Social Story In Hindi: सुभा- देवी की मूर्ति हटाने की बात पर क्या हुआ

 

 

सुभा: भाग 3- देवी की मूर्ति हटाने की बात पर क्या हुआ सुभा के साथ

किंतु न जाने कब नियति ने उन के मनमंदिर में सुभा का अनाधिकार प्रवेश करा  दिया था. देवेन जान भी नहीं पाए थे और उन के अभेद संयम दुर्ग में प्रेम नामक एक सर्प घुस आया था. वह तो क्या संसार का संयमी से संयमी पुरुष भी होता तो वह भी उस चंचल और सुंदर किशोरी का हाथ थामते ही दुस्साहसी बन जाता. 2 वर्षों के अमूल्य साथ ने जाति विभेद के अस्तित्व को ही मिटा दिया था.

उन के दाएंबाएं, दामिनी सी दमकती वह दुस्साहसिनी लड़की उन्हें उंगुलियों पर नचा रही थी. जिस के परिवार के दुश्चरित्रता की दिगंत्व्यापी दंतकथाओं को वे सुनते आ रहे  थे और जिस से उन्हें नफरत होनी चाहिए थी, उसी को पाने के लिए वे स्वप्नों के शून्याकाश में बांहें फैलाने लगे थे.

‘‘तेरे जैसी मूर्खा से प्रेम कर बैठा हूं, बस शंभू तेरी इस बुद्धि और हमारे इस प्रेम को दुनिया की नजरों से बचा कर रखे.’’

यह सुनते ही सुभा उस के गले में बांहें डाल कर झल पड़ी थी. पर शंभू में युगल प्रेमियों की इस प्रणयकिलोल में सहयोग देने का धैर्य नहीं रहा और देवेन के पिता को सब पता चल गया.

न्यायधीश के सामने जब देवेन की पेशी हुई, झठ नहीं बोल पाए थे वे.

‘‘ब्राह्मण हो कर शूद्र की लड़की से प्रेम तुम्हें शोभा नहीं देता,’’ पंडितजी ने भीतर कठिनाई से दबाए जाने वाले क्रोध को बड़ी कठिनाई से रोक कर कहा.

‘‘और फिर ऐसी मति भ्रष्ट, चरित्रहीन और विप्लवी लड़की के साथ क्या तुम्हारा निबाह हो पाएगा?’’ कभी किसी भी रूप में अपना मत न प्रकट करने वाली माता भी आज बोली थी. इस के पीछे का कारण पुत्र प्रेम था अथवा सौतिया डाह इस की मीमांसा का भार स्वयं उन्हीं पर था.

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यों रुकावट पड़ती देख पंडितजी ने अपने वृषभ स्कंधों को थोड़ा ऊंचा उठा कर फैसला सुना दिया, ‘‘तुम कल सुबह ही चाचा के पास चले जाओगे, आगे की पढ़ाई वहीं से करो यही अच्छा है.’’

‘‘बा… बा… बूजी..’’ देवेन ने एक दुर्बल प्रयास किया था.

‘‘ऐसी स्त्रियां विवाह योग्य कदापि नहीं होतीं. गंदे नाले का पानी पीने के लिए इस्तेमाल नहीं करते, यह बात तुम जितनी जल्दी समझ जाओ तुम्हारे लिए अच्छा हैं,’’ अनकही बातें पिता की आंखों ने पुत्र को समझ दी थीं.

इतने दिनों से प्रेम की जिस पतवार को थामे वे चल रहे थे, उस में दरारें आ गई थीं.  सुभा उस के लिए एक ऐसा जंगली गुलाब बन गई थी जिसे हवा में झमते देखना किसी भी प्रकृति प्रेमी मन को रुच सकता था, उसे तोड़ कर सूंघा भी जा सकता था, परंतु ऐसे फूल को देवता के चरणों में नहीं चढ़ाया जा सकता था.

अस्पृश्यता को विस्मृत भी कर दें तो, ऐसी मुंहजोर, स्वच्छंद और विदग्ध स्त्री से प्रेम तो किया जा सकता है, परंतु ऐसी स्त्रियां विवाह के लिए सर्वथा उपयुक्त नहीं हैं? ऐसा निश्चय कर वे अगले ही दिन सुभा से मिले बिना दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे.

