लंबी कहानी: कुंजवन (भाग-7)

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दादू को आखिर लंदन जाना ही पड़ा. शिखा उन को भेजना नहीं चाहती थी, स्वयं ही जाती. लंदन उस की परिचित जगह है. जानने वाले भी कम नहीं हैं पर यहां जैकेटों के सप्लाई को ठीक समय पर भेजना है, उन की क्वालिटी पर नजर रखना है दुश्मनों की कमी नहीं इतना बोझ दादू के लिए संभालना जरा कठिन था और जब से बंटी को साफ मना कर आई है तब से उसे पूरा विश्वास है कि वो चुप नहीं बैठेगा, कहीं से ना कहीं से नुकसान पहुंचाने की कोशिश तो करेगा ही, ऐसे में दादू को अकेले छोड़ना…लंदन पार्टी से बातचीत पूरी हो चुकी है. पावर आफ एटौर्नी ले कर गए हैं काम हो जाएगा. शिखा अब बाहर की पार्टियों में ज्यादा रुचि ले रही है. इधर बंटी की तरफ से उस के मन में आशंका बढ़ी है बहुत सतर्क रहना पड़ रहा है. वो सोच रही थी दुर्गा मौसी के घर की घटना को हफ्ता बीता पर बंटी चुप क्यों है? सुलह करने की कोशिश क्यों नहीं की? रविवार का दिन था थोड़ी देर से उठी वो. रात देर तक काम किया था. दादू से बात भी हुई काम बन गया, साईन हो गए कल सुबह चले आएंगे. यह भी बड़ी डील है शिखा घबरा रही थी पर दादू ने साहस जुटाया, ‘‘घबराने की कोई बात नहीं, हम सोचते हैं हम कर रहे हैं पर करने वाला तो कोई और है.’’

लच्छो मौसी ने आज उस के पसंद का नाश्ता बनाया है, आलू परांठा, मूली के लच्छे, बूंदी का रायता. वो शाकाहारी नहीं है पर मांस अंडा ज्यादा पसंद नहीं करती.

दादू तो पूरी तरह शाकाहारी हैं. शिखा मेज पर बैठी ही थी कि दुर्गा मौसी आ धमकी. शिखा को उन का आना बुरा नहीं लगा. अकेली बैठ खाना अच्छा नहीं लगता. उस ने मौसी का हार्दिक स्वागत किया.

‘‘आओ मौसी. नाश्ता करो.’’

तभी लच्छो गरम परांठा ले कर आई. सुगंध से कमरा महक उठा.

‘‘मौसी, एक और प्लेट ला दो.’’

दुर्गा मौसी तुरंत बैठ कर गोद में नैपकिन बिछाते बोली, ‘‘तेरे दादू नाश्ता नहीं करेंगे आज?’’

सतर्क हुई शिखा, मौसी उस की सगी है पर निकटता है मेहता परिवार से क्योंकि रुचि और सोच उन लोगों से ही मिलती है इन की. एक प्लेट में परांठा डाल कर ही लाई लच्छो रख गई मौसी के सामने. वो तुरंत टूट पड़ी प्लेट के ऊपर.

‘‘तेरे दादू क्या दिल्ली से बाहर गए हैं?’’

‘‘नहीं. द्वारका में उन के गुरुभाई के घर कुछ पूजा प्रवचन है.’’

‘‘हूं.’’

पूरी कटोरी भर रायता पी फिर से कटोरी भरती बोलीं, ‘‘कामकाज, जिम्मेदारी कुछ है नहीं तो यह सब फालतू काम करो.’’

‘‘यह फालतू काम तो है मौसी पर साफ शुद्ध भगवान का नाम तो है. जिम्मेदार कामकाजी लोग तो शराब की पार्टी करते चार सौ बीवी का प्लान बनाते उस से तो अच्छा है.’’

मौसी इतनी भी मूर्ख नहीं कि व्यंग के तीर की दिशा ना समझे पर इस समय अपने मिजाज पर कंट्रोल करना बहुत जरूरी है. तुरंत प्रसंग टाल दिया.

‘‘बेबी, बंटी की ओर देख कर छाती फटती है मेरी.’’

