लौटती बहारें: मीनू के मायके वालों में कैसे आया बदलाव

Serial Story: लौटती बहारें (भाग-4)

अचानक अम्मांजी की आवाज आई, ‘‘बहू, मेरा और नीलम का खाना मत बनाना. हमारा खाना वहीं होगा.’’ मैं आहत सी हो गई. मैं नईनवेली दुलहन पर मुझे तो कोई किसी योग्य समझता ही नहीं. मन मार कर काम में लग गई. तभी अचानक नीलम जीजी की जोरजोर से रोने की आवाजें आने लगीं. मैं डर गई कि क्या हुआ. कहीं राहुल को चोट तो नहीं लग गई. मैं आटे से सने हाथों को जल्दी से धो कर अंदर कमरे की ओर दौड़ी. अंदर जा कर देखा नीलम जीजी अपना सामान बिखराए रो रही थीं. अम्मांजी बैग खोल कर कुछ ढूंढ़ रही थीं. पूछने पर मालूम चला कि नीलम दीदी का एक बैग शायद जल्दबाजी में औटोरिकशा में ही छूट गया. उस में उन के जेवर भी थे.

यह सुन कर मुझे बहुत बुरा लगा. अब तो औटोचालक की ईमानदारी पर ही उम्मीद लगाई कि शायद पुलिस स्टेशन में जमा करा दे अथवा घर आ कर लौटा जाए. नीलम को न तो औटो का नंबर याद था और न ही चालक का चेहरा. इस से परेशानी और बढ़ गई. घर में गहरा तनाव छा गया था. पापाजी ने इन्हें भी औफिस से बुलवा लिया था. दोनों पुलिस स्टेशन रपट लिखवाने गए. पर वहां जा कर भी कोई ऐसी तसल्ली नहीं मिली जिस से तनाव कम हो जाता. बेटी का मायके आ कर जेवर खो देना मायके वालों के लिए बहुत बदनामी काकारण था. शेखर और रवि दोनों मिल कर जीजी को दिलासा दे रहे थे. नीलम जीजी एक ही प्रलाप किए जा रही थीं कि ससुराल जा कर क्या मुंह दिखाऊंगी. अम्मां औटो वाले को कोस रही थीं. मैं और पापाजी दोनों बेबस से खड़े थे.

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उस दिन किसी ने खाना नहीं खाया. मैं ने बड़ी कठिनाई से राहुल को दूध व बिस्कुट खिलाए. अगले दिन शाम तक न पुलिस स्टेशन से कोई खबर आई और न ही औटोचालक का ही कुछ अतापता मिला. सभी निराश हो चले थे. मुझे नीलम जीजी की दशा देख कर बहुत दुख हो रहा था. कितने उत्साह से विवाह में शामिल होने आई थीं और किस परेशानी में घिर गईं. अगर कभी मायके जा कर मेरे साथ यह घटना हो जाती तो? यह सोच मैं मन ही मन कांप गई. मेरे मन में विचारों की उधेड़बुन चल रही थी कि कैसे नीलम जीजी की परेशानी दूर करूं.

अचानक दिमाग में बिजली कौंधी. मैं दृढ़ कदमों से अपने कमरे में गई और अपनी अलमारी से सारे जेवर निकाल लाई. जेवरों का डब्बा मैं ने नीलम जीजी को देते हुए कहा, ‘‘लो जीजी, ये जेवर आज से आप के हुए. मेरे तो फिर बन जाएंगे… अभी आप का जेवरों के कारण कोई अपमान नहीं होना चाहिए.’’

सभी हैरानी से मेरा मुंह देखने लगे मानो उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा हो. कुछ ही क्षणों बाद घर के सभी सदस्य गहने लेने से इनकार करने लगे तो मैं ने सधे स्वर में कहा, ‘‘मैं जेवर, नीलम जीजी को दे कर कोई एहसान नहीं कर रही हूं. आप सब मेरा परिवार हैं. आप के मानअपमान में मैं भी बराबर की हिस्सेदार हूं. आजकल आएदिन लूटपाट की खबरें आती रहती हैं. गहने तो अधिकतर लौकरों की शोभा ही बढ़ाते हैं,’’ यह कह मैं किचन की ओर चल दी.

तभी नीलम जीजी ने लपक कर मेरा हाथ पकड़ लिया और कहने लगीं, ‘‘नहींनहीं भाभी मैं अपनी लापरवाही की सजा आप को नहीं दे सकती,’’ और फिर से जेवर वापस करने लगीं. इस बार मैं ने उन्हें राहुल का वास्ता दे कर जेवर ले लेने को कहा. कोई चारा न देख कर उन्होंने जेवर ले लिए.

शेखर और रवि भैया मुझे प्रशंसाभरी नजरों से देख रहे थे. पापा ने मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा, ‘‘बहू, इस समय जो तुम ने हमारे लिए किया उसे हम जीवन भर नहीं भुला पाएंगे.’’

हर समय पराए घर की और पराया खून की रट लगाने वाली अम्मांजी लज्जित सी सिर झुकाए बैठी थीं. जेवरों का यों खो जाना कोई मामूली चोट न थी. फिर भी फिलहाल उस पर मरहम लगा दिया. सभी बेमन से थोड़ाबहुत खा कर सो गए.

नीलम जीजी जैसेतैसे सहेली की शादी निबटा कर चली गईं. ससुराल में जा कर बताया कि भाभी के जेवर नए डिजाइन के थे, इसलिए उन से बदल लिए. उन की ससुराल वाले खुले विचारों के लोग थे. अत: उन्होंने कोई पूछताछ नहीं की. इस घटना के बाद से सब का मेरे प्रति व्यवहार बदल गया. शेखर बाहर घुमाने भी ले जाने लगे. खाना बन जाने पर रवि भैया और शेखरजी डाइनिंगटेबल पर प्लेटें, डोंगे रखवाने

में मेरी मदद करते. खाने के समय सब मेरा इंतजार करते. एक दिन तो अम्मां ने यहां तक कह दिया, ‘‘बहू रोटियां बना कर कैसरोल में रख लिया करो. सब के साथ ही खाना खाया करो.’’

मैं मन ही मन इस बदलाव से खुश थी. पर मन में रेनू और राजू की चिंता, किसी फांस की तरह चुभती रहती. मैं ऊपर से सामान्य दिखने का प्रयत्न करती रहती. मुझे सहारनपुर से लौटे लगभग 2 महीने होने को आए थे.

पापा का 2-3 बार कुशलमंगल पूछने के लिए फोन आ चुका था. मम्मी से भी बात हो गई थी. रेनू और राजू से एक बार भी बात नहीं हो पाई. उन के बारे में जब भी पूछा, पापा ने घर पर नहीं हैं कह कर बहाना बना दिया. हो सकता है वे दोनों बात करना न चाहते हों. कल रात जब खाना बना रही थी तो सहारनपुर से पापा का फोन आया. घबराए हुए थे. उन्होंने कहा, ‘‘मीनू बेटी, तेरी मम्मी की तबीयत खराब है, उन्हें पीलिया हो गया है. तुम्हें बहुत याद कर रही हैं.’’

मैं समझ गई मम्मी की तबीयत ज्यादा ही खराब होगी. तभी पापा ने मुझे फोन किया वरना नहीं करते. मेरी आंखें भर आईं. मैं ने पापा को आने का आश्वासन दे कर फोन काट दिया. पीछे मुड़ी तो कमरे में अम्मां और पापाजी खड़े थे. मेरे चेहरे पर चिंता की रेखाएं देख कर पूछने लगे, ‘‘बहू, मायके में सब कुशलमंगल तो है?’’ मम्मी की तबीयत के बारे में बतातेबताते मैं रो पड़ी.

अम्मां ने मुझे सांत्वना दी. पापाजी ने कहा, ‘‘तुम सुबह ही शेखर को ले कर चली जाओ. मम्मी की देखभाल करो. शेखर के पास छुट्टियां कम हैं पर 1-2 दिन रह कर लौट आएगा. तुम जितने दिन चाहो रह लेना.’’ अगले दिन मैं और शेखर सहारनपुर जा पहुंचे. सारा घर अस्तव्यस्त हो रखा था. मैं ने मम्मी को देखा तो हैरान रह गई. वे बहुत कमजोर हो गई थीं. आंखों में बहुत पीलापन आ गया था.

इलाज तो चल ही रहा था, पर मुझे तसल्ली न हुई. मैं और शेखर मम्मी को दूसरे डाक्टर के पास ले गए. शहर में इन का अच्छे डाक्टरों में नाम आता था. मुआयना करने के बाद डाक्टर ने कहा कि मर्ज काफी बढ़ गया है, पर परहेज और आराम करने से सुधार आ सकता है. घर पहुंचने पर पाया रेनू और राजू भी आ गए थे. मुझे देख कर दोनों के चेहरे उतर गए, पर मैं भी उन से औपचारिक बातें ही करती.