वह मानिनी अपना मान त्याग बीच रास्ते उन्हें रोकने भी आई थी, परंतु देवेन के एक छोटे से वाक्य ने उस के सुंदर चेहरे को निस्तेज कर दिया था.

‘‘सुभी, पहाड़ के जलप्रपात को घर में लाने की कुचेष्ठा मैं नहीं कर सकता. मेरा रास्ता …’’

उन की बात पूरी होने के पहले ही सुभा हिरणी सी कुलांचें भरती हुई उन के जीवन से गायब हो गई थी.

‘‘क्षमा कीजिएगा, थोड़ी देर हो गई. कुछ ही दिन रह गए हैं समारोह में, तो प्राभ्यास में लगे हुए हैं हम सब,’’ सामने आ कर बैठ गई थी सुभा.

वह क्या 24 वर्ष पूर्व की सुभा थी. तब का गोल चेहरा लंबोतरा हो कर और भी आकर्षक बन गया था. 16 वर्ष की वह किशोरी 40 वर्ष की स्त्री बन गई थी. सुघड़ जूड़े में मंडित घने केशपाश की गरिमा आज भी वैसी ही थी. उन अधरों की स्वाभाविक लालिमा को देवेन ने बहुत निकट से देखा था. आज स्वामिनी ने उन्हें हलके गुलाबी रंग के पीछे ढक रखा था.

देवेन को देख कर उस के मुख पर एक अपरिचित स्मित की रेखा सहसा उज्ज्वल हो उठी थी. बदल तो देवेन भी गए थे. एक युवक अब जीवन के 50 वसंत देख कर प्रौढ़ हो गया था. वह सुभा के मुख के भाव पड़ने की चेष्टा करने लगा था.

‘‘जी,’’ सुभा की आंखों में अब भी अजनबीपन ही था.

‘‘मैं नवल का पिता हूं.’’

‘‘मैं जानती हूं,’’ सुभा ने कहा परंतु उस का चेहरा अभी भी भावहीन ही था.

‘‘जानती थी, फिर तुम ने ऐसा क्यों किया? कहीं, मुझ से प्रतिशोध लेने के लिए तो…’’ प्रश्न के कंठ से छूटते ही देवेन को पसीना छूटने लगा. किंतु सुभा उसी प्रकार शांत बैठी रही.

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उच्छावास के बाद, एक गंभीर और सशक्त आवाज में उस ने उत्तर दिया, ‘‘देवेन, भारतीय समाज को पितृसत्ता की व्यवस्था के तहत ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज कहा जाता है. इस के पीछे कारण हैं कि यहां का समाज जाति व्यवस्था पर आधारित है, परंतु इस की भी एक खास बात है, महिलाओं पर चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग की हो पितृसत्ता का उत्पीड़न बना रहता है.’’

‘‘मेरी बात से इस बात का औचित्य? मैं समझ नहीं पा रहा,’’ देवेन झंझला पड़े थे.

सुभा ने हंस कर अपनी बात जारी रखी, ‘‘इस बात का ही तो औचित्य है. आप को लगता है कि यदि आप किसी स्त्री को त्याग देते हैं, तो उस के पास कुछ ही विकल्प शेष रह जाते हैं. मृत्य को अंगीकार करना, विरह की अग्नि में जलना अथवा प्रतिकारस्वरूप उसी अग्नि में एक दिन उसी पुरुष को जलाने की मंत्रणा करना.

आप की ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक सोच आपको यह सोचने ही नहीं देती कि हर नायिका विप्रलब्धा नहीं होती, कुछ नायिकाएं स्वयंसिद्धा भी होती हैं.’’

देवेन उस के बुधिदिप्त चेहरे को देखते रह गए. बोले, ‘‘वह मैं ने सुना था कि तुम…’’ देवेन ने अपने दांतों से जीभ काट कर बात पूरी की, ‘‘आप ने विवाह नहीं किया.’’

सुभा व्यंग्यात्मक मुसकान के साथ बोली, ‘‘और आप ने यह सोच लिया कि मैं ने आप की विरह में आजीवन कौमार्य का प्रण ले रखा है.’’

देवेन का सर झक गया था.

