Scientist Nigar Shazi Interview: दहकते सूरज को भेदने वाला दिमाग
आखिरकार वह दिन आ गया, जब निगार शाजी को इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (इसरो) ने भारत के पहले सौर मिशन ‘आदित्य - L1’ का प्रोजेक्ट डायरेक्टर बनाया.
साइंटिस्ट निगार शाजी : भारत के पहले सौर मिशन की प्रोजेक्ट डायरेक्ट
जमीं पर काम करने वाले किसान की नन्ही बेटी निगार अपनी गहरी आंखों से आकाश को टटोलती थी. उसे ऐसा लगता था मानो सूरज, चांद, सितारों को अपने दामन में समेटने वाला दूर तक फैला आकाश खामोशी से उसे अपनी ओर बुलाता है. दिन बीता, महीने बीते, और बीते कई साल… और आखिरकार वह दिन आ गया, जब निगार शाजी को इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (इसरो) ने भारत के पहले सौर मिशन ‘आदित्य – L1’ का प्रोजेक्ट डायरेक्टर बनाया.
यह मिशन साल 2023 में PSLV- C 57 रॉकेट की मदद से सूर्य की स्टडी के लिए लॉन्च किया गया. आज ‘आदित्य – L1’ की मदद से सूरज के वायुमंडल की स्टडी की जा रही है, सौर तूफानों का पूर्वानुमान लगाया जा रहा है, साथ ही सौरमंडल के कई अनसुलझे रहस्यों की गुत्थी को प्रयोगशाला में सुलझाने की कोशिश की जारी है.
इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट की डायरेक्टर के तौर पर साइंटिस्ट निगार शाजी का चुना जाना इस देश की लाखों लड़कियों, महिला वैज्ञानिकों, साइंस स्टूडेंट्स के लिए एक इंस्पायरिंग मोमेंट था. ‘गृहशोभा’ ने निगार शाजी से एजुकेशन, यूथ के करियर, साइंस में संभावनाएं, एआई और जॉब्स को लेकर खास बातचीत की, जिसका प्रमुख अंश यहां दिया जा रहा है.
सवाल – आप एक ऐसी वैज्ञानिक हैं जिनकी उपलब्धियों पर पूरा देश गर्व करता है, क्या आपके जीवन में कोई ऐसा वैज्ञानिक रहा, जिसने आपके भीतर गहरा प्रभाव छोड़ा?
जवाब – (गंभीर आवाज के साथ) मेरे पिता मैथेमेटिक्स ग्रेजुएट थे. बचपन में अकसर साइंटिस्टस और फिलॉस्फर्स की कहानियां सुनाया करते थे. उन्हीं की वजह से मेरे अंदर विज्ञान के प्रति रुचि पैदा हुई. वह अक्सर मैरी क्यूरी (रेडियम की आविष्कारक) के बारे में बताते थे, इसलिए स्कूल के दिनों से ही वह मेरी रोल मॉडल बन गई थीं.
मेरे पिताजी बताते थे कि गर्भवती होने के दौरान भी मैरी क्यूरी ने लंबे समय तक काम किया. रेडियम निकालने का प्रोसेस बहुत ही कठिन काम था, इसके लिए उन्हें भारी मात्रा में यूरेनियम को प्रोसेस करना पड़ता था. मैरी क्यूरी का समर्पण, मेहनत और लक्ष्य के प्रति जुनून ने मुझे साइंटिस्ट बनने को प्रेरित किया. मेरा मानना है कि हर किसी के जीवन में एक लक्ष्य होना चाहिए और उसे पाने के लिए उसी दिशा में मेहनत करनी चाहिए.
सवाल – आज के समय में गणित और फिजिक्स को कठिन विषय माना जाता है. क्या आप इससे सहमत हैं?
जवाब – नहीं, मैं इससे सहमत नहीं हूं. यह सालों से चला आ रहा एक तरह का मिथक है. मैं दूसरे सब्जेक्टस की तुलना में मैथेमेटिक्स को आसान समझती हूं. मुझे तो स्कूल के दिनों में गणित का एग्जाम देना अच्छा लगता था, क्योंकि इसमें न तो अधिक रटने की जरूरत पड़ती थी और न ही अधिक पढ़ने की. अगर आप गणित के लॉजिक समझ लें, तो यह बहुत आसान सब्जेक्ट मालूम पड़ता हो है.
