चंपकवन में एक बूढ़ा कौआ रहता था. उसे अपनी आवाज और बुद्धिमानी पर बहुत घमंड था. वह वन में सब से कहता फिरता कि हम कौओं की आवाज वन में सब से अच्छी है और वन के अन्य पक्षियों की आवाज साधारण है.

‘‘कोयल के गानों की आवाज सब को बहरा कर देती है, मोर बिना कारण के चिल्लाता है. बाज और गाय की आवाज सुन कर सभी कानों को बंद कर लेते हैं,’’ कौआ बोला.

अन्य कौए उस की बात सुन कर बोले, ‘‘इस का कहना सही है. दुनिया में कोई ऐसा पक्षी नहीं है, जिस की आवाज हम से अच्छी हो.’’

बूढ़े कौए ने कहा, ‘‘भाइयो, आज मैं एक अच्छा सा स्कूल खोलने जा रहा हूं. तुम सभी अन्य पक्षियों को बताओ कि हम उन्हें बताएंगे कि कैसे बोला जाता है, कैसे गाना गाया जाता है. जब वे ये बातें सीख लेंगे, तब ही प्रसिद्ध हो पाएंगे.’’

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सभी कौए वन में सभी जानवरों को ये बातें बताने लगे. उन्होंने जानवरों से यह भी कहा कि अपनेअपने बच्चों को बूढ़े कौए के पास भेजा करें.

बच्चों के मातापिता ने यह फैसला किया कि उन के बच्चों को बूढ़े कौए के स्कूल में जाना चाहिए. गाने वाली कोयल, नाचने वाले मोर, तोता, मैना, कबूतर, मुर्गी, बाज, टिड्डे तथा उल्लू भी अपने बच्चों को ले कर स्कूल पहुंचे.

कौए ने बच्चों को सीटों पर बिठाया और खुद एक बैंच पर बैठ कर शुरू हो गया, ‘‘किर..कांव…कांव..’’

इतनी भद्दी आवाज सुन कर बच्चों ने कान दबा लिए और जोरजोर से हंसने लगे.

‘‘प्लीज, अपनी कर्कश और भद्दी आवाज को बंद करो. हम अपनी मीठी आवाज खो कर तुम से कुछ नहीं सीखना चाहते. हम अपनी आवाज से अपनी पहचान बना कर खुश हैं. हमें अपनी आवाज पर गर्व है,’’ सभी बच्चों ने कहा.

बूढ़ा कौआ हैरान रह गया. ‘‘तुम क्या कह रहे हो?’’

वह तो सोच रहा था कि उस की आवाज असाधारण और सब से मीठी है. लेकिन बच्चों को उस की आवाज पसंद नहीं थी.

सभी बच्चे बूढ़े कौए की क्लास छोड़ कर लौट गए. तब कौए को एहसास हुआ कि आवाज से कुछ नहीं होता, सभी की अपनी विशेषता, अपनी ताकत होती है. उस ने फैसला किया कि अपनी प्रशंसा करने, शेखी बघारने के बजाय दूसरों के साथ मिल कर अपनी ताकत को समझने का प्रयास करेगा और वन में एकता लाने की कोशिश करेगा.

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