मिनी चुहिया स्कूल लाइब्रेरी में रहती थी. छिपने के लिए उस ने कोने में एक बिल बना लिया था. वहां काफी किताबें पड़ी रहती थीं. किसी की नजर बिल पर पड़ती ही नहीं थी.

मिनी लाइब्रेरी में बड़े आराम की जिंदगी बिता रही थी. पास में स्कूल कैंटीन था. यहां खाना उसे आसानी से मिल जाता.

बच्चे भी टिफिन के समय कुछ खाना फेंक देते थे. मिनी इसे भी बड़े चाव से खाती.

मिनी शांत स्वभाव की थी. लाइब्रेरी में किताबों को वह जरा भी नुकसान नहीं पहुंचाती. वह जानती थी कि ऐसा करने से उसे यहां से भगा दिया जाएगा.

एक दिन मिनी कैंटीन के पास गिरे सैंडविच के टुकड़ों को खा रही थी, तभी उसे किसी ने पुकारा, ‘‘मिनी, तुम कैसी हो?’’

मिनी ने पलट कर देखा तो उस के बचपन का दोस्त कुकू खड़ा था.

‘‘कुकू, तुम यहां?’’ मिनी खुशी से उछल पड़ी.

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‘‘तुम से मिलने की बड़ी इच्छा थी. काफी ढूंढ़ने के बाद तुम्हारा पता मिला,’’ कुकू ने मुसकरा कर कहा.

कुकू ने जब बताया कि अब वह उस के साथ ही रहेगा तो मिनी की खुशी और बढ़ गई.

‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है. चलो, मैं तुम्हें अपना घर दिखाती हूं,’’ मिनी कुकू को लाइब्रेरी ले गई.

‘‘तुम्हारा घर तो बहुत सुंदर है. यह सुरक्षित और आरामदायक भी है,’’ कुकू ने कहा.

दोनों साथ रहने लगे. कुकू थोड़ा शरारती स्वभाव का था. लाइब्रेरी की किताबों को देख कर कुकू ने मिनी से कहा, ‘‘यहां कितनी सारी किताबें हैं. इन्हें कुतरने में बहुत मजा आएगा.’’

‘‘खबरदार, इन किताबों को हाथ भी मत लगाना. ये बच्चों की पढ़ाई के लिए हैं.’’ मिनी ने कुकू को चेतावनी दी.

‘‘यहां काफी किताबें हैं, कुछ कुतर भी जाऊंगा तो क्या फर्क पड़ेगा,’’ कुकू ने हंस कर कहा.

‘‘कुकू, ऐसा करने से अपना ही नुकसान है. अगर लाइब्रेरियन को एक भी किताब फटी मिली तो हमें लाइब्रेरी से बाहर भगा देगा. फिर रहने के लाले पड़ जाएंगे,’’ मिनी ने समझाने की कोशिश की.

पर कुकू ने बात नहीं मानी. रात में जब मिनी सो गई तब कुकू दबे पांव बिल से निकला.

वह लाइब्रेरी की एक रैक पर चढ़ गया. वहां कतार में कई किताबें रखी थीं. अपनी तेज दांतों से कुकू किताबों को कुतरने लगा. किताबों को उस ने धक्का दे कर नीचे जमीन पर बिखेर दिया.

शोर सुन कर मिनी की नींद खुली. वह घबरा कर बिल से बाहर झांकी. बिखरी किताबों को देख कर उसे सारी बात समझ में आ गई.

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उस ने कुकू को बुला कर चेतावनी दी, ‘‘कुकू, मैं ने तो यह सब करने से मना किया था. दोबारा ऐसा मत करना.’’

अगले दिन सुबह से ही लाइब्रेरी में हलचल थी. लाइब्रेरी टीचर स्कूल के चपरासी को समझा रही थी, ‘‘लाइब्रेरी में चूहे बढ़ गए हैं. वे किताबों को कुतर रहे हैं, उन्हें नुकसान पहुंचा रहे हैं. जल्द से जल्द इन्हें पकड़ने का इंतजाम करो.’’