आज गणित और फिजिक्स जैसे सब्जेक्ट्स, पेरेंट्स घर पर नहीं पढ़ा सकते हैं ऐसे में क्या कोचिंग संस्थान मददगार हो सकते हैं ?
बेसिक तैयारी पेरेंट्स को ही करानी चाहिए क्योंकि कोचिंग संस्थान खास तरह की परीक्षाओं की तैयारी के लिए सही रहते हैं.
क्या विज्ञान और तकनीक जैसे विषयों में कैरियर बनाने को लेकर जेंडर से जुड़े पूर्वाग्रह कम हुए हैं
जवाब – हमारी स्कूली शिक्षा से लेकर अब तक में काफी बदलाव आया है लेकिन इसे पर्याप्त नहीं माना जा सकता है. शहरों में कहींकहीं इस बदलाव को महसूस किया जा सकता है लेकिन दूरदराज के गांवों में जेंडर के साथ सब्जेक्ट्स को कनेक्ट किया जाता है. फैमिली और साेसाइटी में गर्ल चाइल्ड को लेकर सोच बदली है लेकिन यह काफी नहीं है. सदियों बाद ही सही एक दिन ऐसा आएगा जब लड़केलड़की को लेकर किया जाने वाला भेद खत्म होगा और दोनों को समान नजर से देखा जाएगा.
अगर आप वैज्ञानिक नहीं बनतीं तो क्या होतीं?
( धीमी और एक लय में निकलती हंसी के साथ) शायद फाइटर पायलट या स्पोर्ट्स पर्सन. स्कूल के दिनों में मैं एथलीट हुआ करती थी. मैं स्प्रिंटर और लॉन्ग जंप में भाग लेती थी. इसके साथ ही कोको और बेसबॉल भी खेलती थी. (गर्व भरे अंदाज में कहते हए) मैं अपने स्कूल की कई स्पोर्ट्स टीम से जुड़ी थी. दरअसल, मुझे बचपन से ही एडवेंचर पसंद था. शायद इसी नेचर की वजह से मैं फाइटर पायलट बनना चाहती थी. मैंने नेशनल डिफेंस एकेडमी (एनडीए) में अप्लाई किया था लेकिन उन दिनों वहां महिलाओं को दाखिला नहीं दिया जाता था. लेकिन आज महिला फाइटर पायलट्स को देख कर अच्छा लगता है.
क्या सोशल मीडिया के दौर के बच्चे विज्ञान को गहराई से समझ पाएंगे?
सोशल मीडिया के पॉजिटिव और नेगेटिव दोनों पहलू हैं. आज के यूथ को चाहिए कि वह किसी भी जानकारी को एक बार में मान लेने से पहले उसकी जांच करें. बिना वेरिफिकेशन के किसी भी फैक्ट को सही नहीं मानना चाहिए.
क्या आपको लगता है कि आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वजह से नौकरी के अवसर कम होंगे?
AI कुछ बदलाव जरूर लाएगा, नौकरियां जाएगी. लेकिन इसके साथ ही ढेरों नई अपौर्च्यूनिटी जेनरेट भी होगी. मशीन को सिखाने, ट्रेन करने और उसकी जांच करने के लिए इंसान की जरूरत हमेशा रहेगी. मशीन को ट्रेनिंग देने के साथ ही उसका टेस्ट करने को लेकर जितने भी काम होंगे वह इंसानी मदद के बिना संभव नहीं है खासकर मेडिकल फील्ड में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के साथ इंसानी तालमेल बेहद जरूरी है. AI की वजह से ढेर सारे इंजीनियरिंग और हाईएंड जॉब्स की संभावना बढ़ेगी लेकिन लोएंड और रूटीन मैनुअल जॉब्स कम होंगे.
आज छात्र कंप्यूटर साइंस में रुचि ले रहे हैं, ऐसे में फंडामेंटल साइंस से स्टूडेंट्स की दूरी क्या चिंता का विषय है?
हम्म… यह चिंता का विषय है. मूलभूत विज्ञान बहुत जरूरी है, क्योंकि तकनीक उसी से जन्म लेती है. इसलिए तकनीक के विकास के लिए फंडामेंटल साइंस का विकास साथ-साथ होना जरूरी है.
भविष्य में किन क्षेत्रों में ज्यादा अवसर होंगे?
डेटा साइंस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में अभी ज्यादा अवसर दिख रहे हैं, लेकिन कोर इंजीनियरिंग जैसे मैकेनिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स की जरूरत हमेशा बनी रहेगी
क्या मौका मिलने पर अंतरिक्ष को और अधिक खंगालना चाहेंगी ?
