लंबी कहानी: कुंजवन (भाग-5)

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पता नहीं उसी दिन से सुकुमार एकदम गायब हो गया, कहीं भी कभी भी किसी को दिखाई नहीं दिया. हवा में कपूर की तरह अदृश्य हो गया. फिर तो मम्मा ने उसे ‘लंदन’ ही भेज दिया एमबीए करने. इस घटना से बंटी का खून दुगना हो गया ऊपर से मम्मा की शह पा वो शिखा को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति ही मानने लगा. मम्मा ने कई बार दोनों की मंगनी की बात कही अवश्य थी पर वो भी व्यस्त थीं तो बात बस बात ही बन कर रह गई है अभी तक. शिखा ने उसे कभी पसंद नहीं किया अब मम्मा के बाद तो उठतेबैठते उसे काटती है. पता नहीं सुकुमार अब कहां है. किस हाल में है. भावुक लड़का, शिखा को खो कर कहीं उस ने आत्महत्या तो… सिहर उठी. ना…ना भगवान, वो जहां भी हो उस की रक्षा करना, उसे स्वस्थ और सुखी रखना. एक प्रतिभा की अकालमृत्यु मत होने देना प्रभू.

आंसू पोंछे शिखा ने लैपटौप औन करते ही कल की घटना याद हो आई लंच के बाद से सिर थोड़ा भारी हो रहा था. घर आ कर सोने की सोच रही थी कि बंटी आया. ठीक उसी चाल से दनदनाता आ कर कुरसी खींच बैठ गया. कोई औपचारिकता की परवा किए बिना. पीछे से रामदयाल सहमा सा, डरा सा झांकने लगा शिखा ने इशारा किया तो वो चला गया. गुस्से से सिर जल रहा था पर संयम और धैर्य की शिक्षा उस ने पापा से ली है नहीं तो मम्मा जैसी महिला को झेलना आसान नहीं था. बंटी सीधे अपने मुद्दे पर आया, ‘डील तो तुम ने कर ली पर इतनी बड़ी सप्लाई तीन महीने में दे पाओगी?’

शिखा ने सामने की खुली फाइल बंद की और कुरसी की पीठ पर ढीली पड़ गई.

‘‘लगता है मेरे बिजनैस को ले कर तुम को मुझ से भी ज्यादा चिंता है.’’

‘‘क्यों न हो. दो दिन बाद मुझे ही तो संभालना है.’’

‘‘ओ रिऐली, मुझे तो पता नहीं कि मैं सब कुछ छोड़ कर सन्यास ले रही हूं.’’

‘‘सन्यास की बात किस ने की? शादी के बाद दायित्व तो दायित्व मेरा ही होगा.’’

‘‘किस की शादी?’’

‘‘सारी दुनिया जानती है मैं तुम्हारा मंगेतर हूं.’’

‘‘कोई रस्म हुई है क्या?’’

‘‘वो भी कर लेते हैं. अब मुझे शादी की जल्दी है.’’

‘‘तुम को होगी ही अपनी डूबती नाव को किनारे पर लाने की, पर मेरे साथ ऐसी कोई समस्या नहीं.’’

‘‘अरे आंटी का दिया वचन…’’

‘‘नशे में धुत् हो कर कोई भी अपने को भारत का प्रधानमंत्री घोषित करे तो क्या वो हो जाएगा.’’

रंग उड़ गया बंटी का, ‘‘क्या कह रही हो?’’

‘‘जो तुम सुन रहे हो.’’

‘‘सारा समाज जानता है आंटी ने वचन दिया था.’’

‘‘मैं भी जानती हूं इस बात का प्रचार तुम लोगों ने ही जोरशोर से किया है. उस से कोई फर्क नहीं पड़ता. जाने दो यह काम का समय है तुम को कोई काम हो तो कहो.’’

नरम पड़ा बंटी,

‘‘देखो इतना बड़ा सप्लाई इतने कम समय में कोई एक कंपनी तो दे नहीं पाएगी तुम को कई कंपनियों से काम करवाना पड़ेगा. एक लाट हमें भी दे दो.’’

‘‘सौरी,’’ मैं ठेका दे चुकी.

‘‘मुझे बताया तक नहीं?’’

‘‘नहीं. पहला विदेशी आर्डर है. मैं ने उन को काम दिया है जिन पर मुझे भरोसा है, विश्वास है. तुम पर विश्वास का ही प्रश्न नहीं तो भरोसा क्या होगा?’’

बंटी का गोरा मुख लाल हो गया. शिखा ध्यान से उसे देख रही थी. वो वास्तव में हैंडसम है, लंबा, गोरा तीखे नैन नक्श उसी का हम उम्र पर अत्यधिक शराब और अय्याशी ने अभी से उस के शरीर को थुलथुल बनाना शुरू कर दिया है. मुख पर, आंखों के नीचे चर्बी की परतें जमनी शुरू हो गई हैं. उसे लगा थोड़ी थकान भी है.

बंटी उठ खड़ा हुआ.

‘‘तो तुम आंटी के वचन की परवा नहीं करोगी?’’

