Education: अब रेगुलर बीए, एमए करने से कोई फायदा नहीं है

Education: एक समय था जब बीए और एमए जैसे डिग्री को समाज में सम्मान, स्थिरता और सुरक्षित भविष्य की गारंटी माना जाता था. माता-पिता गर्व से कहते थे - “बच्चा एमए कर रहा है”, और यह वाक्य ही उसकी सामाजिक हैसियत तय कर देता था. लेकिन आज उसी वाक्य के साथ एक सवाल जु

February 28, 2026

राइटर – नसीम अंसारी कोचर
एक समय था जब बीए और एमए जैसे डिग्री को समाज में सम्मान, स्थिरता और सुरक्षित भविष्य की गारंटी माना जाता था. माता-पिता गर्व से कहते थे – “बच्चा एमए कर रहा है”, और यह वाक्य ही उसकी सामाजिक हैसियत तय कर देता था. लेकिन आज उसी वाक्य के साथ एक सवाल जुड़ गया है – “फिर करेगा क्या?”

यह सवाल केवल किसी एक छात्र का नहीं, बल्कि पूरे भारतीय शिक्षा तंत्र के खोखलेपन का आईना बन चुका है. हर साल लाखों छात्र रेगुलर बीए और एमए की डिग्री लेकर विश्वविद्यालयों से निकलते हैं. मगर बाजार में उनके लिए न तो पर्याप्त नौकरियां हैं, न ही उनकी पढ़ाई ऐसी है जो उन्हें काम के लायक बनाती हो. नतीजा यह है कि डिग्री हाथ में है, लेकिन हुनर से खाली बेरोजगारों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. बीए, एमए करके युवा जोमाटो जैसी कंपनियों में डिलीवरी बॉय बन रहे हैं या किसी कोरियर कंपनी में पत्रों और सामान की छंटाई के काम में लगे हैं.

राजेश वर्मा एमए इकोनॉमिक्स करके लखनऊ के एक मॉल में सेल्समैन का काम कर रहा है. यह राजेश की सातवीं नौकरी है. इससे पहले उसने एक बड़ी दुकान में कैश काउंटर संभाला, ऑटो चलाई और कुछ दिन एक प्राइवेट ठेकेदार के साथ भी काम किया . मगर अभी तक 15 हजार रुपये महीने से ज्यादा इनकम नहीं हुई.

दिल्ली में कितने ही बीए-एमए पास लड़के ई-रिक्शा या ऑटो-टैक्सी चला रहे हैं. खाने का ठेला लगाए खड़े हैं. बीए पास लडकियां 7-8 हजार रुपये महीने पर कूरियर कंपनी में काम कर रही हैं या किसी ब्यूटी पार्लर में लोगों के हाथ पैर साफ़ कर रही हैं. कहने का तात्पर्य यह कि आज बीए-एमए की कोई वैल्यू नहीं रही. सरकारी नौकरियों में सीटें सीमित हैं, प्रतियोगी परीक्षाएं जुए जैसी हो गई हैं और निजी क्षेत्र डिग्री से ज्यादा स्किल पूछ रहा है. ऐसे में रेगुलर बीए-एमए सिर्फ एक काग़ज़ी उपलब्धि बनकर रह गई है.

एशिया वर्ल्ड एजुकेशन (AWE ) नाम की शैक्षणिक संस्था की निदेशक रेखा बंसल जो विगत 24 वर्षों से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत हैं, कहती हैं, ”बीए-एमए क्या आज तो एमबीए पास बच्चे भी बेरोजगार घूम रहे हैं. मैं एमबीए को ‘महा-बीए’ कहती हूँ, क्योंकि आज हर शहर में दर्जनों एमबीए कॉलेज खुल गए हैं, जो ज्यादा से ज्यादा बच्चों को एडमिशन देने के लिए लालायित रहते हैं. पर क्या जो एमबीए अधिकतर कॉलेज दे रहे हैं वो वाकई में मास्टर ऑफ़ बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन है? पढाई के नाम पर सिर्फ रस्म अदायगी होती है. अगर देश के कुछ नामचीन प्रबंधन संस्थानों को छोड़ दें तो इन तमाम संस्थानों से डिग्री लेकर निकलने वाले बच्चों को अगर कहीं जॉब मिल भी जाए तो उनकी एवरेज सैलरी कुछ हजार रुपये भर की होती है.

