coaching tips : आज लगभग हर स्टूडैंट किसी न किसी कोचिंग सैंटर में पढ़ रहा है. अब वे चाहे छोटे हों या बड़े, औनलाइन हों या औफलाइन आप को शिक्षा तो दे ही रहे हैं और यहां शिक्षा देने वाले भले कोच कहलाते हों
लेकिन हैं तो टीचर्स या गुरु ही. तो फिर उन का सम्मान गुरु जैसा क्यों नहीं? क्यों उन की बातों को एक टीचर की हिदायत जैसा नहीं सम झते आज के स्टूडैंट्स?
आजकल देखा जाता है कि स्टूडैंट्स कोचिंग तो जाते हैं लेकिन उन्हें अपने कोच या टीचर्स के पढ़ाएसिखाए पर कुछ खास भरोसा या दिलचस्पी नहीं होती जिस के कई कारण होते हैं जैसे:
उन की फीस को लेनदेन समझना स्टूडैंट्स और उन के पेरैंट्स भारी शुल्क का भुगतान करते हैं, इसलिए कुछ स्टूडैंट्स को लगता है उन्होंने क्लासेज भी किसी सामान या सर्विस की तरह खरीदीं तो यह उन की मरजी कि वे कैसे पढ़ें. इस से वे कोच या टीचर्स को केवल एक काम करने वाले इंप्लोई की तरह ही देखते है.
कोच का कम उम्र का होना
आज बहुत से कोचिंग के टीचर्स बहुत युवा है अर्थात बहुत से स्टूडैंट्स और कोच की उम्र में 5-7 साल का ही फर्क होता है, जिस से स्टूडैंट्स उन्हें एक गुरु या टीचर नहीं बल्कि हमउम्र सम झने की भूल करते हैं और जो आदर का दायरा उन्हें एक टीचर के लिए बनाना चाहिए, वे उस का पालन नहीं करते और कोच की बातों को महत्त्व नहीं देते.
ऐक्सपीरियंस की कमी
अब जब उम्र कम होगी तो ऐक्सपीरियंस भी कम होगा, जिस वजह से बहुत से स्टूडैंट्स यह सोचते हैं कि इस कोच को ज्यादा क्या आता होगा कि इस की बात पर ध्यान दिया जाए.
ऐक्स्ट्रा लोड
स्टूडैंट्स अपनी निरंतर दिनचर्या यानी स्कूल टाइम और होमवर्क से इतना थक जाते हैं कि कोचिंग सैंटर उन्हें एक ऐक्स्ट्रा लोड ही लगता है. वहां जाने का तनाव ही इतना बड़ा हो जाता है कि वह झुं झलाहट या उदासीनता का रूप लेता है, जिस से स्टूडैंट्स टीचर या कोच की अवज्ञा कर जाते हैं.
स्कूल और कोचिंग की भिन्नता
स्टूडैंट्स अकसर अपने स्कूल के लिए जो सम्मान रखते हैं वह कोचिंग सैंटर के लिए नहीं रखते. इस का एक कारण यह है कि स्कूल उन से बचपन के समय से ही जुड़ जाता है. स्कूल में उन्होंने सिर्फ पढ़ाई ही नहीं बल्कि बचपन के कई खेल खेले, अपने बैस्ट फ्रैंड्स भी बनाए और बहुत से टीचर्स के चाहते भी बने. इसलिए स्कूल के लिए उन के मन में हमेशा एक खास जगह रहती है. मगर यह सब उन्हें कोचिंग में नहीं मिलता. यहां तो वे सिर्फ मार्क्स या रैंक बढ़ाने की दौड़ में शामिल होने आते हैं.
रैंकिंग की दौड़
कोचिंग कल्चर में अधिकतर रैंक वाले स्टूडैंट्स को अत्यधिक प्राथमिकता दी जाती है. जो स्टूडैंट्स पीछे रह जाते हैं वे कोच के प्रति असंतुष्ट हो सकते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि कोचिंग उन्हें केवल उन की फीस के लिए ही महत्त्व देता है.
बड़े बैच
बड़े बैचों में व्यक्तिगत बातचीत खो जाती है. इस से टीचर्स को स्टूडैंट्स से जुड़ने, उन्हें करीब से सम झने का मौका नहीं मिलता और कई स्टूडैंट्स इस वजह से टीचर्स की बातों को मान नहीं देते या उन्हें अपनी मनमानी करने का एक मौका सा मिल जाता है.
औनलाइन विकल्पों की उपलब्धता
हाई क्वालिटी ऐंड सर्विस वाले डिजिटल शिक्षा प्लेटफौर्मों की बढ़ती संख्या और लोकप्रियता के साथ स्टूडैंट्स को कभीकभी लगता है कि औफलाइन टीचर की आवश्यकता नहीं है और जब वे औनलाइन क्लास ले सकते हैं तो किसी कोच या कोचिंग की क्या जरूरत है.