‘‘मैं ने विवाह नहीं किया क्योंकि मु?ो कोई अपने जैसा नहीं मिला और मैं श्रेष्ठ से नीचे कुछ चाहती नहीं थी. वैसे भी पुरुष एक सशक्त, विप्लवी और प्रारब्धवान स्त्री से डरते हैं. मैं अपनी स्वतंत्रता के साथ समझता नहीं कर सकती. विवाह कोई अनिवार्यता नहीं वरन व्यक्तिगत चुनाव है और आप की जानकारी के लिए बता दूं, मैं अविवाहित अवश्य हूं, परंतु अकेली नहीं.’’

‘देवेन तू मूर्ख है. तू क्या इस स्वाभिमानी स्त्री को नहीं जानता. संसार का कौन सा मूर्ख पुरुष होगा जो इस पूजनीय प्रतिमा के सामने नतमस्तक नहीं होगा. नवल तो फिर भी एक बालक हैं,’ उन के विवेकशील अंत:करण ने उन्हें चाबुक की मार से तिलमिला दिया.

देवेन के मानसिक यंत्रणा से अनभिज्ञ सुभा ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘आज से  पहले मैं नहीं जानती थी कि नवल आप का पुत्र है. उस के विचार भी तो आप से मेल नहीं खाते. न पुरुष होने का दंभ और न ही अपनी जाति की झठी सर्वोचता का घमंड,’’ सुभा की आवाज में तलखी थी.

एक लंबी सांस ले कर वह आगे बोलने लगी, ‘‘खैर, आज प्रात: उस ने अपने दिल की बात मेरे सामने रखी. एक पल में मैं समझ गयी थी कि यह प्रेम नहीं, मात्र आदरणीय और अपरिपक्व आकर्षण है, जो इस उम्र में आम बात है. किसी से प्रेम होना गलत भी नहीं है, बात धर्म, जाति, लिंग और उम्र की नहीं. बात प्रेम की परिपक्वता की है. मैं ने उसे समझया, प्रेम का मात्र एक ही रूप नहीं है.

‘‘आप अत्यंत आदरणीय से भी तो प्रेम करते हैं. मु?ो भी उस से प्रेम हैं, परंतु एक शिशु के समान. जहां स्वार्थ नहीं है, प्रेम वहीं है. मेरी बातें सुन कर उस की आंखें भर आई थीं. समझदार बच्चा है, धीरेधीरे समझ जाएगा. मैं उस के मार्गदर्शन के लिए सदा रहूंगी, आप की अनुमति हो अथवा न हो.’’

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अब देवेन से कुछ न कहा गया, गला रुध आया था. इस स्त्री के सामने वे स्वयं को कमजोर तो हमेशा महसूस करते थे, आज परास्त भी हो गए थे. उन के सामने जो नारी खड़ी थी उस ने उन्हें पिघला दिया था. उन्होंने मन ही मन कहा कि आप जो चाहोगी वही होगा. इस संसार में नवल का भला आप से ज्यादा कोई नहीं सोच सकता.

अपने जुड़े हुए हाथ उन की तरफ करते हुए सुभा खड़ी हो गई थी. देवेन भी खड़े हो गए. नि:शब्द दोनों ने विदा ली.

सुभा: भाग 2- देवी की मूर्ति हटाने की बात पर क्या हुआ सुभा के साथ

उस के प्रेम की निजता तभी तक थी जब तक उस की खबर किसी और को नहीं लगती. परंतु हाय, उस की आंखों ने चुगली कर दी थी. माता को इन दिनों पुत्र का खोयाखोया रहना नहीं भा रहा था. बात पिता तक पहुंची, व्यावहारिक तथा इंद्रियगम्य देवेन को पुत्र के दिल का हाल समझते ज्यादा देर नहीं लगी.

कुमाऊं के छोटे से गांव के एक धर्मपरायण परिवार में उन का जन्म हुआ था. पिता थे एक शिव मंदिर के पुजारी और माता थी सरल गृहिणी जिन्हें मुंह खोलने की स्वतंत्रता भोजन के समय ही थी. पहाड़ के मोटे चावल और मडुवे की रोटी को निगल वे झल के तीखे उतारचढ़ाव पार कर स्कूल पढ़ने जाते थे. उन के पिता इच्छा के अनुरूप कई पुत्रों के पिता तो अवश्य बने, परंतु जीवित एकमात्र देवेन ही रह पाए थे.

उस गांव के प्रजातंत्र में भी इतना साहस नहीं था कि वह पंडित श्री सूर्यनारायण की बात काट दे. परंतु फिर भी पिता के विरोध के बावजूद अपने ही पौरुष की बैसाखियों को टेकते वह मेधावी छात्र एक दिन छलांग लगा कर देहरादून का प्रसिद्ध हीरा व्यवसायी बन गया था.

