भोदीराम लोमड़ जंगल में कुछ काम से निकला, तो अपने छात्र गंगोर गधे को देखा. वह उस के पास चला गया. ‘‘अरे गंगोर, कैसे हो?’’ भोदीराम ने पूछा.

गंगोर ने उदास स्वर में कहा, ‘‘मैं ठीक हूं, सर.’’ ‘‘क्या बात हो गई? तुम उदास क्यों लग रहे हो?’’

‘‘हां, मैं थोड़ा दुखी हूं,’’ गंगोर बोला. ‘‘मुझे बताओ, शायद मैं तुम्हारी कुछ सहायता कर सकूं,’’ भोदीराम बोला.

‘‘सर, मैं नौकरी की तलाश में हूं, लेकिन नौकरी मिल नहीं रही. मैं नहीं जानता कि मुझे क्या करना चाहिए.’’

भोदीराम जानता था कि गंगोर सिर्फ बुद्धिमान छात्र ही नहीं था, बल्कि मेहनती और ईमानदार भी था. ‘तो क्यों न इसे अपना व्यापार करने की सलाह दूं,’ भोदीराम ने सोचा. ‘‘एक दुकान खोल लो,’’ भोदीराम बोला.

‘‘लेकिन इस के लिए मेरे पास रुपए नहीं हैं,’’ गंगोर बोला. ‘‘उदास मत हो. मैं तुम्हें उधार दूंगा, लगभग 5 लाख रुपए,’’ भोदीराम बोला. ‘‘तुम्हारी गली में मोबाइल की दुकान नहीं है. वहां अगर दुकान खोल लो, तो खूब चलेगी. जब तुम इतने रुपए कमा लोगे, तो मुझे वापस कर देना.’’

गंगोर यह बात सुन कर खुश भी हुआ और उत्साहित भी. कुछ ही दिनों बाद भोदीराम को गंगोर की तरफ से मोबाइल दुकान खुलने का निमंत्रण पत्र मिला. लेकिन कुछ आवश्यक काम होने के कारण भोदीराम वहां नहीं जा सका. उस ने फोन पर ही अपने छात्र

गंगोर को शुभकामनाएं दे दीं. गंगोर ने दुकान के उद्घाटन की कुछ तस्वीरें भी भेज दीं. भोदीराम बहुत खुश हुआ. लेकिन दूसरे महीने गंगोर फिर से उदास चेहरा लिए भोदीराम के यहां पहुंच गया.

‘‘क्या हुआ, गंगोर?’’ भोदीराम ने चिंतित हो कर पूछा. ‘‘सर, दुकान तो चल ही नहीं रही,’’ गंगोर बोला.

‘‘चिंता मत करो. दुकान चलने में थोड़ा समय तो लगेगा ही,’’ भोदीराम बोला. ‘‘लेकिन कुछ न कुछ आमदनी भी तो होनी चाहिए,’’ गंगोर बोला.

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‘‘ठीक है, फिर अपनी दुकान पर खानेपीने वाली चीजें भी रखनी शुरू कर दो. जैसे, जूस, फ्रूट जैम आदि. हो सकता है इसी की बिक्री बढ़ जाए,’’ भोदीराम बोला. ‘‘ठीक है, सर,’’ गंगोर बोला.

एक सप्ताह बाद गंगोर फिर से अपनी समस्या ले कर पहुंच गया. भोदीराम सोचने लगा कि अब इस की किस तरह सहायता की जाए. भोदीराम ने कहा कि अपनी दुकान का विज्ञापन न्यूजपेपर में छपवाओ और कुछ पोस्टर्स बनवा कर भी आसपास में चिपका दो, ताकि ग्राहकों को तुम्हारी दुकान के बारे में पता चले और वे तुम्हारी दुकान पर आएं.

लेकिन अगले महीने गंगोर फिर से अपनी समस्या ले कर भोदीराम के पास पहुंच गया. ‘‘गंगोर, मुझे लगता है तुम्हें अपनी दुकान पर बैठना चाहिए. ग्राहकों से लड़ाई नहीं करनी चाहिए,’’ भोदीराम बोला.

‘‘जी सर, मैं सुबह के 7 बजे से रात के 9 बजे तक दुकान पर बैठता हूं. मैं कभी ग्राहक से नहीं लड़ता,’’ गंगोर ने आंखों में आंसू भर कर कहा. ‘‘अभी तक तुम ने कितने मोबाइल फोन बेचे?’’ भोदीराम ने पूछा.

‘‘मैं ने 5 से 7 मोबाइल फोन बेचे हैं,’’ गंगोर बोला. ‘‘3 महीने पहले खुली दुकान के लिए यह तो कुछ भी नहीं है. एक काम करो, तुम अभी घर जाओ, मैं कल तुम्हारी दुकान पर पहुंचता हूं,’’ भोदीराम बोला.

दूसरे दिन भोदीराम जब गंगोर के घर पर पहुंचा, तो उसे मोबाइल की दुकान नजर नहीं आई. उस ने गंगोर को फोन मिला कर कहा, ‘‘ मैं तुम्हारे घर के बाहर खड़ा हूं. तुम्हारी दुकान कहां है? मुझे तो नहीं दिखाई दे रही.’’ गंगोर ने उसे घर के अंदर बुलाया. अंदर भोदीराम ने देखा एक सजीसजाई, चमकती दुकान थी, जिस पर गंगोर बैठा था.

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‘‘गंगोर, तुम ने घर के अंदर दुकान खोल ली?’’ भोदीराम ने पूछा. ‘‘जी सर,’’ गंगोर बोला.

गंगोर की बात पर भोदीराम को हंसी आ गई. ‘‘गंगोर, तुम्हें दुकान तो घर के बाहर खोलनी चाहिए, जहां ग्राहक देख सकें. घर के अंदर खोलने से दुकान किसे दिखाई देगी. यही कारण है कि तुम्हारी दुकान की बिक्री नहीं हो रही,’’ भोदीराम ने विस्तार से बताया.

‘‘इस स्टोर को घर के बाहर ले कर आओ और शटर खोल कर रखो, तभी दुकान चलेगी,’’ भोदीराम बोला. गंगोर ने वही किया. 2 महीने में भोदीराम ने जितने रुपए दिए थे, वे दुकान की कमाई से आ गए.

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‘‘सर, दुकान को बाहर ले आने से अब अच्छी चलने लगी. मैं जल्दी ही आप के सारे रुपए लौटा दूंगा.’’ एक दिन गंगोर ने भोदीराम को फोन पर बताया. भोदीराम की आंखें खुशी से भर गईं, भोदीराम समझ गया कि किसी की सहायता करने से कितनी खुशी मिलती है.

VIDEO : मरीन नेल आर्ट

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