job switch : जब नई नौकरी मिलने से हरकोई खुश होता है तो फिर मनीष अपनी नई जौब में खुश क्यों नहीं है? वह भी तब जब नई जौब में सैलरी भी ज्यादा मिल रही है. इस का कारण यह है कि उसे पुरानी जौब की याद आती रहती है. दरअसल, एक छोटी सी बहस के चलते मनीष ने नौकरी छोड़ दी, जिस के बाद उसे अच्छी सैलरी के साथ नई नौकरी भी मिली. पहले बड़ी सैलरी को ले कर मनीष बहुत खुश रहा लेकिन कुछ समय बाद उसे पुरानी नौकरी की याद आने लगी. वहां के माहौल की, लोगों की. उसे महसूस हुआ कि नौकरी भले कम सैलरी की थी लेकिन वहां सुकून तो था जो उसे यहां नए में माहौल में नहीं मिल रहा है. कभीकभी तो उसे यहां यह भी लगता है कि जैसे उस के काम या विचारों का भी कोई दर्जा नहीं.

छोटीछोटी बातों और मामूली विवाद पर नौकरी छोड़ना अब आम बात बनती जा रही है खासकर जैन जी में यह अधिक देखने को मिल रहा है. कोई बात हुई नहीं, काम का प्रैशर थोड़ा बढ़ा नहीं कि वह नौकरी छोड़ने का तय कर लेती है. इसलिए आज बहुत सी कंपनीज बड़ी पोस्टों पर जैन जी को नियुक्त नहीं कर रही हैं.

एक सर्वे के अनुसार तो जैनरेशन जैड के 93% तक युवा पर्सनल इंटरव्यू में नहीं जाते और 87% नौकरी को स्वीकार करने के बाद पहले दिन से पहले ही गायब हो जाते हैं. अब इस तरह की अनुपस्थिति तो सिर्फ गैरजिम्मेदार होने का ही प्रमाण देती है.

क्यों नहीं टिकता कैरियर

इस का बहुत बड़ा कारण उन में धैर्य, चिंतन और आकलन यानी पेशैंस, क्रिटिक थिंकिंग और इवैल्यूएशन की कमी है और फिर यही कमियां नौकरी मिलने पर भी उन का कैरियर टिकने नहीं देतीं. किसी भी समस्या और उस पर लेने वाले फैसलों को धैर्य के साथ सोचविचार करने के बजाय उस के सभी अच्छेबुरे पहलुओं को अनदेखा कर सीधे नौकरी छोड़ देने की प्रवृत्ति उन में बढ़ती जा रही है, जिस कारण उन्हें बाद में बहुत परेशानी का सामना करना पड़ता है जैसे:

बिना दूसरी नौकरी ढूंढ़े पहली छोड़ देना, जिस से व्यक्ति नौकरी के अभाव में कुछ समय तक या लंबे समय तक बेरोजगार बैठा रह सकता है, जो उसे हर दिन उस की गलती का गहरा एहसास कराता है.

दूसरी नौकरी मिल तो गई लेकिन वहां सैलरी पहले से कम और वर्कलोड उतना ही या उस से ज्यादा ही है.

द्य फिर यह कि सैलरी भी ठीक है या पहले से ज्यादा ही है मगर पहली नौकरी की तरह माहौल नहीं, लोगों का साथ नहीं, आप की आइडियोलौजी का वहां से मैच नहीं.

नौकरी बदलने से पहले सोचें

कई बार बड़ी सैलरी मिलने के बाद इन चीजों की कमी खलती है. मन में यह भी खयाल आता है कि सैलरी कम ही सही लेकिन वहां सुकून तो था. कई बार वापस जाने का मन भी करता है. मगर या तो आप ने अपने अहं में आ कर वापसी के रास्ते बंद कर दिए होते हैं या फिर रास्ते उन्होंने बंद कर दिए होते हैं. इसलिए किसी आवेग में आ कर नौकरी नहीं छोड़नी चाहिए. यदि कोई दिक्कत, शिकायत या परेशानी है तो उसे बैठ कर सुल झाने का प्रयास कीजिए. हड़बड़ी में या आवेश में कोई फैसला न करें. समय लें सोचें, विचारविमर्श करें उस के बाद ही कोई फैसला लें और यदि नौकरी छोड़नी ही है तो इस्तीफे को सकारात्मक रूप से प्रस्तुत करें ताकि भविष्य में आप के लिए संबंध खराब न हों और वापस आने का रास्ता भी बंद हो जाए.