स्वयं के अनुभवों ने उन की सोच को आधुनिक और प्रगतिशील बना दिया था. उन का अपने पुत्र के साथ व्यवहार भी मित्रवत ही था. इसलिए अपने पुत्र के पास जा कर उस की प्रेयसी के बारे में पूछने में उन्हें कोई संकोच नहीं हुआ. परंतु प्रेयसी की उम्र जान कर उन का प्रगतिशील हृदय भी धिक्कार उठा था. वे जानते थे नवल की उम्र में विमोह होना प्राकृतिक है. इसलिए क्रोध उन्हें उस प्राध्यापिका पर आ रहा था. बड़ी ही चतुराई से उन्होंने नवल को नानी से मिलने के लिए भेज दिया और स्वयं उस मोहिनी से मिलने पहुंच गए.

अभी देवेन की गाड़ी वहां पहुंची ही थी कि उन्होंने नवल को वहां से निकलते हुए  देख लिया. जाने से पहले अपनी प्रेयसी से अनुमति लेने आया होगा, यह सोचते ही क्रोध से उन का चेहरा तमतमा हो उठा. वे क्रोध में पैर पटकते हुए प्राभ्यास भवन के अंदर चले गए.

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‘‘लोगों को अपनी भंगिमाओं पर घुमाना खूब आता है आप को, ‘‘सुभा अभी कलाकारों को निर्देश दे ही रही थी पीछे से किसी की अनाधिकार टिप्पणी ने उसे अचंभित कर दिया.

वह स्वर की दिशा की तरफ पलटी और देवेन को उन के जीवन का एक बहुत बड़ा झटका मिला.

‘यह कैसे आ गई यहां? क्या मेरी ही इच्छाशक्ति इसे खींच लाई?’ मन ही मन देवेन सोचने लगे थे. इतने वर्षों बाद भी इस अलौकिक नारी की उपस्थिति उन्हें सम्मोहित कर रही थी.

‘‘आप भीतर कमरे में जा कर बैठें, मैं आती हूं,’’ सुभा सामान्य ही थी.

स्मृतियों के जलप्रपात पर यत्न से बनाया गया बांध किसी अदृश्य शक्ति द्वारा तोड़ दिया गया था और वे तीव्र फुहार के साथ देवेन के मन और मस्तिष्क को भिंगोती चली गई.

गांव की खूबसूरत यादों में सब से मोहक याद उसी की तो थी. प्रशस्त ललाट, तीखी नासिका, भुवनमोहिनी सुभा स्वभाव से विप्लवी और जाती से अश्पृश्य थी. उस के विप्लवी स्वभाव और निर्दोष चेहरे को देख कर ही उस का नाम उस के पिता ने महाकाली के कई नामों में से चुन कर रखा था, सुभा, अर्थात् वह जो सौभाग्यशाली है. परंतु उस के नाम की शुभता भी उस की जाति की अस्पृश्यता का दमन नहीं कर पाई थी.

‘‘छोटे पंडित, शंभू की पूजा का समय हो गया,’’ कहती हुई वह प्रतिदिन सुबह देवेन के शयनकक्ष की खिड़की की सांकल खड़खड़ा जाती और वे झंझला कर खून का घूंट पी कर रह जाते थे.

एक दिन रात बीतने को ही थी कि खुसरफुसर सुन सब ने सोचा मंदिर में कोई जानवर घुस आया है, जिसे भगाने का भार देवेन पर डाला गया. देवेन ने लाठी उठाई, परंतु जब वहां पहुंचे तो देखा कि कोई दूसरी ही छाया अपनी अपावन उपस्थति से शिवालय को अपवित्र कर रही थी. शिवलिंग के सम्मुख घुटने टेके आंखें मूंदे करुण स्वर में गा रही थी-

ईट की दीवारों में बंदी,

यह प्रभू नहीं उस की मूरत है.

जो जीव प्रेम की चुनरी ओढ़े,

उस मानव में उस की सूरत है.

प्रभु नाम को जपने वालो,

सुन लो यह कथन भी मेरा.

तुम जिस को पूजते रहे,

अस्पृश्य है वह प्रभु भी तुम्हारा.