‘‘परवा तो तब करती अगर वचन होता.’’ शराब पिला कर बड़ीबड़ी संपत्ति लिखवा लेते हैं लोग. बिना कुछ बोले चला गया था बंटी, शिखा विचलित नहीं हुई पर घटना सुन कर चिंता में पड़ गए थे जानकीदास.

‘‘बेटा, यह अच्छा नहीं हुआ.’’ यह अच्छे लोग नहीं हैं चुप नहीं बैठेंगे.

‘‘आप इतने दुखी क्यों हैं दादू?’’ क्या करेंगे वो?

‘‘यह तो नहीं जानता पर चिंता तो हो रही है.’’

‘‘बिजनैस में दुशमनी तो चलती ही रहती है.’’

‘‘पता है जीवनभर इसी से जुड़ा हूं. शरीफों की दुशमनी से डर नहीं लगता वो जो भी करें अपने स्वर से नीचे नहीं गिरते पर यह लोग तो इतने गिरे हुए हैं और इस समय बौखलाए हुए हैं, क्योंकि सड़क पर आने ही वाले हैं बस…’’

‘‘जो होगा देखा जाएगा.’’

‘‘बेबी.’’

‘‘कुछ कहोगे दादू.’’

‘‘बेटा तू हमारी अकेली वारिस है. शादी नहीं करेगी क्या?’’

अनमनी हो गई थी शिखा,

‘‘पता नहीं दादू. हाथ में शादी की लकीर डालना ही भूल गए होंगे विधाता पुरुष.’’

उस ने हंस कर ही टाला पर मानो एक जलता तीर उस के हृदय के अंदर जा घुसा.

दूसरे दिन सुबह आफिस जाने के लिए तैयार हो रही थी कि मोबाइल बजा. उस ने देखा दुर्गा मौसी. मां की ममेरी बहन पर सहेली थी मां की, एक स्कूल की क्लास में. रहीस खानदान की नाकचढ़ी मालकिन. मम्मा रहते बहुत आना जाना था अब बहुत कम हो गया. असल में शिखा को ही समय नहीं मिलता. ‘हैलो मौसी. गुड मौर्निंग. कैसी हो आप?’

‘‘बस रहने दे. मैं कैसी हूं उस से तुझे क्या?’’

‘‘सौरी मौसी. गुस्सा मत करो. विश्वास करो एकदम समय नहीं मिलता.’’

‘‘जाने दे. कहां है तू? रास्ते में तो नहीं?’’

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‘‘बस निकलने ही वाली हूं.’’

‘‘सुन, आज शाम मेरे घर आ जा साथ खाना खाएंगे.’’

‘‘अचानक डिनर का निमंत्रण ओहो ध्यान ही नहीं था. हैपी बर्थ डे मौसी. जरूर आऊंगी.’’

गला भारी हो गया मौसी का.

‘‘मंजरी क्या गई तू ने मौसी से रिश्ता ही तोड़ दिया.’’

शिखा का भी मन भर आया.

‘‘नहीं मौसी, जनम का रिश्ता कभी टूटता है भला. मुझे इतना काम रहता है…’’

‘‘सारा काम तू ने अपने सिर पर लिया क्यों है. उस बूढ्ढे को मोटी रकम दे कर क्यों रखा है. पड़ेपड़े छप्पन भोग उड़ाने.’’

दादू के प्रति अपमानजनक शब्दों से मन ही मन आहत हुई शिखा. मन में जो प्रसन्नता जागी थी वो विराग में बदल गया. रसहीन शब्दों में बोली,

‘‘उन्होंने ही सब कुछ संभाल रखा है. नहीं तो मुझे भला क्या आता था?’’

‘‘काम तेरा है संभालना तो तुझे ही पड़ेगा. वो तो कर्मचारी ही हैं.’’

‘‘और मेरे सब से बड़े सहारा जाने दो. अब चलूं.’’

‘‘सुन तू आफिस से सीधे यहां आना. रात को खाना खा कर घर जाएगी और हां यह गिफ्टविफ्ट के चक्कर में मत पड़ना.’’

‘‘एकदम नहीं पड़ूंगी.’’

आफिस से जल्दी निकल शिखा ने सीधे कनाट प्लेस आ कर मौसी के लिए पिओर लैदर का बैग खरीदा. फिर नहाधो कर तैयार हुई. आज उस ने सफेद सीधेसादे शर्ट के नीचे लंबे खादी का स्कर्ट पहना घेरदार जयपूरी प्रिंट का. इस समय वो मासूम किशोरी सी लग रही थी. जब मौसी के घर पहुंची तब पांच बज चुके थे. ड्राइंगरूम में पैर रखते ही उस का सुबह से हलके मिजाज पर काले पत्थर का बोझ पड़ गया. बंटी और उस की मां वहां पहले से महफिल जमाए बैठे हैं. कोल्ड ड्रिंक और नमकीन का दौर चल रहा है. यह कोई अनहोनी बात नहीं दुर्गा मौसी भी बंटी की मां नंदा की क्लासमेट थी और अकसर पार्टियों में साथ घूमती हैं. उसे इन बातों की जानकारी होते भी मन में विराग आना नहीं चाहिए था. उस ने गिफ्ट पकड़ाया.

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