नींव: क्या थी रितू की जेठानी की असलियत

लेखिका- करुणा शंकर

विवेकवेक ने लंच ब्रेक के दौरान मोबाइल पर मुझे जो जानकारी दी उस ने मुझे चिंता से भर दिया.

‘‘विनोद भैया ने किराए का मकान ढूंढ़ लिया है. मुझे उन के दोस्त ने बताया है कि

2 हफ्ते बाद वे शिफ्ट कर जाएंगे,’’ विवेक की आवाज में परेशानी के भाव साफ झलक रहे थे.

‘‘हमें उन्हें जाने से रोकना होगा,’’ मैं एकदम बेचैन हो उठी.

‘‘बिलकुल रोकना होगा, रितु. अब रिश्तेदार और महल्ले वाले हम पर कितना हंसेंगे. तुम आज शाम ही भाभी को समझना. मैं भी बड़े भैया को अभी फोन करता हूं.’’

‘‘नहीं,’’ मैं ने उन्हें फौरन टोका, ‘‘अभी आप किसी से इस विषय पर कोई बात न करना प्लीज. यह मामला समझनेबुझने से नहीं सुधरेगा.’’

‘‘फिर कैसे बात बनेगी?’’

‘‘पहले शाम को हम आपस में विचारविमर्श करेंगे फिर कोई कदम उठाएंगे.’’

‘‘ओ. के.’’

इधरउधर की कुछ और बातें करने के बाद मैं ने फोन काट दिया. खाना खाने का मन नहीं कर रहा था. मैं ने आंखें मूंद लीं और वर्तमान समस्या के बारे में सोचविचार करने लगी…

संयुक्त परिवार की बहू बन कर सुसराल आए मुझे अभी सालभर भी नहीं हुआ है. अब मेरे जेठजेठानी अलग होने की सोच रहे हैं. इस कारण मैं परेशान तो हूं, पर मेरी परेशानी का कारण जगहंसाई का डर नहीं है.

संयुक्त परिवार से जुड़े रहने के फायदों को, उस की सुरक्षा को मैं व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर जानती हूं.

मेरे पापा का दिल के दौरे से जब अचानक देहांत हुआ, तब मैं बी.कौम. के अंतिम वर्ष में पढ़ रही थी. साथ रह रहे मेरे दोनों चाचाओं का पूरा सहयोग हमारे परिवार को न मिला होता, तो मेरी कालेज की पढ़ाई बड़ी कठिनाई से पूरी होती. फिर बाद में जो मैं ने एमबीए भी किया, उस डिगरी को प्राप्त करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था.

एमबीए करने के बाद मुझे अच्छी नौकरी मिली, तो मैं अपने संयुक्त परिवार का मजबूत स्तंभ बन गई. अपने छोटे भाई को इंजीनियर व बड़े चाचा के बेटे को डाक्टर बनाने में मेरी पगार का पूरा योगदान रहा. अपनी शादी का लगभग पूरा खर्चा मैं ने ही उठाया. मेरे मायके में संयुक्त परिवार की नींव आज भी मजबूत है.

अपनी ससुराल में भी मैं संयुक्त परिवार की जड़ों को उखड़ने नहीं देना चाहती हूं. काफी सोचविचार के बाद मैं अपने बौस अमन साहब से मिलने उठ खड़ी हुई. वे मुझे बहुत मानते हैं और इस समस्या के समाधान के लिए मैं उन की सहायता व सहयोग पाने की इच्छुक थी.

शाम को घर में घुसते समय मेरे पास सब को सुनाने के लिए एक महत्त्वपूर्ण खबर

थी. उसे मैं शानदार अभिनय करते हुए सुनाना चाहती थी, पर वैसा कुछ हो नहीं सका क्योंकि मेरी सासूमां संध्या भाभी पर बुरी तरह बरस रही थीं.

‘‘हम तो तंग आ गए हैं तुम्हारे रोजरोज के बीमार रहने से,’’ मेरी सास की गुस्से से भरी आवाज घर के बाहर तक सुनी जा सकती थी, ‘‘तुम सारा दिन पलंग तोड़ती रहा करो और रितु सुबह रसोई में घुसे फिर औफिस में और फिर थकीहारी शाम को लौटे, तो फिर सब का खाना बनाने को रसोई में घुंसे. अरे, इस तरह से बड़ी घरगृहस्थियां नहीं चलतीं… अगर कल को हम ने घर से अलग कर दिया, तो कौन देगा खाना बना कर विनोद और बच्चों को?’’

संध्या भाभी अपने कमरे में खामोश लेटी थीं. यह सच है कि वे आए दिन कमर व सिर के दर्द से परेशान रहती हैं. तब उन से कोई काम नहीं होता और मेरी सासूमां ऐसे मौकों पर उन्हें कड़वीतीखी बातें सुनाने से कभी नहीं चूकतीं.

मैं घर में मौजूद हूं तो सासूमां भाभी की जरा ज्यादा बुराइयां गिनाने के साथसाथ मेरी प्रशंसा के पुल भी बखूबी बांधती जातीं.

भाभी और मेरी व्यक्तित्व बिलकुल भिन्न है. वे बीमार रहती हैं और मैं बिलकुल चुस्त. घर की साफसफाई, वाशिंग मशीन में कपड़े डालने व रसोई के सारे काम अकेले निबटाने का अभ्यास मुझे अपने मातापिता के घर से ही है. ये सारे काम में वहां नौकरी करने के साथसाथ ही करती थी. इन कामों से न में थकती हूं, न चिड़ती हूं.