बिल के अंदर बैठी मिनी और कुकू भी सारी बातें सुन रहे थे.

मिनी के चहरे पर चिंता की लकीरें थीं, वहीं कुकू मुसकरा रहा था.

मिनी ने दोबारा कुकू को समझाया, ‘‘कुकू. मैं ने इसी लिए तुम्हें लाइब्रेरी की किताबों से दूर रहने के लिए कहा था. लाइब्रेरी टीचर कितना गुस्सा हो रही हैं. तुम अपनी शैतानियां छोड़ दो. कहीं लेने के देने न पड़ जाएं.’’

‘‘किताबों को कुतरना तो हमारा अधिकार है.’’ कुकू ने हंस कर बात को टाल दिया.

कुकू की शरारतें कम नहीं हुईं. लाइब्रेरी में उस ने फिर किताबों को कुतर दिया. मिनी ने कुकू से कहा, ‘‘दोस्त, अब यहां रहना खतरे से खाली नहीं. क्या पता हम कब पकड़ लिए जाएं. मैं कल ही दूसरे बिल की तलाश करती हूं.’’

‘‘पागल हो गई हो, क्या? भला कोई इतना अच्छा घर छोड़ कर जाता है? तुम्हें जाना है तो जाओ. मैं तो यहीं रहूंगा,’’ कुकू बोला.

मिनी अगले दिन दूसरी जगह चली गई. कुकू अब लाइब्रेरी में अकेला ही रहने लगा.

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रविवार का दिन था. स्कूल की छुट्टी थी. कुकू बिल में आराम कर रहा था, तभी लाइब्रेरी का दरवाजा खुला.

‘‘अरे, आज छुट्टी के दिन कौन आया?’’ कुकू ने बिल से बाहर झांका.

दो लोग अंदर आए. उन के हाथों में नई किताबें थीं. दोनों किताबों में जिल्द चढ़ाने में जुट गए.

कुकू बिल से उन दोनों को देखे जा रहा?था. शाम को काम खत्म होने के बाद दोनों लोग चले गए.

कु?कू बिल से बाहर निकला. किताबों के पास पहुंचा. नई जिल्द चढ़ी किताबें काफी सुंदर लग रही थीं.

कुकू किताबों को छू कर देखने लगा. उसे शरारत सूझी.

‘अगर मैं इन किताबों को कुतर डालूं तो कल जरूर हंगामा होगा. फिर कितना मजा आएगा.’ सोच कर कुकू मुसकरा उठा.

वह कूद कर एक किताब पर चढ़ गया और एक कोने से कुतरना शुरू किया. एक के बाद एक कुकू ने कई किताबें कुतर डालीं. किताबों के पास कतरन की ढेर लग गई थी.

कुकू मेज के कोने में रखी किताबों पर चढ़ने लगा. अचानक उस का संतुलन बिगड़ा. वह नीचे रखी गोंद की शीशी पर जा गिरा. शीशी की ढक्कन खुली थी. सारा गोंद जमीन पर बिखर गया. गोंद कुकू के शरीर पर भी लग गया.

कुकू कतरन की जाल में बुरी तरह उलझ गया. काफी देर तक कुकू खुद को बचाने की कोशिश करता रहा. पर वह असफल रहा. कुकू के पैर वहां रखी किताबों से चिपक गए थे. गोंद सूख चुका था. कुकू ने अपने पैरों को छुड़ाने की काफी कोशिश की पर सब बेकार साबित हुआ.

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अगली सुबह जब चपरासी लाइब्रेरी में आया तो गोंद की शीशी और इधरउधर कागज की कतरनों को देख कर उसे सारा मामला समझ में आ गया.

उस ने पूंछ पकड़ कर कुकू को किताब से अलग किया और उसे बाहर कचरे की बालटी में फेंकते हुए बोला, ‘‘शरारती चूहे, तुम ने किताबों को काफी नुकसान पहुंचाया है. तुम्हारी जगह लाइब्रेरी में नहीं इस कचरे के डब्बे में है.’’ कुकू को शरारत की सजा मिल चुकी थी.

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