नंदू, चीनू, बाबू, शिवम, गुडि़या, गौरी, चुनमुन, सन्नी सभी अलगअलग उम्र व घरों से थे, पर चूंकि गरमियों की छुट्टियां शुरू हो चुकी थीं और बच्चों का मन न टीवी देखने का था, न कहानियों की किताबें पढ़ने का, इसलिए वे दिन भर कालोनी में उछलकूद मचाते. कहते हैं, ‘‘खाली दिमाग शैतान का घर होता है.’’ इसलिए रोज कोई न कोई नई शरारत होती और किसी न किसी से रोज डांट पड़ती.

उस दिन शाम होते ही सभी बच्चे वर्मा अंकल के बगीचे में जमा हो गए. एक के ऊपर एक चढ़ कर आम की कैरियां तोड़ी जाने लगीं. सब से ऊपर नंदू था. अचानक वर्मा अंकल का कुत्ता भौंकता हुआ बगीचे में आ धमका.

बच्चे भय से चीखते हुए हट गए और नंदू धड़ाम से नीचे गिरा. कैरियां भी बिखर गई. जैसेतैसे बच्चों ने जान बचाई. वर्मा अंकल और आंटी शायद घर में नहीं थे. सब चौराहे तक पहुंचे तो देखा कि नंदू की टांग से काफी खून बह रहा था. मांस छिल चुका था और दर्द भी बहुत था. नंदू को घर ले जाने से पोल खुल जाने का डर था इसलिए डाक्टर किरण के यहां ले गए, जिन का घर सामने था. वे स्वभाव से बहुत अच्छी थीं.

डाक्टर दीदी ने तुरंत नंदू की मरहमपट्टी की. उन्होंने चोट लगने की जब वजह पूछी तो सभी बच्चे चुप थे पर सुई देख कर गुडि़या से रहा नही गया. उस ने सारी बात बता दी. डाक्टर दीदी ने कुछ नहीं कहा. उन्होंने बच्चों को ठंडा पिलाया और अगले दिन फिर आने को कहा.

 

बच्चों की टोली कुछ मायूस हो चली थी. जब लीडर ही बीमार हो तो बाकी लोग क्या करें? शाम को सभी बच्चे डाक्टर दीदी के घर पहुंचे. दीदी घर के लौन में व्यस्त थीं. बच्चे वहीं जमा हो गए. लौन में बड़े पेड़, छोटेछोटे पौधे, फल, फूल सभी करीने से कटे हुए थे. एक कोने में सुंदर फाउंटेन था.

दूसरे कोने में छोटे पिंजरों में चहकते पक्षी थे. एक बड़ा नीम का पेड़ था, जिस में दीदी ने लकड़ी का एक घर बना रखा था, उस में चिडि़यों का परिवार भी था. बच्चे हैरानी से दीदी के लौन को देख रहे थे. इतनी ही जगह उन के घर के पिछवाड़े में भी थी. पर इतनी खूबसूरत क्यारी उन्होंने पहली बार देखी थी.

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दीदी ने उन्हें घर के अंदर ड्राइंगरूम की तरफ से बुलाया. दीदी का ड्राइंगरूम तो और भी खूबसूरत था. हाथ से बनी पेंटिंग, शोपीस, एक्वेरियम और भी न जाने क्याक्या.

दीदी ने नंदू की ड्रैसिंग कर के सभी बच्चों को नूडल्स, मठरी, गुलाबजामुन खिलाए. बच्चों का ऐसा स्वागत पहले कभी नहीं हुआ था. हिम्मत कर के नंदू ने पूछ ही लिया कि क्या लौन, ड्राइंगरूम में सजे सामान दीदी ने स्वयं बनाए हैं?

जवाब में दीदी ने हंस कर ‘‘हां’’ कहा, तो बच्चों ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी. बच्चों की उत्सुकता व जिद देख कर दीदी ने उन्हें वे सारी चीजें सिखाने की हामी भर दी.

बस बच्चे जुट गए सामान जुटाने में. दिन भर धूप में खेलना, उछलकूद मचाना, खिड़कियां तोड़ना अचानक बंद हो गया तो मातापिता को कुछ हैरानी हुई, पर बच्चे टोली में संग में बैठे रहते. शाम को ही निकलते तो उन लोगों ने भी ज्यादा गौर नहीं किया. घरों में से अब टूटेफूटे सामान गायब होने लगे. गौरी को फाउंटेन बनाना सीखना था. नंदू को बोनसाई बनाना, चुनमुन पेंटिंग करना चाहता था और बाबू को बागवानी सीखनी थी. गुडि़या ने रंगोली बनाना सीखा तो शिवम ने मठरी.

छुट्यिं कब बीत गईं, पता ही नहीं चला. दीदी हर बच्चे को कुछ सिखातीं फिर सभी मिल कर कुछ खाते. दिन भर घर में बच्चे दीदी से सीखा हुआ काम करते, शाम को उन्हें दिखाते, उन से ठीक करवाते. उस दिन छुटियों का आखिरी दिन था. नंदू का घाव भी ठीक हो गया था. अब वह पहले की तरह उछलकूद कर सकता था. शाम को उदास से बच्चे दीदी के घर में जमा हुए.

अगले दिन से स्कूल खुलने थे. सभी अपनी बनाई चीजें लाए थे. सभी ने बहुत अच्छा सीखा था. न केवल उन के बनाए सामान अच्छे थे, बल्कि इतने दिन दीदी के साथ रह कर पेड़पौधों की देखभाल, जानवरों के प्रति अच्छा व्यवहार, पर्यावरण का ध्यान रखना, समय का सदुपयोग और सत्य को भी उन्होंने जाना था. दीदी को भी बच्चों के साथ बहुत मजा आया था. वे भी उदास थीं. इतने दिनों तक बच्चों के आते रहने से उन का खाली समय तो गुजरा ही, उन के घर में रौनक भी बनी रही.

दीदी ने सभी बच्चों की तारीफ की और नई कक्षा में जाने की बधाई दी. भारी मन से नंदू की टोली विदा हुई. स्कूल खुलने के बाद यह बात फैल गई कि छुट्टियों में नंदू और उस के दोस्तों ने कई चीजें सीखी हैं.

वेबच्चे स्कूल में खुद के बनाए हुए बिस्कुट ले कर आते और अन्य बच्चों को नईनई चीजें सिखाते. जब प्रिंसिपल सर के पास यह खबर पहुंची, तो उन्होंने इन बच्चों द्वारा बनाई गई चीजों की प्रदर्शनी लगाने की सोची. इस के लिए उन्होंने बच्चों के मातापिता को भी बुलवाया.

प्रदर्शनी में प्रिंसिपल सर ने कहा, ‘‘यहां लगाई प्रदर्शनी की सारी चीजें हमारे स्कूल के बच्चों ने बनाई है. ये चीजें इन्होंने गरमी की छुट्टियों में बनानी सीखी हैं. गरमी की छुट्टियों का सही उपयोग करने के लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूं.’’ बच्चों के मातापिता को भी अपने बच्चों पर बहुत गर्व हुआ. शाम को सभी बच्चे अपने मम्मीपापा के साथ दीदी के घर पहुंचे.

मम्मीपापा ने बच्चों को नईनई चीजें सिखाने के लिए दीदी को धन्यवाद दिया.

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