संध्या भाभी के दर्दों ने उन्हें अपाहिज सा बना दिया है. फूला शरीर भी उन की कार्यक्षमता को कम कर रहा है. सासूमां और उन के बीच झगड़ा शायद हमेशा से चलता रहा होगा, पर मेरे आने के बाद स्थिति बदतर हो गई.

मैं समझ सकती हूं कि देवरानी के सामने आए दिन बेइज्जत होना उन्हें बिलकुल अच्छा नहीं लगता होगा. वे उलट कर जवाब देने की आदी नहीं हैं पर कभीकभी गुस्से का शिकार हो अपना संतुलन खो देती हैं. कोविड-19 के दिनों की बात तो दूसरी थी पर अब तक लगा मामला सुधर जाएगा पर सासूमां तो और मुखर हो गईं.

ये भी पढ़ें- एक और सच: क्या बदल गया था जीतेंद्र

जेठानी के पलट कर जवाब देते ही मेरी सास घंटों तक झगड़े को बनाए रखती हैं. घर का माहौल तब बहुत खराब हो जाता है.

इसी कारण संध्या भाभी चुप रहती हैं. मैं ने कई बार उन्हें अपने कमरे में मौन आंसू बहाते देखा है.

उस दिन कपड़े बदल कर जब मैं उन का हालचाल पूछने उन के कमरे में पहुंची, तो उन की आंखों में आंसुओं के बजाय गुस्से व विद्रोह के भावों को देख कर मुझे ज्यादा हैरानी नहीं हुई.

किराए के मकान में जा कर रहने का निर्णय उन के इन विद्रोही भावों को पैदा कर रहा था. उन के इस फैसले की विवेक और मेरे अलावा किसी को खबर नहीं थी.

उन के दोनों बच्चे एक तरफ रखी स्टडीटेबल पर पढ़ रहे थे. शायद किसी टीचर से औनलाइन ट्यूशन चल रही थी. मैं ने भाभी से सिर्फ उन का हालचाल पूछा और फिर रोहित और आंचल से हाय की.

दोनों पढ़ाई में बहुत होशिशर हैं.दोनों की लिखावट के अक्षर मोतियों से नजर आते हैं. दोनों के कक्षा में प्रथम आने का पूरा श्रेय संध्या भाभी को जाता है. वे प्यार व सहनशीलता के साथ उन्हें नियमितरूप से पढ़ाने में पूरी दिलचस्पी लेती हैं.

‘‘भाभी, आप मम्मी की बातों का बुरा न माना करो. रसोई का काम मैं संभाल लूंगी,’’ मेरा यह आश्वासन उन का मूड ठीक करने में असमर्थ रहा और मैं दोनों बच्चों को प्यार करने के बाद उन के कमरे से बाहर आ गई.

विवेक तब तक औफिस से लौट आए थे. मैं ने कुछ देर तक उन्हें संक्षेप में अपनी बात समझई और फिर रात के भोजन की तैयारी करने रसोई में जा घुसी.

मेरी सास भी रसोई में आ गईं. पर वहां उन की ऊर्जा का बड़ा भाग संध्या भाभी को जलीकटी बतों सुनाने में ही खर्र्च हो रहा था.

मेरी ज्यादा बोलने की आदत कभी नहीं रही. इस कारण कई लोग मुझे घमंडी मानने की भूल कर बैठते हैं. मैं अंतर्मुखी इंसान हूं और मुझे अपने काम से काम रखना पसंद है.

अपनी सास का लगातार बोलना मुझे पसंद नहीं आ रहा था, पर मैं चुपचाप काम में लगी रही. न तो उन की हां में हां मिलाई और न ही भाभी के पक्ष में बोल कर उन्हें भड़काने की गलती करी.

डिनर कर लेने के बाद मुझे सब को वह खबर सुनाने का मौका मिला जिसे मैं घर में घुसते ही सुनाना चाहती थी.

अपने सुसरजी को संबोधित करते हुए मैं

ने खुशीभरे लहजे में कहा, ‘‘पापा, मुझे औफिस में आज प्रमोशन मिला है. यह देखिए मेरा

औफर लेटर.’’

मेरे हाथ से लैटर ले कर सुसरजी ने पढ़ा और फिर परेशान लहजे में बोले, ‘‘बहू, इस में तो तुम्हारे मुंबई जाने की बात लिखी हुई है.’’

‘‘वही एक समस्या जरूर है, पापा पर पदोन्नति के साथसाथ मेरी पगार में पूरे 15 हजार रुपए हर महीने की बढ़त भी होगी.’’

‘‘वह तो ठीक है पर इतनी दूर जाने का फैसला…’’

‘‘तुम लोगों को मुंबई जाने की कोई जरूरत नहीं है,’’ मेरी सास ने अपने पति को टोकते हुए अपना मत मजबूत स्वर में व्यक्त किया, ‘‘अरे, 15 हजार की बढ़त मिलेगी, तो खर्चे भी तो बढ़ेंगे. फिर कल को तुम्हारे पैर भारी होगा, तो कौन देखभाल करेगा तुम्हारी?’’

