नास्तिक बहू: नैंसी के प्रति क्या बदली लोगों की सोच

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नास्तिक बहू: भाग 3- नैंसी के प्रति क्या बदली लोगों की सोच

लेखिका- प्रेमलता यदु

नैंसी का बस इतना कहना था कि नलिनी ने प्रचंड रूप धारण कर लिया और कहने लगी,”प्रौब्लम यह है कि तुम चाहती ही नहीं हो कि हम तुम्हारे साथ रहें, मैं तुम्हें किसी बात पर रोकटोक करूं, तुम्हें साड़ी पहनने को कहूं, तुम्हें अपने संग भजनकीर्तन में भाग लेने को कहूं, तुम्हें कालोनी की दूसरी बहुओं की तरह संस्कारी बनाने की कोशिश करूं.”

नैंसी आवाक नलिनी को सुनती रही फिर बीच में ही उसे रोकती हुई बोली,”मम्मीजी, यह सब बेबुनियाद बेकार की बातें आप क्यों कह रही हैं?”

“अच्छा… बेबुनियाद बेकार की बातें? तुम कुछ दिन पहले ओल्ड‌ऐज होम ग‌ई थी और वहां से फौर्म भी ले कर आई हो, तुम हमें वृद्धाश्राम भेजना चाहती हो लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूंगी. हम अपने पुराने मकान में शिफ्ट हो जाएंगे. मैं ने किराएदार से मकान भी खाली करवा लिया है. हम वहीं जा रहे हैं यह उसी की तैयारी है,” नलिनी तमतमाती हुई बोली.

इतना सब सुनने के बाद नलिनी के पति सौरभ चिढ़ते हुए बोले,”यह क्या बकवास कर रही हो. नैंसी ओल्ड‌ऐज होम जरूर गई थी, वहां से वह फौर्म भी ले कर आई है लेकिन हमें ओल्ड‌ऐज होम भेजने के लिए नहीं. नैंसी हर महीने कुछ सेविंग करती है और जब उस के पास अच्छीखासी सेविंग हो जाती है तो वह उन रूपयों से जरूरतमंदों की मदद करती है. कभी किसी गरीब मजदूर बच्चे के स्कूल का फीस भर देती है तो कभी किसी अनाथालय में जा कर उन की सहायता करती है.

“इस बार मैं ने ही उस से कहा कि मेरे दोस्त को सहायता की जरूरत है. मेरे दोस्त के बच्चे उसे वृद्धाश्रम में छोड़ कर, उस से सारे नाते तोड़ कर चले ग‌ए हैं. वह बहुत बीमार है. उस के इलाज के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं इसलिए नैंसी वृद्धाश्रम गई थी और किसी संस्था में रूपए जमा करने के लिए उन की अपनी कुछ औपचारिकताएं होती हैं, उसी का फौर्म ले कर आई है नैंसी, जो तुम ने देखा होगा.”

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यह सुनते ही नलिनी गुस्से में बोली,”अगर ऐसी ही बात है तो आप सब ने मुझे क्यों नहीं बताया?”

नलिनी के इस सवाल का जबाव नैंसी ने बड़े प्यार दिया, वह बोली,”मम्मीजी, क्योंकि मैं यह जानती थी कि अगर मैं आप से कहूंगी कि मेरे पास कुछ रूपए हैं और मैं उन्हें किसी अच्छे कामों में लगाना चाहती हूं तो आप कहतीं कि उसे हम मंदिर के किसी ट्रस्ट को दान दे देते हैं, भव्य भजन संध्या का आयोजन करते हैं या किसी मंदिर में अनुष्ठान करा लेते हैं लेकिन मैं ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहती थी, क्योंकि मैं उन पैसों से केवल जरूरतमंदों की सहायता करना चाहती थी और आगे भी यही करना चाहूंगी. और रही बात आप लोगों को वृद्धाश्रम भेजने की तो मैं यह अपने सपने में भी कभी नहीं सोच सकती. आप और पापाजी तो इस घर की शान हैं, इस घर की रौनक हैं. छोटों के सिर पर अपने बड़ों का हाथ होना ही दुनिया की सब से बड़ी दौलत होती है जिसे मैं किसी भी हाल में खोना नहीं चाहती हूं.”

तभी नलिनी का मोबाइल बजा और उस के फोन उठाते ही उस के चेहरे का उड़ता रंग इस बात की पुष्टि कर रहा था कि अवश्य कोई गंभीर बात है. नलिनी के फोन रखते ही सभी ने एक स्वर में कहा,”क्या हुआ?”