हां । इंसान हमेशा से जानना चाहता है कि हम कहां से आए और हमारी उत्पत्ति कैसे हुई. इसके साथ ही स्पेस को लेकर कई बातें जानने की इच्छा होती है. अंतरिक्ष को अधिक खंगालने या उसको और अधिक खोजने का एक बड़ा कारण यह है कि भविष्य में इंसान के अस्तित्व पर किसी संकट को आने से रोका जा सके. इसके साथ ही, पृथ्वी पर मौजूद संसाधन तेजी से कम होने की स्थिति में, ऊर्जा और इंसानी जरूरतों से जुड़े दूसरे सोर्सेज का पता लगाने के लिए भी स्पेस को समझना जरूरी है. इन्हीं वजहों से वैज्ञानिक दूसरे ग्रहों या सौर मंडल में रहने की संभावना तलाश रहे हैं, लेकिन किसी दूसरे ग्रह पर बसने के लिए अभी बहुत डेवलपमेंट और टेक्निकल एडवांसमेंट की जरूरत है, क्योंकि अभी तक पृथ्वी की तरह किसी दूसरे ग्रह पर इंसानों जैसी चीज नहीं मिली है. अगर किसी दूसरे ग्रह पर रहने की स्थिति आती है, तो वहां कृत्रिम तरीके से वातावरण बनाना पड़ेगा, क्योंकि मंगल जैसे ग्रह पर पतला वातावरण है, वहां ना तो ऑक्सीजन है और ना ही पानी, और हर चीज को पृथ्वी से वहां ले जाना संभव नहीं है. आज हमारे पास जो तकनीक है उससे वहां पहुंचने में लगभग 6 महीने लगते हैं, इसलिए किसी दूसरे ग्रह पर स्थायी रूप से बसना तब तक मुश्किल है जब तक पृथ्वी जैसा कोई ग्रह नहीं मिल जाता. फिर भी इस दिशा में लगातार प्रयास और तकनीकी विकास जारी है, और उम्मीद है कि आने वाली पीढ़ियों में से कोई इंसान इस सपने को सच कर दिखाएगा.
क्या दफ्तर से घर लौटने के बाद आपके मन में आपका प्रोजेक्ट घूमता है या पूरी तरह से फैमिली को समय देती हैं?
इसमें दो राय नहीं है कि घर आने पर भी मेरा काम मेरे मन में अपनी जगह बनाए रखता है, यह पूरी तरह से दिमाग से नहीं जाता. अगर किसी तरह का इश्यू हो, तो घर में होने पर भी डिस्कशन करती हूं. मैं अपने करियर और प्रोजेक्ट को लेकर बहुत गहराई से जुड़ी हूं. मुझे अपने काम से प्यार है. देखिए, जब काम के बाद मैं घर आती हूं तो एक प्रोफेसर ही होती हूं, अपने रिव्यूअर की मेंटोर रहती हूं इसलिए मैं कहीं भी रहूं, अपने काम और प्रोजेक्ट से कनेक्ट रहती हूं.
क्या आपकी पढ़ाई के दौरान फाइनेंशियल प्रौब्लम्स कभी बाधा बनी ?
मेरी पिताजी किसान थे और यह कोई फायदे का बिजनेस नहीं था. यह भी सच है कि बचपन में मेरी स्कूली पढ़ाई के दिनों में हमारी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी. इसके बावजूद मेरी पढ़ाई को कभी नुकसान नहीं होने दिया गया, इसके पीछे कहीं न कहीं मेरी रुचि, मेरे एजुकेशन को लेकर मेरे पेरेंट्स की रुचि मायने रखती है.
क्या आप यह मानती हैं कि महिलाओं को अपनी क्षमता को साबित करने के लिए पुरुषों से अधिक मेहनत करनी पड़ती है ?
बिल्कुल, महिलाओं को यह साबित करना पड़ता है कि वह पुरुषों के बराबर है. महिलाओं पर फैमिली और कैरियर दोनों की जिम्मेदारियां होती है और इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्हें अपने कैरियर को भी फर्स्ट प्राइओरिटी देनी पड़ती है क्योंकि ऐसा नहीं हो सकता कि कैरियर को हमेशा सेकंडरी प्राइओरिटी पर रख कर आप आगे बढ़ सकते हैं. महिलाओं को घर और करियर को बैलेंस करने के लिए काफी प्रयास करना होता है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता.