चौथे दिन मम्मी के स्वास्थ्य में सुधार दिखने लगा. पापा के चेहरे पर भी रौनक लौट आई. यह देख बहुत अच्छा लगा. दोपहर को मैं मम्मी को खिचड़ी खिलाने लगी. घर में कोई नहीं था. मम्मी ने खिचड़ी खा कर प्लेट एक ओर रख कर मेरे दोनों हाथ पकड़ कर मुझे पलंग पर अपने पास ही बैठा लिया. उन की आंखों में आंसू थे. वे रोते हुए बोलीं, ‘‘मीनू, बेटी पिछली बार हम से तुम्हारा बड़ा अपमान हो गया था. मुझे माफ कर दे बेटी. मैं मजबूर हो गई थी,’’ और फिर मेरे सामने हाथ जोड़ने लगीं.

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मुझे बहुत बुरा लगा. मैं ने उन के हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘मम्मी, आप यह क्या कर रही हैं? आप न तो पिछली बातें सोचेंगी और न ही कहेंगी. बस अपनी सेहत पर ध्यान दें.’’ धीरेधीरे मां खुलती गईं. अपनी मन की पीड़ा से मुझे अवगत कराने लगीं. उन्होंने बताया कि रेनू किस तरह घर के प्रति लापरवाह हो गई है. जब से बीमार हुईं हूं सवेरे ही कुछ बना कर डाइनिंगटेबल पर रख जाती है. शाम को भी यही हाल है. जल्दबाजी में कुछ भी कच्चापक्का बना कर दे देती है. कुछ कहो या पूछो तो गुस्सा हो जाती है.

राजू भी दिन भर बाहर रहता है. खानेपीने का कोई नियम नहीं. तेरे पापा ने चाय बनानी सीख ली है. चाय तो वे ही बना लेते हैं. ये सब सुन कर मन बेहद दुखी हुआ. मैं भी रेनू और राजू के बहकते कदमों के बारे में मम्मी को सतर्क करना चाहती थी पर उन के स्वास्थ्य को देखते हुए मैं ने इस विषय पर चुप्पी ही साध ली.

अगले दिन मैं ने अपनी सहेली चित्रा को फोन किया. वह मुझ से मिलने घर आ गई. विवाह के बाद मैं उसे मिल न पाई थी. चित्रा मेरी बचपन की एक मात्र अंतरंग सखी थी. वह एक धनी व्यवसायी की बेटी थी, परंतु घमंड से कोसों दूर थी. बेहद स्नेहमयी थी. इसीलिए वह हमेशा मेरे दिल के करीब रही. दोनों एकदूसरे के दुखसुख में भागीदार रहती थीं. चित्रा के आने पर मेरा मन खुश हो उठा. हम दोनों पहले मम्मी के पास बैठीं.

मम्मी बोलीं, ‘‘अरे चित्रा, आज तो तू मीनू को कहीं बाहर घुमा ला. जब से आई है मेरी सेवा में लगी है. अब मैं ठीक हूं.’’ चित्रा ने चलने का अनुरोध किया तो मैं मना न कर पाई. वह अपनी कार में आई थी. दोनों एक रेस्तरां में पहुंच गईं. चित्रा ने कौफी और सैंडविच का और्डर दिया. फिर दोनों बतियाने लगीं. चित्रा मुझ से मेरे विवाह और ससुराल के अनुभव सुनने के लिए बेताब थी. फिर अचानक चित्रा गंभीर हो गई. बोली, ‘‘मीनू, हम दोनों कितने समय बाद मिले हैं. मैं तेरा दिल दुखाना नहीं चाहती हूं पर इस विषय पर चुप्पी साध कर भी मैं तेरा और तेरे परिवार का नुकसान नहीं करना चाहती.’’

मैं ने उसे सब कुछ खुल कर बताने को कहा तो चित्रा ने कहा, ‘‘मीनू तू तो जानती है कि मेरा छोटा भाई रजत और राजू कालेज में एकसाथ ही हैं. रजत ने मुझे बताया कि राजू 3-4 महीनों से कालेज में बहुत कम दिखाई देता है. वह कुछ दादा टाइप लड़कों के साथ घूमता है. प्रोफैसर उसे कई बार चेतावनी दे चुके हैं. मुझे लगता है उसे अभी न रोका गया तो वह गलत रास्ते पर आगे बढ़ जाएगा, फिर वहां से लौटना कठिन हो जाएगा.’’ मैं ने चित्रा को शुक्रिया कहा और बोली, ‘‘तू ने सही समय पर मुझे सचेत कर दिया. राजू से आज ही बात करती हूं.’’

बात निकली तो मैं ने रेनू के बारे में भी चित्रा को सब बता दिया. मेरी बात सुन कर चित्रा कहने लगी, ‘‘वैसे तो इस उम्र में लड़कियों और लड़कों में आकर्षण आम बात है पर परेशानी तब होती है जब लड़के मासूम लड़कियों को बहलाफुसला कर उन से संबंध बना कर उन के आपत्तिजनक वीडियो बना कर ब्लैकमेल करने लगते हैं.’’ मैं ने कहा, ‘‘बस चित्रा मुझे यही चिंता खा रही है. रेनू सुनने को तैयार ही नहीं है. क्या करूं?’’

अभी हम बातें कर ही रही थीं कि एकाएक मेरी नजर सामने की टेबल पर पड़ी. वहां एक नवयुवक और एक नवयुवती हाथों में हाथ डाले जूस पी रहे थे. वे धीरेधीरे बातें कर रहे थे. मुझे लगा कि इस लड़के को कहीं देखा है. दिमाग पर जोर डाला और ध्यान से देखा तो याद आ गया. यह वही लड़का है, जिस के साथ रेनू बाइक पर घूमती है. बस अब मेरा दिमाग तेजी से काम करने लगा. इस फ्लर्टी लड़के के चक्कर में रेनू मेरा इतना अपमान कर रही थी. मैं ने झटपट एक प्लान बनाया और चित्रा को समझाया. चित्रा वाशरूम जाने के बहाने उन दोनों के पास जा कर रुकेगी और मैं समय नष्ट न करते हुए मोबाइल से उन का फोटो ले लूंगी. अगर वह जोड़ा सचेत हो जाता है, तो मैं कैमरे का रुख चित्रा की ओर कर के उसे पोज देने को कहने लगूंगी. मगर दोनों प्रेमी अपने आसपास की चहलपहल से बेखबर एक ही गिलास में जूस पीने में मस्त थे. मैं ने जल्दी से फोटो लिए और हम दोनों रेस्तरां से बाहर आ गईं.

घर पर रेनू और राजू भी आ चुके थे. राजू तो चित्रा को घर आया देख सकपका सा गया पर चित्रा को रेनू बहुत पसंद करती थी, इसलिए वह चित्रा से बहुत प्यार से मिली. एकदूसरे का हालचाल पूछ कर रेनू सब के लिए चाय बनाने चली गई. कुछ देर रुक राजू मौका देख कर कोचिंग क्लास के बहाने बाहर जाने लगा तो चित्रा ने लपक कर उस का हाथ पकड़ लिया और बोली, ‘‘क्यों मैं इतने दिनों बाद आई हूं, मुझ से बातचीत नहीं करोगे? मीनू के ससुराल जाने के बाद अब मैं ही तुम्हारी दीदी हूं. मुझ से अपने मन की बात कह सकते हो,’’ यह कहतेकहते वह राजू को अलग कमरे में ले गई.

चित्रा ने राजू को समझाया, ‘‘तुम्हारी हरकतों से तुम्हारा कैरियर तो खराब होगा ही, पूरे घर के मानसम्मान पर भी धब्बा लगेगा. तुम्हारे मातापिता तुम से कितनी उम्मीदें लगाए बैठे हैं.’’ राजू सब सिर झुकाए सुनता रहा.

चित्रा ने आगे कहा, ‘‘तुम कल से नियमित कालेज जाओ… उन लड़कों से मिलनाजुलना बंद करो. अगर इस में कोई भी समस्या सामने आती है, तो प्रोफैसर आदित्य के पास चले जाना. वे मेरे कजिन हैं. हर तरह से तुम्हारी मदद करेंगे. हां, अब तुम्हारी सारी गतिविधियों पर ध्यान भी रखा जाएगा. याद रहे तुम्हारी मीनू दीदी उसी कालेज में टौपर रह चुकी हैं.’’ राजू चित्रा का बहुत आदर करता था. अत: ये सब सुन कर रो पड़ा. उस ने चित्रा से वादा किया कि वह उन की बातों पर अमल करेगा. चित्रा ने प्यार से उस की पीठ थपथपाई. तभी रेनू चाय बना कर कर ले आई. उधर मैं ने भी अपना काम कर लिया. मैं ने रेस्तरां में खींचे गए फोटो वहीं रख दिए जहां टेबल पर रेनू ने चाय रखी थी. मैं वहां से उठ कर मम्मी के कमरे में चली गई. रेनू चाय के लिए सब को बुलाने लगी. हम सब हंसतेखिलाते चाय पीने लगे. तभी रेनू की नजर फोटो पर पड़ गई, ‘‘किस के फोटो हैं ये?’’ कह कर उन्हें उठा लिया.

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चित्रा बोली, ‘‘ये मेरे फोटो खींच रही थी. मेरे तो खींच नहीं पाई. यह जोड़ा रेस्तरां में बैठा था, उस की खिंच गई. मीनू तू तो मोबाइल से भी फोटो नहीं खींच पाती.’’ फोटो देखते ही रेनू के चेहरे का रंग बदल गया. हम चुपचाप अनजान बने चाय पीते रहे.

