Film Review: जानें कैसी है नसीरुद्दीन शाह की फिल्म Mee Raqsam

रेटिंग: 4 स्टार

निर्माता और निर्देशक: बाबा आजमी

प्रस्तुतकर्ता: शबाना आज़मी

कलाकार: नसीरुद्दीन शाह, दानिश हुसैन, अदिति सुवेदी ,राकेश चतुर्वेदी ओम, श्रद्धा कौल, सुदीपा सिंह, फारुक जफर व अन्य

अवधि: एक घंटा 35 मिनट

ओटीटी प्लेटफॉर्म: जी 5

भारतीय सभ्यता व संस्कृति में गंगा जमुनी तहजीब की बातें बहुत की जाती है. मगर धीरे-धीरे हम सभी इस बात को भूलते जा रहे हैं.  अब बाबा आजमी और शबाना आज़मी अपने पिता कैफी आजमी को ट्रिब्यूट देने के लिए  एक फिल्म ” मी रक्सम” लेकर आए हैं. ओटीटी प्लेटफार्म “जी 5” पर प्रसारित हो रही इस फिल्म में  एक बार फिर से भारत की “गंगा जमुनी संस्कृति” को बढ़ावा देने के साथ-साथ इस बात को रेखांकित किया गया है कि कला का कोई धर्म नहीं होता.

कहानी:

यह कहानी है उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के तहत आने वाले गांव मिजवान में रहने वाले एक मुस्लिम परिवार की. सलीम(दानिश हुसैन) दर्जी का काम करते हैं , जो अपनी पत्नी सकीना और 15 वर्ष की बेटी मरियम(अदिति सुवेदी) के साथ रहते हैं. अचानक सकीना की मौत हो जाती है, इससे मरियम अंदर से काफी टूट जाती है. इस दुख की घड़ी में शोक व्यक्त करने के लिए मरियम की खाला जेहरा(श्रद्धा कौल), उनके पति, उनकी बेटी के साथ साथ मरियम की नानी(फारुक जफर) भी आती है और शोक प्रकट कर सलीम को नसीहत देकर चले जाते है. इलाके के सम्मानित व्यक्ति हासिम शेख(नसीरुद्दीन शाह) भी शोक व्यक्त करने आते हैं और सलीम से कहते हैं कि अब उन्हें मरियम का खास ख्याल रखना होगा.

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सलीम महसूस करते हैं कि अपनी मां की मौत से दुखी उनकी बेटी मरियम को नृत्य करने से आनंद मिलता है और वह अक्सर स्कूल जाते समय रास्ते में “उमा भारतनाट्यम डांस अकादमी” के पास रूक कर नृत्य देखती है. अपनी बेटी के अरमानों को पूरा करने के लिए सलीम  निर्णय लेते हुए “उमा भरतनाट्यम डांस एकेडमी” में मरियम को भी नृत्य की ट्रेनिंग दिलाना शुरू करते हैं.  इस बात से हाशिम शाह, मौलवी सभी नाराज होते हैं. सभी चाहते हैं कि सलीम अपनी बेटी मरियम को भरतनाट्यम डांस सिखाना बंद करे. लेकिन सलीम के लिए अपनी बेटी मरियम की खुशी प्राथमिकता है. इससे हाशिम शेख नाराज हो जाते हैं और सलीम को मस्जिद में भी जाने से रोक देते हैं. गांव के सभी लोग सलीम से कपड़े सिलवाना बंद कर देते हैं. सलीम चारों तरफ से मुसीबत से घिर जाते हैं. पर वह अपनी बेटी  को नृत्य सिखाना बंद नहीं करते हैं. भरतनाट्यम सिखाने वाली शिक्षक उमा (श्रद्धा कौल), मरियम की नृत्य प्रतिभा से काफी खुश हैं.मगर मरियम की खाला और उनकी नानी भी नाराज हैं .मगर मरियम को अपनी खाला की बेटी गुलशन का साथ मिलता है. ऑटो रिक्शा चालक अशफाक(कौस्तुभ शुक्ला) नई सोच वाला लड़का है. वह सलीम के परिवार का साथ देता है, जिसकी वजह से कई रिक्शा चालक अब सलीम के पास अपने कपड़े सिलवाने लगते हैं. सभी मरियम के नृत्य कौशल से प्रभावित है. मगर “उमा भरतनाट्यम डांस अकादमी” को सहयोग देने वाले नेता जयप्रकाश(राकेश चतुर्वेदी ओम) को यह बात पसंद नहीं है कि एक मुस्लिम लड़की भरतनाट्यम सीखे. जबकि जयप्रकाश की बेटी अंजलि, मरियम का साथ देती है और वह खुद भी सूफी संगीत सुनती रहती है. तमाम विरोध के बावजूद मरियम अपनी मिट्टी को जारी रखती है और मुस्लिम समुदाय के साथ साथ हिंदू नेता जयप्रकाश के विरोध के बावजूद वह एक प्रतियोगिता में विजयश्री हासिल करती है.

