फिल्म मेकर ऐंड कम्युनिकेशन में करियर बनायें

अगर पेरैंट्स को लगता है कि उन की बेटी अच्छा लिखती है तो आप उस को स्क्रीन राइटिंग पढ़ाओ क्योंकि हर प्रोड्यूसर को अच्छी कहानी लिखने वाला चाहिए...

March 3, 2026

अगर पेरैंट्स को लगता है कि उन की बेटी अच्छा लिखती है तो आप उस को स्क्रीन राइटिंग पढ़ाओ क्योंकि हर प्रोड्यूसर को अच्छी कहानी लिखने वाला चाहिए

फिल्म मेकर ऐंड कम्युनिकेशन स्पैशलिस्ट
सुनीति घोषाल भिलाई टाउन से सपनों की उड़ान भरने वाली वे महिला हैं, जिन्होंने न्यूयौर्क फिल्म ऐकैडेमी से पढ़ाई करने के बाद आज वहां के स्टूडैंट्स को एक निर्देशक के रूप में फिल्म मेकिंग सिखा रही हैं.
गृहशोभा का यह ऐजुकेशन सेगमैंट आज सुनीति के जीवन के असली फिल्मी सफर को देखते हुए कुछ ऐसे किस्सों और सीख को सामने लाएगा, जिन से कि कैरियर की ओर बढ़ते हुए स्टूडैंट्स को अपने जीवन में कुछ सीखने  समझनें को मिल सके.


मातापिता और बचपन के बारे में कुछ बताएं?
मेरा प्रारंभिक जीवन भिलाई, छत्तीसगढ़ में रहा. मेरे पिता स्टील प्लांट में इंजीनियर थे. मां होममेकर थीं लेकिन बाद में उन्होंने टीचिंग शुरू की. हम 3 भाईबहन हैं. भिलाई एक छोटा टाउन था, जहां सब का जीवन स्टील प्लांट के इर्दगिर्द ही था. कहें तो टाउन में हर अगला घर इंजीनियर या डाक्टर का था. मेरी मां ने थिएटर में पीएचडी की थी तो हमारा घर संगीत और कला से भरा हुआ था. मेरी बहन ने शास्त्रीय गायन सीखा था. मैं ने कई सालों तक भरतनाट्यम सीखा. इसलिए हम सांस्कृतिक पक्ष से भी बहुत परिचित थे. मगर बड़े होने पर प्रैशर था कि आप को सफल होना है तो इंजीनियर या डाक्टर बनना है क्योंकि उस समय यही प्रचलित थे.


आप की प्रारंभिक शिक्षा कहां से हुई?
12वीं तक मैं ने स्कूलिंग भिलाई के स्टील प्लांट स्कूल से की. फिर मैं ने रायपुर की रविशंकर यूनिवर्सिटी से ग्रैजुएशन की और मुंबई में सोफिया पौलिटैक्निक से पोस्ट ग्रैजुएशन की. मैं ने मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की. इस के पीछे भी एक कहानी है. दरअसल, उस समय मैं ने प्रीतीश नंदी को एक पत्र लिखा जो उन दिनों इलस्ट्रेटेड वीकली नामक पत्रिका के संपादक थे. मैं ने उन्हें लिख कि मैं ने इंजीनियर बनने के लिए कोई भी प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की है.


