परी हूं मैं: भाग 3- आखिर क्या किया था तरुण ने

तरुण फुरती से दौड़ा उस के पीछे, तब तक तो खबर फैल चुकी थी. मैं कुछ देर तो चौके में बैठी रह गई. जब छत पर पहुंची तो औरतों की नजरों में स्पष्ट हिकारत भाव देखा और तो और, उस रोज से नानी की नजरें बदली सी लगीं. मैं सावधान हो गई. ज्योंज्यों शादी की तिथि नजदीक आ रही थी, मेरा जी धकधक कर रहा था. तरुण का सहज उत्साहित होना मुझे अखर रहा था. इसीलिए तरुण को मेहंदी लगाती बहनों के पास जा बैठी. मगर तरुण अपने में ही मगन बहन से बात कर रहा था, ‘पुष्पा, पंजे और चेहरे के जले दागों पर भी हलके से हाथ फेर दे मेहंदी का, छिप जाएंगे.’  सुन कर मैं रोक न पाई खुद को, ‘‘तरुण, ये दाग न छिपेंगे, न इन पर कोई दूसरा रंग चढ़ेगा. आग के दाग हैं ये.’’ सन्नाटा छा गया हौल में. मुझे राजीव आज बेहद याद आए. कैसी निरापदता होती है उन के साथ, तरुण को देखो…तो वह दूर बड़ी दूर नजर आता है और राजीव, हर पल उस के संग. आज मैं सचमुच उन्हें याद करने लगी.

आखिरकार बरात प्रस्थान का दिन आ गया, मेरे लिए कयामत की घड़ी थी. जैसे ही तरुण के सेहरा बंधा, वह अपने नातेरिश्तेदारों से घिर गया. उसे छूना तो दूर, उस के करीब तक मैं नहीं पहुंच पाई. मुझे अपनी औकात समझ में आने लगी. असल औकात अन्य औरतों ने बरात के वापस आते ही समझा दी. उन बहन-बुआ के एकएक शब्द में व्यंग्य छिपा था-‘‘भाभीजी, आज से आप को हम लोगों के साथ हौल में ही सोना पड़ेगा. तरुण के कमरे का सारा पुराना सामान हटा कर विराज के साथ आया नया पलंग सजाना होगा, ताजे फूलों से.’’ छुरियां सी चलीं दिल पर. लेकिन दिखावे के लिए बड़ी हिम्मत दिखाई मैं ने भी. बराबरी से हंसीठिठोली करते हुए तरुण और विराज का कमरा सजवाया. लेकिन आधीरात के बाद जब कमरे का दरवाजा खट से बंद हुआ. मेरी जान निकल गई, लगा, मेरा पूरा शरीर कान बन गया है. कैसे देखती रहूं मैं अपनी सब से कीमती चीज की चोरी होते हुए. चीख पड़ी, ‘चोर, चोर,चोर.’ गुल हुई सारी बत्तियां जल पड़ीं. रंग में भंग डालने का मेरा उपक्रम पूर्ण हुआ. शादी वाला घर, दानदहेज के संग घर की हर औरत आभूषणों से लदी हुई. ऐसे मालदार घरों में ही तो चोरलुटेरे घात लगाए बैठे रहते हैं.

नींद से उठे, डरे बच्चों के रोने का शोर, आदमियों का टौर्च ले कर भागदौड़ का कोलाहल…ऐसे में तरुण के कमरे का दरवाजा खुलना ही था. उस के पीछेपीछे सजीसजाई विराज भी चली आई हौल में. चैन की सांस ली मैं ने. बाकी सभी भयभीत थे लुट जाने के भय से. सब की आंखों से नींद गायब थी. इस बीच, मसजिद से सुबह की आजान की आवाज आते ही मैं मन ही मन बुदबुदाई, ‘हो गई सुहागरात.’ लेकिन कब तक? वह तो सावित्री थी जिस ने सूर्य को अस्त नहीं होने दिया था. सुबह से ही मेहमानों की विदाई शुरू हो गई थी. छुट्टियां किस के पास थीं? मुझे भी लौटना था तरुण के साथ. मगर मेरे गले में बड़े प्यार से विराज को भी टांग दिया गया. जाने किस घड़ी में बेटियों से कहा था कि चाची ले कर आऊंगी. विराज को देख कर मुझे अपना सिर पीट लेने का मन होता. मगर उस ने रिद्धि व सिद्धि का तो जाते ही मन जीत लिया. 10 दिनों बाद विराज का भाई उसे लेने आ गया और मैं फिर तरुण की परी बन गई. गिनगिन कर बदले लिए मैं ने तरुण से. अब मुझे उस से सबकुछ वैसा ही चाहिए था जैसे वह विराज के लिए करता था…प्यार, व्यवहार, संभाल, परवा सब.

