REVIEW: महिला किरदारों की उपेक्षा है ‘पॉटलक’

रेटिंगः ढाई स्टार

निर्माताः कुणालदास गुपत,  पवनीत गखल, गौरव लुल्ला और विवेक गुप्ता

निर्देशकः राजश्री ओझा

कलाकारः किट्टू गिडवाणी,  जतिन सियाल, ईरा दुबे, सायरस सहुकार, हरमन सिंघा सलोनी खन्ना, सिद्धांत कार्णिक, शिखा तलसानिया, औरव राणा, आरवी राणा, आराध्य अजाना व अन्य.

अवधिः बीस से पच्चीस मिनट के आठ एपीसोड, लगभग तीन घंटे आठ मिनट

ओटीटी प्लेटफार्मः सोनी लिव

किसी भी इंसान के हाथ की पांचों उंगलियां एक समान नही होती. मगर यह पांचो उंगलियां एक साथ आकर मुक्का अथवा चांटे के रूप में बहुत बड़ी ताकत होती हैं. इसी तरह हर परिवार में उसके सभी सदस्यों का कद, व्यवहार, सोच, समझ,  इच्छाएं अलग अलग होती हैं. इसी के चलते अक्सर परिवार का हर सदस्य एक दूसरे से प्यार करते हुए भी विखरा और अलग थलग नजर आता है. ऐसे ही विखरे परिवार के सदस्यों को एकजुट करने के लिए निर्देशक राजश्री ओझा और लेखकद्वय अश्विन लक्ष्मीनारायण व गौरव लुल्ला वेब सीरीज ‘‘पॉटलक’’लेकर आए है. दस सितंबर से ओटीटी प्लेटफार्म ‘‘सोनी लिव’’ पर स्ट्रीम हो रही वेब सीरीज ‘पॉटलक’ में हास्य के साथ परिवार के सदस्यों के बीच की नोकझोक,  प्यार, समस्याओं, उलझनों व रिश्तों के नवीनीकरण का हास्यप्रदा चित्रण है.

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कहानीः

पॉटलक अंग्रेजी का शब्द है,  जिसका मतलब है कुछ परिवारों द्वारा अपनी -अपनी रसोई में खाना पकाना और फिर सभी का एक जगह पर इकट्ठा होकर मिल-जुल कर भोजन का आनंद उठाना. इतना ही नही अंग्रेजी में कहावत है -‘‘द फैमिल हू इ्ट्स टुगेदर, स्टे टुगेदर. ’’अर्थात जो परिवार साथ में बैठ कर भोजन करता है, वह(सदैव) इकट्ठा रहता है. लेकिन यह कहानी उस शास्त्री परिवार की है, जो इकट्ठा नही रहता. अवकाश प्राप्त गोविंद शास्त्री (जतिन सयाल) अपनी पत्नी प्रमिला (किटू गिडवानी) के साथ एक बड़े से घर में रहते हैं. उनके  दो बेटों की शादी हो चुकी है. बड़े बेटा विक्रांत (साइरस साहुकार) अपनी पत्नी आकांक्षा (इरा दुबे) व तीन बच्चों  नक्श, साइशा व जिया के अलग घर में रहता है. गोविंद शास्त्री का छोटा बेटा ध्रुव (हरमन सिंघा) अपनी पत्नी  निधि (सलोनी खन्ना पटेल) के साथ अलग रहता है. निधि को भोजन पकाना नही आता. उसे बच्चे पसंद नहीं और वह नौकरीपेशा है. ध्रुव की नौकरी अमेरिका में लग गई है. ध्रुव व निधि अमेरिका जाने की तैयारी कर रहे हैं. गोविंद शास्त्री की बेटी प्रेरणा (शिखा तलसानिया)कोलकाता में नौकरी करती थी, मगर अब घर आ गई है.  वह लगातार लड़कों को डेट करती रहती है. कोई पसंद नहीं आता.  माता-पिता चाहते हैं कि वह सैटल हो जाए. मगर अवकाश प्राप्त करने के बाद गोविंद शास्त्री को अहसास होता है कि जब उनके बच्चे स्कूल में पढ़ते थे,  तब बच्चों के लिए उनके पास वक्त नहीं था. अब जब उनके पास वक्त है, तो उनके लिए उनके बच्चों के पास वक्त नही है कि सभी एक छत के नीचे कुछ समय एक साथ बिता सके. तभी अचानक एक दिन गोविंद शास्त्री हार्टअटैक की बीमारी की बात बताते हैं,  जिसके चलते ध्रुव अपना अमेरिका जाने का इरादा बदल देता है. उसके बाद हर सप्ताहांत पर किसी न किसी के घर पर गोविंद की राय के अनुसार पॉटलक के लिए सभी इकट्ठा होते हैं. उनके बीच पारिवारिक संबंध प्रगाढ़ होते हैं. परिणामतः छोटा भाई अपने बड़े भाई की मदद भी करता है. मगर अंततः यह धागा टूटता है और फिर. . . .

लेखन व निर्देशनः

लेखकद्वय ने सास ससुर के व्यवहार से बहू को होने वाली दिक्कतें,  बेटी की शादी की चिंता, माता-पिता की कुछ आदतों से बच्चों का खीझना, भाई-बहन की नोकझोंक सहित कई मुद्दें बिना उपदेशात्मक भाषण के रचे गए है. किरदारों की बातें पल-पल गुदगुदाती हैं. मगर यह परिवार व इसके किरदार साधारण मध्यम वर्गीय परिवार की बजाय उच्च वर्गीय परिवार यानी कि अभिजात वर्ग के हैं. जहां नया घर करोड़ में खरीदा जा सकता है. दस साल पहले निर्देशक राजश्री ओझा ने उच्च वर्ग की कहानी को फिल्म ‘‘आएशा’में पेश किया था. फिर वह अमरीका चली गयी थी. अमरीका से वापस आने पर उन्हें अभिजात वर्ग की कहानी पेश करना सहज लगा. लेकिन शुरूआती चार एपीसोड काफी ढीले ढाले हैं. इन्हें कसे जाने की जरुरत थीं. सातवां व आठवां एपीसोड जबरदस्त है, और दर्शकों को जकड़कर रख देता है. लेखक व निर्देशक ने इसमें बेवजह हिंदू मुस्लिम व उर्दू भाषा का एंगल जोड़ा है. प्रेरणा शास्त्री का किरदार अधपका सा लगता है. लेखक व निर्देशक ने महिला किरदारों की पूरी तरह से अनदेखी की है.

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अभिनयः

गोंविंद शास्त्री के किरदार में जतिन सियाल और प्रमिला शास्त्री के किरदार में किट्टू गिडवाणी अपने अभिनय का जलवा दिखाने में सफल रही हैं. आकांक्षा शास्त्री के किरदार में ईरा दुबे अपने अभिनय की छाप छोड़ती हैं. शिखा तलसानिया को अभी अपने अभिनय में निखार लाने की आवश्यकता है. आलिम के किरदार में सिद्धांत कार्णिक का अभिनय काफी सहज है. अन्य कलाकार ठीक ठाक हैं.

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