नलिनी ने कोई उत्तर नहीं दिया, बस वह नैंसी का हाथ पकड़ कर खींचती हुई बोली,”तू चल मेरे साथ मैं सब बताती हूं,” कहती हुई नलिनी अपनी सहेली सुषमा के घर नैंसी को ले कर पहुंची.

वहां पहुंच कर नैंसी ने जो दृश्य देखा उसे देख कर वह स्तब्ध रह गई. सुषमा और उस के पति का कुछ सामान जमीन पर बिखरे हुए थे. सुषमा रो रही थी, उन के पति खिड़की से बाहर की ओर देखते हुए मौन खड़े थे. बेटा हाथ में हाथ धरे यह सब देख रहा था और सुषमा की सुसंस्कारी बहू उन पर जोरजोर से चिल्ला रही थी.

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नलिनी को देखते ही सुषमा भाग कर उस के पास आ गई और उसे गले लगा कर रोती हुई बोली,”नलिनी, देख न रमा क्या कह रही है. यह कह रही है कि हम इस घर को छोड़ कर कहीं और चले जाएं क्योंकि यह घर उस के पति के नाम पर है. इस घर को बनाने के लिए उस के पति ने लोन लिया है. अब तुम ही बताओ इस उम्र में हम अपना घर छोड़ कर कहां जाएंगे?”

यह सुन कर नलिनी ने रमा को बहुत समझाने की कोशिश की कि सासससुर मातापिता के समान होते हैं. यह घर जरूर तुम्हारे पति के नाम पर है लेकिन तुम्हारा पति इन का इकलौता बेटा है. लोन जरूर तुम्हारे पति ने ली है लेकिन इन्होंने भी अपना पुराना घर बेच कर कर इस घर में पैसे लगाया है. अपनी जमापूंजी भी इस घर में लगाई है लेकिन रमा कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी, उलटा वह नलिनी से बदतमीजी पर उतर आई. यह देख नैंसी की आंखें लाल हो गईं और वह रमा पर तनती हुई बोली,”तुम्हें बड़ों से बात करने की तमीज नहीं है यही है तुम्हारे संस्कार.”

नैंसी का इतना कहना था रमा अकड़ती हुई बोली,”तुम संस्कारों के बारे में कुछ जानती भी हो, तुम तो खुद अपने सासससुर को वृद्धाश्रम भेज रही हो और यहां मुझे संस्कारों के पाठ पढ़ाने आई हो.”

“तुम से किस ने कहा कि मैं अपने मम्मीपापा को वृद्धाश्रम भेज रही हूं. तुम जैसी छोटी सोच वाले ही ऐसा सोच सकते हैं और ऐसा कर सकते हैं. मातापिता तो बच्चों के लिए सुरक्षा कवच की तरह होते हैं और अपने सुरक्षा कवच को अपने से अलग नहीं किया जाता, लेकिन तुम्हें यह बात कहां से समझ आएगी, तुम्हारी आंखों पर तो पट्टी बंधी है. तुम एक बात अच्छी तरह से समझ लो कि तुम अंकलआंटी को इस घर से नहीं निकाल सकतीं,” नैंसी ने जोर डालते हुए कहा.

“क्यों? क्यों नहीं निकाल सकती और तुम कौन होती हो मुझे रोकने वाली…” रमा गुर्राती हुई बोली.

“मैं कोई नहीं होती तुम्हें रोकने वाली लेकिन कानून तुम्हें रोक सकता है. बस, एक पुलिस कंप्लैंट की जरूरत है, बेहतर होगा कि तुम अंकलआंटी को ऊपर वाले हिस्से में आराम से रहने दो और तुम अलग रहना चाहती हो तो नीचे के हिस्से में सुकून से रहो और इन्हें भी रहने दो,” नैंसी रमा की ओर उंगली दिखाती हुई बोली.

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पुलिस कंप्लैंट की बात सुन कर रमा डर गई और सुषमा और उस के पति का मकान के ऊपरी हिस्से में रहने के लिए मान गई. रमा के मानते ही नैंसी जमीन पर बिखरे सुषमा और उस के पति का सामान उठा कर जमाने लगी. यह देख नलिनी और सुषमा को अपनी सोच पर आज पछतावा हो रहा था. नलिनी को हमेशा इस बात का मलाल था कि उस की बहू नैंसी संस्कारी नहीं है और न तो वह किसी पूजापाठ या भजनकीर्तन में शरीक होती और न ही कोई धर्मकर्म या पुण्य का कार्य करती है लेकिन आज वह समझ गई थी कि असली धर्मकर्म और पुण्य क्या होता है.

