नव वर्ष का प्रकाश: कैसे घटी मनीष और निधि की दूरियां

उस के मन में आने वाले नव वर्ष के लिए बेचैनी होने लगी.प्रकाश ने फोन पर इतना ही कहा था कि वह दीया को ले कर पहुंच रहा है. अंधेरा घिर आया था लेकिन निधि ने अभी तक घर की बत्तियां नहीं जलाई थीं. जला कर वह करती भी क्या. जिस के जीवन से ही प्रकाश चला गया हो उस के घर के कमरों में प्रकाश हो न हो, क्या फर्क पड़ता है.

प्रकाश, जिसे पिछले 31 सालों से उन्होंने अपने खूनपसीने से सींचा था, जिस के पलपल का खयाल रखा था, जिस की पसंदनापसंद बड़ी माने रखती थी, उसी ने आज उन्हें बंजर, बेसहारा बना दिया था.

ममता भरे स्नेहिल आंचल की छांव में जो प्रकाश खेला था आज एकाएक अपने तक ही सीमित हो गया था. उस ने अपने मातापिता को बुढ़ापे में यों निकाल फेंका था मानो पैर में चुभा कांटा निकाल कर फेंक दिया हो. बेचारे मातापिता अपने बुढ़ापे के लिए कुछ बचा भी नहीं पाए थे. सोचा था प्रकाश पढ़लिख जाएगा तो कमा लेगा, हमारे बुढ़ापे की लाठी बनेगा. यह एहसास निधि के लिए जानलेवा था. सारे दिन वह व्यथित रहती. उस पर पति का कठोर जीवन उसे और भी सालता. पति को जीतोड़ मेहनत करते देख उसे बहुत दुख होता. अपने जिगर के टुकड़े से उसे ऐसी उम्मीद न थी.

निधि को वह दिन याद आया जब प्रकाश का नामकरण किया गया था. सब उसे राज…राजकुमार नाम से पुकारने लगे थे किंतु उस ने प्रकाश नाम रखा. शायद यह सोच कर कि प्रकाश नाम से उसे सदैव जीवन में प्रकाश मिलता रहेगा और दूसरों को भी वह अपने प्रकाश से प्रकाशित करेगा.

परंतु आज जब जीवन इतना गुजर गया तो अनुभव हुआ कि प्रकाश का अपना कोई वजूद ही नहीं है, उस का ऐसा कोई अस्तित्व नहीं है कि जैसा दीपक के साथ या बल्ब, ट्यूबलाइट के साथ जुड़ा होता है. प्रकाश के साथ जुड़ी चीजें भले ही उस के प्रकाश के साथ जुड़ी हों लेकिन उन से प्रकाश का कोई लेनदेन या सरोकार नहीं होता. बिना किसी आग्रह के वह वहीं चला जाता है जहां बल्ब, ट्यूब- लाइट या दीपक जल रहा होता है.

वह खुद भी इस बात को सोचने की जरूरत भी नहीं समझता कि उस के चले जाने के बाद किसी का जीवन प्रकाशहीन हो कर अंधेरे में डूब जाएगा.

बड़ी नौकरी मिलते ही प्रकाश का रुख बदल गया था. घर, कार, पैसा उस के पास होते ही उस ने अपने तेवर बदल लिए थे. जब तक उस को जरूरत थी मातापिता को एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करता रहा.

अपनी इच्छा से उस ने शादी भी बाहर ही कर ली. शादी के एक साल तक अपने शहर भी नहीं आया था. आज  आएगा, वह भी केवल 4 घंटे के लिए, क्योंकि बहू के गले में खानदान का पुश्तैनी हार जो डलवाना चाहता है. इस के लिए उसे घर फोन कर के सूचना देने की पूरी याद रही. फोन पर उस ने मां से पूछा, ‘मां, कैसी हो?’

‘अच्छी हूं,’ कहते ही कितना दिल भर आया था. क्या कहती कि तेरे बिना घर सूना लग रहा है. तू भूल गया है लेकिन हम नहीं भूले. तेरी शादी के अरमान ऐसे ही धरे के धरे रह गए. परंतु कहा कुछ भी नहीं था.

‘पिताजी कैसे हैं?’ प्रकाश ने पूछा.