विवेक ने शांत लहजे में अपनी मां को जवाब दिया, ‘‘मां, अभी हम ने

इस विषय पर ठीक से सोचविचार नहीं किया है, पर इस प्रमोशन को पाना रितु के लिए महत्त्वपूर्ण है. मेरी कंपनी भी मुझे मुंबई शाखा में ट्रांसफर करने के लिए आसानी से राजी हो जाएगी. रही बात बच्चे होने के समय में देखभाल की तो

अच्छे डाक्टरों व अस्पतालों की मुंबई में कोई कमी नहीं.’’

‘‘बेकार की बातें मत कर तू,’’ सासूजी ने उन्हें डपट दिया, ‘‘मांबाप के बुढ़ापे में बेटे को साथ रहना चाहिए. आजकल कोविड-19 की वजह से पता नहीं कब बसें, ट्रेनें, फ्लाइटें बंद हो जाएं.’’

‘‘हमें आए दिन घर से निकल जाने की धमकी मिलती है, भाई. मेरे इस घर में सुखशांति से रहने के दिन कब के खत्म हो चुके हैं,’’ विनोद भैया ने नाराजगीभरे अंदाज में अपनी शिकायत दर्ज कराई और ड्राइंगरूम से उठ कर अपने कमरे में चले गए.

‘‘तुम लोग मुंबई नहीं जाओगे,’’ हमें आदेश देते हुए अपनी सास की आंखों में चिंता और बेबसी के भाव मैं ने शायद पहली बार देखे होंगे.

‘‘मां, हम और सोचविचार कर के इस विषय में फैसला  करेंगे,’’ विवेक के इस आश्वासन से मेरी सास का आंतरिक तनाव शायद रत्तीभर भी कम नहीं हुआ होगा.

अगले दिन से मेरी सास चिड़ी और परेशान सी नजर आने लगीं. वे गुस्सा करने के हर मौके पर खूब बोल रही थीं, पर कमाल की बात यह हुई कि उस दिन बीमार संध्या भाभी के खिलाफ सीधेसीधे एक भी जलीकटी बात उन्होंने अपने मुंह से नहीं निकाली.

रविवार के उस दिन उन्होंने मुझे दसियों बार मुंबई न जाने के कई फायदे गिनाए. अपनी आदत के अनुरूप में चुप रह कर सारी बातें सुनती रही.

‘‘आप बेकार परेशान हो रही हैं मम्मी, अभी हम ने कोई पक्का फैसला नहीं किया है. अगर हम मुंबई गए भी, तो आप को साथ ले कर जाएंगे,’’ मेरे इस प्रस्ताव का उन्होंने फौरन विरोध करते हुए मुंबई कभी न जाने का निर्णय सब को नाराज लहजे में सुना दिया.

उस शाम को बड़े भैया ने किराए का मकान लेने व अगले महीने की पहली तारीख को उस में शिफ्ट करने का अपना फैसला बता कर मेरी सास को एक जबरदस्त झटका दिया.

‘‘तुम दोनों भाइयों को क्या बिलकुल शर्म नहीं आ रही है इस घर से दूर जाने की बात कहते हुए?’’ सासूमां फट पड़ी, ‘‘हम बुढ्ढेबुढि़या को यहां अकेले सड़ने के लिए छोड़ोगे क्या तुम दोनों?’’

‘‘मुझे यह बेकार का ड्रामे मत दिखाओ मां,’’ विनोद भैया ने उन्हें उलटा डांट दिया, ‘‘तुम तो मुझे घर से निकल जाने की धमकी वर्षों से देती आ रही हो. अगर अकेले रहने से डर लगता है, तो अपने छोटे बेटे व प्यारी बहू को मुंबई न जाने को राजी कर लो. मैं रोजरोज अपमानित होने को इस घर में नहीं रूकूंगा, ‘‘अपना फैसला सुना कर बड़े भैया ड्राइंगरूम से बाहर चले गए.’’

‘‘मां, हम मुंबई रितु का कैरियर बेहतर बनाने के लिए जा रहे हैं और भैया नाराज हो कर घर छोड़ रहे हैं. हम शायद न रुकें, पर भैयाभाभी को रोका जा सकता है और यह काम सिर्फ तुम ही कर सकती हो अपने व्यवहार में परिवर्तन लाने का उन दोनों का भरोसा दिला कर,’’ बाद में अपनी मां को अकेले में यह सलाह दे कर विवेक भी अपने कमरे में आ गए थे.

उस रात के बाद सासूमां ने खूब रोनाधोना शुरू कर दिया. संध्या भाभी के साथ

उन्होंने सारी तकरार बंद कर दी थी, पर उन के दोनों बेटों को बड़ी कड़वीतीखी बातें सुनने को मिलीं.

ससुरजी से उन की खूब झड़प होती. बड़े बेटेबहू के घर छोड़ कर जाने के लिए ससुरजी उन्हें खुल कर जिम्मेदार ठहरा रहे थे. वे अपनी गलती ना मान कर बेटों को खुदगर्ज बतातीं और दोनों के बीच कुछ घंटों के अंतराल पर नया झगड़ा शुरू हो जाता.

अगला सप्ताह ऐसे ही लड़ाईझगड़े में गुजरा पर न बड़े भैया ने किराए के मकान में जाने का फैसला बदला और न ही विवेक ने मुंबई जाने का विकल्प छोड़ा.