सुषमा नलिनी को गले लगाती हुई बोली,”तेरी बहू सच में सुसंस्कारी है, उसे समझने में भूल हम से ही हुई है.”

नास्तिक बहू: भाग 2- नैंसी के प्रति क्या बदली लोगों की सोच

लेखिका- प्रेमलता यदु

“अब क्या बताऊं सुषमा, तुम तो जानती ही हो नैंसी को, उस का मन कहां लगता है इन सब में, उस से तो बस फैशन करवा लो, बिना मिर्चमसाला के खाना बनवा लो या फिर इधरउधर घूमने को कह दो, एक पैर में खड़ी रहती है,” नलिनी दुखी और शिकायती अंदाज में बोली “अच्छा छोड़ इन सब बातों को, ठीक ही है जो वह नहीं आ रही है. वैसे भी मुझे तुम्हें बहुत जरूरी बात बतानी है, जो मैं उस के सामने तुम्हें बता नहीं पाऊंगी. अब तुम जल्दी बाहर मिलो मैं फोन रखती हूं,” अपनी सारी बातें रहस्यमय तरीके से कहने के बाद सुषमा ने फोन रख दिया.

सोसाइटी के मंदिर प्रांगण में मेला सा लगा हुआ था. खूब धूम मची हुई थी, यह एक प्रकार का साप्ताहिक मेला का आयोजन जैसा ही था. हफ्ते में 1 दिन भजनकीर्तन सभी महिलाओं के मनोरंजन के साथ ही साथ सुसंस्कारी होने का परिचायक भी था.

आसपास के सोसाइटी की औरतें भी पूरे मेकअप में इतना सजधज कर आई थीं जैसे शादीब्याह में आई हों या फिर कोई फैशन शो चल रहा हो. छोटेछोटे समूह बना कर सभी औरतें एकदूसरे से गुफ्तगू करने में लगी हुई थीं. उन में से कोई अपने कान का न‌या झुमका दिखा रही थी, तो कोई अपनी साड़ी पर इतरा रही थी, कोई अपनी सास की दुष्टता के कर्मकांड बयां कर रही थी. कोई अपनी बहू के आतंक पर रो रही थी, तो कोई अपने ही घर की कहानी सुना रही थी. सभी अपनीअपनी गाथाएं सुनाने में लगी हुई थीं.

नलिनी भी अपनी संगी सुषमा और उस की बहू के संग प्रांगण में पहुंची. वहां पहुंचते ही सुषमा की बहू रमा अपनी सास को छोड़ कर कर अपनी हमउम्र और अपनी सहेलियों के पास खिसक ली. खूब ढोल, ताशे और मंजीरे बजे, भक्ति गीतों से पूरा परिसर गुंजायमान हो उठा. कुछ बुजुर्ग महिलाएं वहां पर उपस्थित महिलाओं को भजनकीर्तन, पूजाअर्चना का जीवन में महत्त्व समझा कर अपनेअपने घरों का पोथापुराण ले कर बैठ गईं और फिर बाकी महिलाएं भी इधरउधर की बेकार की बातें ले कर शुरू हो गईं. यह सब हर सप्ताह का दृश्य था.

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नलिनी और सुषमा दोनों भजन के बाद अलगथलग एक कोने में जा बैठीं तब नलिनी ने कहा,”तुम फोन पर कह रही न कि तुम मुझे कुछ बताना चाहती हो तो अब बताओ तुम क्या बताना चाहती हो.”

सुषमा ठंडी सांसें भरती हुई बोली,”देखो नलिनी, मैं तुम से जो कहने जा रही हूं उसे धैर्य और ध्यान से सुनना. तुम्हारी बहू नैंसी संस्कारी नहीं है यह बात तो तुम जानती ही हो लेकिन यह नहीं जानतीं कि अब वह इस बात को पूरी तरह से सिद्ध करने जा रही है. जिस बहू के पास भजनकीर्तन के लिए समय नहीं है, उस के पास अपने सासससुर और परिवार के लिए समय कहां से होगा,” यह सुन नलिनी आश्चर्य से सुषमा का हाथ थामती हुई बोली,”तुम क्या कह रही हो मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, तुम साफसाफ कहो न तुम्हें जो भी कहना है.”

