महिलाओं को विवाह के बाद अपने व्यक्तित्व को, स्वभाव को बहुत बदलना पड़ता है. समाज सोचता है कि नारी की स्वयं की पहचान कुछ नहीं है. विवाह के बाद बड़े प्यारदुलार से उस की सामाजिक, मानसिक स्वतंत्रता उस से छीनी जाती है. छीनने वाला और कोई नहीं स्वयं उस के मातापिता, सासससुर और पति नामक प्राणी होता है. विदाई के समय मांबाप बेटी को रोतेरोते समझाते हैं कि बेटी यह तुम्हारा दूसरा जन्म है. सासससुर और पति की आज्ञा का पालन करना तुम्हारा परम कर्त्तव्य है.

ससुराल में साससुसर और पति कुछ स्पष्ट और कुछ संकेतों द्वारा ससुराल के अनुसार चलने की हिदायत देते हैं. मध्यवर्गीय व उच्च मध्यवर्गीय समाज की यह खास समस्या है. पत्नी विदूषी है, किसी कला में पारंगत है, तो उस में ससुराल वाले और संकुचित मानसिकता वाला पति उस की प्रतिभा का गला घोटने में देर नहीं करता. नृत्यकला या गायन क्षेत्र हो तो उसे साफतौर पर बता दिया जाता है कि ये सब यहां नहीं चलेगा. इज्जतदार खानदान के मानसम्मान की दुहाई दी जाती.

यहां तक कि कुछ घरों में बहुओं को नौकरी करने से भी मना कर दिया जाता है. भले घर में कितनी ही आर्थिक तंगी क्यों न हो. किसीकिसी घर में जहां आर्थिक तंगी, बदहाली चरम सीमा पर पहुंची होती है वे नौकरी की आज्ञा तो दे देते हैं, पर औफिस में किसी पुरुष से बात नहीं करनी और पूरा वेतन पति या सास को देने की शर्त रख दी जाती है. कठपुतली वाली जिंदगी

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