‘‘अरे क्या हुआ? हाथपैर टूट गए क्या? हां गाड़ी बड़ी तेज चलाता है. असल में पीने के बाद कंट्रोल नहीं कर पाता. एक ड्राइवर रखने को कहो उसे.’’

गुस्सा पी लिया मौसी ने.

‘‘तू समझती क्यों नहीं, तू ने बड़ा दुख दिया है उसे. बचपन से उस ने तुझे अपना समझ, प्यार किया.’’

‘‘अपना समझा होगा, क्योंकि किसी भी चीज को कोई भी उस की अपनी चीज समझ सकता है पर प्यार का नाम मत लो इस शब्द का मतलब भी नहीं पता उसे.’’ नरम स्वर में दुर्गा मौसी ने कहा.

‘‘उन को आस थी कि तू बंटी की दुलहन बनेगी और यह कोई खयाली पुलाव भी नहीं. मेरे सामने मंजरी ने वचन दिया था तभी तो…’’

‘‘मौसी, उस समय तुम तीनों ही नशे में धुत् थीं शायद बंटी भी गिलास ले साथ दे रहा था.’’

‘‘पर वचन तो दिया ही था.’’

‘‘बारबार तुम ‘वचन’ शब्द को मत दोहराओ तुम्हारे मुख से शोभा नहीं देता. यह बड़ा पवित्र शब्द है उसे गंदे शराब के गिलास में मत बोलो. सुनो नशे के धुन में किए काम को कानून भी मान्यता नहीं देती. मैं ने तो साफ कह दिया है कि मैं इस बात को नहीं मानती.’’

‘‘पर अपनी मां का तो मान रख.’’

‘‘मां. नहीं मां के प्रति मेरे मन में कोई भी अनुभूति नहीं है और मां ने कभी बेटी का प्यार दिया है मुझे.’’

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‘‘गुस्सा मत कर मैं तो यों ही कह रही थी. ठीक है बंटी ना सही कोई दूसरा लड़का.’’

‘‘चुना एक बार ही जाता मौसी बारबार नहीं.’’

‘‘बेटा तू ही सोच वो अनाथ, गरीब आश्रम में पला लड़का तेरे स्तर, तेरे परिवार में बेमेल नहीं था?’’

‘‘बंटी किस बात से मेल खा रहा, शराबी, चरित्रहीन, सड़क पर आ कर खड़े होने वाले भ्रष्ट व्यापारी परिवार…’’

मौसी के शब्द ही खो गए. जाते समय बोल गई, ‘‘बेबी, तू माने या ना माने पर मुझे तेरे लिए बड़ी चिंता है.’’

‘‘इस का सीधा मतलब है कि तुम भी बंटी को विश्वास नहीं करती वो अपने मतलब के लिए मेरे साथ कुछ भी गलत कर सकता है. हद से नीचे जा सकता है. मौसी के पास इस का कोई उत्तर नहीं था. वो थोड़ी देर चुप रह कर बोली, पर बेबी, तेरे दादू और कितने दिन के… तू अकेली कैसे?’’

‘‘तब सोचूंगी कुछ.’’

‘‘वो…वो लड़का… मिलता है कभी?’’

‘‘सुकुमार? नहीं वो वचन का पक्का है.’’

‘‘मैं चाहती हूं तू अकेली ना रहे?’’

‘‘कल किसी को नहीं पता पर जो भी हो बंटी नहीं.’’

दुर्गा मौसी चुप हो गई.

‘‘लंदन’’ का आर्डर मिल गया. काम बढ़े पहले सोचा था हाथ का काम निबटा दूसरे काम में हाथ डालेगी पर ऐसा हुआ नहीं समय सीमा इन की भी कम है, टैंडर बुलाना पड़ा. दादू ने लौट कर पूरी घटना सुनी तो बहुत तनाव में आ गए, ‘‘बेटा, मुझे डर लग रहा है.’’

‘‘नहीं दादू, अगर चार दुश्मन हैं तो आठ दोस्त भी हैं.’’

‘‘समय पर कोई पास ना हुआ तो?’’

‘‘आप क्या सोच रहे हैं?’’

‘‘यही इस समय वो बौखलाए हुए हैं, डेसपरेट हैं.’’

‘‘कितना बड़ा कारोबार था. हमारे साथ टक्कर लेने वाले थे. सब बरबाद कर दिया.’’