तभी सुषमा धीरे से बोली,”नैंसी, तुम्हें और तुम्हारे पति को वृद्धाश्रम भेजने की तैयारी कर रही है, मेरी बहू रमा ने उसे वृद्धाश्रम से बाहर निकलते हुए देखा था और उस के हाथों में कुछ कागज भी थे, शायद वृद्धाश्रम के फौर्म होंगे…”

सुषमा का इतना कहना था कि नलिनी की आंखें भर आईं, उस के और नैंसी के बीच विचारों का मदभेद अवश्य था लेकिन इतना भी नहीं था कि नैंसी उन्हें ओल्ड‌ऐज होम भेजने की सोचे. नलिनी की आंखों में पानी देख सुषमा बोली,”मैं ने तो तुझे पहले ही कहा था कि नैंसी को सत्संग और भजनकीर्तन में अपने साथ जबरदस्ती ले कर आया कर तभी तो वह संस्कारी बन पाएगी लेकिन तुम ऐसा कर नहीं पाई, यह उसी का नतीजा है. मेरी बहू को देख सुबहशाम ईश्वर आराधना करती है, मन लगा कर भजनकीर्तन करती है तभी तो संस्कारी है, धर्मकर्म, पापपुण्य सब जानती है इसलिए परिवार को साथ ले कर चलती है.”

सुषमा और नलिनी की बातें अभी समाप्त नही हुई थीं लेकिन धीरेधीरे अब मंदिर परिसर खाली होने लगा था. सब अपनेअपने घर की ओर जाने लगे थे. तभी सिर पर पल्लू ओढ़े रमा भी वहां आ गई और सुषमा से बोली,”मम्मीजी, चलिए अब हम भी चलते हैं.”

सुषमा उठ खड़ी हुई और नलिनी से बोली,”चलो नलिनी.”

नलिनी शांत रही फिर बोली,”तुम दोनों चलो मैं थोड़ी देर रुक कर जाऊंगी.”

नलिनी के ऐसा कहने पर सुषमा और उस की बहू चले गए. नलिनी काफी देर तक अकेली बैठी रही फिर मन में कुछ निश्चय कर घर लौट आई. नलिनी देर से लौटी है यह देख नैंसी दौड़ कर उस के करीब आ कर बोली,”मम्मीजी, आज आप को आने में बहुत देर हो गई, मैं कब से आप की राह देख रही थी.”

नलिनी ने कोई जवाब नहीं दिया और अपने कमरे की ओर मुड़ गई. तभी उस की नजर टेबल पर रखे कागज पर पड़ी जिस में बड़ीबड़ी अक्षरों में वृद्धाश्रम लिखा था, जिसे पढ़ने के लिए नलनी को चश्मे की जरूरत नहीं थी. नलिनी समझ गई कि सुषमा जो कह रही थी वह सही है.

नलिनी की आंखों से लुढ़कते हुए आंसू उस के गालों पर आ गए और वह फौरन अपने कमरे में चली गई और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. नैंसी ने बहुत आवाज लगाई लेकिन नलिनी ने दरवाजा नहीं खोला, बस इतना कहा कि कुछ देर के लिए मैं अकेले रहना चाहती हूं. नैंसी चुपचाप दरवाजे से लौट ग‌ई, उसे कुछ समझ नहीं आया.

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उस रात नलिनी ने किसी से कोई बात नहीं की. नैंसी के लाख मनुहार के बाद भी नलिनी ने खाना भी नहीं खाया. नलिनी के पति सौरभ ने पूरी कोशिश की कि नलिनी कुछ बोले लेकिन वह कुछ नहीं बोली जैसे उस ने न बोलने का प्रण कर लिया हो इस प्रकार मौन रही. इसी प्रकार 4 दिन बीत ग‌ए 5वें दिन नलिनी अपना और अपने पति का सामान पैक करने लगी. यह देख सौरभ बोले,”यह सब तुम क्या कर रही हो?”

नलिनी बिना जवाब दिए पैकिंग में लगी रही तभी वहां नैंसी और उस के पति अमन भी आ गए. नलिनी को इस प्रकार सामान पैक करता देख नैंसी से रहा नहीं गया और वह जोर से बोली,”मम्मीजी, यह सब क्या है, न आप ठीक से खाना खा रही हैं, न किसी से कुछ बोल रही हैं और अब यह पैकिंग… जब तक आप हमें बताएंगी नहीं कि प्रौब्लम क्या है हमें पता कैसे चलेगा… आप बताइए तो सही कि आखिर बात क्या है?”

