लंबी कहानी: कुंजवन (भाग-4)

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तैयार हो वो औफिस आई. बैठते ही रामदयाल पानी ले आया. पुराना स्टाफ, सीधासादा, वयोवृद्ध. पहले बिटिया कहता था अब मालकिन का सम्मान देता है. पानी ले उस ने कहा.

‘‘रामदयाल.’’

‘‘जी साब.’’

‘‘ब्रिजेश बाबू आ गए?’’

‘‘जी साब जी.’’

‘‘उन को बुला दो.’’

थोड़ी देर में ब्रिजेश बाबू आए. दादू से थोड़े ही छोटे हैं, सरल स्वभाव के हैं.

‘‘आइए बाबूजी बैठिए.’’

‘‘कोई समस्या है क्या मैडम.’’

‘‘जी, देखने में तो छोटी बात है पर समस्या छोटी नहीं बहुत बड़ी हो सकती है.’’

वो घबराए.

‘‘क्या हो गया?’’

‘‘आप तो जानते हैं हर कंपनी का नियम है कि उस की डील छोटी हो या बड़ी उसे सिक्रेट रखा जाता है.’’

‘‘हां यह तो व्यापार का पहला नियम है.’’

‘‘हमारी कंपनी में इस नियम का पालन नहीं हो रहा.’’

चौंके वो, ‘‘क्या?’’

‘‘हाल में जो डील हुई है उस की खबर बाहर फैली है…कैसे?’’

वो घबराए, मुख पर चिंता की रेखाएं उभर आईं, ‘‘पर…उस की खबर तो आप, सरजी और मुझे ही है बाकी किसी को पता नहीं.’’

‘‘तभी तो यह प्रश्न उठ रहा है सूचना बाहर कैसे गई?’’

उन्होंने सोचा, शिखा ने सोचने के लिए उन को समय दिया.

उन्होंने कहा, ‘‘मुझे छोड़ दो और लोगों को पता हो सकता है.’’

‘‘वो कौन हैं?’’

‘‘एक तो मेरा सहकारी जो सारे कागजपत्तर संभालता है दूसरा टाईपिस्ट जिस ने डील के पेपर मतलब टर्म्स औफ कंडीशंस टाईप किया था.’’

‘‘आप के पास कितने दिनों से काम कर रहे हैं?’’

‘‘हो गए चारपांच वर्ष.’’

‘‘स्वभाव के कैसे हैं दोनों?’’

‘‘सहकारी राजीव तो प्रश्न के बाहर है. रामदयाल का पोता गरीब पर ईमानदार सज्जन परिवार वैसे ही सहमा रहता है दादा के डर से.’’

‘‘दूसरा?’’

‘‘टाईपिस्ट विकास हां वो थोड़ा शौकीन और चंचल स्वभाव का है. पर इस प्रकार का अपराध कभी कुछ किया नहीं…’’

‘‘वो बिक सकता है?’’

‘‘शायद.’’

‘‘उस पर नजर रखिए. जरूरत हो तो निकाल सकते हैं.’’

‘‘अगर लीक हुआ हो तो कंपनी को नुकसान?’’

‘‘बहुत ज्यादा नहीं पक्की डील है हमारी. काम भी शुरू हो जाएगा बस, इस की थोड़ी चिंता रहेगी.’’

‘‘मैं उस पर नजर रखता हूं.’’

अगले दिन छुट्टी थी. ड्राइंगरूम में बैठ दादू पोती बात कर रहे थे, ‘‘दादू, टाईपिस्ट विकास ही चोर निकला आखिर.’’

‘‘हां, मेहता ने खरीदा था उसे.’’

‘‘तब तो वो हमारे लिए खतरनाक है.’’

‘‘पर अब वो हमारे काम का है.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘उस ने यह काम एक मुश्त मामूली पैसों के लिए किया था. मैं ने प्रतिमाह हजार रुपए बढ़ा दिए.’’

‘‘यह लो, सजा के बदले ईनाम.’’

‘‘बड़ी कंपनी चलाने के लिए दोचार कांटे भी पालने पड़ जाते हैं बेबी.’’

‘‘आप जो ठीक समझो.’’

‘‘बेबी, एक बात तुझ से कहने की सोच रहा था. मेहता संस की हालत अच्छी नहीं है. मतलब डूबने के कगार पर है.’’

‘‘पुरानी खबर है दादू.’’

‘‘तू जानती है? कैसे पता? इन लोगों ने खबर छिपा रखी है और बापबेटे लंबी चौड़ी हांकते घूम रहे हैं.’’

‘‘मैं तो आम स्कूल में नहीं पढ़ी वो स्कूल महंगा स्कूल था. मेरे नब्बे प्रतिशत दोस्त व्यापारी परिवारों के बच्चे थे जिन में बंटी भी था. इन का घर भी गिरवी पड़ा है.’’

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‘‘इतना नहीं पता था मुझे.’’

‘‘हां, व्यापार डूबा है बेईमानी और धोखाधड़ी के कारण और बापबेटे के खराब, दिखावा, अय्याशी के खर्चे में अभी भी कोई कमी नहीं.’’

‘‘बेबी, तेरा भविष्य तो तेरी मम्मा वहां ही बांध गई है. क्या होगा बेटा?’’

‘‘चिंता मत करो दादू. कोई बंधन नहीं, शराब के नशे में इंसान अनापशनाप बोलते ही रहते हैं.’’