‘‘उस के पीछे एक कारण है दादू.’’

‘‘क्या?’’

‘‘अय्याश तो यह लोग पहले से ही थे, दिमाग में मुफ्त में कंपनी को पाने का सपना पाल बैठे.’’ जानकीदास को चिंता थी शिखा की सुरक्षा की.

‘‘बेबी, एक गार्ड रख दूं?’’

‘‘क्या दादू? इतना भी क्या डरना.’’

‘‘यह अच्छे लोग नहीं हैं. बंटी की संगत बहुत बुरी है.’’

‘‘मैं अपनी गाड़ी में रहती हूं.’’

‘‘उसी का डर है. औफिस गार्ड को मना कर दूंगा कि बंटी अंदर ना आने पाए.’’

‘‘जैसा आप ठीक समझो.’’

‘‘सोच रहा था एक बार जोशीमठ हो आता पर.’’

‘‘जोशीमठ’’ के थोड़ा नीचे गंगा किनारे एक गांव में अति मनोरम स्थान पर पापा ने चार एकड़ जमीन ली थी. कहते थे.

‘‘तेरी शादी के बाद मैं वहां चला जाऊंगा. यहां तो मैं बस तेरे लिए पड़ा हूं. फिर वहां मैं फूलों की खेती करूंगा और शांति से रहूंगा.’’

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वहां एक सुंदर आरामदेह काटेज भी बनवाया था. कभीकभी जा कर रहते भी थे. उसे भी साथ लाना चाहते पर मम्मा के डर से कभी नहीं ले जा पाए. अब दादू महीना दो महीना में जाते हैं. फूलों का बगीचा भी लगाया है. माली है एक केयर टेकर परिवार सहित आउट हाउस में रहता है. झड़ाईसफाई करते हैं और दादू जब रहते हैं तब सेवा करते हैं. नई उम्र का जोड़ा है, सीधेसादे भले लोग.

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लंबी कहानी: कुंजवन (भाग-6)

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‘‘हैपी बर्थ डे मौसी’’

गिफ्ट ले पुलकित मुख से गुस्सा दिखाया दुर्गा ने, ‘‘कहा था न गिफ्ट मत लाना.’’

वो हंसी. आज बहुत ही सुंदर लग रही है वो एकदम ओस धूली अभीअभी खिली फूल जैसी. कल ही घमासान हुई है बंटी के साथ पर बंटी के चेहरे पर उस की कोई झलक तक नहीं. हंस कर बोला,

‘‘हाई बेबी.’’

‘‘हाई आंटी, नमस्ते. कैसी हैं आप?’’

‘‘ठीक हूं बेटी. पर मंजरी के बिना मेरी शौपिंग, पार्टी, मूवी सब सूनी हो गई. लोग कितनी उमर तक बैठे रहते हैं और उसे ही जल्दी पड़ी थी मुझे छोड़ जाने की. उन्होंने सुगंधित रूमाल सूखे आंखों पर रगड़ा, दुर्गा ने परिवेश भारी होते देख प्रसंग बदला, ‘‘तुझे लंच पर बुलाया था और तू मेहमान की तरह अब आ रही है.’’

बैठ गई शिखा, एक माजा उठाया.

‘‘क्या करूं काम इतना बढ़ गया है कि…’’

कहते ही मन ही मन उस ने सिर पीटा, यह क्या कह गई दुश्मनों के सामने.

‘‘हां सुना है तू ने बड़ी कुशलता से बिजनैस को बढ़ाया है मंजरी जो छोड़ गई थी उस से दो गुना हो गया है…’’

‘‘मुझे भला क्या आता है मांजी? सब दादू की मेहनत है.’’

‘‘हां सुना है अब विदेश में भी खूब काम चल पड़ा है.’’

‘‘खूब तो नहीं बस पैर रखा ही है. बेचारे दादू ही दोतीन बार विदेश दौड़े इस उम्र में अकेले तब जा कर…’’

‘‘तू भी तो सब छोड़ लगी पड़ी है.’’

‘‘लगना पड़ता है. ईमानदारी और सिनसियर ना हो तो बिजनैस मजधार में डूबता है.’’