रेनू चुपचाप वहां से चली गई. हम थोड़ी देर बाद रेनू के कमरे में जा पहुंचे. वह बिस्तर पर पड़ी रो रही थी. चित्रा ने उस से प्यार से रोने का कारण पूछा तो उस ने पहले तो बहाना किया पर उस का बहाना मेरे और चित्रा के सामने नहीं चला. मैं ने पुचकार कर पूछा तो उस ने उस लड़के के बारे में सब बता दिया. मैं ने और चित्रा ने उसे इस उम्र में होने वाली गलतियों से आगाह किया और पढ़ाईलिखाई में ध्यान देने को कहा.

रेनू रोतेरोते मेरे गले लग गई और बोली, ‘‘दीदी, मुझे डांटो, मैं बहुत खराब हूं.’’ तब मैं ने प्यार से समझाया, ‘‘सुबह का भूला अगर शाम को घर वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते. अब मम्मीपापा की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी तुम्हारी है.’’

रेनू ने हां में सिर हिला दिया. राजू भी सिर झुकाए खड़ा था. वह भी मेरे गले लग गया. चित्रा जाते समय मम्मीपापा से मिलने गई तो हंस कर बोली, ‘‘अंकल जिस काम के लिए मैं यहां आई थी उसे तो भूल कर जा रही थी. दरअसल, पापा ने मुझे आप के पास इसलिए भेजा था कि पापा को अपने व्यवसाय के लिए एक अनुभवी अकाउंटैंट चाहिए. यदि आप यह कार्य संभाल लें तो उन की चिंता कम हो जाएगी.’’

पापा की खुशी की सीमा न रही. बोले, ‘‘नेकी और पूछपूछ. चित्रा बेटी तुम्हारा यह उपकार कभी नहीं भूलूंगा.’’ यह सुन कर चित्रा प्यार भरे गुस्से से बोली, ‘‘अंकल आप ऐसा कहेंगे तो मैं आप से बहुत नाराज हो जाऊंगी.’’

पापा ने मुसकरा कर अपने कान पकड़ लिए तो सभी जोर से हंस पड़े. सारा माहौल खुशगवार हो गया. मम्मी अब ठीक थीं. रेनू ने भी घर के कामकाज में ध्यान देना शुरू कर दिया था. मैं ने भी ससुराल लौटने की इच्छा जताई. इस बार

राजू मुझे ससुराल छोड़ने जा रहा था. अगले दिन मैं जाने से पहले मम्मीपापा के कमरे के पास से गुजर रही थी तो मुझे उन की बातचीत सुनाई पड़ी. मम्मी कह रही थीं, ‘‘देखो हम बेटियों को पराया धन, पराई अमानत कह कर दुखी करते हैं परंतु बेटियां पति के घर जा कर भी पिता की चिंता नहीं छोड़तीं.’’

पापा हंस कर बोले, ‘‘तुम ने वह कहावत नहीं सुनी है कि बेटे अपने तब तक रहते हैं जब तक न हो वाइफ और बेटियां तब तक साथ रहती हैं जब तक हो लाइफ.’’ यह सुन कर मैं भी मुसकरा दी. अगले दिन मैं मायके से विदा हो कर ससुराल आ गई. सभी मुझ से और राजू से बहुत प्यार से मिले. शेखर ने राजू को पूरी दिल्ली घुमाया. कई तोहफे दिए. नीलम जीजी भी राजू से मिलने आईं. राजू बहुत ही अच्छे मूड में विदा हुआ.

अम्मां के घुटनों के दर्द के लिए मैं एक तेल लाई थी. उस से मालिश कर के अम्मां और पापाजी के कमरे से निकली तो पापा की आवाज सुनाई दी, ‘‘बहुएं तो प्यार की भूखी होती हैं. जब तक उन्हें पराए घर की, पराए खून की कहते रहेंगे वे ससुराल में अपनी जगह कैसे बनाएंगी?’’ अम्मां बोलीं, ‘‘सच कह रहे हो शेखर के पापा… वे बेचारियां अपना मायके का सब कुछ छोड़ कर हमारे आसरे आती हैं और हम उन्हें अपनाने में पीछे हटते हैं.’’

‘‘ये नादानियां तुम्हीं ने सब से ज्यादा की हैं,’’ पापा ने कहा तो अम्मां ने शर्म से सिर झुका लिया.

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Serial Story: लौटती बहारें (भाग-2)

इतना घटिया सामान खरीदा. फिर रवि को कुछ खिलानापिलाना तो दूर उलटे औटो तक के पैसे ले लिए. मैं शर्म से गड़ी जा रही थी. कैसे बताती अपनी पसंद के बारे में. कभीकभी इंसान हालात के हाथों मजबूर सा हो जाता है.

अगले दिन रवि भैया ने मुझे सहारनपुर जाने वाली बस में बैठा दिया. अम्मां ने एक मिठाई का डब्बा दे कर अपना कर्त्तव्य निभा दिया.

शादी के बाद पहली बार अकेली मायके जा रही थी. दिल खुशी से धड़क रहा था.

पिछली बार तो पगफेरे के समय वे साथ थे. मम्मीपापा, भाईबहन से ज्यादा बातें करने का अवसर ही नहीं मिला, क्योंकि शेखर हर समय साथ रहते थे. अगले दिन वापस भी आ गए थे.

मन रोमांचित हो रहा था कि इस बार अपनी प्यारी सहेली चित्रा से भी मिलूंगी. रेनू और राजू मेरे बाद कितने अकेले हो गए होंगे. उन दोनों की चाहे पढ़ाई से संबंधित समस्या हो या कोई और, हल अपनी मीनू दीदी से ही पूछते थे. मम्मी का भी दाहिना हाथ मैं ही थी. पापा मुझे देख गर्व से फूले न समाते. यही सोचतेसोचते समय कब बीत गया पता ही नहीं चला.

झटके से बस रूकी. मैं ने देखा सहारनपुर आ गया था. मैं पुलकित हो उठी. बस की खिड़की से झांका तो राजू तेज कदमों से बस की ओर आता दिखा. बस से उतरते ही राजू ने मेरा सूटकेस थाम लिया. उसे देख खुशी से मेरी आंखें भर आईं. 2 ही महीनों में राजू बहुत स्मार्ट हो गया था. नए स्टाइल में संवरे बाल, आंखों पर काला चश्मा लगा था.

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घर पहुंचते ही ऐसे लगा मानो कोई खोई

हुई चीज अचानक मिल गई हो. मैं सब से टूट कर मिली. मम्मीपापा ने पीठ पर हाथ फेर कर दुलारा. मुझे लगा कि मैं इस प्यार के लिए कितना तरस गई थी. मेरा और ससुराल का हालचाल

पूछ मम्मी किचन में चली गईं. मैं पापा की सेहत और रेनू व राजू की पढ़ाई के बारे में पूछताछ करने लगी.

बड़े अच्छे माहौल में खाना खत्म हुआ. राजू और रेनू मेरी अटैची के आसपास घूमने लगे. बोले, ‘‘बताओ दीदी, दिल्ली से हमारे लिए क्या लाई हो?’’

मैं शर्म से गड़ी जा रही थी कि किस मुंह से उपहार दिखाऊं. मैं अनिच्छा से ही उठी और उन दोनों के पैकेट निकाल कर दे दिए. पैकेट खोलते ही रेनू और राजू के मुंह उतर गए. दोनों मेरी ओर देखने लगे.

रेनू बोली, ‘‘आप कमाल करती हैं दीदी… पूरी दिल्ली में यही घटिया चीजें आप को हमारे लिए मिलीं.’’

राजू भी बोल उठा, ‘‘दीदी, ऐसे चीप

कपड़े तो हमारी कामवाली बाई के बच्चे भी नहीं पहनते हैं.’’

शर्म और अपमान से मैं क्षुब्ध हो उठी. यह सही था. कपड़े उन के स्तर के नहीं थे, परंतु ऐसा व्यवहार तो मैं ने उन का पहली बार देखा था. दोनों पैकेटों को पलंग पर रख कमरे से बाहर निकल गए. मैं हैरानपरेशान उन्हें देखती रह गई.

जो भाईबहन मुझे इतना आदर और मान देते थे वही सस्ते से उपहारों के लिए इतना सुना गए. मन खिन्न हो उठा. बहुत थकी थी. वहीं पलंग पर लेट गई. न जाने कब आंख लग गई.

शाम को आंख खुली तो कानों में रेनू की आवाज सुनाई दी.

मैं ने बालकनी से नीचे देखा तो रेनू एक लड़के से बातें करती दिखाई दी. लड़का बाइक पर बैठा था. हावभाव और बातचीत से किसी निम्नवर्गीय परिवार का लग रहा था. अचानक उस ने बाइक स्टार्ट की और रेनू को फ्लाइंग किस देता हुआ तेज गति से चला गया.

यह सब देख मैं हैरान रह गई. अभी तो कालेज में रेनू का पहला वर्ष ही है. उस ने अपनी आयु के 18 वर्ष भी पूरे नहीं किए. अपरिपक्व है. अभी से यह किस रास्ते चल पड़ी? फिर मैं ने सोचा कि मौका देख कर बात करूंगी.