‘‘पर उसी को इन लोगों ने पत्थर की लकीर मान लिया है.’’

‘‘इन के मानने से क्या होगा? मैं नाबालिक हूं क्या?’’

‘‘कितने दुख की बात है हाथ का हीरा फेंक कांच का टुकड़ा उठा लिया तेरी मां ने.’’

‘‘मां की बात मां जाने’’ जीवन तो मेरा है.

दोपहर सोने की आदत नहीं थी शिखा को. टीवी का नशा भी नहीं. तो कंप्यूटर खोल कुछ बकाया काम निबटाने बैठी. जो डील हुई है उस से अब निश्चिंत है. तीन बड़ी गारमेंट्स कंपनी को ठेका दे दिया है ढाई महीना समय सीमा दे कर. पंद्रह दिन हाथ में रखा है पैकिंग, कारगो की व्यवस्था इन सब के लिए. यह तीनों कंपनियों के साथ सोनी कंपनी पहले भी काम कर चुकी हैं. भरोसे की पार्टी है समय पर सप्लाई और माल की गुणवत्ता में कभी कोई शिकायत का मौका नहीं मिला और अच्छे व्यापार के लिए यही दोनों बातें अहम हैं फिर भी दादू ने बारबार उन को सावधान कर दिया है कि पहला विदेशी सप्लाई है बीस से साड़े उन्नीस भी नहीं होना चाहिए. सच दादू न होते तो वो कुछ भी नहीं कर पाती. दादू की छाया में रह कर ही वो इतनी कुशलता से सिर्फ व्यापार को चला ही नहीं रही वरन् ऊंचाई पर ले जाने में सफल हो रही है. और मम्मा ने दादू को सदा ही वेतन पाने वाला कर्मचारी ही समझा ससुर का आदर सम्मान कभी दिया ही नहीं उन को, दादू बेटा जाने के बाद भी यहां टिके रहे बस शिखा के लिए, नहीं तो उन के जैसे अनुभवी और ईमानदार व्यक्ति का आदर कम नहीं. कोई भी दुगने पैसों से उन का स्वागत कर लेता. कल दादू ने ठीक ही कहा था मम्मा ने हाथ से कच्चा हीरा फेंक कांच का टुकड़ा उठा लिया था यह भी नहीं सोचा कि कांच हथेली को काट लहूलुहान कर देगा.

कच्चा हीरा था सुकुमार, नाम जैसा ही कोमल भावुक और मृदुभाषी. रंग सांवला अवश्य था पर सौम्यता लिए आकर्षक व्यक्तित्त्व था उस का. कितना मीठा गला था उस का और क्लास क्या पूरे स्कूल का बैस्ट स्टूडैंट. मां के विराग का एक ही कारण था कि वह गरीब था. मातापिता नहीं थे एक आश्रम में बड़ा हुआ वो भी उम्र की एक सीमा तक फिर तो घर के दो बच्चों को मुफ्त पढ़ाने के बदले किसी बड़े आदमी के आउट हाऊस में रहता था कुछ और बच्चे पढ़ा अपना खर्चा चलाता था. शिखा, बंटी यह सब जिस स्कूल में पढ़ते थे वो महंगा स्कूल था बड़े बिजनैसमैन, नेता, मंत्री, अभिनेता जैसे लोगों के बच्चे ही वहां प्रवेश पाते. वहां ही सुकुमार पढ़ता था यह भी संयोग की बात थी. असल में इस स्कूल के प्रतिष्ठक जो थे वो धार्मिक और दयालू थे. उन्होंने एक नियम बनाया था कि प्रतिवर्ष छटी क्लास में कोई गरीब बेसहारा पर मेधावी को स्कूल ट्रस्ट गोद लेगा उस के ग्रैजुऐशन तक स्कूल कालेज का पूरा खर्चा उठाएगा. उन का चुनाव होगा एक प्रतियोगिता के द्वारा. सुकुमार उस में भी प्रथम आया था तो सहपाठी बन गया. अपने गुण के कारण वो सब का प्रिय बन गया था और शिखा का प्रियतम. उस का पहला प्यार, बचपन का प्यार. मेहता परिवार की नजर शुरू से शिखा पर थी, इतना बड़ा राजपाट अकेली मालकिन वो. बंटी भी बचपन से अति चालाक था वो शिखा से चिपकाचिपका रहता जिस से सुकुमार उस के पास ना आ पाए. शिखा उसे कभी पसंद नहीं करती, काटने की कोशिश भी करती पर मम्मा बंटी की स्कूल की सहेली होने के नाते इस परिवार और बंटी के लिए कोठी नं. 55 के द्वार सदा चौरस खुले रहते बंटी उस का लाभ उठाता. शिखा उस से बोले ना बोले, उस के साथ खेले ना खेले यहां ही पड़ा रहता. पर शिखा, सुकुमार एकदूसरे के प्रति समर्पितप्राण थे पहले ही दिन से. ग्रैजुएशन से पहले ही उस ने मम्मा से उस का हाथ मांगने का साहस कर डाला उसे कुत्ते की तरह दुत्कार ‘कुंजवन’ से निकाला मम्मा ने सब के सामने और शिखा को भी पता नहीं क्या हो गया मम्मा के सुर में सुर मिला उस ने भी उसे अपमानित तो किया ही साथ ही कड़े शब्दों में कह दिया कि आगे वे अपनी शक्ल उसे कभी ना दिखाए.

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