गर्ल्स एजुकेशन में आज भी सबसे बड़ी बाधा क्या है
समाजिक पूर्वाग्रह । आज भी ग्रामीण इलाकों के कई घरों में पेरेंट्स की यह सोच है कि लड़कियों के लिए यह काफी है कि उसकी शादी एक अच्छे लड़के के साथ करा दी जाए. ऐसे में मां का रोल है कि वह अपने बेटेबेटी में एकदूसरे को समान इज्जत देने की भावना पैदा करे. हर फैमिली ऐसा सोचेगी, तो समाज में लड़केलड़कियों के बीच का भेद खत्म होगा और बदलाव आएगा.
आपकी नजर में कौन से ऐसे प्रोफेशन्स हैं, जिसने महिलाओं के जॉब को लेकर स्टीरियोटाइप सोच बदली है
पहले ज्यादातर महिलाएं शिक्षक, नर्स और डॉक्टर जैसे प्रोफेशन को चुनती थी. लेकिन आज महिलाएं इंजीनियर हैं, पायलट हैं, यहां तक कि ट्रक ड्राइवर हैं और फाइअर फाइटर भी. एक समय यह माना जाता था कि ऐसे काम केवल पुरुष ही कर सकते हैं.
यंग साइंटिस्ट को क्या मैसेज देना चाहेंगी
पहला – जो भी फील्ड चुनो, उसमें अपना बेस्ट दो.
दूसरा – अपने काम को लेकर पैशनेट रहो.
तीसरा – सीखते रहो, सीखना कभी मत छोड़ो.
जब कोई स्टूडेंट असफलताओं से घबरा जाए, उसे कोई रास्ता न सूझे, तो उसके लिए आपका मैसेज क्या है?
हर किसी को यह समझना जरूरी है कि अगर कोई सफल है, तो हो सकता है उसने 100 बार असफल होने के बाद वह सफलता पाई हो. ऐसा भी होता है कि लाख कोशिशों के बाद भी कुछ लोग सफल नहीं हो पाते हैं. बेहतर होगा कि खुद को उस समय तक शांत रखें जब तक वह वक्त न गुजर जाए. एक बात याद रखें सेल्फ मोटिवेशन से बेहतर कुछ भी नहीं होता है, इसलिए यह सोचें कि आज का वक्त बुरा ही सही, कल जरूर बेहतर होगा. किसी भी कीमत पर प्रयास करना बंद मत करें क्योंकि ‘गिवअप करना’, ‘कुइट करना’ समाधान नहीं है. अपने मकसद को जुनून समझेंगे, तो काम कभी बोझिल नहीं लगेगा. खुद के अंदर के जुनून को जिंदा रखें, इसे कभी खत्म नहीं होनें दें, एक दिन सफलता मिलेगी. निराशा महसूस हो, तो एक छोटा ब्रेक लें और फिर से काम शुरू करें.
खाली समय में क्या करना पसंद है?
बागबानी
क्या व्यस्त जीवन में बागवानी के लिए समय मिलता है?
अगर आप समय निकालना चाहें तो समय मिल ही जाता है. शहर में ज्यादा स्पेस नहीं होता है इसलिए मैंने अपने टेरेस पर ही गार्डन बना रखा है. मुझे गुलाब और चमेली बहुत पसंद हैं, इसलिए मैंने कई अलग-अलग रंगों के गुलाब लगा रखे हैं. इसके अलावा मेरे गार्डन में जीनिया भी है. मैं रोज सुबह कम से कम 15 मिनट अपने पौधों के साथ समय बिताने की कोशिश करती हूं जबकि शनिवार और रविवार का बड़ा समय इनकी खुशबू के बीच बीतता है.
कुछ वन लाइनर प्रश्न आपकी पसंद-नापसंद को लेकर –
चाय या कॉफी, क्या पीना पसंद हैं
(हंसते हुए) कॉफी
मेरी क्यूरी और एपीजे अबुल कलाम में से किसे एक को चुनना हो, तो
(बेहिचक) मेरी क्यूरी
दिन का कौन सा पहर ज्यादा पसंद है, सुबह या शाम
(इत्मीनान भरे अंदाज में) सुबह
हिंदी मूवी या हिंदी सॉन्ग, क्या चुनेंगी
(हल्की हंसी के साथ) मलयाली मूवी
फेवरेट मलयाली मूवी
माधवन की रॉकेट्री: द नंबी इफेक्ट
जींस या साड़ी
साड़ी
बुक रीडिंग या गार्डेनिंग
दोनों
करियर से जुड़े 10 बेजोड़ सवाल जवाब
सवाल – स्कूल के बाद की अपनी शैक्षणिक यात्रा के बारे में बताएं. शुरुआत में विज्ञान और अंतरिक्ष अनुसंधान की ओर क्या आकर्षित किया?