मेरे मातापिता मुझे शिक्षक बनाने जा रहे हैं, मगर मैं शिक्षक नहीं बनना चाहती. आप क्या सलाह देते हैं? मुझे क्या करना चाहिए? तब मेरे पत्र में मेरे लेखन को देख प्रीतीश नंदी के कार्यालय से शारोना गांधी नामक एक महिला ने मुझे भिलाई में पत्र लिख कर सुझा दिया कि मैं मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रैजुएशन करूं और मैं बोम्बे चली गई. जब मेरे पिता को पता चला कि मैं ने प्रीतीश नंदी को पत्र लिखा था, तब उन्होंने भी मेरी इस पहल में मेरा साथ दिया.
सोफिया पौलिटैक्निक में हमारे जेरू मुल्ला नामक एक उत्कृष्ट शिक्षक थे, जिन्होंने वास्तव में हमें सिखाया था कि बोलने से पहले या संवाद करने या लिखने से पहले सुनो, देखो क्योंकि बहुत सी चीजें आप जानते हैं जो हम देखते हैं वह सतह पर होती हैं. असली वह होता है जिसे आप बैकस्टोरी कहते हैं.
न्यूयौर्क फिल्म ऐकेडेमी ने मु? और बेहतर बनाया. वह ऐकेडेमी आप के दिमाग खोलती हैं कि आप किसी फिल्म को कैसे सम?ोंगे यानी आप की क्षमता को बढ़ाती है. वहां शिक्षक आप को पूरी आजादी देते हैं अलगअलग तरीके से सीखने को, अपना काम पेश करने को. मैं ने वहां निडर हो कर प्रयोग करना सीखा. यह आप की रचनात्मक क्षेत्र में मदद करता है.


विज्ञापन निर्माण में काम करने के बाद फिल्मों की तरफ वापस कैसे आईं?
जब मुंबई आई तो मुझे जर्नलिस्ट बनना था. उन मुद्दों के बारे में लिखना था जो माने रखते हैं. एक बार कालेज से हमें लियो बर्नेट नामक एक विज्ञापन एजेंसी में भेज गया. उन दिनों इसे चैत्रा लियो बर्नेट कहा जाता था, और हम एक अभियान से गुजरे. हम ने जिंगल की रिकौर्डिंग की, हम एक एडिटिंग स्टूडियो से गुजरे. यह सब बहुत तेज था और इस ने मुझे पूरी तरह से बदल दिया.
मुझे एहसास हुआ कि मैं स्क्रिप्ट लिखना चाहती हूं. मुझे फिल्म निर्माण में शामिल होना था. मैं ने ग्रैजुएशन के बाद वास्तव में नौकरी की तलाश शुरू कर दी. मुझे सब से पहले एक प्रोडक्शन नौकरी मिली जो प्रतिदिन सौ रुपए देती थे. फिर मैं ने एक यूटीवी शो लिखा. उस के बाद मैं ने स्वोर्ड आफ टीपू सुल्ताननामक सीरीज के लिए संजय खान के साथ काम किया.
ये सब मेरी फिल्म के टर्निंग पौइंट्स रहे. फिर जब मुझे फिल्मअजूबामें सहायक निर्देशक के रूप में शशि कपूर के साथ काम करने का मौका मिला तो बहुत कुछ बदल गया. यहां एक छोटी कहानी भी है कि भिलाई स्टील प्लांट रूसियों द्वारा बनाया गया है. वहां रहने वाले रूसी पत्नियों के घर, मेरे मातापिता विशेष रूप से मेरी मां, रूसी भाषा सीखने के लिए भेजते थी. अबअजूबाएक इंडोसोवियत फिल्म थी और काम इसलिए मिला क्योंकि मैं रूसी बोल सकती थी. इस से साबित होता है कि जीवन में आप जो भी सीखते हैं वह कभी व्यर्थ नहीं जाता.
शशि कपूर हमेशा कहते थे कि यदि आप किसी ऐसी चीज में काम करते हैं जिस में आप वास्तव में आनंद लेते हैं तो आप उसी पर टिके रहेंगे. यही कारण है कि विज्ञापन निर्माण में काम करने के बाद कुछ समय बाद मुझे एहसास हुआ कि वास्तव में मुझे फिल्म निर्माण में आनंद मिलता है और मैं इस में वापस गई.


