छुट्टियों के बाद रवि अपनी नई साइकिल से स्कूल गया. सभी दोस्तों ने उस से नई साइकिल के बारे में पूछा.

रवि के मातापिता बहुत गरीब थे. वे सिर्फ काम की चीजें ही खरीद सकते थे. वे कुछ भी बरबाद नहीं करते थे. हर चीज को संभाल कर रखते थे. रवि के पापा एक स्कूल में क्लर्क थे और मम्मी हाउसवाइफ थीं. इसलिए रवि के सारे दोस्त नई साइकिल देख कर हैरान थे.

एक दोस्त ने कहा, ‘‘शायद किसी रिश्तेदार ने उपहार दिया होगा.’’

‘‘हो सकता है यह साइकिल उस ने कहीं से

चुराई हो,’’ राम बोला. लेकिन रवि चोरी नहीं कर सकता था.

सभी दोस्त रवि के आसपास जमा हो गए और उस से पूछा, ‘‘रवि, क्या यह साइकिल तुम्हारी है?’’

‘‘हां, यह मेरी है,’’ रवि बोला.

‘‘क्या तुम्हारे पापा ने तुम्हारे लिए खरीदी है,’’ अशोक ने पूछा.

‘‘नहीं, मैं ने खुद ही खरीदी है,’’ रवि ने जवाब दिया.

‘‘इस की कीमत कितनी है?’’ नीव ने पूछा.

‘‘यह 1300 रुपए की है,’’ रवि बोला.

‘‘तुम्हारे पास इतने रुपए कहां से आए?’’ राम ने पूछा.

‘‘मैं ने इस के लिए रुपए बचा कर जमा किए,’’ रवि ने आत्मविश्वास से कहा.

‘‘मजाक मत करो. तुम इतने रुपए कैसे जमा कर सकते हो?’’ नीव ने अविश्वास से कहा.

‘‘मैं मजाक नहीं कर रहा. मुझे जो भी थोड़ेबहुत पैसे मिलते थे, मैं उसे संचयिका खाते में जमा कर देता था,’’ रवि बोला.

‘‘मैं ने कभी बाहर से खाने की कोई चीज नहीं खरीदी. चौकलेट्स और कोल्डड्रिंक्स से दूर ही रहा. इस तरह मैं जेबखर्च बचा कर जमा करता रहा,’’ रवि बोला.

‘‘तुम्हें इस खाते के बारे में जानकारी कहां से मिली?’’ उस के दोस्त मानव ने पूछा.

‘‘हमारे स्कूल में ही संचयिका खाते के बारे में बताया गया था. यह बैंक का ही एक दूसरा नाम है, जिस में बच्चों को बचपन से ही पैसे बचाने के लिए सिखाया जाता है. लेकिन शुरू में मैं ने भी ध्यान नहीं दिया. एक दिन पापा ने एक महिला की सच्ची घटना सुनाई कि कैसे उन्होंने थोड़ेथोड़े रुपयों को जमा किया.

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इस के बाद मैं ने इस बैंक में अपना खाता खुलवाया,’’ रवि बोला.

‘‘हमें भी वह कहानी सुनाओ,’’ सभी दोस्त कहने लगे.

‘‘हमारे जन्म से बहुत पहले 1960 में छत्तीसगढ़ के एक गांव धुरसत में एक महिला को 10 रुपए की बहुत जरूरत हुई. 10 रुपए बहुत बड़ी बात नहीं थी लेकिन उस महिला के पास 10 रुपए नहीं थे. उस के पास कुछ अनाज, मुर्गियां और अंडे थे. यदि वह कोई भी चीज बेचती तो उस के पास कुछ रुपए हो जाते. वह अपने पड़ोस में गई, पर वहां भी वही हालात थे. वह 10 रुपए नहीं जुटा पाई. फिर सभी महिलाओं ने मिल कर यह निश्चय किया कि हर सप्ताह वे आपस में 2-2 रुपए जमा करेंगी. इस तरह जमा किए गए रुपए उसे दिए जाएंगे, जिसे अचानक रुपयों की जरूरत पड़ेगी.

‘‘शुरुआत में जरूरतमंदों को ये रुपए दिए जाते, जब उन का काम हो जाता फिर वे रुपए वापस कर देतीं. महिला समझदार और पढ़ीलिखी थीं.

वे सभी खातों का ईमानदारी से ध्यान रखतीं. धीरेधीरे खातों की संख्या बढ़ने लगीं. ‘‘जब काफी रुपए इकट्ठे हो गए तो उन्होंने पास के गांव के संकायथा बैंक में सारे रुपए जमा करा दिए. उन्हें एक आइडिया आया और उन्होंने बैंक का नाम ‘धिधि’ रख दिया. उस के बाद बैंक की शाखाएं छत्तीसगढ़ और छोटानागपुर में खोली गईं. जल्द ही जमा हुए रुपए करोड़ों में पहुंच गए. इन रुपयों से गांव के लोगों की भी सहायता की जाने लगी. धिधि बैंक द्वारा गरीब और मध्यवर्गीय लोगों की सहायता भी की जाने लगी.

‘‘मैं ने भी पढ़ा कि थोड़ाथोड़ा जमा करने के बाद ही अधिक रुपए बन पाएंगे. इसलिए मैं ने भी अपना खाता खुलवाया और उसी जमा किए हुए रुपयों से साइकिल खरीद पाया,’’ रवि ने बताया.

सभी दोस्तों ने रवि की प्रशंसा की और फैसला किया कि अब वे?भी रुपए जमा करना शुरू करेंगे.

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