देवेन का सम्मोहन उस के पिता की कर्कश ध्वनि ने तोड़ा, ‘‘ऐ लड़की सुबहसुबह मंदिर को अपवित्र कर रही है, चल निकल भाग. अभागन प्रभु को अस्पृश्य कहती है.

क्यों न कहूं. स्पर्श किया है कि तुम ने अपने प्रभु को? जिस का स्पर्श नहीं कर सकते वह तो अस्पृश्य ही हुआ न? अपने प्रश्न का उत्तर स्वयं दे कर बाबूजी को अंगूठा दिखा कर भाग गई थी वह आनंदी.

बाबूजी चाहते तो सुभा और उस के परिवार को भगाने में उन्हें क्षणिक भी समय नहीं लगता, परंतु सुभा की विधवा बूआ की अनन्य भक्ति आड़े आ जाती थी. अस्पृश्यता की कालिख रात्रि के अंधेरों में मिल जाती थी, इसलिए बाबूजी की शिक्षा उस बेचारी को रात में ही नसीब होती थी. विद्यालय में भी सुभा को प्रवेश मेरे प्रभुतुल्य पिता की अनुशंसा पर ही मिला था.

जो अपनी दर्पोंक्ति से गांव के मनचलों को तिलमिला कर कर स्तब्ध कर दिया करती थी, उस की बातों का मर्म समझने की सामर्थ्य किसी में भी नहीं थी, स्वयं देवेन में भी नहीं.

देवेन से 10 वर्ष छोटी होने के बावजूद समझदारी में सुभा उस से बहुत बड़ी थी.

एक दिन ऐसे ही मंदिर में आ कर देवी की मूर्ति हटाने की बात करने लगी.

‘‘पागल हो गई है क्या?’’ देवेन की आंखों में भय था.

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‘‘क्यों? 5 दिनों के लिए जब सभी स्त्रियां अस्पृश्य हो जाती हैं, तो यह देवी बारहों महीने अंदर मंदिर में कैसे बैठ सकती हैं?’’ यह कह वह पुन: अंदर जाने का प्रयास करने लगी. देवेन उस का दुसाहस देख कर दंग रह गया था.

‘‘पगली, ये तो देवी हैं,’’ उस प्रज्ञात्मक कन्या को देवेन ने समझने का असफल प्रयास किया.

‘‘देवी हैं तो क्या औरत नहीं हैं? क्या ये योनिविहीन हैं? क्या इन के पास अंडाशय नहीं है?’’ बड़ी मुश्किल से उस दिन उसे वहां से खींच कर ला पाए थे वे. पता नहीं वह सिरफिरी उस दिन क्या कर बैठती.

‘‘अच्छा तो क्या तू ईश्वर को भी स्वीकार नहीं करती?’’ एक बार देवेन ने उस से पूछा.

सुभा ने हंस कर जवाब दिया था, ‘‘इतना डरडर कर क्यों पूछ रहे हो? इस में भय की कोई  बात नहीं. कह नहीं सकती, अभी तो उसे ले कर असमंजस की स्थिति में हूं. परंतु कालांतर में शायद उस के अस्तित्व को नकार दूं,’’ उस किशोरी की इन बातों से देवेन डर जाते और मन ही मन उस लड़की की छाया से भी दूर रहने के वादे करते थे.

आगे पढ़ें- सुभा उस के गले में बांहें डाल कर …

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सुभा: भाग 1- देवी की मूर्ति हटाने की बात पर क्या हुआ सुभा के साथ

‘‘निर्धनतथा संपन्न, सबल तथा निर्बल के बीच कभी न समाप्त होने वाली असमानता व्याप्त है. परंतु इस क्षणभंगुर संसार में भी एकमात्र वही हैं, जिस ने बिना किसी पक्षपात हर श्रेणी में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है. नियत समय पर भयमुक्त आती है और मनुष्य को अपनी सत्ता दिखा जाती है, मृत्यु ही परम सत्य है.’’

‘‘परंतु मैम, जीवन क्या परम सत्य नहीं हैं?’’

‘‘आप के जीवन में नवांकुर पल्लवित होगा अथवा नहीं, इस में संशय हो सकता है, परंतु मृत्यु आएगी इस में कोई संशय नहीं है. इसलिए मेरे अनुसार जीवन एक सार्वभौमिक सत्य है परंतु परम सत्य तो मृत्यु ही है,’’ अपने प्रथम वर्ष के विधार्थियों की भीड़ को मुग्ध कर प्रोफैसर सुभा ने अपनी बात समाप्त की और कक्षा से निकल गई.