चूक यहीं हुई कि मैं अपनी तुलना विराज से करते हुए सोच ही नहीं पाई कि तरुण भी मेरी तुलना विराज से कर रहा होगा. वक्त भाग रहा था. मैं मुठ्ठी में पकड़ नहीं पा रही थी. ऐसा लगा जैसे हर कोई मेरे ही खिलाफ षड्यंत्र रच रहा है. तरुण ने भी बताया ही नहीं कि विराज ट्रांसफर के लिए ऐप्लीकेशन दे चुकी है. इधर राजीव का एग्रीमैंट पूरा हो चुका था. उन्होंने आते ही तरुण को व्यस्त तो कर ही दिया, साथ ही शहर की पौश कालोनी में फ्लैट का इंतजाम कर दिया यह कहते हुए, ‘‘शादीशुदा है अब, यहां बहू के साथ जमेगा नहीं.’’ मैं चुप रह गई मगर तरुण ने अब भी मुंह मारना छोड़ा नहीं था. तरुण मेरी मुट्ठी में है, यह एहसास विराज को कराने का कोई मौका मैं छोड़ती नहीं थी. जब भी विराज से मिलना होता, वह मुझे पहले से ज्यादा भद्दी, मोटी और सांवली नजर आती. संतुष्ट हो कर मैं घर लौट कर अपने बनावशृंगार पर और ज्यादा ध्यान देती. फिर मैं ने नोट किया, तरुण का रुख उस के बजाय मेरे प्रति ज्यादा नरम और प्यारभरा होता, फिर भी विराज सहजभाव से नौकरी, ट्यूशन के साथसाथ तरुण की सुविधा का पूरा खयाल रखती. न तरुण से कोई शिकायत, न मांगी कोई सुविधा या भेंट.

‘परी थोड़ी है जो छू लो तो पिघल जाए,’ तरुण ने भावों में बह कर एक बार कहा था तो मैं सचमुच अपने को परी ही समझ बैठी थी. तब तक तरुण की थीसिस पूरी हो चुकी थी मगर अभी डिसकशन बाकी था. और फिर वह दिन आ ही गया. तरुण को डौक्टरेट की डिगरी के ही साथ आटोनौमस कालेज में असिस्टैंट प्रोफैसर पद पर नियुक्ति भी मिल गई. धीरेधीरे उस का मेरे पास आना कम हो रहा था, फिर भी मैं कभी अकेली, कभी बेटियों के साथ उस के घर जा ही धमकती. विराज अकसर शाम को भी सूती साड़ी में बगैर मेकअप के मिडिल स्कूल के बच्चों को पढ़ाती मिलती. ऐसे में हमारी आवभगत तरुण को ही करनी पड़ती. वह एकएक चीज का वर्णन चाव से करता…विराज ने गैलरी में ही बोनसाई पौधों के संग गुलाब के गमले सजाए हैं, साथ ही गमले में हरीमिर्च, हरा धनिया भी उगाया है. विराज…विराज… विराज…विराज…विराज ने मेरा ये स्वेटर क्रोशिए से बनाया है. विराज ने घर को घर बना दिया है. विराज के हाथ की मखाने की खीर, विराज के गाए गीत… विराज के हाथ, पैर, चेहरा, आंखे…

