ब्राउनी भालू पेड़ की छांव में काफी देर से सो रहा था. जब उस की गीली नाक पर मक्खियां भिन्नभिनाने लगीं, तब जा कर उस की नींद टूटी. ‘‘उफ. इस भूख को भी अभी लगनी थी,’’ उस ने अपनी तोंद पर हाथ फेरते हुए कहा.

ब्राउनी बहुत आलसी था. काम करने के नाम पर उस के हाथपैर फूलने लगते थे. उसे सोना बहुत अच्छा लगता था. पहले तो उस ने फिर से सोने की कोशिश की, लेकिन जब पेट में चूहे ज्यादा उछलकूद करने लगे, तो वह खाने की तलाश में निकला. सामने काफी बड़ेबड़े पेड़ थे. कहीं आम के पेड़, तो कहीं बरगद, गुलमोहर के पेड़ थे. पर ब्राउनी को तो खाने की तलाश थी. अचानक उस की नजर एक पेड़ पर पड़ी, जहां मधुमक्खियां उड़ रही थीं.

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