अब यदि पुरानी नौकरी में वापस जाना ही है तो क्या करें:

पहले तो देखें आप ने नौकरी छोड़ी क्यों थी? क्या वह कारण मान्य था? अगर हां तो क्या वह कारण या परेशानी अब सुल झ चुकी है, तो ही वापस जाने का अर्थ बनता है अन्यथा नहीं.

दूसरा पहलू यह कि यदि कारण गंभीर नहीं था या आवेश में लिया गया फैसला था या कोई हड़बड़ी तो पहले पुरानी जगह का माहौल पता करें. पता करे कि टीम, लीडर्स ने आप के फैसले को या अनुचित व्यवहार को भुलाया है या नहीं या भुलाना चाहते हैं या नहीं. यह जानने में आप की आप के पुराने सहकर्मी मदद कर सकते हैं.

जब पुराने औफिस जाना पड़े

अब यहां गौर करने वाली एक और बात है कि यदि पुराने औफिस में सब ठीक हो लेकिन आप को ही वापस जाने में कोई हिचक, शर्म या कोई भय कचोट रहा हो तो अब क्या करें? ऐसे में मन को सम झाएं, आप के लिए क्या सही है. उसे ध्यान में रख कर आगे बढ़ें. संकोच तो होगा ही लेकिन पहल करना भी जरूरी है खासकर तब जब गलती या गलत फैसला आप की तरफ से हुआ हो. यहां और भी अच्छा होगा कि आप कुछ नई स्किल सीख कर जाएं ताकि आप की बात, आप की पहल में थोड़ी गंभीरता, वजन दिखाई दे.

यदि संकोच, हीनता के भाव, पुराने बौस और टीम के शांत होने तक के इंतेजार से बचना है तो मन को शांत रखें, अपनी परेशानी को विचारविमर्श से दूर करने की कोशिश करें और नौकरी न छोड़ें.

किताबें जरूर पढ़ें

अच्छा होगा कि आप यहां किताबों और पत्रिकाओं को भी पढ़ें. आज बहुत से अच्छे लाइफ कोच, पर्सनैलिटी डैवलपमैंट, पीपल मैनेजमैंट, टीम वर्किंग आदि पर बहुत सी किताबें और आर्टिकल्स मौजूद हैं, जिन में से कुछ किताबे हैं–‘हाउ टू विन फ्रैंड्स ऐंड इन्फ्लुएंस पीपल,’ ‘एटामिक हैबिट्स,’ ‘थिंकिंग, फास्ट ऐंड स्लो.’ इस तरह की किताबें लेखकों ने रिसर्च, मंथन और कड़े अनुभव के आधार पर लिखी होती हैं न कि आज के चल रहे बेतुके सोशल मीडिया के ट्रेंड पर. जहां रील्स पर हजारों लाइक तो हैं, इन्फ्लुएंसर के हजारों फौलोअर्स भी हैं लेकिन अनुभव और वास्तविक ज्ञान शून्य. इसलिए इन की ट्रेंडिंग रील्स जैसे बौस से बदला, जौब को टाटा बायबाय वाली के  झांसे में न पड़ें क्योंकि ये रील्स वाले न तो आप के आंसू पोंछने आएंगे और न ही घर में राशन भरने.

आज वैसे भी टैक्नोलौजी और डिजिटलाइजेशन के बढ़ते चलन और उपयोग से बहुत से क्षेत्रों में नौकरियां कम हो चुकी हैं. इसलिए सोचसम झ कर कदम आगे बढ़ाएं न कि आवेश या गलतफहमी में.