एकपल के लिए उस ने मांबेटे पर नजर डाली. देखा दोनों का मुंह फूल गया है. नंदा ने बड़ी चालाकी से बात संभालने का प्रयास किया, ‘‘बेबी, हमें सब से ज्यादा खुशी है, तुम्हारी कामयाबी से, पर तुम्हारी मां की जगह मैं हूं इसलिए तुम्हारे लिए चिंता और डर मन में लगा ही रहता है.’’

‘‘क्यों आंटी?’’

‘‘समय अच्छा नहीं है लोग जलते हैं दूसरों को फलताफूलता देख. इसलिए जो है उसे छिपा उल्टी बात प्रचार करना चाहिए.’’

‘‘मतलब बिजनैस डूब रहा है, दीवाला निकल रहा है यही सच…’’

‘‘एकदम ठीक.’’

शिखा खुल कर हंसी,

‘‘अब समझी आंटी बंटी यही बात क्यों कहता है, लोग भी मान चुके हैं कि मेहता संस के बुरे दिन आ गए.’’ नंदा का मुख तमतमा उठा, बंटी के जबड़े कस गए. नथूने फूल उठे. दुर्गा ने बात संभाली,

‘‘बेबी, नमकीन ले चाय पीएगी? बनवा दूं?’’

शाम को ही लौटने का मन बना कर गई थी शिखा पर नहीं लौट पाई. मौसी ने रात के खाने तक रोक ही लिया. इस बीच दुर्गा मौसी ने टूटे तार को जोड़ने की बहुत कोशिश की, धीरेधीरे माहौल सामान्य भी हो गया. खाना खातेखाते 9 बज गए. मौसी ने चिंता जताई,

‘‘बेबी, इतनी रात हो गई तू अकेली जाएगी.’’

‘‘9 ही तो बजे हैं मौसी. मैं चली जाऊंगी. शंकर दादा हैं तो साथ में.’’

शंकर ‘‘कुंजवन’’ के पुराने ड्राईवर हैं. मंजरी नौकरों को नौकर ही समझती थी पर पापा ने ही सिखाया था कि बड़ों का सम्मान करो भले ही वो नौकर ही क्यों ना हो.

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‘‘बंटी तुझे पहुंचा आता.’’

‘‘अरे नहीं रात कहां है?’’

‘‘दिल्ली का माहौल क्या है देख तो रही है. बेबी मुझे तेरी बड़ी चिंता रहती है. अकेली लड़की?’’

‘‘अकेली कैसे? पूरा घर साथ में है.’’

‘‘फिर भी…समय का काम समय पर ही होना चाहिए.’’

अब तेरी एक नहीं सुनूंगी. कल ही पंडितजी को बुला महुरत निकलवाती हूं.

‘‘महुरत?’’

‘‘हां… बंटी भी कब तक बैठा रहेगा?’’ नंदा बोल पड़ी,

‘‘हमारी तो आफत हो गई है. रोज दोचार लड़की वाले आ बैठते हैं.’’

नरम स्वर में शिखा ने कहा

‘‘वो तो होगा ही आंटी, आप का बंटी हीरा जो है.’’

‘‘तू ही बता कब तक मना करूं?’’

‘‘मना कर ही क्यों रही हैं. कर दीजिए न शादी.’’

‘‘कैसे कर दूं. मंजरी को वचन दिया था उस का पालन ना करने का पाप कैसे सिर पर लूं?’’

दुर्गा ने समर्थन किया

‘‘बात सच है. मंजरी तेरी शादी बंटी से ही तय कर गई है.’’

‘‘शादी तो मुझे करनी है, और मैं बालिग भी कब की हो चुकी तो मैं ही तय करूंगी कि किस से शादी करूंगी.’’

‘‘पर बेटा बंटी तेरा बचपन का दोस्त है. वो तुझे चाहता है.’’

‘‘मौसी मुझे छोड़ उस के दर्जनभर दोस्त और भी हैं जिन को वो चाहता है तो क्या उन सब से शादी करेगा?’’

बंटी चीखा.

‘‘शिखा, जबान संभाल के बात करो,’’

‘‘मैं भी चाहती हूं तुम से बात ना करूं. मजबूर किया गया बोलने को. मौसी मैं चली. याद रखना इन के साथ मुझे अपने घर कभी मत बुलाना.’’