मम्मी कमरे में चाय ले कर आ गईं. मैं ने मम्मी का हाथ पकड़ कर, ‘‘मम्मी, आप यहीं बैठो,’’ कह कर मैं ने उन के लिए लाई साड़ी और पापा की शौल का पैकेट उन्हें पकड़ा दिया. मेरी आंखें शर्म से झुकी जा रही थीं.

उन्होंने साड़ी और शौल को उलटपुलट कर देखा, फिर बोलीं, ‘‘इस की क्या जरूरत थी. अभी तेरे पापा ने रिटायरमैंट के अवसर पर महंगी साडि़यां दिलवाई हैं,’’ और फिर पैकेट वहीं छोड़ किचन में चली गईं.

मैं शर्मिंदगी से उबर नहीं पा रही थी. मैं ने सारे तोहफे समेटे और अलमारी के कोने में

रख दिए.

बड़ा नौर्मल सा दिखने का अभिनय करते हुए मैं मम्मी के पास किचन में चली गई.

मुझे देखते ही मम्मी बोली, ‘‘अरे, तू कमरे में ही आराम कर यहां कहां चली आई. अब तो तू हमारी मेहमान है.’’

यह सुन कर मेरी आंखें भर आईं. मैं मुंह फेर कर बरतनों को उलटपलट कर रखने लगी. मुझे वे दिन याद आने लगे, जब मेरे किचन में जाने पर मम्मी आश्वस्त हो बाहर निकल जाती थीं. दो घड़ी आराम कर लेती थीं. कल तो मौसियां, चाची, बूआ सब मेहमान आ जाएंगे. फिर तो मम्मी को जरा सी भी फुरसत नहीं मिलेगी. बड़ा मन कर रहा था कि मां की गोद में सिर रख कर खूब रो लूं, मन हलका कर लूं पर मां तो लगातार काम करती जा रही थीं. बीचबीच में ससुराल के मेरे अनुभव भी पूछती जा रही थीं. मुझे जो भी सूझता जवाब देती जा रही थी.

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मम्मी ने रसोई में पड़ा स्टूल मेरी तरफ खिसका दिया और बोलीं, ‘‘थक जाएगी, बैठ जा.’’

उन का यह मेहमानों वाला व्यवहार मेरे सीने में किसी कांटे की तरह चुभ रहा था.

अगले दिन बहुत चहलपहल रही. घर में खूब रौनक हो गई थी. सब की केंद्र बिंदु मैं थी. सभी ससुराल के अनुभव, पति, घर वालों के स्वभाव के बारे में पूछ रहे थे. मैं दिल में टीस छिपाए रटेरटाए उत्तर देती जा रही थी. कैसे बताती कि मैं पेड़ से टूटी शाखा और शाखा से

टूटे पत्ते जैसी जिंदगी गुजार रही हूं. अपनापन पाने की कई परीक्षाएं दे चुकी पर हर बार असफल होती रही.

पापा का सेवानिवृत्ति का आयोजन बहुत अच्छी तरह संपन्न हो गया. सभी लोगों

ने उन की ईमानदारी की खूब प्रशंसा की. मैं ने देखा पापा ने चेहरे पर कृतिम खुशी का जो मुखौटा लगा रखा था वह कई बार खिसक जाता तो चेहरे पर चिंता की रेखाएं दिखने लगतीं. मैं जानती थी कि ये चिंताएं रेनू और राजू को ले कर हैं, जो अभी कहीं सैटल नहीं हैं. उन की शिक्षा, विवाह, नौकरी सभी कुछ बाकी है. यह तो पापा की दूरदर्शिता थी कि समय पर यह मकान बनवा लिया था, जिस की छत्रछाया में उन का परिवार सुरक्षित था. अब तो फंड और पैंशन से गुजारा चलाना था.

अगले दिन पापा कैटरिंग वालों का हिसाब कर रहे थे. उधर मेहमानों की विदाई भी हो रही थी.

मेहमानों के जाते ही घर में सन्नाटा सा छा गया. सब थके हुए थे. दोपहर को थकान उतारने के लिए आराम करने लगे.

मैं ने इस आयोजन के दौरान एक बात और नोट की कि पूरे आयोजन में रेनू और राजू का सहयोग नगण्य था. रेनू काफी समय तो पार्लर में लगा आई बाकी समय मौसी, चाची और बूआ से गपशप करती रही. राजू भी मेहमानों के साथ मेहमान बना घूम रहा था. 1-2 बार तो मैं ने उसे बिलकुल पड़ोस वाली टीना, जो उस की ही हमउम्र थी, से इशारेबाजी करते भी देखा. देखने में ये बातें इस उम्र में नौर्मल होती है, परंतु इन्हें अपनी पढ़ाईलिखाई और जिम्मेदारी का पूरा ध्यान रखना चाहिए. उपहारों को ले कर किए इन दोनों के कटाक्ष एक बार फिर मेरी वेदना को बढ़ा गए. मन उचाट हो गया. मैं उठ कर अपने कमरे में चली गई.

रेनू और राजू घर पर नहीं थे. मम्मीपापा सोए हुए थे. मैं ने देखा पूरे कमरे की काया पलट हो चुकी थी. दीवारों पर आलिया भट्ट, वरुण धवन के पोस्टर लगे हुए थे.

फिर मैं ने अपनी अलमारी खोली. इस में मेरी बहुत सी यादें जुड़ी थी. अलमारी में रेनू के कपड़े और सामान रखा था. इधरउधर देखा, रेनू की अलमारी पर ताला लगा था. अचानक अलमारी के ऊपर रखी 2 गठरियां दिखाई दीं. उतार कर देखीं तो एक में मेरे कपड़े थे और एक में किताबें बंधी थीं. मैं उन्हें कहां रखूं, यह सोच ही रही थी कि रेनू के बाय कहने की आवाज आई.

बालकनी में जा कर देखा, रेनू उसी लड़के की बाइक से उतर कर

ऊपर आ रही थी. मुझे सामने पा कर चौंक गई. फिर नजरें बचा कर अंदर जाने लगी.

उसी समय राजू भी किसी से मोबाइल पर बातें करता ऊपर आ गया. मुझे देख मोबाइल छिपाते हुए अपने कमरे की ओर जाने लगा. मैं ने उसे आवाज दी तो वह अनसुना कर गया.

अब मेरा धैर्य भी जवाब देने लगा था.

फिर भी मैं ने यथासंभव खुद को सामान्य करते हुए बड़े प्यार से दोनों को पुकारा. रेनू तो अभी वहीं खड़ी थी. राजू मुंह फुलाए आकर खड़ा हो गया.

मैं ने बड़े प्यार से दोनों की पढ़ाईलिखाई के बारे में पूछा तो दोनों ने संक्षिप्त उत्तर दिए और जाने लगे.

मैं ने राजू से पूछा, ‘‘यह मोबाइल तुम ने नया खरीदा क्या?’’

‘‘पापा ने ले कर दिया?’’

राजू मुंह बना कर बोला ‘‘पापा क्या ले

कर देंगे, यह मुंबई वाली मौसी का बेटा रजत अपना पुराना मोबाइल दे गया. मैं ने अपनी सिम डलवा ली.’’

मैं ने कहा, ‘‘ऐसे एकदम किसी से कोई चीज नहीं लेते. कम से कम मुझ से ही एक बार पूछ लेते. पापा को तो तुम ने कहा ही नहीं होगा. वरना क्या वे मना कर देते.’’

यह सुन कर राजू ने बहुत अवज्ञा से मुंह बनाया. यह देख मुझे गुस्सा आया. मैं ने कहा, ‘‘देख रही हूं तुम दोनों 2 महीनों में ही बहुत बदल चुके हो,’’ कह मैं ने रेनू की ओर मुखातिब हो कर पूछा, ‘‘रेनू यह लड़का कौन है जिस की बाइक पर तुम आई थीं?’’

यह सुन कर रेनू गुस्से से फट पड़ी, ‘‘क्या हो गया दीदी… वह रोमी है. कालेज में मेरे साथ पढ़ता है… क्या हो गया अगर मुझे छोड़ने घर तक आ गया?’’

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मैं ने उसे शांत करते हुए कहा, ‘‘रेनू, इन बातों के लिए तुम अभी बहुत छोटी हो, भोली हो, अभी तुम दोनों को अपनी पढ़ाईलिखाई पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए… राजू, रात मैं पानी पीने उठी तो तुम्हारे कमरे की लाइट जल रही थी. मैं ने सोचा तुम अभी तक पढ़ रहे होगे. लेकिन खिड़की से देखा तो पाया कि तुम रात को 1 बजे तक टीवी देख रहे थे. तुम दोनों जानते हो कि पापा को तुम दोनों से बहुत उम्मीदे हैं. उन्हें यह सब जान कर बुरा लगेगा. अभी पढ़ाई पर पूरा ध्यान लगाओ.’’

यह सुन कर राजू बोला, ‘‘दीदी, हम लोगों ने ऐसा क्या दुनिया से अलग कर दिया है जो तुम हमें ताने मार रही हो?’’