मगर इन सभी कारणों में जो सब से बड़ा या संवेदनशील मुद्दा है वह है ह्यूमिलिएशन या नीचा दिखाना. आज हर कोचिंग सैंटर अपने स्टूडैंट्स को नीट क्लीयरैंस, आईआईटी सीट, यूपीएससी रैंक दिलाने में इतना जोर आजमा रहा है कि कई बार स्टूडैंट्स की भावनाओं से खेल रहा है. कई बार देखा गया है कि कोचिंग के इंटरनल ऐग्जाम, मोक टैस्ट आदि में स्टूडैंट्स पास नहीं हुए या कम स्कोर करते हैं तो उन्हें बहुत ह्यूमिलेट किया जाता है, दूसरें स्टूडैंट्स के सामने उन की निंदा की जाती है.
इस तरह का बरताव स्टूडैंट्स का मनोबल तो तोड़ता तो ही है, साथ ही उन का कोचिंग सैंटर और कोच पर से विश्वास भी खत्म कर देता है. इस से उन के अंदर का आदरभाव हमेशा के लिए खत्म हो जाता है. इसलिए कोचिंग और कोच को भी मर्यादाओं का पालन करना चाहिए और किसी भी स्टूडैंट के मान को स्कोर पर नहीं मापना चाहिए. उन के लिए हर स्टूडैंट्स को एकजैसा ही महत्त्व देना चाहिए.
माना कि कोचिंग सैंटर आप से स्कूल की तरह बचपन से नहीं जुड़ा, माना कि वह मोटी फीस ले रहा है, माना कि कोच की उम्र इतनी बड़ी नहीं, माना उस का ज्ञान या उस का ऐक्सपीरियंस कम है, माना कि उस की बौंडिंग आप से खास नहीं लेकिन इन बातों या तथ्यों में कोई भी ऐसी वजह नहीं कि आप उन की इज्जत न करें, उन का सम्मान न करें या उन के पढ़ाने को हलके में लें. वे 1-2 घंटों के लिए ही आप को पढ़ा रहे हैं लेकिन पढ़ाने वाला, शिक्षा देना वाला हमेशा गुरु ही रहेगा और गुरु आप के लिए हमेशा आदरणीय है.
यह भी ध्यान दें कि आप ने फीस दे दी है, आप के पेरैंट्स का पैसा सिर्फ इसलिए कोचिंग में दिया गया है ताकि आप को पढ़ाई में मदद मिल सके, आप के डाउट्स क्लीयर हो सकें और आप अच्छा स्कोर कर सकें. इसलिए उस पैसे को वेस्ट मत जाने दो और कोचिंग में पूरा मन लगा कर पढ़ो. भले आप को लगता हो कि कोच इतना काबिल नहीं या ऐक्सपीरियंस्ड नहीं. उस से आप को कुछ तो ज्ञान मिलेगा ही. इसलिए कोचिंग में दिए पैसों का, अपने समय और कोच के समय का मान करो और पढ़ो.
ध्यान रखें
यदि फिर भी कोई परेशानी है, सवाल है तो अपने टीचर्स (स्कूल और कोचिंग दोनों के), अपने पेरैंट्स के साथ शेयर करो और हां किताबों और पत्रिकाओं का सहारा लो. कई बार छोटी से बड़ी उल झन का समाधान आप को किताबों और पत्रिकाओं में मिल जाता है क्योंकि इन्हें लिखने वाले हर उम्र, लिंग, क्लास की समस्या को ध्यान में रख कर, उन की मानसिकता को सम झ कर और पूरे वातावरण को सम झ कर अपने अनुभवों के साथ हर तर्क, आधार को सामने रखते हैं.
यह सचाई आप को सोशल मीडिया के प्लेटफौर्म पर नहीं मिलेगी क्योंकि यूटूयूब वालों को अपने सब्सक्राइबर बढ़ाने से मतलब है और इंस्टाग्राम वालों को लाइक और व्यूज से, जिस के लिए वे हर तरह का झूठ और नाटक अपना रहे हैं, इसलिए उन की बातों में आ कर अपना विवेक न खोएं.
सम्मान करें
माना कि कोचिंग सैंटर आप से स्कूल की तरह बचपन से नहीं जुड़ा, माना कि वह मोटी फीस ले रहा है, माना कि कोच की उम्र इतनी बड़ी नहीं, माना उस का ज्ञान या उस का ऐक्सपीरियंस कम है, माना कि उस की बौंडिंग आप से खास नहीं लेकिन इन बातों या तथ्यों में कोई भी ऐसी वजह नहीं कि आप उन की इज्जत न करें, उन का सम्मान न करें या उन के पढ़ाने को हलके में लें. वे 1-2 घंटों के लिए ही आप को पढ़ा रहे हैं लेकिन पढ़ाने वाला, शिक्षा देना वाला हमेशा गुरु ही रहेगा और गुरु आप के लिए हमेशा आदरणीय है.