आगे पढ़ें- नैंसी आवाक नलिनी को सुनती रही फिर…

नास्तिक बहू: भाग 1- नैंसी के प्रति क्या बदली लोगों की सोच

लेखिका- प्रेमलता यदु

नलिनी शीशे के सामने खड़ी हो स्वयं को निहारने लगी. खुले गले का ब्लाउज, ढीला जुड़ा, खुला पल्लू, माथे पर अपनी साड़ी के रंग से मिलता हुआ बड़ी सा बिंदी, पिंक कलर की लिपिस्टिक और गले में लंबा सा मंगलसूत्र… इन सब में नलिनी बेहद ही आकर्षक लग रही थी. कल रात ही उस ने तय कर लिया था कि उसे क्या पहनना है और कीर्तन में जाने के लिए किस तरह से तैयार होना है.

सुबह होते ही उस ने अपनी बहू नैंसी से कहा, “नैंसी, जरा बेसन, हलदी और गुलाबजल मिला कर कर लेप तैयार कर लेना, बहुत दिनों से मैं ने लगाया नहीं है. पूजापाठ, भजनकीर्तन और प्रभु चरणों में मैं कुछ इस तरह से लीन हो जाती हूं कि मुझे अपनी ओर ध्यान देने का वक्त ही नहीं मिल पाता.”

नलिनी की बातें सुन नैंसी मंदमंद यह सोच कर मुसकराने लगी कि हर सोमवार मम्मीजी यही सारी बातें दोहराती हैं जबकि वह सप्ताह में 2-3 बार अपने चेहरे पर निखार के लिए लेप लगाती ही हैं और भजनकीर्तन से ज्यादा वह खुद के लुक पर ध्यान देती हैं.

नैंसी होंठों पर मुसकान लिए हुए बोली,”मम्मीजी, इस बार आप यह इंस्टैंट ग्लो वाला पील औफ ट्राई कर के देखिए.”

नैंसी के ऐसा कहते ही नलिनी आश्चर्य से बोली,”क्या सचमुच इंस्टैंट ग्लो आता है?”

“आप ट्राई कर के तो देखिए मम्मीजी…” नैंसी ने प्यार से कहा. वैसे दोनों सासबहू के बीच कोई तालमेल नहीं था. एक पूरब की ओर जाती, तो दूसरी पश्चिम की ओर. नलिनी को खाने में जहां चटपटा, मसालेदार पसंद था, वहीं नैंसी डाइट फूड पर जोर देती. नलिनी चाहती थी कि कालोनी की बाकी बहुओं की तरह नैंसी भी घर पर साड़ी ही पहने लेकिन वह ऐसा नहीं करती क्योंकि उसे काम करते वक्त साड़ी में असुविधा महसूस होती इसलिए वह घर पर सलवार सूट पहन लेती ताकि घर पर शांति बनी रहे और बात ज्यादा न बढ़े लेकिन यह भी नलिनी को नागवार ही गुजरता.

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नैंसी की एक और बात नलिनी की आंखों में चुभती और वह थी नैंसी का भजनकीर्तन से दूर भागना. इस बात को ले कर कालोनी की सभी औरतें नलिनी को तानें भी दिया करती थीं कि कैसी बहू ब्याह कर लाई हो, जो पूजापाठ और भजनकीर्तन में भाग लेने के बजाय वहां से भाग लेती है. नलिनी की घनिष्ठ सहेली सुषमा तो उस से क‌ई बार यह कहने से भी नहीं चूकती कि तेरी बहू तो बिलकुल भी संस्कारी नहीं है. यह सुन कर नलिनी का पारा चढ़ जाता और वह नैंसी पर दबाव डालती कि वह भी बाकी बहुओं की तरह सजधज कर पूजाअर्चना में अपनी सक्रिय भूमिका निभाए लेकिन नैंसी साफ मना कर देती क्योंकि वह किसी के भी दबाव में आ कर ऐसा कोई काम नहीं करना चाहती थी जिसे करने का उस का अपना मन न हो. इसी वजह से क‌ई बार दोनों के मध्य कहासुनी भी हो जाती.