‘ठीक हैं, मजे में हैं?’ सोचा, क्यों बताऊं कैसे जी रहे हैं. बेटा हो कर जब तुझे दायित्व का बोध नहीं रहा, केवल अपना अधिकार याद है. पुश्तैनी हार…बहू के नाम पर रखे गहने तो याद हैं किंतु कर्तव्य नहीं.

वह सोच में पड़ी थी, बेटे ने यह भी नहीं सोचा कि मांपिताजी कैसे थोड़ी सी रकम से गुजारा कर रहे होंगे. सारा जीवन तो कमाकमा कर उसे पढ़ाते रहे. होनहार निकले…कितनेकितने घंटे पढ़ाती रही और तुझे पढ़ाने के लिए खुद पढ़पढ़ कर समझती रही. उस का ऐसा परिणाम?

‘हम दोनों आप से आशीर्वाद लेने आ रहे हैं.’

निधि के मन की तटस्थता बनी रही थी. प्रकाश की बातें सुनती रही. वह कह रहा था, ‘शाम को आएंगे. रात में भोजन साथ करेंगे.’ निधि ने किसी प्रकार का कोई आश्वासन नहीं दिया था. और फोन पर वार्तालाप बंद हो गया था.

निधि ने पति मनीष को प्रकाश और बहू दीया के आने की तथा बहू की मुंह दिखाई की रस्म में पुश्तैनी हार व अन्य गहने, जो उस के लिए कभी बनवाए थे, देने की मंशा जाहिर की साथ ही वह सारी बातें बता दीं जो प्रकाश ने उस से फोन पर कही थीं.

मनीष ने गहरी नजरों से निधि की ओर देखा. वह आश्वस्त हो गए कि निधि के चेहरे पर ममता का भाव तो है साथ ही पति के प्रति पूर्ण निष्ठा भी.

‘तुम क्या चाहती हो?’

पति के दिल को पढ़ते हुए निधि ने उत्तर दिया था, ‘जैसा आप कहें.’

थोड़ी देर चुप्पी छाई रही. दोनों के मन में एक जैसी भावनाएं चल रही थीं. मनीष वहीं से उठ कर आराम करने चले गए थे.

घर के खर्चे के लिए उन्होंने एक सेठ के यहां 2,500 रुपए की नौकरी कर ली थी. सुबह 6 बजे घर से निकलते और शाम 7 बजे घर आते. बसों में आनेजाने के कारण थकान बहुत ज्यादा हो जाती. अत: थोड़ी देर आराम करने के लिए भीतर के कमरे में चले गए.

बाहर घने बादलों के कारण कुछ ज्यादा ही अंधकार हो गया था. थोड़ी देर में टिपटिप बूंदाबांदी होने लगी. निधि उसी तरह बरामदे में बैठी रही. प्रकाश और दीया अभी तक नहीं आए थे. मन अनेक खट्टीमीठी घटनाओं को याद करता और भूलता रहा.

तभी एक टैक्सी गेट के पास आ कर रुकी. निधि उसी तरह बैठी खिड़की से देखती रही. वे दोनों उस के बहूबेटा ही थे, किंतु अंधकार के कारण कुछ साफ दिखाई नहीं दे रहा था. तभी प्रकाश का स्वर सुनाई दिया, ‘‘लगता है, घर में रोशनी नहीं है.’’

आवाज सुन निधि की ममता उमड़ आई. मन में सोचा, ‘हां, ठीक कहा, घर में बेटा न हो तो प्रकाश कैसे होगा. तू आ गया है तो उजाला हो जाएगा.’ किंतु प्रकाश ने मां के भावों को नहीं समझा.

निधि ने उठ कर बत्ती जलाई. आवाज सुन कर मनीष भी उठ बैठे. मुख्यद्वार खोला. प्रकाश और दीया ने दोनों को प्रणाम किया. उन्होंने आशीर्वाद दिया, ‘‘सदा सुखी रहो.’’

मां और पिताजी ने बहू के आगमन की कोई तैयारी नहीं की थी, यह देख प्रकाश मन ही मन अपने को अपमानित महसूस करने लगा. न तो मां ने उठ कर कोई खातिरदारी का उपक्रम किया और न ही पिताजी ने.