रेनू बोली, ‘‘हमें यह बेकार की रोकटोक पसंद नहीं… आप अपना बहनजीपन हम पर मत थोपो… अपनी ससुराल में जा कर यह रोब दिखाना.’’

मैं यह सब सुन कर सन्न रह गई कि क्या ये वही रेनू और राजू हैं, जो हर काम मेरे से पूछ कर करते थे? दोनों मैथ और अंगरेजी में कमजोर थे. मैं अपनी पढ़ाई खत्म कर दोनों को रात 1-2 बजे तक पढ़ाती थी. तब जा कर पास होने योग्य नंबर जुटा पाते थे. मैं इन का आदर्श थी.

हम सब की तेज अवाजें सुन मम्मी भागती हुई चली आईं. हम सब को आपस में उलझते देख हैरान रह गईं. मुझ से पूछने लगीं, ‘‘क्या बात हो गई?’’

मैं कुछ कहती, उस से पहले ही रेनू चिल्लाने लगी, ‘‘होना क्या है मम्मी… मीनू दीदी जब से आईं हैं हमारी जासूसी में लगी हैं कि कहां जाते हैं क्या पहनते हैं, हमारे कौनकौन दोस्त हैं… हमारी छोटीछोटी खुशियां इन से बरदाश्त नहीं हो रही है.’’

राजू बोला, ‘‘मम्मी, जमाना बदल रहा है. हम भी बदल रहे हैं. इन्हें हम से क्या परेशानी है, समझ नहीं आता.’’

मेरा इतना अपमान होते देख मम्मी बौखला गईं. मेरा हाथ खींचते हुए बोलीं, ‘‘तू चल यहां से… काहे को चौधराइन बन रही है… अब तू इन की चिंता छोड़ अपनी ससुराल देख.’’

मुझे किसी ने कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया. मैं अपमानित सी खड़ी थी. शोर सुन कर पापा भी आ गए. बिना कुछ पूछे धीरगंभीर पापा मेरा हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गए. अपमान ने मेरे मुंह पर चुप्पी का ताला लगा दिया. पापा ने भी मुझे इस घटना से उबरने का मौका दिया. वे चुप रहे.

थोड़ी देर बाद मैं उठ कर लिविंग रूम के सोफे पर जा लेटी. कब आंख लग गई, पता ही न चला. रात को डिनर के लिए मम्मी और पापा बारीबारी से मुझे बुलाने आए पर मैं ने भूख नहीं है कह कर मना कर दिया. रेनू और राजू के अलावा किसी ने भी खाना नहीं खाया. मुझे रात भर नींद नहीं आई. यही सोचती रही कि यह मैं ने क्या किया? आई थी इन सब की खुशियों में शामिल होने पर सारे माहौल को तनावयुक्त कर दिया.

अगले दिन मैं जल्दी उठ कर नहा कर तैयार हो गई. मैं ने सब के लिए चाय बनाई. रेनू और राजू को आवाज दे कर उन के कमरे में चाय दे कर आई. मम्मी और पापा की चाय उन के कमरे में ले गई. होंठों पर नकली मुसकान लिए मैं ने बिलकुल नौर्मल दिखने का अभिनय किया. अपनी चाय पीतेपीते मैं अपनी ससुराल के बारे में बिना उन के पूछे बातें शेयर करने लगी. अपने देवर की शैतानियों के बारे में हंसहंस कर झूठी कहानियां सुनाने लगी.

मम्मीपापा भी मेरे द्वारा बनाए माहौल को बनाए रखने में मेरा साथ देने लगे. यह देख मैं सोचने लगी कि हम हिंदुस्तानी औरतों को घरगृहस्थी की गाड़ी सुचारु रूप से चलाने के लिए अभिनय घुट्टी में पिलाया जाता है. कभी मायके की इज्जत रखने को तो कभी ससुराल का मानसम्मान बनाए रखने के लिए अच्छा अभिनय कर जाती हैं?

तभी रेनू कालेज के लिए तैयार हो कर आ गई. उसे देख कर मैं ने जल्दी से कहा, ‘‘अरे रेनू, आज इतनी जल्दी कालेज जा रही है… 5 मिनट रुक मैं मेरे लिए नाश्ता बना रही हूं… तुझे गोभी के परांठे पसंद हैं. वही बना देती हूं.’’ मगर रेनू मेरी बात अनसुनी कर मम्मी की ओर देखते हुए बोली, ‘‘मम्मी, आज कालेज में देर हो जाएगी,’’ और फिर सीढि़यां उतर गई.

मम्मी और मैं देखते रह गए. मैं ने बिना समय नष्ट किए जा कर किचन संभाली. सोचा रेनू तो बिना कुछ खाए निकल गई कहीं राजू भी भूखे पेट न निकल जाए. जल्दी सभी की पसंद ध्यान में रखते हुए नाश्ता बनाया और डाइनिंगटेबल पर लगा दिया.

नाश्ता तैयार है की आवाज लगा कर माहौल को तनावमुक्त करने की कोशिश की. मम्मीपापा तो तुरंत आ गए पर राजू अनमना सा थोड़ी देर बाद आया. उस ने किसी से बात नहीं की. जल्दीजल्दी खा कर खड़ा हो गया. बोला, ‘‘मम्मी, कालेज जा रहा हूं… आज दीदी को बस में बैठाने तो नहीं जाना?’’ और फिर जवाब का इंतजार किए बिना चला गया.

मैं रेनू और राजू के व्यवहार से मन ही मन क्षुब्ध हो रही थी. मैं दकियानूसी स्वभाव की बहन नहीं थी, परंतु इस कच्ची उम्र में हुई कुछ गलतियां सारी जिंदगी के लिए घातक हो जाती हैं. अपरिपक्व दिमाग, भोलेपन या नासमझी के चलते कुछ लोग गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं. फिर वहां से लौटना कठिन हो जाता है. बस इसी उलझन में पड़ गई थी. मेरे दिल में भाईबहन के लिए प्यार, ममता, सहानुभूति की भावनाएं प्रबलता से हिलोरें ले रही थीं, परंतु स्वाभिमान और फैला तनाव मुझे चुप रहने का संकेत दे रहा था.

क्रमश:

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Serial Story: लौटती बहारें (भाग-1)

अचानक शेखर को जल्दी घर आया देख मैं चौंक गई. साहब 8 बजे से पहले कभी पहुंचते नहीं हैं. औफिस से तो 6 बजे छुट्टी हो जाती है, पर घर पहुंचने में समय लग जाता है. मगर आज एक मित्र ने गाड़ी में लिफ्ट दे दी. अत: जल्दी आ गए. बड़ा हलकाफुलका महसूस कर रहे थे.

मैं जल्दी से 2 कप चाय ले कर अम्मांजी के कमरे में पहुंची. औफिस से आ कर शेखर की हाजिरी वहीं लगती है. पापा का ब्लडप्रैशर, रवि भैया का कालेज सभी की जानकारी लेने के बाद आखिर में मेरी खोजखबर ली जाती और वह भी रात के डिनर का मैन्यू पता करने के लिए. पापाजी भी शाम की सैर से आ गए थे. उन के लिए भी चाय ले कर गई. जल्दी में पोहे की प्लेट रसोई में ही रह गई. बस अम्मां झट से बोल उठीं, ‘‘बहू इन की पोहे की प्लेट कहां है?’’

मैं कुछ जवाब देती उस से पहले ही शेखर का भाषण शुरू हो गया, ‘‘मीनू, 2 महीने हो गए हमारे घर आए पर तुम अभी तक एक भी नियमकायदा नहीं सीख पाई हो. कल अम्मां का कमरा साफ नहीं हुआ था. उस से पहले रवि के कपड़े प्रैस करना भूल गई थी.’’

अम्मां ने जले पर नमक बुरकते हुए कहा, ‘‘पराए घर की लड़कियां हैं, ससुराल को अपना घर कहां समझती हैं.’’

मैं मन मसोस कर रह गई. कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया. मैं सुबह से ले कर देर रात तक इस घर में सब की फरमाइशें पूरी करने के लिए चक्करघिन्नी की तरह घूमती हूं, फिर भी पराया घर, पराया खून बस यही उपाधियां मिलती हैं.

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मैं बोझिल कदमों से रसोई में आ कर रात के डिनर की तैयारी में जुट गई. खाना तैयार कर मैं दो घड़ी आराम करने के लिए अपने कमरे में जा रही थी तो अम्मांपापाजी को कमरे में अपने श्रवण कुमार बेटे शेखर से धीमे स्वर में बतियाते देखा तो कदम सुस्त हो गए.

ध्यान से सुनने पर पता चला शेखर 8 दिनों के लिए मुंबई टूअर पर जा रहे हैं. इसीलिए आज जल्दी घर आ गए थे. मन में टीस सी उठी कि जो खबर सब से पहले मुझे बतानी चाहिए थी, उसे अभी तक इस बात का पता ही नहीं.

अभी 2 महीने पहले ही आंखों में सपने लिए ससुराल आई थी, पर अपनापन कहीं दूरदूर तक दिखाई नहीं देता. सब ने एक बेगानेपन का नकाब सा ओढ़ रखा है. हां, रवि भैया को जब कोई काम होता है तो अपनापन दिखा कर करवा लेते हैं. शेखर के प्यार की बरसात तभी होती है जब रात को हमबिस्तर होते हैं.