उस के निकलते ही नंदा बेटे पर झिड़की.

‘‘बापबेटे कटोरा ले चौराहे पर खड़े होना.’’

बचने की आखरी उम्मीद है शिखा. उसे नाराज कर दिया नालायक अब डूबो मझधार में. तेवर दिखाने चला तो शिखा को.

‘‘बात सही है. बचना चाहो तो बेबी को मनाओ.’’

घर लौटते हुए शिखा ने मन ही मन निर्णय लिया कि आज की घटना के विषय में दादू को कुछ नहीं बताएगी. उस की गाड़ी की आवाज सुनते ही जानकीदास ड्राईंगरूम में आ गए. शिखा हंसी.

‘‘मुझे पता था मेरे लौटने तक तुम बैठे रहोगे. रात की दवाई ली?’’

‘‘बस अब ले कर सीधे सोने जाता हूं.’’

‘‘साड़े दस बज गए.’’

‘‘हां तू भी जा कर सो जा टीवी या किताब ले मत बैठना. अपने कमरे में आ कर फ्रैश हो ली शिखा. नरम फूल सा नाईट सूट पहन बिस्तर पर बैठ क्रीम लगाते हुए आज उस ने हलका महसूस किया. मेहता परिवार में आज मातम छा गया होगा. एक बड़ा सा सपनों का महल था उन के सामने उस के दम पर उछलते फिर रहे थे. जल्दी से शादी कर उस के दम पर अपने को सड़क पर आने से बचाना चाहते थे. उधेड़बुन में ना रख कर शिखा उन की सारी आशाओं की जड़ ही काट आई. उस का अपना सिर दर्द समाप्त हुआ. बत्ती बंद कर वो लेट गई. मां उस की शुभचिंतक कभी नहीं रही. सदा ही उस की इच्छा, पसंद, शौक का गला दबा अपनी दिशा में हांकती रही. उस की छोटीछोटी खुशियों की हत्या कर मन ही मन अपनी जीत पर गर्व करती रही. उस के प्यार को भी उस से छीन पता नहीं कहां कितनी दूर फेंक दिया जिसे वो इस जीवन में नहीं खोज पाएगी. सुकुमार वचन का पक्का है वचन दे कर गया है कि अब कभी उस को अपना मुख नहीं दिखाएगा.’’

उस दिन तो शिखा ने मां को ही समर्थन किया था उसे अपने से बहुत नीचे स्तर का कह धिक्कारा था. व्यंग किया था, पैसों का लालची कहा था और गेट से बाहर निकाल दिया था. उस दिन के बाद वो कभी नहीं दिखाई दिया ‘कुंजवन’ के बाहर आते ही तो शिखा की प्यासी व्यथित दोनों आंखें उसी को खोजती हैं पर कहां है वो, कहां चले गए तुम? मेरे मुंह के बोल सुन मुझे छोड़ गए एक बार मेरी आंखों में भी तो झांकते मन को पढ़ते कि मैं ने ऐसा क्यों किया? मुझे समझने की कोशिश करते. तुम मेरे बचपन के प्यार हो, तुम मुझे कैसे छोड़ गए बस मेरे दो मुंह के बोल सुन कर. लौट आओ प्लीज, मेरे पास लौट आओ. मैं बहुत अकेली हूं. उस ने आंसू पोंछे. मां जातेजाते उस के साथ एक और शत्रुता कर गई. बंटी से उस के विवाह की बात कह कर उसे सिर चढ़ा गई. मेहता परिवार तो आसमान पर छलांगे लगाने लगा खास कर बंटी. सब के सामने ऐसा दिखाने लगा मानो उस का विवाह ही हो चुका है शिखा के साथ, जबकि शिखा ने एक दिन भी घास नहीं डाली उसे. राजकन्या के साथ पूरा साम्राज्य मुट्ठी में आ रहा है. बंटी ने अय्याशी बढ़ा दी, चमचे भी जुट गए. व्यापार डूबने लगा तो क्या, शिखा तो अपने व्यापार को चौगुना बढ़ा रही है ब्याह होते ही सब कुछ मुट्ठी में, तब तक जरा हिचकोले खा ही लेंगे. आज शिखा रोजरोज की फजिहत की जड़ ही काट आई है. इतनी देर में उसे नींद आई.

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