रोनेधोने और चीखनेचिल्लाने के अपने हथियारों को बेकार जाता देख सासूमां निराश हो गईं और उन्हें खामोश उदासी ने अपनी गिरफ्त में ले लिया.

इस रविवार की दोपहर में मैं अकेली संध्या भाभी से मिलने उन के कमरे में पहुंची. बाकी के लोग उस समय ड्राइंगरूम में टीवी पर फिल्म देख रहे थे.

मेरे हावभावों को सही ढंग से पढ़ते हुए संध्या भाभी ने मेरे कुछ कहने से पहले ही अपना फैसला दोहरया, ‘‘न, मुझे कुछ समझने की जरूरत नहीं है. मैं किराए के मकान में पक्का जाऊंगी.’’

मैं ने भावुक लहजे में जवाब दिया, ‘‘भाभी, अपने अनुभव के आधार पर मैं एक बार जानती हूं. बुरा वक्त आते जरा देर नहीं लगती… वही परिवार ऐसे सदमों व हादसों का सामना कर

लेता है जिस के सदस्यों में एका हो… दिलों में प्यार हो.’’

‘‘मांजी को हमारी नहीं तुम्हारी जरूरत है.’’

‘‘लेकिन मुझे तुम्हारी जरूरत है,’’ मैं ने एकएक शब्द पर पूरा जोर दिया.

‘‘तुम अच्छा कमाती हो… घर के कामों में ऐक्सपर्ट हो तुम्हें किसी की क्या जरूरत होगी? सारा घर तो तुम्हारे आगेपीछे घूमता है,’’ उन की आवाज में शिकायत भरी कड़वाहट उभरी.

‘‘भाभी, आप मुझे प्यार करती हैं न?’’

ये भी पढ़ें- अपने पराए: बबली और उसकी जेठानी के बीच कैसे थे रिश्ते

मैं ने पास बैठ कर उन का हाथ अपने हाथों में

ले लिया.

‘‘हां, लेकिन मैं इस घर में सुखी नहीं रह सकती हूं.’’

‘‘और अगर आप घर छोड़ कर चली गईं

तो मैं खुद को बड़ा दुखी और असुरक्षित महसूस करूंगी.’’

‘‘तुम तो मुंबई जा रही हो. फिर तुम्हें मेरे यहां रहने या न रहने से क्या फर्क पड़ता है?’’ उन्होंने माथे में बल डाल कर प्रश्न किया.

‘‘आप अगर आदेश देंगी, तो मैं मुंबई नहीं जाऊंगी,’’ मैं शरारती ढंग से मुसकराई.

‘‘क्या मतलब?’’ वे चौंक पड़ीं.

‘‘भाभी, मैं अपने मन की बात आज खुल कर आप से कहू?’’

‘‘हां… हां,’’ उन की आंखों में उत्सुकता के भाव पैदा हुए.

‘‘भाभी, इस घर की नई पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य के लिए हम दोनों को बड़े प्रेम व समझदारी भरा आचरण करना होगा. और लोग हम दोनों के बीच तुलना करते रहेंगे, पर हम दोनों को मन में खटास पैदा करने वाली उन बातों पर बिलकुल ध्यान नहीं देना है.

‘‘देखिए, मेरी पगार इस घर की आर्थिक नींव मजबूत करती है. पर मेरे पास समय का अभाव है. जैसे आप ने रोहित और आंचल को अपने पढ़ाई में होशियार बनाया है, कल को वैसे ही मेरे बच्चों का होशियार बनाना आप की जिम्मेदारी होगी.’’

‘‘आप स्वस्थ नहीं रहती हैं, तो मैं आप का काम खुशीखुशी करूंगी. तुलना वाली कोई बात ही नहीं. हम दोनों एकदूसरे की पूरक बनी रहें, तो ही हमारे घर में सुखशांति और हंसीखुशी का वास रहेगा. क्या मेरी यह सोच गलत है, भाभी?’’ उन के सामने शायद पहली बार मेरी आंखों में आंसू ?िलमिलाए होंगे.

‘‘नहीं, पर…’’

‘‘भाभी, सब बातों को नजरअंदाज कर हम दोनों को अपनी मजबूत टीम बनानी ही होगी. हमें अपने पतियों व सासससुर का साथ व सहयोग न भी मिले, तो परवाह नहीं. यह परिवार टूटा, तो सब से ज्यादा नुकसान हम दोनों का ही होगा. हम दोनों जुड़ी रहीं, तो छोटेबड़े सब का बेड़ा पार हो जाएगा,’’ उन का नजरिया बदलने का प्रयास करते हुए मैं ने अपनी पूरी ताकत लगा दी.

कुछ देर खामोश रहने के बाद भाभी ने आगे बढ़ कर जब मेरा माथा प्यार से चूमा,

तो मैं इतनी खुश हुई कि उन के गले लग कर

रो पड़ी.

वे मुझे देर तक समझती रहीं. साथसाथ अपने मन की पीड़ा भी व्यक्त कर रही थीं. उस समय मेरे मन ने उन के सान्निध्य में इतनी राहत व शांति महसूस करी कि मैं ने मन ही मन उन्हें भाभी के साथसाथ मां का दर्जा भी दे दिया.