नैंसी का मानना था कि कर्म ही पूजा है और हर इंसान को अपना काम पूरी ईमानदारी से करना चाहिए. नैंसी की इसी सोच की वजह से वह अपना समय औरों की तरह पूजापाठ में नहीं गंवाती, जो कालोनी की महिलाओं को बुरा लगने का एक बहुत ही बड़ा कारण था.

नलिनी और नैंसी के बीच लाख अनबन हो लेकिन जहां फैशन की बात आती दोनों एक हो जातीं और नलिनी, नैंसी के फैशन टिप्स जरूर फौलो करती क्योंकि नैंसी का फैशन सैंस कमाल का था. उस के ड्रैससैंस, मेकअप और हेयरस्टाइल के आगे सब फीका लगता.

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नलिनी फेस पैक का डब्बा नैंसी से लेते हुई बोली,”आज कालोनी की सभी औरतें कीर्तन में आएंगी न, इसलिए मुझे भी थोड़ा ठीकठाक तैयार हो कर तो जाना ही पड़ेगा. वैसे तो मैं बाहरी सुंदरता पर विश्वास नहीं रखती, मन की सुंदरता ही मनुष्य की असली सुंदरता होती है लेकिन तुम तो जानती ही हो कि यहां की औरतों को खासकर वह शालिनी न जाने अपनेआप को क्या समझती है. उसे तो ऐसे लगता है जैसे उस से ज्यादा सुंदर इस कालोनी में कोई है ही नहीं और जब से दादी बनी है इतराती फिरती है. हर किसी से कहते नहीं थकती है कि मेरी त्वचा से किसी को मेरी उम्र का पता ही नहीं चलता. जब तक मैं किसी को न बताऊं कि दादी बन गई हूं, कोई जान ही नहीं पाता. भला कोई जान भी कैसे पाएगा… चेहरे पर इतना मेकअप जो पोत कर आती है. भजन में आती है या फैशन शो में कौन जाने…

नैंसी बिना कुछ कहे नलिनी की बातें सुन कर केवल मुसकरा कर वहां से चली गई क्योंकि नैंसी भलीभांति जानती है कि स्वयं नलिनी भी कालोनी की उन्हीं औरतों में से एक है जो लोगों के सामने खुद को खूबसूरत दिखाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ती. भजनकीर्तन, पूजापाठ, व्रतअनुष्ठान यह सब इस सोसाइटी की ज्यादातर महिलाओं के लिए एक मनोरंजन और टाइमपास का साधन मात्र ही है जिस में दिखावा और ढोंग से ज्यादा कुछ नहीं है. असल में यहां की ज्यादातर महिलाएं केवल सजसंवर कर मंदिर प्रांगण में खुद को सुसंस्कृत साबित करने में लगी रहती हैं. अपनी भव्यता महंगी साड़ियों और गहनों का प्रर्दशन करना ही उन का मुख्य उद्देश्य होता है. आस्था, श्रद्धा जैसे बड़ेबड़े शब्द तो सिर्फ दिखावा व स्वांग मात्र ही है. इस बात से नैंसी पूर्ण रूप से अवगत थी.

हर सोमवार की तरह आज भी दुर्ग शहर के पौश कालोनी साईं परिसर में शाम को सोसाइटी कंपाउंड के मंदिर प्रांगण में भजनकीर्तन का आयोजन रखा गया था. इसलिए नलिनी सुबह होते ही अपने चेहरे पर निखार लाने में जुट गई थी और सारा दिन शाम की तैयारी में ही लगी रही. निर्धारित समय पर पूरी तरह से सजसंवर कर इतराती हुई बुदबुदाई,’आज कीर्तन में सब की नजरें सिर्फ मुझ पर और मुझ पर ही होंगी,’ तभी नलिनी का फोन बजा,”हैलो… नलिनी, भजन संध्या के लिए तैयार हुई या नहीं? मैं और मेरी बहू निकल रहे हैं,” नलिनी की खास सहेली सुषमा बोली जो उसी सोसाइटी की रहने वाली थी.

“हां, बस निकल ही रही हूं. तुम दोनों सासबहू निकलो मैं तुम्हें गेट पर ही मिलती हूं,” नलिनी अपने मेकअप का टच‌अप करती हुई बोली.

“अरे…क्या तुम अकेले ही कीर्तन में आ रही हो, नैंसी क्यों नहीं आ रही है?”

आगे पढ़ें- सोसाइटी के मंदिर प्रांगण में…

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