मैं ने जल्दी से मसाले वाला गाउन बदल हाथमुंह धो कर साड़ी पहन ली. बाल खोल कर सुलझा रही थी कि शेखर सीटी बजाते हुए बड़े हलके मूड में कमरे में आ गए. मुझे तैयार होते देख मुसकराते हुए अपनी बांहों के घेरे में लेने लगे तो मैं ने पूछा, ‘‘आप ने जल्दी आने का कारण नहीं बताया?’’

शेखर बोले, ‘‘अरे, कुछ खास नहीं. 8 दिनों के लिए मुंबई टूअर पर जा रहा हूं.’’

मैं ने शरमाते हुए कहा, ‘‘मैं 8 दिन आप के बिना कैसे रहूंगी? मेरा मन नहीं लगेगा आप के बिना… मुझे भी साथ ले चलो न… वैसे भी शादी के बाद कहीं घूमने भी तो नहीं गए.’’

यह सुनते ही इन का सारा रोमांस काफूर हो गया. मुझे बांहों के बंधन से अलग करते हुए बोले, ‘‘मेरी गैरमौजूदगी में अम्मांपापा का खयाल रखने के बजाय घूमनेफिरने की बात कह रही हो… अम्मां सही कहती हैं कि बहुएं कभी अपनी नहीं होती… पराया खून पराया ही होता है.’’

यह सुन कर मैं ने चुप रहना ही ठीक समझा. शेखर भी अनमने से प्यारमुहब्बत का ऐपिसोड अधूरा छोड़ डिनर के लिए अम्मांपापा को बुलाने चले गए. रवि भैया भी आ पहुंचे थे. मैं पापा की पसंद के भरवां करेले और सब की पसंद की अरहर की दाल व चावल परोस कर गरमगरम रोटियां सेंकने लगी.

सब डिनर कर कुरसियां खिसका कर उठ खड़े हुए. मुझे न तो किसी ने खाना खाने के लिए कहा न कोई मेरे लिए खाना परोसने खड़ा हुआ. मैं ने भी लाजशर्म छोड़ जल्दी से हाथ धो कर अपनी थाली लगा ली. बचा खाना मेरी प्रतीक्षा में था. भूख ज्यादा लगी थी, इसलिए खाना कुछ जल्दी खा लिया.

अम्मां के कमरे के बाहर लगे वाशबेसिन में हाथ धो रही थी कि अम्मांजी की व्यंग्यात्मक आवाज कानों में पड़ी, ‘‘शेखर के पापा, देखा आप ने नई बहू वाली तो कोई बात ही नहीं है मीनू में… मैं जब आई थी तो सासननद से पूछे बिना कौर नहीं तोड़ती थी. यहां तो मामला ही अलग है.’’

यह सुन कर मन वितृष्णा से भर उठा कि यह क्या जाहिलपन है. नई बहू यह नहीं करती, पराए घर की, पराया खून बस यही सुनसुन कर कान पक गए.

अम्मां की बातों को दरकिनार कर मैं अपने कमरे में चली गई. वहां शेखर अपने कपड़े फैलाए बैठे थे. पास ही सूटकेस रखा था. समझ गई साहब जाने की तैयारी में लगे हैं. मैं बड़े प्यार से उन का हाथ पकड़ उन्हें उठाते हुए बोली, ‘‘हटिए, मैं आप का सूटकेस तैयार कर देती हूं…’’

‘‘अब आप को यह जहमत उठाने की जरूरत नहीं है,’’ शेखर ने हाथ झटकते हुए कहा, ‘‘अरे यार, कनफ्यूज न करो. तुम्हें मेरी पसंदनापसंद का कुछ पता भी है.’’

मैं चुप लगा कर बाहर बालकनी में आ कर खड़ी सड़क की रौनक देखने लगी. मन बहुत खिन्न था. पहली बार विवाह के बाद बाहर जा रहे हैं… अकेली कैसे रहूंगी… होने को भरापूरा घर है… ऐसा कोई कष्ट भी नहीं है, परंतु ससुराल में जो सब की अलगाव की भावना मुझे अंदर ही अंदर सालती थी.

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मैं पेड़ से टूटी डाली की तरह एक ओर पड़ी थी. कुछ दिन पहले की ही बात है. इन की बहन नीलम जीजी आई थीं. मेरी हमउम्र भी थीं. मैं मन ही मन बहुत उत्साहित थी कि नीलम जीजी से खुल कर बातें करूंगी. इतने दिनों से लाज, संकोच ही पीछा नहीं छोड़ता था कि कहीं कुछ गलत न बोल जाऊं. नईनवेली थी. जबान खुलती ही न थी. मैं अल्पभाषी थी. मगर अब सोच लिया था कि नीलम जीजी को अपनी दहेज में मिली साडि़यों और उपहारों को दिखाऊंगी. वे कुछ लेना चाहेंगी तो उन्हें दे दूंगी. उन का उन की ससुराल में मान बढ़ेगा.

मैं ने बड़े चाव से रवि भैया से उन की खानेपीने की पसंद पूछ कर उन की पसंद का मटरपनीर, भरवां भिंडी, मेवे वाली खीर बना दी. मैं हलका सा मेकअप कर तैयार हो नीलम जीजी का बेकरारी से इंतजार करने लगी.

नीलम जीजी नन्हे राहुल को ले कर अकेली ही आई थीं. उन्हें देख कर मैं बहुत उत्साह से आगे बढ़ी और उन्हें गले लगा लिया. मुझे लगा जैसे मेरी कोई बचपन की सहेली हैं पर नीलम जीजी तुरंत मुझे स्वयं से अलग करते हुए एक औपचारिक सी मुसकान दे कर अम्मांअम्मां करते हुए कमरे में चली गईं.

मुझे ठेस सी लगी पर मैं सब कुछ भूल कर ननद की सेवा में जुट गई. मांबेटी को एकांत देने के लिए मैं रसोई में ही बनी रही.

छुट्टी का दिन था. सब घर में ही थे. अम्मां के घुटनों का दर्द बहुत बढ़ा हुआ था, इसलिए उन्होंने मुझे आदेश दिया, ‘‘बहू खाना मेरे कमरे में ही लगा दो.’’

एक अतिरिक्त टेबल रख कर मैं खाना रखने की व्यवस्था कर किचन में चली गई. किचन में जा कर मैं ने जल्दीजल्दी चपातियां बनाईं. अम्मां के कमरे में खुशनुमा महफिल जमी थी. ठहाकों की आवाजें आ रही थीं. मैं जैसे ही खाना ले कर कमरे में पहुंची सब चुप हो गए मानो कमरे में कोई अजनबी आ गया हो. हंसने वाले चुप हो गए, बोलने वालों ने बातों का रूख बदल दिया. खाना टेबल पर लगा कर मैं जल्दीजल्दी चपातियां देने लगी.

खाना खाने के बाद नीलम जीजी और रवि बरतन समेट कर रसोई में रखने आ गए. किचन से निकलते समय वे बिना मेरी ओर देखे बोले, ‘‘आप भी हमारे साथ खा लेतीं भाभी.’’

मैं कोई जवाब देती उस से पहले ही रवि व जीजी किचन से जा चुके थे. एक बार फिर महफिल जम गई. मैं शांता बाई के साथ मिल कर रसोई संभालने लगी. बड़ा मन कर रहा था कि मैं भी उन के साथ बैठूं, घर के और सदस्यों की तरह हंसीमजाक करूं, पर न मुझे किसी ने बुलाया और न ही मेरी हिम्मत हुई. शाम की चाय के बाद नीलम जीजी जाने को तैयार हो गईर्ं. रवि औटो ले आया. शेखर और पापाजी आंगन में खड़े जीजी से बतिया रहे थे. मैं भी वहीं पास जा कर खड़ी हो गई. औटो आते ही मैं लपक कर आगे बढ़ी पर जीजी सिर पर पल्ला लेते हुए ‘‘भाभी बाय’’ कह कर औटो में जा बैठीं. देखतेदेखते औटो चला गया. मैं ठगी सी वहीं खड़ी रही. अलगाव की पीड़ा ने मुझे बहुत उदास कर दिया था.

रवि की आवाज मुझे एक बार फिर वर्तमान में खींच लाई. रवि ने बताया कि आप के मायके से पापा का फोन आया है. मैं ने रवि से मोबाइल ले कर पापा से कुशलमंगल पूछा तो उन्होंने बताया कि 31 मार्च को उन का रिटायरमैंट का आयोजन है. मुझे सपरिवार आमंत्रित किया.

तब पापाजी (मेरे ससुरजी) ने, मेरे पापा से न आ पाने के लिए क्षमायाचना करते हुए मुझे भेजने की बात कही. तय हुआ कि रवि मुझे बस में बैठा देगा. वहां सहारनपुर बसअड्डा से राजू मुझे ले लेगा.

सहारनपुर अपने मायके जाने की बात सुन कर मुझे तो जैसे खुशियों के पंख लग गए. पगफेरे के बाद मैं पहली बार वहां अकेली रहने जा रही थी. मैं भी अपना सूटकेस तैयार करने के लिए उतावली हुई जा रही थी.