आजकल हमारे घर में कुछ भी नहीं बदलते हुए भी सबकुछ बदल गया है.

हमारी सास शोर करती रहती हैं पहले की तरह, लेकिन अब भाभी की आंखों में शिकायत या नाराजगी के भाव नहीं होते. सासूमां के सामने हम गंभीर नजर आती हैं, पर उन के मुड़ते ही एकदूसरे की आंखों में देख कर हमारा मुसकराना मन का सारा तनाव दूर कर देता है.

मैं ने अपनी बेटी आंचल के लिए हर महीने 1000 रुपए जोड़ने शुरू कर दिए हैं. इस बात का भाभी और विवेक के अलावा किसी को पता नहीं.

वे आए दिन मुझे समझती हैं, ‘‘रितु, अब जल्दी से एक बेटा या बेटी पैदा कर के मेरे हवाले कर दे. बेटा होगा तो उसे इंजीनियर और बेटी होगी तो उसे डाक्टर बनाने की मेहनत शुरू करने को मैं बेताब हुई जा रही हूं.’’

उन की बेताबी देख कर कभी मैं हंसती हूं, तो कभी शरमा जाती हूं. अब मन बड़ा हलका व प्रसन्न महसूस करता है. अपने इस संयुक्त परिवार की सुरक्षा, सुखशांति व खुशियों की मजबूत नींव के प्रति मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूं.

ये भी पढ़ें- समर्पण: आलोक ने अपनी जिंदगी का क्या फैसला लिया

नींव: अंजु ने ऐसा क्या किया कि संजीव खुश हो गया?

उसदिन करीब 8 साल के बाद मानसी को एक हेयर सैलून से बाहर आते देखा तो आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. कालेज के दिनों में वह कभी मेरी बहुत अच्छी दोस्त हुआ करती थी. फिर वह एमबीए करने मुंबई चली गई और हमारे बीच संपर्क कम होतेहोते समाप्त हो गया था.

मैं मुसकराता उस के सामने पहुंचा तो उस ने भी मुझे फौरन पहचान लिया. हम ने बड़े अपनेपन के साथ हाथ मिलाया और हंसतेमुसकराते एकदूसरे के बारे में जानकारी का आदानप्रदान करने लगे.

‘‘तुम यहां दिल्ली में कैसे नजर आ रही हो?’’

‘‘मेरे पति को यहां नई जौब मिली है.’’

‘‘क्या पति को घर छोड़ कर केश कटवाने आई हो?’’

‘‘नहीं भई. वे मुझे यहां छोड़ कर किसी दोस्त से मिलने गए हैं. बस, अब लेने आते ही होंगे. तुम बताओ जिंदगी कैसी गुजर रही है?’’

‘‘ठीकठीक सी गुजर रही है.’’

‘‘तुम्हारी पत्नी क्या करती है?’’

‘‘अंजु नौकरी करती है.’’

‘‘तुम तो कहा करते थे कि पत्नी को सिर्फ घरगृहस्थी की जिम्मेदारियां संभालनी चाहिए. फिर अंजु को नौकरी कैसे करा रहे हो?’’ उस ने हंसते हुए पूछा.

‘‘मैं तो अभी भी यही चाहता हूं कि अंजु घर में रहे पर आज की महंगाई में डबल इनकम का होना जरूरी है.’’

‘‘बच्चे कितने बडे़ हो रहे हैं?’’

‘‘हमारा 1 बेटा है समीर, जो पिछले महीने 6 साल का हुआ है.’’

‘‘उस के लिए भाई या बहन अभी तक क्यों नहीं लाए हो?’’

‘‘अरे, दूसरे बच्चे की बात ही मत छेड़ो. आजकल 1 बच्चे को ही ढंग से पालना आसान नहीं है. तुम अपने बारे में बताओ.’’

‘‘मैं तो कोई जौब नहीं करती हूं. पति सौफ्टवेयर इंजीनियर हैं. 3 साल अहमदाबाद में रहे. अब यहां दिल्ली की एक कंपनी में जौब शुरू करने के कारण 2 महीने पहले यहां आए हैं. अभी तक मन नहीं लग रहा था पर अब तुम मिल गए हो तो अकेलेपन का एहसास कम हो ही जाएगा. कब मिलवा रहे हो अंजु और समीर से, संजीव?’’

‘‘बहुत जल्दी मिलने का कार्यक्रम बना लेते हैं. तुम ने अपने बच्चों के बारे में तो कुछ बताया नहीं,’’ मैं ने जानबूझ कर विषय बदल दिया.

ये भी पढ़ें- किराएदार: कंजूस व्यवहार के शिवनाथजी का कैसे बदला नजरिया?

‘‘मेरी 2 बेटियां हैं – श्वेता और शिखा. श्वेता स्कूल जाती है और शिखा अभी 2 साल की है.’’

‘‘बहुत अच्छा मैंटेन किया हुआ है तुम ने खुद को. कोई देख कर कह नहीं सकता कि तुम 2 बेटियों की मम्मी हो.’’

‘‘थैंकयू, मैं नियम से डांस करती हूं. कोई टैंशन नहीं है, इसलिए स्वास्थ्य ठीक चल रहा है,’’ मेरे मुंह से अपनी प्रशंसा सुन वह खुश हो कर बोली, ‘‘वैसे तुम भी बहुत जंच रहे हो. तुम्हें देख कर कोई भी कह सकता है कि तुम ने जिंदगी में अच्छी तरक्की की है.’’