प्रोडक्शन हाउस शुरू करने के बारे में कैसे सोचा?
मुझे लगता है कि भिलाई ने बचपन से जो मुझे सिखाया है वह यह है कि आप हार नहीं मान सकते. जब मैं ने एक अपना प्रोड्क्शन हाउस शुरू किया तो क्लाइंट पैसे नहीं चुकाता था. मुझे सैलरी देनी होती थी. कभी फिल्म बनाने के बाद क्लाइंट का मन बदल गया, उस ने पैसे नहीं दिए और आप नए हैं तो बैंक लोन नहीं देता.
ऐसी तमाम तरह की दिक्कतें थीं लेकिन मैं ने बस हार मानना सीखा. धक्के खाने की आदत हो गई थी. और इस से सीखने की भी कि आगे क्या होगा, कैसे होगा, किस तरह से आप की फिल्में बेहतर दिखेंगी कि आप के क्लाइंट आप से अधिक खुश होंगे.


आज के निर्देशक को क्या कहना चाहेंगी?
 आज के निर्देशक में भावनात्मक जुड़ाव या अच्छी कम्युनिकेशन स्किल्स का होना जरूरी है. यहां कम्युनिकेशन स्किल्स से मेरा मतलब मीडिया को अच्छा इंटरव्यू देने से नहीं है बल्कि अपनी बात अपनी टीम तक पहुंचाना है क्योंकि जब आप टीम से अच्छे से बात करोगे, विचार करोगे तो टीम में एकता होगी. यह एक बहुत ही टीम वर्क वाला पेशा है. इसलिए जितना अधिक आप अपनी टीम के साथ संवाद करने और उन्हें एकजुट रखने में अच्छे होंगे, उतना अधिक आप सफल होंगे.


आप के अनुसार फिल्म मेकिंग इंडस्ट्री में कितना स्कोप है?
आज फिल्म मेकिंग इंडस्ट्री में स्कोप बहुत बढ़ गए हैं. ओटीटी प्लेटफार्म गया, लैंग्वेज बैरियर भी नही रहे. पंजाबी ऐक्ट्रैस तमिल भी कर रही हैं, तमिल ऐक्टर हिंदी फिल्म. जिस के पास क्रिएटिविटी है उस के लिए बहुत सारी जौब्स हैं.
 पेरैंट्स को कि जो प्रोड्यूसर पैसे लगा रहा है वह पैसे इसलिए लगा रहा है ताकि उसे प्रौफिट मिले और इस के लिए उसे टैलेंट चाहिए. फिर वह लड़का हो या लड़की हो.
अगर पेरैंट्स को लगता है कि उन की बेटी अच्छा लिखती है तो आप उस को स्क्रीन राइटिंग पढ़ाओ क्योंकि हर प्रोड्यूसर को अच्छी कहानी लिखने वाला चाहिए. जिन को डर रहता है कि फिल्म इंडस्ट्री में हैरेसमैंट है तो यह आज हर सैक्टर में है. इस वजह से आप अपनी लड़कियों को आगे नहीं बढ़ने देंगे तो यह भी गलत है. पेरैंट्स को चाहिए कि अपने बच्चों को मजबूत बनाएं. उन्हें बताएं कि अगर ऐसी परेशानी आए तो उन्हें किस तरह उस का सामना करना चाहिए बजाय इस के कि बोलें कि बाप रे यह लाइन खराब है, यहां मत जाओ.


सिनेमा में वूमन ऐंपावरमैंट को बहुत अधिक वायलैंस के साथ दिखाया जाता है. इस बार में आप की राय क्या है?
सिनेमा का वूमन ऐंपावरमैंट में हमेशा से एक अच्छा रोल रहा है. मगर कुछ समय से मैं देख रही हूं कि हमारे सिनेमा में वूमन ऐंपावरमैंट को बहुत अधिक वायलैंस के साथ पेश किया जा रहा है, जहां एक पुरुष मारधाड़ कर सुपर हीरो बन रहा है. अगर मेरी 4 साल की बच्ची हो और वह इंडियन पुरुष का यह रूप देखे कि वह मारपीट कर घर रहा है और उस की पत्नी उस का स्वागत कर रही है और इस वायलैंस के साथ उसे अपना रही है उस क्या असर पड़ेगा.
वह यही सोचेगी कि सारे इंडियन पुरुष ऐसे ही होते हैं. सिनेमा हमेशा से ऐसे टूल की तरह है, जहां से बच्चे कुछ कुछ सीख लेते हैं. इसलिए हमें ध्यान रखना होगा कि बच्चा क्या देख रहा है. वूमन ऐंपावरमैंट का मतलब यह नहीं कि वह पुलिस इंस्पैक्टर का रोल ही करना है.

