जनसंख्या नियंत्रण और समाज

जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने वाली कट्टरपंथी हिंदू सोच की सरकारों को असल में औरतों के दुख की चिंता ही नहीं है. जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर वे न केवल औरतों का यौन सुख का हक छीन रही हैं, अगर गर्भ ठहर जाए तो उन्हें अपराधी की सी श्रेणी में डाल रही हैं. तीसरा बच्चा नाजायज है, अपराधी है, समाज विरोधी है, राज्य पर बोझ है जैसे शब्दों से चाहे जनसंख्या नियंत्रण कानून न भर हों, पर ये शब्द हैं जो केवल उन्हें दिखेंगे जो भुगतेंगी, सचिवालयों और मंत्रालयों में बैठने वालों को नहीं.

फ्रांस का उदाहरण लें. उस की प्रति व्यक्ति आय भारत की महज 2000 डौलर प्रतिवर्ष के मुकाबले 60,000 डौलर प्रति वर्ष है यानि वहां के लोग 30 गुना अमीर हैं. फिर भी वहां बहुत गर्भ ठहर जाते हैं क्योंकि लड़कियां गर्भनिरोधक नहीं खरीद पातीं. अब फ्रांस सरकार ने 25 वर्ष की आयु तक डाक्टर की फीस, दवाएं व गर्भपात सब फ्री कर दिया है. फ्रांस सरकार का मानना है कि यह मामला लडक़ी की इच्छा का है कि वह कब सेक्स सुख ले और कब बच्चा पैदा करे. सरकार को लडक़ी की इच्छा का आदर करना चाहिए.

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हमारे यहां लडक़ी को पहले ही दिन से बोझ माना जाता है. उस के सारे हक बनावटी हैं. दिखाऊ हैं. उसे धर्मकर्म में अकेला जाता है जहां और कुछ नहीं तो सेक्स सुख अवश्य मिल जाता है चाहे पति हो या न हो औरतें घरों में सेक्स सुख से वंचित रहें इसलिए ङ्क्षहदूमुसलिम के नाम पर उन के जननांग और कोख पर आदेशों के ताले लगाए गए हैं, उन्हें कहां गया है कि 2 बच्चों के बाद या तो ताला या सरकारी समाज से बाहर, न नौकरी मिलेगी न राशन, न चुनाव लडऩे की सुविधा. कहने को यह बढ़ती जनसंख्या को रोकने के लिए पर असल में यह भ्रामक सोच पर आधारित है जो नरेंद्र मोदी ने जम कर गुजरात विधानसभा चुनावों में कही थी कि एक समाज 5 से 25 होता है और दूसरा 2 पर संतोष करता है.

मुसलमानों और दलितों के लिए गर्भ नियंत्रण कठिन है, मंहगा है यह इस कानून में सुलझाना नहीं गया है, सुविधाएं छीनने का खौफ दर्शाया गया है. आज यदि गर्भ निरोधक सस्ते या मुफ्त हो और गर्भपात्र जब चाहों जहां चाहो मुफ्त में करा लो तो नैतिकता नहीं खत्म होगी औरतों के अधिकारों की स्थापना होगी. हर युवती, चाहे विवाहित हो या अविवाहित अपने शरीर का कैसे इस्तेमाल करे, उस का अपना मामला है और वह खुद बेकार का गर्भ नहीं चाहती. आज की कामकाजी औरत बच्चों को चाहती है पर सीमा में. इस के लिए कानून चाहिए तो सुविधाएं देने वाले पर उस में खर्च होता है. सरकार तो ऐसा आदेश देना जानती है जिस से नागरिकों के हाथ पैर बंंधे, अब जननांग भी बांध रहे हैं.

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