‘‘थैंकयू, ये शायद तुम्हारे पति ही हमारी तरफ आ रहे हैं,’’ अपनी तरफ एक ऊंचे कद व आकर्षक व्यक्तित्व वाले पुरुष को आते देख कर मैं ने कहा.

आत्मविश्वास से भरा वह व्यक्ति मानसी का पति रोहित ही निकला. उस ने रोहित से मेरा परिचय कालेज के बहुत अच्छे दोस्त के रूप में कराया.

रोहित ने बड़ी गर्मजोशी के साथ मुझ से हाथ मिलाया. फिर हम दोनों एकदूसरे के काम के विषय में बातें करने लगे.

मानसी अब चुप रह कर हमारी बातें सुन रही थी.

करीब 15 मिनट बातें करने के बाद रोहित ने विदा लेने को अपना हाथ आगे बढ़ा दिया और बोला, ‘‘संजीव, तुम्हें अपनी वाइफ और बेटे के साथ हमारे घर बहुत जल्दी आना ही है. मानसी को अपने शहर में बोर मत होने देना.’’

‘‘हम बहुत जल्दी मिलते हैं,’’ मैं ने मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘अपना मोबाइल नंबर तो दो, नहीं तो एकदूसरे के संपर्क में कैसे रहेेंगे?’’ मानसी को याद आया तो हम ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिया.

वे दोनों अपनी कार में बैठे और हाथ हिलाते हुए मेरी आंखों से ओझल हो गए.

मैं ने डिपार्टमैंटल स्टोर से घर का सामान खरीदा और अपनी 2 साल पुरानी कार से घर आ गया.

‘‘आप कहां अटक गए थे? मुझे मशीन लगानी थी पर बिना वाशिंग पाउडर के कैसे लगाती?’’ अंजु मुझे देखते ही नाराज हो उठी.

‘‘मशीन अब लगा लो. खाना देर से खा लेंगे,’’ मैं ने उसे शांत करने के लिए धीमी आवाज में जवाब दिया.

‘‘कितनी आसानी से कह दिया कि मशीन अब लगा लो. मैं नहा चुकी हूं और समीर को तो सही वक्त पर खाना चाहिए ही न. अब खाना बनाऊं या मशीन लगाऊं?’’ उस का गुस्सा कम नहीं हुआ था.

‘‘इतनी गुस्सा क्यों हो रही हो? तुम मशीन लगा लो, आज लंच करने बाहर चलते हैं.’’

‘‘अपना पेट खराब करने के लिए मुझे बाहर का खाना नहीं खाना है. आप यह बताओ कि अटक कहां गए थे?’’

‘‘अटका कहीं नहीं. ऐसे ही विंडो शौपिंग करते हुए समय का अंदाजा नहीं रहा,’’ न जाने क्यों उसे मानसी और रोहित से हुई मुलाकात के बारे में उस समय कुछ बताने को मेरा मन नहीं किया.

अंजु ड्राइंगरूम में समीर द्वारा फैलाई चीजें उठाने के काम में लग गई. अब उस का ध्यान मेरी तरफ न होने के कारण मैं उसे ध्यान से देख सकता था.

कितना फर्क था मानसी और अंजु के व्यक्तित्व में. शादी होने के समय वह आकर्षक फिगर की मालकिन होती थी, पर अब उस का शरीर काफी भारी हो चुका था. चेहरे पर तनाव की रेखाएं साफ पढ़ी जा सकती थीं. उस का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता. समीर के होने के समय से उसे पेट और कमर दर्द ने एक बार घेरा तो अब तक छुटकारा नहीं मिला है.

अंजु की मानसी से तुलना करते हुए मेरा मन अजीब सी खिन्नता महसूस कर रहा था. रोहित और हमारे आर्थिक स्तर में खास अंतर नहीं था. पर हमारी पत्नियों के व्यक्तित्व कितने विपरीत थे.

मेरा चेहरा सारा दिन मुरझाया सा रहा. रात में भी ढंग से नींद नहीं आई. मानसी का रंगरूप आंखों के सामने आते ही बगल में लेटी अंजु से अजीब सी चिढ़ हो रही थी.

किसी से अपनी हालत की तुलना कर के दिमाग खराब करने का कोई फायदा नहीं होता है. खुद को बारबार ऐसा समझाने के बाद ही मैं ढंग से सो पाया था. मेरे पास मानसी का 2 दिन बाद ही औफिस में लंच के समय फोन आ गया.

ये भी पढ़े- Short Story: जय बाबा सैम की

‘‘अपने घर का पता बताओ. हम आज रात को अंजु और समीर से मिलने आ रहे हैं,’’ उस की यह बात सुन कर मैं बहुत बेचैन हो उठा.

‘‘आज मत आओ. अंजु को अपने भाई के यहां जाना है,’’ मैं ने झूठ बोल कर उन के आने को टाल दिया.

‘‘चलो, उन से मिलने फिर किसी और दिन आ जाएंगे पर तुम अपना पता तो लिखवा ही दो.’’