गौरतलब है कि भारत के अधिकतर विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाने वाला सिलेबस दशकों पुराना है. वहीं दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा, डिजिटल मीडिया, पॉलिसी एनालिसिस और क्रिएटिव इकॉनमी की ओर बढ़ चुकी है. बीए-एमए में अब भी वही घिसे-पिटे सिद्धांत, वही रटी-रटाई परिभाषाएं और वही परीक्षा-केंद्रित पढ़ाई होती है.न प्रैक्टिकल एक्सपोज़र, न इंडस्ट्री कनेक्शन, न फील्ड ट्रेनिंग. यहाँ छात्र पढ़ता है, लेकिन सीखता कुछ भी नहीं है.

रेखा बंसल सुझाव देती हैं, ”आज बहुत जरूरी है कि छात्र क्लासरूम स्टडी के अलावा भी खुद को किसी विशेष क्षेत्र में कुशल बनाएं. इसके लिए वे ऑनलाइन प्रोफेशनल कोर्स कर सकते हैं. विश्व के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जैसे हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड अदि मुफ्त ऑनलाइन कोर्स चलाते हैं. आप कहीं से भी अपनी रुचि का व्यावसायिक कोर्स चुन कर इनके पाठ्यक्रमों में एडमिशन ले सकते हैं. उदाहरणार्थ अगर आप हार्वर्ड +फ्री ऑनलाइन कोर्स गूगल करेंगे तो आप को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा मुफ्त कोर्सेज की सूची मिल जाएगी.

रेखा कहती हैं – ”आज का रोजगार बाजार तीन चीज़ें मांगता है – स्किल, अनुभव और समस्या सुलझाने की क्षमता. रेगुलर बीए-एमए इनमें से किसी की भी ठोस गारंटी नहीं देता है. नतीजतन, छात्र 22–24 साल की उम्र में डिग्री लेकर निकलता है, फिर कोचिंग, प्रतियोगी परीक्षा और बेरोजगारी के चक्र में फंस जाता है. यह वह उम्र होती है जब दुनिया के दूसरे देशों में युवा स्टार्टअप चला रहे होते हैं, रिसर्च कर रहे होते हैं या इंडस्ट्री में खुद को साबित कर रहे होते हैं.”

यह कहना कठोर है, लेकिन सच के करीब है कि आज रेगुलर बीए-एमए कई मामलों में समय और संसाधनों की बर्बादी है, खासकर उन छात्रों के लिए जिनके पास न आर्थिक सहारा है, न पारिवारिक बैकअप. तीन से पांच साल की पढ़ाई के बाद भी अगर छात्र आत्मनिर्भर नहीं बन पाता, तो उस शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है.

इसका मतलब यह नहीं कि पढ़ाई बेकार है. यह साफ करना ज़रूरी है कि समस्या ज्ञान में नहीं, ढांचे में है. समस्या बीए-एमए की अवधारणा में नहीं, उसके रेगुलर, पुराने और बाजार-विच्छिन्न स्वरूप में है. जबकि आज ज़रूरत है मल्टी-डिसिप्लिनरी पढ़ाई की, इंटर्नशिप और फील्डवर्क की, स्किल-बेस्ड कोर्सेज़ की, रिसर्च, क्रिएटिविटी और आलोचनात्मक सोच की. बिना इसके, कोई भी डिग्री सिर्फ एक प्रमाणपत्र भर रह जाती है.

इसीलिए आज का युवा ऑनलाइन कोर्स की और ज्यादा आकर्षित हो रहा है. वह स्टार्टअप्स की ओर जा रहा है. फ्रीलांसिंग, कंटेंट, डिजाइन, डेटा और टेक स्किल सीखना चाहता है. पारंपरिक डिग्री से ज्यादा सीखने की प्रक्रिया पर छात्रों का भरोसा बढ़ रहा है. यह शिक्षा के खिलाफ विद्रोह नहीं है, बल्कि बेकार शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ एक शांत क्रांति है.

आज जरूरत है रेगुलर बीए-एमए को प्रासंगिक बनाए रखना. उसे नौकरी-मुखी नहीं, जीवन-मुखी बनाना होगा. उसे किताबों से बाहर, समाज और बाजार से जोड़ना होगा. वरना आने वाले समय में यह डिग्रियां न सम्मान दिलाएंगी, न रोजगार और न ही आत्मविश्वास. तब इतिहास यही लिखेगा – डिग्रियां थीं, लेकिन भविष्य नहीं था.