सुभा की सर्विस का यह 10वां वर्ष था. अपने इन 10 वर्षों के कार्यकाल में वह देहरादून स्थित एल.एम. कालेज में दर्शनशास्त्र का पर्याय बन गई थी. अपने सभी विद्यार्थियों को उस ने दर्शन कला में इतना निपुण बना दिया था कि उस ने पिछली बार कालेज के मुख्यातिथि, राज्यपाल को वर्ण व्यवस्था पर आधारित नाटिका में अपने विचारों से मुग्ध कर दिया था.

माननीय अतिथि के सम्मान में उस विलक्षण प्राध्यापिका ने प्राचार्य के कुछ ही क्षणों के दिए गए आदेश का पालन कर सुंदर कार्यक्रम ही प्रस्तुत नहीं किया, एक मानपत्र भी भेंट किया. उस की लच्छेदार और त्रुटिरहित भाषा की सराहना स्वयं राज्यपाल ने भी की थी.

इस वर्ष भी कार्यक्रम की सूत्रधार सुभा ही थी. उस के निर्देशन में दर्शनशास्त्र के छात्र एक विशेष नाटिका की तैयारी में व्यस्त थे. ‘सबरी का प्रेम’ नामक नाटक के मंचन की तैयारियां चल रही थीं. यह एक सवर्ण राजकुमार और दलित कन्या के प्रेम पर आधारित नाटिका थी.

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नवल को भी नाटक में एक छोटी सी भूमिका निभाने का मौका मिल गया था. वह दर्शनशास्त्र के प्रथम वर्ष का छात्र था. उस के  पिता देवेन देहरादून के प्रख्यात हीरा व्यवसायी थे. नवल उन का एकमात्र पुत्र था.

उस की उम्र में समाज और स्वयं को ले कर ढेरों प्रश्न होते हैं. अपने इन्हीं प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए वह सुभा के समीप जाने लगा था. प्रतिदिन की मुलाकातों और सुभा के दोस्ताना व्यवहार ने नवल को मुखर बना दिया था. हालांकि सुभा का आचरण सब विद्यार्थियों के साथ समान ही था, परंतु अपरिपक्व नवल स्वयं को उस के निकट अनुभव करने लगा था.

सुभा को देख कर कोई दोबारा देखने का लोभ विस्मरण नहीं कर पाता था. उस के जैसी ओजस्वी वक्ता अपनी मीठी वाणी और अकर्तित तर्कों के मोहपाश में कड़े से कड़े आलोचक को भी बांध देती थी तो फिर नवल तो एक अपरिपक्व और अपरिणामदर्शी युवक था. सुभा को देख कर उस के भीतर विस्मय मिश्रित श्रद्धा का भाव उत्पन्न हुआ था, जिस ने कालांतर में एकतरफा प्रेम का रूप ले लिया.

एक दिन नाटक के प्राभ्यास के पश्चात जब सभी थोड़ा विश्राम कर रहे थे नवल ने अनायास ही एक प्रश्न पूछ लिया, ‘‘मैम, समानता कब आएगी?’’

सुभा ने जरा हंस कर सामने पड़ी कुरसी को हाथ से ठेल कर कहा, ‘‘जिस दिन हर मनुष्य यह जान लेगा कि जिस धर्म, जाति, रंग, प्रदेश अथवा देश के दंभ में वह स्वयं को दूसरों से उच्च समझता है, वह उस की कमाई नहीं, बल्कि विरासत है, समानता उसी क्षण आ जाएगी.’’

नवल ने पुन: प्रश्न किया, ‘‘परंतु इस में तो संदेह है, तो क्या शांति कभी नहीं होगी?’’

सुभा पलभर चुप रह कर मीठे स्वर में बोली, ‘‘जब कर्मठ और मेहनतकश लोगों का राज होगा शांति तभी आएगी. उन की बस एक जाति होगी- कर्मण्यता. जो निठल्ले और नाकारा लोग हैं वे लड़ने और लड़ाने के अलावा कुछ सोच ही नहीं सकते.

‘‘यदि लोग अपनी हर मुसीबत का हल स्वयं ढूंढ़ने लगें तो सोचो पंडितों की तो दुकानें ही बंद हो जाएंगी,’’ सबरी का पात्र निभाने वाली मेघा की इस बात पर सभी हंस पड़े थे और माहौल हलका हो गया था.

नवल भी कुछ क्षण चुप रह कर बोला, ‘‘आरक्षण समानता के प्रथम सोपान की तरह था. परंतु आप को नहीं लगता कि वह भी समाज की सोच को नहीं बदल पाया?’’

‘‘हां, कह तो तुम सही रहे हो, परंतु यह बात भी तो है कि शोषित वर्ग की इस व्यवस्था में हिस्सेदारी भी तो बड़ी है. पहले उच्च पद पर कितने दलित मिलते थे, परंतु आज देखो,’’ उन में से एक छात्र रमन ने जवाब दिया.

‘‘हां, आज तो आलम यह है कि जो लोग पहले ऊंची जाति के गुमान में रहते थे, वे भी आरक्षण के दायरे में आने के लिए आंदोलन कर रहे हैं. अब इसे क्या कहेंगे?’’ हरमन व्यंग्यात्मक मुसकान के साथ बोला.

सुभा चुप ही रही. वह विद्यार्थियों को अपना मत रखने देना चाहती थी.

नवल ने दुखी हो कर कहा, ‘‘इस से कुछ भी नहीं बदला, स्थिति आज भी सोचनीय है. हां, कभीकभी शोषक और शोषित की जाति बदल जाती है. किसी विभाग में उच्च अधिकारी निम्न वर्ग का होता है, तो वह सवर्ण जाति के अपने मातहतों का तिरस्कार करता है जैसे ऐसा करने से वह अपने पूर्वजों के अपमान का बदला ले रहा हो अथवा समाज में व्याप्त वर्ण व्यवस्था को चोट पहुंचा रहा हो,’’ गौतम उस की बात का जवाब देते हुए तुरंत बोल पड़ा, ‘‘अंधकार में यदि भूतों के भय से नेत्र बंद कर यदि तुम आराम पाते हो तो ऐसा ही सही, मैं तुम्हें नेत्र खोलने को नहीं कहूंगा. अपने मातहतों का अपमान करने वाला निम्नवर्ग का हो न हो दंभी अवश्य होता है. दफ्तरों में, विद्यालयों में यहां तक कि पूजास्थलों में भी दलितवर्ग को मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है.

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‘‘मैं बड़े शहरों की बात नहीं कर रहा. वहां शायद स्थिति अपेक्षाकृत संतोषजनक है. इस का कारण लोगों की सोच में बदलाव हो, यह ठीकठीक तो नहीं कह सकता, परंतु मीडिया का सशक्त होना अवश्य है. परंतु छोटे शहरों खासकर गांवों में स्थिति आज भी चिंतनीय है. आज भी पुकारने के लिए हम निम्न और उच्चवर्ग शब्द का इस्तेमाल करते हैं, आज भी हमारे फार्म में जाति का एक कालम है. आज भी इस देश के चुनाव जाति और धर्म के नाम पर लड़े और जीते भी जाते हैं. यही साबित करता हैं कि असमानता की यह खाई कितनी चौड़ी है.

‘‘अनुत्तरित नवल ने उस की बात का अनुमोदन करते हुए चुपचाप सिर हिला दिया.

अब तक शांत खड़ी सुभा ने हाथ के पन्नों को ठीक स्थान पर रख कर बोलना शुरू  किया, ‘‘चाहे वह तथाकथित उच्चवर्ण हो अथवा तथाकथित निम्नवर्ण, प्रभुता की लड़ाई में पलड़ा जिस ओर ज्यादा झकेगा, विद्रोह होगा. शोषक और शोषित वर्ग की भूमिकाएं बदलती रहेंगी. यह विद्रोह विनाश लाएगा, प्रत्युत इस विनाश में ही नवजीवन का विकास निहित है.

‘‘इस संगति की उन्नति किसी एक वर्ग की समृद्धि में नहीं वरन सभी वर्गों की सम्मिलित विकासन में है. कोई भी वर्ग किसी दूसरे वर्ग का शोषण कर समानता नहीं ला सकता, समानता के लिए बौद्धिक विकास अनिवार्य है,’’ इतना कह झक कर नवल के कंधे को सहसा हलका सा दबा कर हौल के बाहर चली गई. नवल मंत्रमुग्ध सा देखता रह गया.

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