मैं उसे घर बुलाना नहीं चाहता था पर मजबूरन उसे अपना पता लिखवाना पड़ा. मैं ने उस से ज्यादा बातें नहीं कीं. कहीं मन ही मन मैं ने यह फैसला कर लिया कि मैं उन के साथ ज्यादा घुलनेमिलने से बचूंगा.

फिर मैं शनिवार की शाम को औफिस से घर पहुंचा तो वे दोनों मुझे ड्राइंगरूम में बैठे मिले. अंजु उन से बातें कर रही थी. मानसी के सामने वह बहुत साधारण सी नजर आ रही है, ऐसी तुलना करते ही मेरा मन उखड़ सा गया.

तभी मैं एकदम चुपचुप सा हो गया. मेरे मुकाबले अंजु उन दोनों से वार्त्तालाप करने की जिम्मेदारी कहीं ज्यादा बेहतर ढंग से निभा रही थी.

मानसी ने अचानक मुझ से पूछ ही लिया, ‘‘इतने उदास क्यों दिख रहे हो, संजीव?’’

‘‘सिर में दर्द हो रहा है. आज औफिस में काम कुछ ज्यादा ही था,’’ मुझे यों झूठ बोलना पड़ा तो मेरा मन और बुझाबुझा सा हो गया.

रोहित ने मेरे बेटे समीर से बहुत अच्छी दोस्ती कर ली थी. मानसी अंजु के साथ खूब खुल कर हंसबोल रही थी. बस मैं ही खुद को उन के बीच अलगथलग सा महसूस कर रहा था.

उन दोनों को रोहित के किसी मित्र के घर भी जाना था, इसलिए वे ज्यादा देर नहीं बैठे और हमें जल्दी अपने घर आगामी रविवार को आने का निमंत्रण देने के बाद चले गए.

उन के जाने के बाद मैं बहुत चिड़चिड़ा हो गया. मैं ने उन से ज्यादा तअल्लुकात न रखने का फैसला करने में ज्यादा वक्त नहीं लिया.

‘‘ये अच्छे लोग हैं. दोनों का स्वभाव बहुत अच्छा है,’’ अंजु के मुंह से उन दोनों की तारीफ में निकले इन शब्दों को सुन कर मैं अपनी चिढ़ व नाराजगी को नियंत्रण में नहीं रख सका.

‘‘यार, इन लोगों की बात मुझ से मत करो. ये बनावटी लोग हैं. इन की सतही चमकदमक से प्रभावित न होओ. ऐसे लोगों के साथ मित्रता बढ़ा कर सिर्फ दुख और परेशानियां ही हासिल होती हैं,’’ मैं ने उसे समझाने की कोशिश की.

‘‘क्या कालेज के दिनों में आप मानसी के बहुत अच्छे दोस्त नहीं थे?’’ मुझे यों अचानक उत्तेजित होता देख कर वह हैरान नजर आ रही थी.

‘‘मानसी मेरे एक अच्छे दोस्त नवीन की प्रेमिका थी. इस कारण मुझे उसे सहन करना पड़ता था. जब मानसी का उस के साथ चक्कर खत्म हो गया, तब मैं ने उस के साथ बोलना बिलकुल खत्म कर दिया था. वह न तब मुझे पसंद थी और न आज.’’

‘‘मुझे तो दोनों अच्छे इंसान लगे हैं. क्या अगले संडे हम उन के घर नहीं जाएंगे?’’

‘‘नहीं जाएंगे और अब कोई और बात करो. हमें नहीं रखना है इन के साथ ज्यादा संबंध,’’ रूखे से अंदाज में उसे टोक कर मैं ने मानसी और रोहित के बारे में चर्चा खत्म कर दी.

अंजु ने फिर उन दोनों के बारे में कोई बात नहीं की. सच तो यह है कि वह मुझे ज्यादा खुश नजर आ रही थी. उस ने बड़े प्यार से मुझे खाना खिलाया और सोने से पहले सिर की मालिश भी की.

अगले दिन अंजु ने मुझे सुबह उठा कर मुसकराते हुए कहा, ‘‘उठिए, सरकार. आज से हम दोनों रोज नियमित रूप से घूमने जाया करेंगे.’’

‘‘यार, तुम्हें जाना हो तो जाओ पर मुझे सोने दो,’’ मैं ने फिर से रजाई में घुसने की कोशिश की.

‘‘नहीं जनाब, ऐसे नहीं चलेगा. अगर आप मेरा साथ नहीं देगे तो मैं और मोटी हो जाऊंगी. क्या आप मुझे मानसी की तरह सुंदर और स्मार्ट बनता नहीं देखना चाहते हो?’’

अंजु की बात सुन कर मैं उठ बैठा और फिर बोला, ‘‘तुम उस के जैसा नकली पीतल नहीं, बल्कि खरा सोना हो. बेकार में उस के साथ अपनी तुलना कर के टैंशन में मत आओ.’’

अंजु ने अपनी बांहों का हार मेरे गले में डाल कर कहा, ‘‘टैंशन में मैं नहीं, बल्कि आप नजर आ रहे हो.’’

‘‘मैं टैंशन में नहीं हूं,’’ मैं ने उस से नजरें चुराते हुए जवाब दिया.

‘‘मैं आप के हर मूड को पहचानती हूं, जनाब. मुझ से कुछ भी छिपाने की कोशिश बेकार जाएगी.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘मतलब यह कि मेरी मानसिक सुखशांति की खातिर आप की झूठ बोलने की आदत बहुत पुरानी है.’’