शेखर प्यार से छेड़ने लगे, ‘‘चलो, अब तो हमारी जुदाई का गम न झेलना पड़ेगा?’’

शेखर बहुत रोमांटिक मूड में थे. मैं भी फागुनी बयार की तरह बही जा रही थी. पूरे मन से शेखर की बांहों में समा गई. कब रात बीती पता ही नहीं चला.

पड़ोस के घर बजे शंख से नींद खुली. 5 बज गए थे. जल्दी से उठ कर नहा कर नाश्ते की तैयारी में जुट गई. इन्हें भी आज जाना था. मुझे कल सवेरे निकलना था. अत: जल्दीजल्दी काम निबटाने लगी. महीने भर का राशन आया पड़ा था. उसे जल्दीजल्दी डब्बों में भरने लगी. मैं सोच रही थी मेरे जाने के बाद किसी को सामान ढूंढ़ने में दिक्कत न हो.

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तभी अम्मांजी किसी काम से किचन में आ गईं. मुझे ये सब करते देख बोलीं,

‘‘बहू, तुम यह सब रहने दो. मैं कामवाली शांता से कह कर भरवा दूंगी… तुम मां के यहां जाने

की खुशी में, सूजी में बेसन और अरहर में चना दाल मिला दोगी. यह काम तसल्ली से करने के होते हैं.’’

मेरे मन में जो खुशी नृत्य कर रही थी उसे विराम सा लगा. बिना कुछ कहे मैं उठ खड़ी हुई. मन में सोचने लगी कि अब तो यही मेरा घर है…कैसे इन सब को विश्वास दिलाऊं.

अपने कमरे में जा कर शेखर ने जो समान इधरउधर फैलाया था उसे यथास्थान रखने लगी. शेखर नहाने गए हुए थे.

अचानक दिमाग में आया कि पापा के रिटायरमैंट पर कोई उपहार देना बनता है. छोटी बहन रेनू और भाई राजू को भी बड़ी होने के नाते कुछ उपहार देना पड़ेगा. सोचा शेखर नहा कर आ जाएं तो उन से सलाह करती हूं. वैसे उन के जाने में 1 घंटा ही शेष था. वे मुझे उपहारों की शौपिंग के लिए अपना साथ तो दे नहीं पाएंगे, हां क्या देना है, इस की सलाह जरूर दे देंगे. मैं आतुरता से उन का इंतजार करने लगी.

शेखर नहा कर निकले तो बहुत जल्दीजल्दी तैयार होने लगे. उन की जल्दबाजी देख कर मुझे समझ नहीं आ रहा था अपनी बात कैसे शुरू करूं? जैसे ही वे तैयार हुए मैं ने झट से अपनी बात उन के सामने रखीं.

सुन कर झल्ला उठे. बोले, ‘‘अरे मीनू, तुम भी मेरे निकलने के समय किन पचड़ों में डाल रही हो? इस समय मैं उपहार देनेलेने की बातें सुनने के मूड में नहीं हूं. तुम जानो और तुम्हारे पापा का रिटायरमैंट,’’ कह कर अपना पल्ला झाड़ उठ खड़े हुए और अम्मां के कमरे में चले गए. जातेजाते अपना सूटकेस भी ले गए यानी वहीं से विदा हो जाएंगे.

मैं जल्दी से नाश्ता लगा कर ले गई. मेरे मन के उत्साह पर शेखर की बातों ने पानी सा डाल दिया था. मुझे लगा जाते समय शेखर मुझे कुछ रुपए अवश्य दे जाएंगे पर नाश्ता कर के हटे ही थे कि गाड़ी आ गई, ‘‘अच्छा, बाय मीनू,’’ कह कर गाड़ी में जा बैठे.

मैं देखती ही रह गई. परेशान सी खड़ी रह गई. सोचने लगी उपहारों के लिए पैसे कहां से लाऊं… जिस पर हक था वह तो अनदेखा कर चला गया. अम्मांपापाजी से रुपए मांगने में लज्जा और स्वाभिमान दीवार बन गया.

अचानक याद आया विदाई के समय कनाडा वाली बुआ ने कुछ नोट हाथ में थमाए थे, जिन्हें उस ने बिना देखे संदूक के नीचे तल में डाल दिए थे. जल्दी से कमरे में जा कर संदूक की तलाशी लेने लगी. एक साड़ी को झाड़ने पर कुछ नोट गिरे. ऐसे लगा कोई कुबेर का खजाना हाथ लग गया. लेकिन गिने तो फिर निराशा ने घेर लिया.

केवल 3000 रुपए ही थे. उन में अच्छे उपहार आना कठिन था. रवि भैया से हिम्मत कर के साथ चलने के लिए मिन्नत की तो वे मान तो गए पर बोले, ‘‘भाभी आप का बजट कितना है? उसी अनुसार दुकान पर ले चलता हूं.’’

मैं ने जब धीमी आवाज में बताया कि

3000 रुपए हैं तो रवि भैया ने व्यंग्य में मुसकरा कर कहा, ‘‘भाभी फिर तो आप पटरी वालों से ही खरीदारी कर लें.’’

मुझे कुछ पटरी वाले आवाज देने लगे तो मैं कुछ कपड़े देखने लगी. कपड़े वास्तव में कामचलाऊ थे. जींस, टौप वगैरह सभी कुछ था.

रेनू और छोटे भाई राजू के लिए सस्ते से कपड़े खरीद कर पापा और मम्मी के लिए कुछ ठीकठाक ही लेना चाहती थी. किसी तरह मां के लिए एक सस्ती सी साड़ी और पापा के लिए एक शौल ले कर घर लौट आई. औटो के पैसे रवि भैया ने ही दिए.

आगे पढ़ें- अगले दिन रवि भैया ने मुझे…

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Serial Story: लौटती बहारें (भाग-3)

अब तक आप ने पढ़ा:

शादी के बाद मीनू ससुराल आई तो घर के लोगों ?की सोच काफी पुरानी थी. उसे बातबात पर नीचा दिखाने की कोशिश की जाती थी. फिर भी मीनू सब को उचित सम्मान देती थी, सब का खयाल रखती थी.
कुछ दिनों बाद वह अपने मायके आई तो वहां भी खुद के लिए घर वालों का व्यवहार बदला पाया. छोटा भाई जहां लफंगे दोस्तों के साथ घूमने लगा था, वहीं छोटी बहन रेनू गलत सोहबत में पड़ गई थी.
यह सब देख कर मीनू उदास तो हुई पर फिर मन ही मन ठान लिया कि वह अपनी बहन और भाई को सही रास्ते पर ला कर ही दम लेगी.

– अब आगे पढ़ें :

मैं अचानक अपने कमरे में जा कर अपने सामान की दोनों गठरियां उठा लाई. कपड़े तो मैं ने घर में काम करने वाली को देने के लिए आंगन में ही रख दिए पर पुस्तकों को जा कर मां के बड़े संदूक में रख आई. मैं ने बड़े चाव से पापा व मम्मी की पसंद का खाना बनाया. मैं किचन से निकल ही रही थी कि मम्मी मुझे आवाज दे कर बुलाने लगीं. वहां जा कर देखा कि मम्मी पापा के रिटायरमैंट में मिले उपहारों का अंबार लगाए बैठी थीं. देखते

ही बोलीं, ‘‘मीनू इधर आ कर देख. तुझे क्याक्या ले जाना है… तेरे जाने की तैयारी कर रही थी. मैं सोच रही थी तुझ से पूछ कर ही तेरा सामान पैक करूं?’’

मैं हैरान रह गई कि मुझ से पूछे बिना ही मेरी जाने की तैयारी शुरू हो गई. मैं मन ही मन टूट सी गई, क्योंकि मैं तो 8 दिन रहने का सपना संजो कर आई थी. यहां तो चौथे दिन ही विदा करने का मन बना लिया. अनुभवी मां ने शायद हम तीनों भाईबहनों के ऊपर गहराते तनाव के बादल और गहरे होते देख लिए थे. मैं ने समझदारी से काम लेते हुए चेहरे पर निराशा का भाव न लाते हुए बड़ी सहजता से कहा, ‘‘अरे नहीं मम्मी, अभी 2 महीने पहले ही तो सब कुछ ले कर विदा हुई हूं. आप फिर शुरू हो गईं?’’

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मम्मी ने चुपचाप पापा को मिले उपहारों में से कुछ उपहार छांट कर एक ओर रख दिए और बोलीं, ‘‘तूने तो कह दिया कुछ नहीं चाहिए, पर हमें तो अपने मानसम्मान का ध्यान रखना है… तेरी ससुराल वाले कहेंगे बेटी को खाली हाथ भेज दिया.’’

मैं ने चुप रहने में ही भलाई समझी. चुपचाप सामान देखने लगी. कुछ सामान घरगृहस्थी के उपयोग का था. कुछ कपड़े थे. मैं ने सारा सामान समेटा और अपने सूटकेस में रखने जाने लगी. आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे. शुक्र है कमरे में कोई नहीं था. अटैची खोली तो बड़े चाव से साथ लाए कपड़े मुंह चिढ़ाने लगे मानो पूछ रहे हों कितने अवसर मिले हमें पहनने के? मन की वेदना कम करने के लिए अपनी सब से प्रिय सखी चित्रा को फोन किया पर वह भी शहर से बाहर गई हुई थी. समय काटे नहीं कट रहा था. जिस मायके आने के लिए इतनी ज्यादा उतावली हो रही थी वहां अब 1-1 पल गुजारना कठिन हो रहा था. समय जैसे रुक गया था.

कुछ देर पापा के पास बैठ कर उन से उन के आगे के प्लान पूछने लगी. वे भी निराश से ही थे. इतनी महंगाई में केवल पैंशन से गुजारा होना कठिन था. पापा भी हमेशा से स्वाभिमानी, गंभीर और मितभाषी रहे हैं. चाहते तो किसी अकाउंट विभाग में नौकरी कर सकते हैं, पर बेचारे कहने लगे, ‘‘मीनू मैं जानता हूं कि पैंशन के पैसे रोजमर्रा के खर्चों के लिए कम पड़ेंगे पर क्या करूं? सिफारिश का जमाना है. इस उम्र में नौकरी के लिए किस के आगे हाथ जोड़ूं?’’ यह सुन मन बहुत दुखी हो गया. मैं रोष से बोली, ‘‘आप लोगों ने मेरी शादी की बहुत जल्दी मचाई वरना उस समय मुझे अपने ही कालेज में लैक्चररशिप मिल रही थी. मैं ने आप लोगों से शादी न करने की कितनी जिद की थी पर आप दोनों माने ही नहीं.’’

पापा बोले, ‘‘मीनू बेटा कब तक तेरी शादी न करता बता? एक दिन तो तुझे जाना ही था. पराया धन कोई कब तक अपने घर में रख सकता है.’’

पापा की बात सुन कर मन फिर से खिन्न हो गया. यहां पर भी पराई और ससुराल में भी पराई… मन हाहाकार कर उठा. तो फिर मेरा कौन सा घर है? मैं हूं किस की? आंखें फिर बरसने लगी थीं. बड़ी कठिनाई से स्वयं को संभाल कर मम्मी के साथ किचन में हाथ बंटाने लगी. मम्मी कहने लगीं, ‘‘आराम से बैठ. मैं सब कर लूंगी. अब तो अकेले ही सब करने की आदत पड़ गई है. रेनू तो किचन में झांकती भी नहीं. बस कालेज, पढ़ाई और कुछ नहीं.’’

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मन तो हुआ कि रेनू की बात बता कर मम्मी को सजग कर दूं पर घर का माहौल और खराब न हो जाए, यह सोच कर चुप रही. अगले दिन सवेरे जल्दी उठ कर नहाधो कर तैयार हो गई. मन उचाट सा हो गया था. दिल कर रहा था जल्दी से निकल जाऊं. कम से कम घर का माहौल तो सामान्य हो जाए. जल्दीजल्दी नाश्ता किया. राजू ही छोड़ने जा रहा था. नीचे औटो आ गया तो मैं सब से मिलने लगी. मैं ने बड़े प्यार से आगे बढ़ कर रेनू को गले लगाया. वह अनमनी सी मेरे जाने के इंतजार में खड़ी थी. उस ने जल्द ही मुझे अपने से अलग कर लिया और सिर झुका कर खड़ी हो गई.

एक बार फिर मैं मम्मीपापा के गले लग कर रो पड़ी. उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेर कर चुप कराया. मैं भावों का और अधिक प्रदर्शन न करते हुए सीढि़यां उतर गई. राजू ने औटो में सामान रख दिया. पापा तो नीचे ही आ गए थे, परंतु मम्मी और रेनू ऊपर बालकनी में ही खड़ी थीं. मैं ने औटों में बैठ कर हाथ हिलाया. ऊपर से भी हाथ हिलते नजर आए. देखतेदेखते सब आंखों से ओझल हो गए. इस प्रकार मायके से मेरी दूसरी बार विदाई हुई. बसस्टैंड पर बस खड़ी थी. राजू ने मुझे बस में बैठाया फिर बोला, ‘‘दीदी कालेज को देर हो रही है,’’ और फिर नीचे उतर गया.

उतर कर राजू ने एक बार बस की खिड़की की ओर पलट कर देखा. मैं उसी की ओर देख रही थी. ‘‘बाय,’’ कह वह तेजी से चलता हुआ भीड़ में गुम हो गया.

राजू के जाते ही मन में एक गहरी टीस उठी. मैं बस में बैठी सोचने लगी कि समय कैसे बदलता है. मैं रेनू और राजू दोनों की चहेती दीदी थी. हर काम में मुझ से सलाह मांगते थे. मुझ से पूछे बिना एक कदम भी नहीं उठाते थे. आज दोनों कैसे पराए से हो गए थे. मेरे मन में दोनों के गुमराह होने की शंका किसी नाग की तरह फन फैला रही थी. ससुराल की दहलीज पर कदम रखते ही याद आया कि मायके से 8-10 दिन रहने की अनुमति ले कर गई थी पर 4 दिनों में ही लौट आई. कोई बहाना ही बनाना होगा. मेरे दिमाग ने काम किया. रवि भैया ने जैसे ही दरवाजा खोला मैं ने नकली मुसकान का मुखौटा ओढ़ लिया.

रवि हैरानी से बोला, ‘‘भाभी इतनी जल्दी कैसे? फोन कर देतीं. मैं लेने आ जाता.’’ हमारी आवाज सुन कर पापाजी आ गए.

मैं ने पापाजी के पैर छुए, फिर यभासंभव आवाज थोड़ी तेज कर के कहा, ‘‘वहां पापामम्मी का परिवार सहित भारतभ्रमण का कार्यक्रम पहले से ही तय था. वे सब मुझ से भी साथ चलने का अनुरोध कर रहे थे, पर मैं ने तो इनकार कर दिया. इसलिए जल्दी आना पड़ा.’’ मैं चाह रही थी कि अंदर कमरे में बैठी अम्मांजी भी सुन लें ताकि मुझे बारबार झूठ न बोलना पड़े. वैसे मेरा मन मुझे यह झूठ बोलने के लिए धिक्कार रहा था. अंदर अम्मां से जा कर भी मिली. उन्होंने बताया कि नीलम यहीं थी. कल ही गई है. दरअसल, कुछ दिन बाद उस की बचपन की सहेली दिव्या की शादी है. वह पड़ोस में ही रहती है, इसलिए वह शादी में शामिल होने के लिए 2-3 दिनों के लिए फिर आएगी.

मैं थोड़ी देर पापाजी और अम्मां के पास बैठी रही. वे रिटायरमैंट के कार्यक्रम के विषय में पूछते रहे. किसी ने भी चाय तो क्या पानी को भी नहीं पूछा. मेरा सिर थकावट व तनाव से फटा जा रहा था. फिर किचन में जा कर सब के लिए चाय बना कर लाई. चाय पी कर थोड़ा तरोताजा हो रात के खाने की तैयारी में जुट गई. 2 दिन बाद ये भी मुंबई से लौट आए. इन का काम भी वहां जल्दी खत्म हो गया था. शेखर भी मुझे जल्दी आया देख कर चौंक गए. मैं ने मन में उठती टीस को दबाते हुए जबरन मुसकराते हुए कहा, ‘‘मुझे वहां आप के आने की महक आने लगी थी, इसलिए भागीभागी चली आई.’’

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ये भी मूड में आ गए. मुझे पकड़ने दौड़े तो मैं हंसते हुए किचन में घुस गई. जिंदगी फिर पुराने ढर्रे पर चलने लगी. मैं बारबार ससुराल में अपनेपन का सुबूत पेश करने की कोशिश में लगी रहती और ससुराल वाले उन सुबूतों को झूठा साबित करने के प्रयास में रहते. यही करतेकरते थोड़ा समय और बीत गया.

2 दिन बाद नीलम जीजी आने वाली थीं. उन के पति व्यस्त थे. उन्हें शादी में बरात के समय ही शामिल होना था. परंतु नीलम जीजी सभी कार्यक्रमों में शामिल होना चाहती थीं, इसलिए 2 दिन पहले ही आ रही थीं. नीलम जीजी के आने की खबर से घर में उत्साह की लहर फैली थी. उन की सहेली के परिवार वाले निमंत्रणपत्र देने आए तो बारबार सभी से विवाह में शामिल होने की मनुहार कर रहे थे. ससुराल शहर में ही थी, इसलिए नीलम जीजी शाम को ही औटो से आईं. राहुल भी साथ था और बहुत सा सामान भी. घर में मैं और अम्मां ही थे. मैं किचन में लगी थी. वे सारा सामान अकेले ही ले कर अंदर आ गईं. सहेली के विवाह में शामिल होने आई थीं, इसलिए बहुत अच्छे मूड में थीं. मैं ने आगे बढ़ कर उन्हें गले लगाया. उन्होंने फिर पहले की तरह मुसकान दी और

स्वयं को मुझ से अलग करते हुए अम्मां के पास चली गईं. अगले दिन दोपहर से संगीत का कार्यक्रम था. मुझे लगा कि मुझे भी नीलम साथ ले कर जाएंगी, इसलिए मैं जल्दीजल्दी काम निबटाने लगी.

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