लेखन व निर्देशन:

मुद्दों पर आधारित फिल्मों का निर्माण करना बहुत कठिन होता है .मगर भाई-बहन की जोड़ी यानी कि बाबा आज़मी और शबाना आज़मी एक बेहतरीन शिक्षाप्रद और प्रेरक कहानी वाली फिल्म “मी रक्सम” लेकर आई है. यह दिल को छू लेने वाली सुंदर कहानी है. इसमें दर्जी का काम करने वाले एक पिता अपनी बेटी को उड़ान/ पंख देने के लिए कितनी मुश्किलो का सामना करता है,इसका बेहतरीन चित्रण है.एक साधारण और सुंदर कहानी के माध्यम से निदेशक लोगों के दिलों तक यह बात पहुंचाने में सफल रहते हैं कि कला की रूह उसकी आजादी है. या फिर जहां एक तरफ भारत की गंगा जमुनी तहजीब की याद दिलाती है वही धर्म और वर्ग भेद में बच्चे समाज का वितरण करती है इतना ही नहीं और चाय हिंदू धर्म की हो या मुस्लिम उसे तमाम तरह के सामाजिक बंधुओं में जकड़ कर रखा जाता है इसका भी चित्रण है तो वही या फिर दकियानूसी प्रथाओं पर चलने वाले समाज का आधुनिक तू ही किसका विरोध कर रही है उसका भी चित्रण है या फिर एक बेहतरीन संदेश देते हुए मानवता और इंसानियत की बात करती हैं इस फिल्म का सबसे बड़ा संदेश यही है कि कला का कोई धर्म नहीं होता है.

लेकिन इसमें कुछ कमियां भी हैं. मशीन पूरी फिल्में भारतनाट्यम सीखते हुए किस तरह की मेहनत मरियम करती है, इसका कहीं कोई चित्रण नहीं है, जबकि इस पर रोशनी डालना जरूरी था.

फिल्म के कुछ संवाद जो दिल को छूने के साथ-साथ बहुत बड़ी बात का जाते हैं. मतलब जब हाशिम शेख धमकी देते हुए सलीम से कहते हैं-“कतरा कतरा से मिलकर रहता है तभी दरिया बनता है.”इसके अलावा वह भी कहते हैं-“तवायफ बनाने का इरादा है?” यह संवाद बहुत कुछ कह जाते हैं.

इसके अलावा एक संवाद है “इस्लाम इतना कमजोर नहीं कि एक बच्ची के नृत्य सीखने से उसकी तोहीन हो जाए.”

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अभिनय:

यह सुंदर फिल्म दानिश हुसैन और अदिति सुवैदी के उत्कृष्ट अभिनय के चलते ही सुंदर बन पाई है. यह दोनों कलाकार पूरी फिल्म को अपने कंधे पर लेकर चलते हैं. अभिनय की जितनी तारीफ की जाए कम है. अदिति सुवेदी ने सिर्फ सुंदर अभिनय नहीं किया है ,बल्कि उनका नृत्य कौशल कमाल का है. नसीरुद्दीन शाह के अपने भक्तों पर सच में लगाया ही नहीं जा सकता .अफसोस इस फिल्म में मेहमान कलाकार के तौर पर उनका किरदार बहुत छोटा है, पर अहम है. इसी के साथ श्रद्धा कौल ,कौस्तुभ शुक्ला, फारुक जफर, सुदीपा सिंह और राकेश चतुर्वेदी ओम ने भी अच्छा अभिनय किया है.

फिल्म समीक्षा: ‘प्रधानमंत्री’ की मौत का वो सच जो कोई नहीं जानता

रेटिंग: साढ़े 3 स्टार

11 जनवरी 1966 की रात सोवियत संघ के ताशकंद शहर में देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय परिस्थितियों में हुई मृत्यु पर सवाल उठाने वाली फिल्म है-‘‘द ताशकंद फाइल्स’. जिसे लेखक व निर्देशक विवेक अग्निहोत्री के अब तक के करियर की बेस्ट फिल्म कहा जा सकता है. फिल्मकार ने इतिहास के किसी भी विवादास्पद पहलू को दिखाने की अपनी रचनात्मक आजादी का बाखूबी उपयोग इस फिल्म में किया है.

लेकिन फिल्मकार की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि फिल्म के आखिरी से पहले कृछ तथ्य एकतरफा नजर आते हैं. एक सीन में एक मसले पर हाथ उठाने के लिए कहे जाने पर इतिहासकार आयशा कहती हैं कि कौन सा हाथ लेफ्ट या राइट?