कुछ देर तक निस्तब्धता छाई रही. मां और पिताजी के ठंडे स्वभाव को देख कर प्रकाश का तनमन क्रोधित हो उठा. वह सोचने लगा कि पुश्तैनी हार ले कर अब उसे चलना चाहिए. उस ने मां से कहा था, ‘‘अपनी बहू की मुंह दिखाई की रस्म पूरी करो, मां. हमारी टे्रन का समय हो रहा है.’’

मुंह दिखाई की रस्म की बात सुन कर मनीष ने कहा, ‘‘हां…हां…क्यों नहीं.’’ और जा कर अपने पर्स से 11 रुपए ला कर निधि को पकड़ाते हुए कहा, ‘‘निधि, बहू की मुंह दिखाई की रस्म पूरी करो.’’

निधि ने पति की आज्ञानुसार वैसा ही किया. सगन देते हुए निधि ने कहा, ‘‘बहू, मुंह दिखाई की रस्म के बाद हम बहू से रसोई करवाते हैं. तुम जा कर रसोई में हलवापूरी बना दो. सारा सामान वहीं रखा हुआ है.’’

मां के मुंह से रस्म अदायगी की बात सुन कर प्रकाश ने अपने गुस्से को काबू में रखते हुए कहा, ‘‘वाह मां, क्या खूब. आप ने बहू को कुछ दिया तो नहीं पर काम करवा रही हैं…काम अगली बार करवाइएगा.’’

प्रकाश की बात सुन कर पिता ने कहा, ‘‘बेटा, अगली बार जब आएगी काम करेगी, घर के प्रति कर्तव्य निभाएगी तो फल भी पाएगी…यह सब तुम्हारा ही तो है…’’

‘‘दीया अभी खाना नहीं बनाएगी,’’ उस ने धीरे से कहा.

दीया चुपचाप सोफे पर बैठी थी. उस ने कलाई घड़ी पर नजर डाली. साढ़े 8 बज रहे थे. उस ने उठते हुए कहा, ‘‘प्रकाश, ट्रेन का समय हो रहा है.’’

‘‘हां, हां, हमें चलना चाहिए. खाना हम ट्रेन में खा लेंगे,’’ प्रकाश ने रूखे स्वर में कहा.

‘‘जैसा तुम दोनों चाहो,’’ मनीष ने मुसकराते हुए कहा.

दोनों ने प्रणाम किया. मातापिता ने उन्हें गले लगा कर प्यार किया और विदा कर दिया.

दोनों के चले जाने के बाद निधि रसोई में आ कर सब्जी काटने लगी. मनीष भी रसोई में आ गए.

‘‘आप को 11 रुपए देने की क्या जरूरत थी?’’ निधि ने कहा.

‘‘अपने उस पढ़ेलिखे बेटे को समझाने के लिए कि हम ने सदा अपने बेटे के प्रति कर्तव्य निभाया है लेकिन तुम ने क्या सीखा? मुंह दिखाई के लिए बहू को लाया था…वह भी एक साल बाद.’’

‘‘इसलिए कह रही हूं कि सवा रुपया देना चाहिए था,’’ निधि की बात सुन मनीष ठहाका मार कर हंसने लगे.

बहुत देर तक हंसते रहे. हमारा ही बेटा हमारे ही कान काटने पर तुला है. वह भूल गया है कि वह हमारा बेटा है,  बाप नहीं. वह दोनों पहली बार भावुक नहीं हुए थे.

पतिपत्नी ने मिल कर खाना खाया. एकसाथ एक ही थाली में खाया. मनीष खूब मजेदार बातें निधि को सुनाते रहे और वह मनीष को.

आज एक लंबे अरसे के बाद पतिपत्नी अत्यंत प्रफुल्लित एवं संतुष्ट थे मानो खोया हुआ खजाना मिल गया हो. आज मन में समझदारी का प्रकाश हुआ हो. इसी तरह 4 घंटे बीत गए. मनीष ने निधि को कहा, ‘‘नव वर्ष की बहुतबहुत बधाई हो.’’

‘‘आप को भी आज प्रकाश के आने पर मन में समझदारी का प्रकाश हुआ है. नव वर्ष सब को शुभ हो,’’ कहते हुए वे दोनों घर की छत पर आ गए और वहां से गली में आनेजाने वालों को नव वर्ष की मुबारकबाद देने लगे.

ये भी पढ़ें- घोंसले के पंछी: क्या मिल पाए आदित्य और ऋचा

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें