टिंकू और शीलू दो पक्के दोस्त थे. एक दिन दोनों अपने कुछ और दोस्तों के साथ खेल रहे थे. अचानक टिंकू खेलना छोड़ कर दूर जमीन पर चलते चींटे को देख कर उस की तरफ भागा. यह देख कर शीलू भी उस के पीछे आ गई कि देखें टिंकू क्या करता है. शीलू ने देखा कि जमीन पर चल रहे एक चींटे को टिंकू बारबार पकड़ने की कोशिश कर रहा है. टिंकू की पकड़ से जब चींटा दूर निकलने लगा, तब उस ने एक जोरदार थप्पड़ चींटे को जड़ दिया.

यह देखते ही शीलू जोर से चिल्ला कर बोली, ‘‘टिंकू, ये क्या कर रहे हो? तुम चींटे को क्यों मार रहे हो?’’ ‘‘तुम यहां मेरे पीछे क्यों आई हो? तुम जा कर खेलो. मुझे अपना काम करने दो,’’ टिंकू बोला.

‘‘क्या यही तुम्हारा काम है?’’ शीलू ने सवाल किया. ‘‘मुझे इस चींटे को मारने में मजा आ रहा हैं. देखो, वह परेशान हो कर इधरउधर कितना छटपटा रहा है. मुझे तो इस को परेशान करने में बहुत मजा आ रहा है,’’ टिंकू ने जवाब दिया.

‘‘टिंकू, किसी कमजोर और बेबस को सताना ठीक नहीं है, इसलिए तुम इसे छोड़ दो. देखो, तड़पने से इसे कितनी तकलीफ हो रही है. तुम्हारी यह अच्छी आदत नहीं है,’’ शीलू ने कहा. ‘‘यदि तुम चींटे को मारना नहीं छोड़ोगे, तो मैं तुम से बात नहीं करूंगी,’’ शीलू गुस्से से बोली.

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‘‘तुम अगर मुझ से नहीं बात करना चाहती तो मैं कौन सा तुम्हारे पीछे पड़ा हूं. मुझे तो चींटे के साथ खेलने में मजा आ रहा है. मैं तो चींटे के साथ ही खेलूंगा,’’ टिंकू ने कहा. ‘‘तुम खेल कहां रहे हो? तुम तो उसे परेशान कर रहे हो. मैं जा रही हूं,’’ शीलू गुस्से में बोली.

‘‘जाओ, मैं तुम्हें रोकने वाला नहीं,’’ टिंकू लापरवाही से बोला. उस ने न तो शीलू की तरफ देखा और न ही उस से रुकने के लिए कहा. जातेजाते शीलू एकबार फिर पीछे मुड़ी और जोर से चिल्लाई, ‘‘टिंकू, चींटे को छोड़ दो.’’ लेकिन टिंकू अपने खेल में लगा रहा.

एक चींटे के कारण दो पक्के दोस्तों की दोस्ती टूट गई. अब टिंकू और शीलू अलगअलग खेलते. शीलू बच्चों के साथ खेलती पर टिंकू अकेला ही चींटे के पीछे भागने, उन्हें छेड़ने और उसे मारने में ही व्यस्त रहता.

एक दिन छुट्टी के समय घर लौटते हुए टिंकू आगे चल रहा था और शीलू उस के पीछे. अकड़ कर चलते हुए टिंकू ने एक पत्थर का टुकड़ा हाथ में उठा लिया. शीलू कुछ समझ पाती, उस से पहले ही टिंकू ने वह पत्थर सड़क किनारे खड़े एक कुत्ते के ऊपर फेंक दिया. पत्थर की चोट लगते ही कुत्ता भूंकने लगा और टिंकू की तरफ दौड़ पड़ा.

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यह देख कर टिंकू की अकड़ गुम हो गई. वह डर कर चिल्लाते हुए पीछे भागा और पीछे आ रहे शीलू से चिपक गया. बोला, ‘‘शीलू, मुझे बचा लो, वरना यह कुत्ता मुझे काट लेगा.’’

शीलू टिंकू को बांहों में भर कर कुत्ते को भगाने लगी. कुत्ता रुक तो गया पर वह बहुत गुस्से में था. वह टिंकू को छोड़ना नहीं चाहता था. अत: वह रुक कर जोरजोर से भूंकता ही रहा. यह देख कर शीलू टिंकू को ले कर पीछे मुड़ गई और दूसरे रास्ते से घर की तरफ चल पड़ी. कुत्ता तब भी भूंकता हुआ पीछेपीछे आ रहा था. लेकिन कुछ दूर तक आने के बाद कुत्ता रुक गया.

अपनी गली में पहुंच कर दोनों ने ठंडी सांस ली. टिंकू शीलू के गले लग कर बोला, ‘‘शीलू, यदि आज तुम मेरे पीछे नहीं होती, तो मुझे वह कुत्ता काट ही लेता. तुम ने मुझे बचा लिया, मेरे दोस्त.’’ शीलू टिंकू को अलग करते हुए बोली, ‘‘आज तुम मुसीबत में फंसे तो तुम्हें पता चला कि जान पर जब मुसीबत आती है तो कितना डर और घबड़ाहट होती है. तुम्हारे जैसा दर्द ही उस चींटे को भी होता होगा, जिसे तुम मारते हो.

‘‘चींटा कमजोर था और उस का कोई दोस्त भी नहीं था. फिर बताओ, उसे कितनी तकलीफ होती होगी. कुत्ते को तुम ने छेड़ा था, इसलिए वह तुम से बदला लेना चाहता था.’’ ‘‘मैं अपनी गलती समझ गया. अब ऐसी गलती नहीं करूंगा, यह तुम से वादा है. मुझे माफ कर के मुझे फिर से दोस्त बना लो, शीलू,’’ टिंकू दुखी हो कर बोला. ‘‘हम तो हमेशा से दोस्त थे और आज भी हैं. बस तुम निर्दोष जीवों को सताना छोड़ दो,’’ शीलू बोली.

‘‘छोड़ दिया, अब तो खुश हो?’’ टिंकू शीलू का? हाथ पकड़ कर अपनी पकड़ मजबूत करते हुए बोला. ‘‘चलो, जल्दी घर चलें, वरना देर होने पर मां घबड़ा जाएंगी.’’ शीलू के यह कहने पर दोनों दोस्त हाथ में हाथ डाले घर की तरफ चल दिए.

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