जवाब – दसवीं कक्षा पूरी करने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि मेरा रुझान जीवविज्ञान से ज्यादा भौतिकी और गणित की ओर था. इसलिए, उच्च माध्यमिक स्कूल में मैंने इंजीनियरिंग स्ट्रीम चुनी. शुरू में, मैंने भौतिकी अनुसंधान करने का सोचा और एक साल के लिए बीएससी फिजिक्स कोर्स भी जॉइन किया. हालांकि, बाद में इंजीनियरिंग की ओर मुड़ गया और इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में बीटेक किया.
सवाल – स्नातक पूरा करने के बाद, 1987 में मैंने इसरो जॉइन किया. वहां काम करते हुए, स्टडी लीव लेकर रांची के बीआईटी से मास्टर्स डिग्री भी हासिल की.
जवाब – इंजीनियरिंग चुनने और इसरो में शामिल होने की प्रेरणा क्या थी? क्या कोई निर्णायक क्षण था?
उस समय इंजीनियरिंग एक उभरता हुआ क्षेत्र था जिसमें बहुत अवसर थे. इंजीनियरिंग में महिलाओं की संख्या बहुत कम थी. भौतिकी और गणित में मेरी रुचि ने इस फैसले को और मजबूत किया. इसरो में शामिल होना शुरू में बचपन का सपना नहीं था. इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद, मैंने कई संगठनों और कंपनियों में आवेदन किया. जब मुझे इसरो का अवसर मिला, तो मैंने इसे चुना क्योंकि अंतरिक्ष अनुसंधान हमेशा मेरी पहली पसंद रहा अगर मौका मिलता.
सवाल – इसरो में शुरुआती वर्ष कैसा रहा? उस चरण में कौन सी चुनौतियां और सीखने ने आपको आकार दिया?
जवाब – जब मैं इसरो में शामिल हुई, तो मुझे नव विकसित रडार सिस्टम पर काम करने का मौका मिला. वहां का काम करने का वातावरण सीखने और खोज करने की इच्छा को प्रोत्साहित करता था. अन्य विभागों से सीखने पर कोई प्रतिबंध नहीं था, और हमारे पास बेहतरीन संसाधन और एक सम्मपन्न लाइब्रेरी तक पहुंच थी. मुझे सबसे ज्यादा जो पसंद आया वह था वहां काम करने और सीखने की आजादी. मेरा काम इंजीनियरिंग के दौरान पढ़े गए विषयों से निकटता से जुड़ा था, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स और रडार इंजीनियरिंग. इस समय भी था जब माइक्रोप्रोसेसर और कंप्यूटर डेवलप हो रहे थे, और मुझे उन क्षेत्रों में काम करने का मौका भी मिला. सीखने का वातावरण और शोध के अवसरों ने मेरे करियर को आकार देने में बड़ी भूमिका निभाई.
सवाल – पीछे मुड़कर देखें तो, आपके एजुकेशन के दिनों के कौन से स्किल या वैल्यूज आपके करियर के सफर में सबसे ज्यादा मददगार साबित हुए?
जवाब – तकनीकी ज्ञान और मूलभूत बातें निश्चित रूप से स्कूल और कॉलेज की शिक्षा से आईं. हालांकि, स्पोर्ट और कल्चरल एक्टिविटीज और अतिरिक्त पाठ्यक्रम कार्यक्रमों में भागीदारी ने समग्र व्यक्तित्व विकास में मदद की. इन अनुभवों ने लोगों के प्रबंधन कौशल, संवाद और टीमवर्क को बेहतर बनाया. मेरे शिक्षकों और माता-पिता का प्रोत्साहन, अनुशासन और एजुकेशन को लेकर सोचने के तरीके ने भी बाद में करियर में प्रोजेक्ट्स और जिम्मेदारियों को संभालने में काफी मदद की.
सवाल – जब आप लीडर की भूमिकाओं में आगे बढ़ीं और आदित्य-एल1 जैसा ऐतिहासिक मिशन का नेतृत्व किया, तो आपको वे कौन से नए स्किल विकसित करने पड़े जो किताबें कभी नहीं सिखातीं?