‘‘तुम्हारी बात मेरी समझ में नहीं आ रही है. मैं ने कब तुम से झूठ बोला है?’’

अंजु ने हलकेफुलके अंदाज में जवाब दिया, ‘‘मैं बताती हूं. जब हमारे पास कार नहीं थी तो आप कार की कितनी बुराई करते थे. कार के पुरजे महंगे आते हैं, सर्विसिंग महंगी होती है, पैट्रोल का खर्चा बहुत बढ़ जाता है, मुझे ड्राइव करना अच्छा नहीं लगता और भी न जाने आप क्याक्या कहते थे.’’

‘‘तुम कहना क्या चाह रही हो?’’

‘‘पहले एक और बात सुनो और फिर मैं आप के सवाल का जवाब दूंगी.

जब समीर के ऐडमिशन का समय आया तो आप महंगे पब्लिक स्कूलों के कितने नुक्स गिनाते थे. वहां पढ़ने वाले अमीर मांबाप के बच्चे छोटी उम्र में बिगड़ जाते हैं, बच्चे को अच्छे संस्कार घर में मिलते हैं स्कूल में नहीं, जैसी दलीलें दे कर आप ने मेरे मन को शांत और खुश रखने की सदा कोशिश की थी.’’

ये भी पढ़ें- दूसरा पत्र: क्या था पत्र में खास?

‘‘मैं जो कहता था वह गलत नहीं था.’’

‘‘मैं यह नहीं कह रही हूं कि आप गलत कहते थे.’’

‘‘मैं वही कह रही हूं, जो मैं ने शुरू में कहा था. मेरे मन की सुखशांति के लिए आप दलीलें गढ़ सकते हो, लेकिन ऐसे मौकों पर आप की जबान जो कहती है वह आप की आंखों के भावों से जाहिर नहीं होता है.’’

‘‘तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आ रही हैं.’’

‘‘देखिए, जब आप कार की बुराई करते थे तब हम कार नहीं खरीद सकते थे. लेकिन जब कार घर में आई तो आप कितने खुश हुए थे.

फिर जब समीर को अच्छे स्कूल में ऐडमिशन मिल गया तो भी आप की खुशी का ठिकाना नहीं रहा था.’’

‘‘अब यह भी समझा दो कि तुम ये पुरानी बातें आज क्यों उठा रही हो?’’

‘‘क्योंकि आज भी आप की जबान पर कुछ और है और दिल में कुछ और. आज भी मेरे मन के सुकून की खातिर आप मानसी जैसी सुंदर, स्मार्ट महिला की बुराई कर रहे हो. लेकिन कल रात मैं ने देखा था कि जब भी आप सहज हो कर उस से बातें करते थे तो आप की आंखें खुशी से चमक उठती थीं.’’

‘‘सचाई यह भी है कि मानसी के मुकाबले मैं मोटी और अनाकर्षक लगती हूं. तभी अपनी पुरानी आदत के अनुरूप आप ने अपना सुर बदल लिया है. लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’

‘‘लेकिन आप मुझे हीनभावना का शिकार बनने से बचाने के लिए न मानसी की बुराई करो और न ही उन के साथ परिचय गहरा करने से कतराओ. कार और समीर के ऐडमिशन का संबंध हमारी माली हालत से था पर यह मामला भिन्न है. मैं भली प्रकार समझती हूं कि अपने व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने का प्रयास मुझे ही करना होगा. तभी मैं ने अपने में बदलाव लाने की कमर कस ली है.

‘‘आप बनावटी व्यवहार से मुझे झूठी तसल्ली दे कर मेरे मन की सुखशांति बनाए रखने की चिंता छोड़ दो. आप के सहज अंदाज में खुश रहने से ही हमारे बीच प्यार की नींव मजबूत होगी.

‘‘आप के सहयोग से मैं अपने लक्ष्य को बहुत जल्दी पा लूंगी. इसीलिए मेरी प्रार्थना है कि कुछ देर और सोने का लालच त्याग कर मेरे साथ घूमने चलिए.’’

‘‘यार, तुम तो बहुत समझदार हो,’’ मैं ने दिल से उस की प्रशंसा की.

‘‘और प्यारी भी तो कहो,’’ अंजु इतरा उठी.

‘‘बहुतबहुत प्यारी भी हो… मेरे दिल की रानी हो.’’

‘‘थैंकयू. अगले संडे हम मानसी के घर चलेंगे न?’’

‘‘श्योर.’’

‘‘और अभी मेरे साथ पार्क में घूमने चल रहे हो न?’’

‘‘जरूर चल रहा हूं पर वैसे इस वक्त मैं तुम्हारे साथ कहीं और होना चाहता हूं,’’ मेरी आवाज नशीली हो उठी.

‘‘कहां?’’

‘‘इस रजाई की गरमाहट में.’’

‘‘अभी सारा दिन पड़ा है. पहले पार्क चलो,’’ मेरी आंखों में प्यार से झांकते हुए अंजु का चेहरा लाजशर्म से लाल हो उठा तो वह मेरी नजरों में संसार की सब से खूबसूरत औरत बन गई थी.

ये भी पढ़ें- बबूल का पेड़: बड़ा भाई अपने छोटे भाई से जब हुआ पराया

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें