आत्महत्या कर लूंगा, तुम मायके मत जइयो!

पति और पत्नी का संबंध पूरी जिंदगी का गठबंधन होता है. ऐसे में जब आसपास यह देखते हैं कि कोई महिला अथवा पुरुष इसलिए आत्महत्या कर लेता है कि उसके साथी ने उसे समझने से इंकार कर दिया तो आश्चर्य होता है. अगर प्रताड़ना का दौर कुछ ऐसा बढ़ा की पुरुष हो या फिर स्त्री जीवन साथी के सामने ही आत्महत्या के द्वारा अपनी इहलीला समाप्त करने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया तो बेहद दुख होता है. इस तरह की त्रासदी बहुत गंभीर होती है.

शादीशुदा पुरुष ऐसी कौन सी परिस्थितियां होती हैं जब गले में फंदा लगाकर आत्महत्या कर लेते हैं. हाल ही में छत्तीसगढ़ में ऐसी अनेक घटनाएं घटी हुई जिसमें पुरुषों ने अपनी पत्नी अथवा सांस पर आरोप लगाकर आत्महत्या कर ली.

ऐसे ही एक परिवार से जब यह संवाददाता मिला और चर्चा की तो अनेक ऐसे तथ्य खुलकर सामने आ गए जिन्हें समझना और जानना आज हरेक के लिए बहुत जरूरी है.

प्रथम घटना-

बिलासपुर में हाईकोर्ट के एक वकील ने आत्महत्या कर ली. सुसाइड नोट में लिखा कि वह पत्नी के व्यवहार से क्षुब्ध होकर आत्महत्या कर रहा है. वह अपनी धर्मपत्नी से प्रताड़ित हो रहा है.
राजनांदगांव जिला में एक व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली और सुसाइड नोट में लिखा कि उसे पत्नी की प्रताड़ना के कारण आत्महत्या करनी पड़ रही है.

जिला कोरबा के एक व्यापारी ने भी आत्महत्या कर ली जांच पड़ताल में यह तथ्य सामने आया कि उसका वैवाहिक जीवन सुखद नहीं था. पत्नी के व्यवहार के कारण उसने अपनी जान दे दी.

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रायपुर में पत्नी और सास से प्रताड़ित होकर एक शख्स द्वारा द्वारा आत्महत्या का मामला सुर्खियों में है. पुलिस द्वारा मिली जानकारी के अनुसार मौके से पुलिस को दो पन्नों का सुसाइड नोट मृतक के जेब से मिला है. कबीर नगर थाने मैं पदस्थ पुलिस अधिकारी के अनुसार मृतक ने अपनी मौत का जिम्मेदार अपनी पत्नी और सास को बताया है.

सुसाइड नोट में मृतक ने लिखा था कि उसकी पत्नी बार-बार घर में झगड़ा कर के अपने मायके चली जाती थी और दो साल की बेटी से भी मिलने नहीं दिया जाता था. जिसके कारण तनाव में आकर उसने आत्महत्या कर ली. मृतक का नाम मनीष चावड़ा था. जो तथ्य सामने आए हैं उनके अनुसार पत्नी अक्सर अपने मायके से संबंध रखे हुए थी.

जब पत्नी बार-बार पति को छोड़कर चले जाती है तो डिप्रेशन में आकर पुरुष आत्महत्या कर लेते हैं. ऐसी अनेक घटनाएं घटित हो चुकी है. ऐसे में यही कहा जा सकता है कि वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने के लिए पति और पत्नी दोनों एक दूसरे की भावना का सम्मान करते हुए यह जानने और समझने की दरकार है कि पूरी जिंदगी दुख सुख में साथ निभाना है. अगर यह बात गांठ बांध ली जाए तो आत्महत्या और तलाक अर्थात संबंध विच्छेद के मामलों में कमी आ सकती है.

आत्महत्या और संबंध विच्छेद के मामलों में आमतौर पर देखा गया है कि विवाह के पश्चात भी अपनी बेटी और बहन के साथ मायके वालों के गठबंधन कुछ ऐसे होते हैं कि पति बेचारा विवश और असहाय हो जाता है.

सामाजिक कार्यकर्ता इंजीनियर रमाकांत श्रीवास कहते हैं- यहां यह बात समझने की है कि बेटी के ब्याह के पश्चात मायके पक्ष को यह समझना चाहिए कि अब बेटी की विदाई हो चुकी है और जब तलक उसके साथ अत्याचार, अथवा प्रताड़ना की घटना सामने नहीं आती, छोटी-छोटी बातों पर उसे प्रोत्साहित करने का मतलब यह होगा कि बेटी के वैवाहिक जीवन में जहर घोलना.

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उम्र के इस पड़ाव में परिस्थितियां कुछ ऐसी मोड़ लेती है कि पति बेचारा मानसिक रूप से परेशान होकर आत्महत्या कर लेता है. और इस तरह एक सुखद परिवार टूट कर बिखर जाता है. कई बार देखा गया है कि बाद में पति की मौत के बाद पत्नी को यह समझ आता है कि उसने कितनी बड़ी भूल कर दी. अतः समझदारी का ताकाजा यही है कि जब हाथ थामा है तो पति का साथ दें और छोटी-छोटी बातों पर कभी भी परिवार को तोड़ने की कोशिश दोनों ही पक्ष में से कोई भी न करें.

सारे अवसर बंद हो गए

इस गुस्से की ट्रेनिंग कौन देता  है? अपने घर के बाहर मोटरसाइकिल पर स्टंट करने को मना करने पर 3 लड़कों ने एक 25 साला युवक को मारापीटा ही नहीं 28 बार चाकू मार कर दिनदहाड़े खुलेआम उस की हत्या कर दी. सभ्य समाज का दावा करने वाले पूजापाठी लोगों में से कोई राहगीर आगे नहीं आया कि इस अत्याचार को रोक ले. पुलिस ने इन तीनों को पकड़ लिया है पर ये शायद 18 साल से कम के हैं, हलकी सी सजा के बाद मुक्त हो जाएंगे.

दिल्ली के पास ही एक बोर्डिंग स्कूल में 14 साल की किशोरी ने आत्महत्या कर ली, क्योंकि उसे उस के साथी परेशान करते थे. स्कूल वालों ने उस का जल्दबाजी में दहन भी कर दिया ताकि ज्यादा पूछताछ न हो.

हम जो शिक्षा आज अपने किशोरों और युवाओं को दे रहे हैं उस में पूजापाठ तो बहुत है पर तर्क व सत्य की जगह नहीं है. एक सभ्य व उन्नत समाज के लिए यह आवश्यक है.

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भेड़चाल या नियमों को तोड़ने की प्रवृत्ति हर समाज में होती है पर जहां कहीं और रोमांच नहीं मिलता, वहां कुछ नया करने के लिए नहीं मिलता वहां घर या आसपास के नियम तोड़े जाते हैं.

आज हमारा समाज ऐसे माहौल में है जहां युवाओं और किशोरों के सामने घना अंधेरा है. लड़कियों का केवल शादी में भविष्य दिख रहा है तो लड़कों को केवल उद्दंडता व गुंडई वाली राजनीति में. कुछ करने के सारे अवसर बंद हो गए हैं.

आधुनिक तकनीकों के कारण आज भूखा तो कोई नहीं रहता पर यह जवान होते लोगों के लिए काफी नहीं है. उन्हें कुछ करने की इच्छा होती है पर न बैकपैक बांध कर पहाड़ पर चढ़ने की सुविधा है न नदियां, समुद्र पार करने की. जो पढ़ाई कराई जा रही है वह इतनी छिछली है कि अधिकांश किशोर व नवयुवक पढ़ भी नहीं सकते और किताबों का रोमांच भी उन से दूर है.

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रहासहा मोबाइल है, जिस में टिकटौक जैसे ऐप पर वे नाचगा कर अपने करतब दूसरों को दिखा पाते हैं. पर यह नाकाफी है. लाइक्स से जिंदगी नहीं बनती. आसपास के लोगों की आबादी की कमी थोड़े से डिवाइस के नाटकों से पूरी नहीं हो सकती.

हत्या कर कानून हाथ में लेना, डिप्रैस होना, आत्महत्या करना एक बड़ी समस्या का अंग है. अफसोस है कि कर्जधारों को इस की चिंता नहीं है.

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