जवाब – सबसे महत्वपूर्ण स्किल में से एक है लोगों का प्रबंधन. जब आप 200-300 लोगों की बड़ी टीम का नेतृत्व करती हैं, तो उन्हें प्रेरित करना और सभी को एक सामान्य लक्ष्य की ओर एकजुट करना आवश्यक हो जाता है. ये वे चीजें नहीं हैं जो किताबें सिखाती हैं. ऐसे कौशल समय के साथ अनुभव, अवलोकन और व्यक्तिगत सीख से विकसित होते हैं.
सवाल – आजकल कई युवा लड़कियां STEM में प्रवेश करना चाहती हैं। ऐसे में उनको किस हकीकत के लिए तैयार रहना चाहिए, और वे पुरुष-प्रधान जगहों पर कैसे आत्मविश्वास बनाए रखें?
जवाब – सबसे जरूरी बात है आत्मविश्वास और जो आप करना चाहती हैं उसके प्रति जुनून. चुनौतियां आएंगी, लेकिन समय के साथ अपनी आकांक्षाओं को खोना नहीं चाहिए. कड़ी मेहनत जरूरी है, क्योंकि बिना प्रयास के कुछ हासिल नहीं होता. जब आप अपनी क्षमताओं को मजबूत बनाती हैं, तब आत्मविश्वास बढ़ता है. एक बार जब आप अपना ज्ञान और कौशल मजबूत कर लेती हैं, तो आत्मविश्वास स्वाभाविक रूप से आ जाता है. आपको यह यकीन करना चाहिए कि आप किसी से कम नहीं हैं।
सवाल – साइंस और टेक्नोलॉजी तेजी से विकसित हो रही हैं. युवा महिलाएं, भविष्य के लिए किस तरह तैयार रहें?
जवाब – विज्ञान आधार बनाता है, और प्रौद्योगिकी उसका प्रैक्टिल रूप है. कई टेक्नोलॉजी, सालों पहले हुए वैज्ञानिक खोजों से साकार करती हैं। इसलिए, विज्ञान में मजबूत मूलभूत बातें आवश्यक हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी परस्पर जुड़े हुए हैं, और विज्ञान को समझने से प्रौद्योगिकी के विकास में सार्थक योगदान संभव होता है.
सवाल – अगर आप अपने करियर की शुरुआत में अपनी युवा प्रोफेशनल्स को सलाह दे सकतीं, तो क्या कहेंगीं?
जवाब – मैं युवा प्रोफेशनल को सलाह दूंगी कि अपनी आंखें और कान खुले रखें, चर्चाओं, सम्मेलनों और सीखने के अवसरों में भाग लें, और नए काम को कभी ना ना कहें. हर असाइनमेंट आपके ज्ञान को बढ़ाता है और नए अवसर खोलता है. अनुभवी लोगों से सीखना और चुनौतियों के प्रति खुलापन लंबे समय तक विकास में मदद करता है.
सवाल – दीर्घकालिक मिशनों पर काम करने के बाद, जो धैर्य और सटीकता की मांग करते हैं, विज्ञान ने आपको सफलता और असफलता के बारे में क्या सिखाया?
जवाब – विज्ञान धैर्य सिखाता है. कभी-कभी रजिल्ट जल्दी आते हैं, और कभी सालों लग जाते हैं. तत्काल परिणामों की चिंता किए बिना ईमानदारी से काम करते रहना चाहिए. निरंतर प्रयास से सफलता अंततः मिल ही जाती है.
सवाल – विज्ञान में करियर चुनते समय युवा लड़कियां संकोच या सामाजिक अपेक्षाओं के कारण कौन सी सामान्य गलतियां करती हैं?
जवाब – आज के जेनरेशन के पास बहुत अधिक जानकारी उपलब्ध है, जो एक लाभ है. हालांकि, सपनों को अपनी क्षमताओं के साथ संतुलित करना बेहद जरूरी है. करियर का चयन आत्म-चिंतन, अपनी ताकतों को समझने और सूचित निर्णय लेकर करना चाहिए, न कि केवल सामाजिक अपेक्षाओं का पालन करके.
सवाल – लड़कियों को विज्ञान और शोध करियर अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने में माता-पिता और शिक्षकों की क्या भूमिका है?
सवाल – करियर चुनने से पहले हर लड़की को याद रखने के लिए आपका एक संदेश क्या है?
जवाब – सपना देखो, हिम्मत करो, और विद्रोह करो.
निशा सिन्हा