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कहानी…

फिल्म ‘‘द ताशकंद फाइल्स’’ की कहानी के केंद्र में एक युवा राजनीतिक पत्रकार रागिनी फुले (श्वेता बसु प्रसाद)हैं. उसे अपने अखबार के लिए स्कूप वाली स्टोरी देनी होती है. जिस दिन उसका जन्मदिन होता है, उसी दिन उसके संपादक उसे दस दिन के अंदर बड़ी स्कूप वाली स्टोरी न देने पर उसे नौकरी से बाहर करने की बात कह देता है. अब रागिनी परेशान है. तभी उसके पास एक अनजान नंबर से फोन आता है,जो कि उससे कुछ सवाल करता है और शास्त्री जी को लेकर भी सवाल करता है. फिर कहता है कि उसके जन्मदिन के उपहार के तौर पर उसके टेबल की दराज में एक लिफाफा है. इस लिफाफे में उसे ढेरी सारी जानकारी मिलती हैं, जिसके आधार पर वह अपने अखबार को स्टोरी देती है कि शास्त्री जी की मौत हार्ट अटैक से नहीं हुई थी और वह इसके लिए जांच कमेटी गठित करने की मांग करती है.

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पूरे देश में हंगामा मच जाता है. तब गृहमंत्री पी के आर नटराजन (नसीरूद्दीन शाह) पहले रागिनी फुले से बात करते हैं और फिर एक जांच कमेटी गठित करने का निर्णय लेते हुए विपक्ष के नेता श्याम सुंदर त्रिपाठी (मिथुन चक्रवर्ती) से मिलते हैं तथा उन्हे इस कमेटी का अध्यक्ष बना देते हैं. श्याम सुंदर त्रिपाठी इस जांच कमेटी में अपने साथ रागिनी फुले, समाज सेविका इंदिरा जय सिंह रौय (मंदिरा बेदी), ओंकार कश्यप (राजेश शर्मा), वैज्ञानिक गंगाराम झा (पंकज त्रिपाठी), जस्टिस कूरियन (विश्व मोहन बडोला), पूर्व रा प्रमुख जी के अनंता सुरेश (प्रशांत बेलावड़ी), युवा नेता वीरेंद्र प्रताप सिंह राना (प्रशांत गुप्ता) के साथ-साथ इतिहासकार आयशा  (पल्लवी जोशी) को भी रखते हैं. आयशा ने शास्त्री जी की मौत पर लिखी अपनी किताब में शास्त्री जी की मौत की वजह हार्ट अटैक लिखी है और उन्हे यह मंजूर नही कि कोई उन्हे व उनकी किताब को गलत ठहराए.

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डायरेक्शन…

फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री ने इस बार अपनी फिल्म ‘‘द ताशकंद फाइल्स’’ में अतीत के बहुत ही ज्यादा विवादास्पद मुद्दे को उठाया है. फिल्म देखते वक्त अहसास होता है कि उन्होने इस राजनीतिक ड्रामा वाली फिल्म के लिए गहन शोधकार्य किया है. बेहतरीन पटकथा व उत्कृष्ट निर्देशन के चलते फिल्म दर्शकों को अंत तक बांधकर रखती है. फिल्म रोमांचक यात्रा है. इंटरवल से पहले कहानी बेवजह खींची गयी लगती है, मगर इंटरवल के बाद जबरदस्त नाटकीयता है. विवेक अग्निहोत्री व फिल्म एडीटर की कमजोरी के चलते फिल्म में सुनील शास्त्री, अनिल शास्त्री, कुलदीप नय्यर आदि के इंटरव्यू ठीक से कहानी का हिस्सा नहीं बन पाते.

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अभिनय…

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो पत्रकार रागिनी फुले का किरदार निभाने वाली अदाकारा श्वेतता बसु प्रसाद के अभिनय की जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है. एक दो सीन को नजरंदाज कर दें, तो वह पूरी फिल्म में अपनी परफार्मेंस की वजह से हावी रहती है. पंकज त्रिपाठी,पल्लवी जोशी, मंदिरा बेदी, मिथुन चक्रवर्ती ने भी बेहतरीन परफार्मेंस दी है. नसीरूद्दीन शाह के हिस्से कुछ खास करने को रहा नही. कैमरामैन उदयसिंह मोहिते भी बधाई के पात्र हैं. इस फिल्म की कमजोर कड़ी इसका बैकग्राउंड साउंड है.

देखें या नहीं…

कुल मिलाकर अगर आप एक गंभीर मुद्दे पर कोई अच्छी फिल्म देखना चाहते हैं तो एक बार इसे जरूर देख सकते हैं. लेकिन बौलीवुड की टिपिकल मसाला फिल्में देखने वाले दर्शकों के लिए ये फिल्म नहीं है.

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