कैरियर और बच्चों को एकसाथ कैसे संभालती हैं?
मु? लगता है कि औरतों से अच्छा मल्टीटास्किंग कोई भी नहीं कर सकता है, इसलिए हस्बैंड, मदर, सिस्टर, मदर इनला, बाकी के लोग क्या कहेंगे मत सोचो. तुम कैरियर और बच्चे दोनों संभाल सकती हो. बस यह ध्यान रखें कि जब औफिस में हैं तो पूरा ध्यान काम पर देंगी और जब बच्चों के साथ हैं तो बच्चों को अपना समय देंगी. बच्चे की स्कूल की छुट्टी है. सारा दिन वह क्या करेगा यह सोच तुम भी औफिस जाओ. यह गलत है. इस का बंदोबस्त कर के जाओ. दोस्तों या रिश्तेदारों से हैल्प लो.


आज की यंग जैनरेशन के लिए क्या संदेश देना चाहेंगी?
तुम्हारी आईडैंटिटी क्या है? तुम्हें क्या पसंद है? तुम किस में अच्छे हो और अपनी मेहनत किस पर दे सकते हो? इन सब को सोच कर अपने कैरियर का चयन करो. जिस में भी तुम अच्छे हो उस में अपना हार्डवर्क दो क्योंकि बिना हार्डवर्क के कुछ भी नहीं मिलता.
दूसरा मैं स्टूडैंट्स से यह बोलना चाहती हूं कि जो मैं अपने बच्चों और अपनी टीम को भी बोलती हूं कि टिक जाओ जैसे एक सोल्जर बौर्डर पर टिक जाता है, पूरा जोश दिखाता है, गिवअप नहीं करता ठीक वैसे ही तुम भी टिक जाओ. कैरियर में बौस चिल्ला रहा है किसी और को प्रमोशन मिल रही है या तुम्हारे अच्छे नंबर नहीं रहे हैं तो भी गिवअप नहीं करो क्योंकि जो टिकता है वही आगे निकलता है.
आज की यंग जैनरेशन लिटिल पेशंस है. साथ ही इसे व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी पर मिलने वाली इन्फौरमेशन की सचाई और गंभीरता समझ नहीं आती है. इसलिए पहले उस इन्फौरमेशन की सही जांच करें देखें कि भेजने वाले का सोर्स क्या है, क्या सचाई है इस में. इसलिए मिली जानकारी पर पेशंस दिखाओ और किसी का भी इन्फौरमेशन को सच मान कर बिलीव करो.            

क्विक इंट्रो


जन्मस्थान : भिलाई
ऐजुकेशन : भिलाई स्टील प्लांट स्कूल, रविशंकर यूनिवर्सिटी, रायपुर, सोफिया पौलीटैक्निक, मुंबई, न्यू यार्क फिल्म एकैडमी
प्रोफेशन : फिल्म मेकर × कम्युनिकेशन स्पैशलिस्ट
लर्निंग :
अगर क्रिएटिविटी है तो फिल्म मेकिंग में बहुत स्कोप है. ओटीटी के जाने से औप्शंस बढ़ गए हैं.
स्क्रीन राइटिंग, कैमरा, एडिटिंग जैसे कई औप्शंस हैं और इन की ट्रेनिंग किसी भी अच्छे इंस्टीट्यूट से की जा सकती है.
 मौडर्न टूल्स के साथ अपनी क्त्रिएटिव स्किल्स को हमेशा अपडेट रखना जरुरी है.