मैं गौर से देखने लगती तरुण को, मगर वह सकपकाने की जगह ढिठाई से मुसकराता रहता और मैं अपमान की ज्वाला में जल उठती. मेरे मन में बदले की आग सुलगने लगी. मैं विराज से अकेले में मिलने का प्रयास करती और अकसर बड़े सहजसरल भाव से तरुण का जिक्र ही करती. तरुण ने मेरा कितना ध्यान रखा, तरुण ने यह कहा वह किया, तरुण की पसंदनापसंद. तरुण की आदतों और मजाकों का वर्णन करने के साथसाथ कभीकभी कोई ऐसा जिक्र भी कर देती थी कि विराज का मुंह रोने जैसा हो जाता और मैं भोलेपन से कहती, ‘देवर है वह मेरा, हिंदी की मास्टरनी हो तुम, देवर का मतलब नहीं समझतीं?’  विराज सब समझ कर भी पूर्ण समर्पण भाव से तरुण और अपनी शादी को संभाल रही थी. मेरे सीने पर सांप लोट गया जब मालूम पड़ा कि विराज उम्मीद से है, और सब से चुभने वाली बात यह कि यह खबर मुझे राजीव ने दी.

‘‘आप को कैसे मालूम?’’ मैं भड़क गई.

‘‘तरुण ने बताया.’’

‘‘मुझे नहीं बता सकता था? मैं इतनी दुश्मन हो गई?’’

विराज, राजीव से सगे जेठ का रिश्ता निभाती है. राजीव की मौजूदगी में कभी अपने सिर से पल्लू नीचे नहीं गिरने देती है, जोर से बोलना हंसना तो दूर, चलती ही इतने कायदे से है…धीमेधीमे, मुझे नहीं लगता कि राजीव से इस बारे में उस की कभी कोई बात भी हुई होगी. लेकिन आज राजीव ने जिस ढंग से विराज के बारे में बात की , स्पष्टतया उन के अंदाज में विराज के लिए स्नेह के साथसाथ सम्मान भी था. चर्चा की केंद्रबिंदु अब विराज थी. तरुण ने विराज को डिलीवरी के लिए घर भेजने के बजाय अपनी मां एवं नानी को ही बुला लिया था. वे लोग विराज को हथेलियों पर रख रही थीं. मेरी हालत सचमुच विचित्र हो गई थी. राजीव अब भी किताबों में ही आंखें गड़ाए रहते हैं. और विराज ने बेटे को जन्म दिया. तरुण पिता बन गया. विराज मां बन गई पर मैं बड़ी मां नहीं बन पाई. तरुण की मां ने बच्चे को मेरी गोद में देते हुए एकएक शब्द पर जोर दिया था, ‘लल्ला, ये आ गईं तुम्हारी ताईजी, आशीष देने.’

बच्चे के नामकरण की रस्म में भी मुझे जाना पड़ा. तरुण की बहनें, बूआओं सहित काफी मेहमानों को निमंत्रित किया गया. कार्यक्रम काफी बड़े पैमाने पर आयोजित किया गया था. इस पीढ़ी का पहला बेटा जो पैदा हुआ है. राजीव अपने पुराने नातेरिश्ते से बंधे फंक्शन में बराबरी से दिलचस्पी ले रहे थे. तरुण विराज और बच्चे के साथ बैठ चुका तो औरतों में नाम रखने की होड़ मच गई. बहनें अपने चुने नाम रखवाने पर अड़ी थीं तो बूआएं अपने नामों पर. बड़ा खुशनुमा माहौल था. तभी मेरी निगाहें विराज से मिलीं. उन आंखों में जीत की ताब थी. सह न सकी मैं. बोल पड़ी, ‘‘नाम रखने का पहला हक उसी का होता है जिस का बच्चा हो. देखो, लल्ला की शक्ल हूबहू राजीव से मिल रही है. वे ही रखेंगे नाम.’’ सन्नाटा छा गया. औरतों की उंगलियां होंठों पर आ गईं. विराज की प्रतिक्रिया जान न सकी मैं. वह तो सलमासितारे जड़ी सिंदूरी साड़ी का लंबा घूंघट लिए गोद में शिशु संभाले सिर झुकाए बैठी थी.

मैं ने चारोें ओर दृष्टि दौड़ाई, शायद राजीव यूनिवर्सिटी के लिए निकल चुके थे. मेरा वार खाली गया. तरुण ने तुरंत बड़ी सादगी से मेरी बात को नकार दिया, ‘‘भाभी, आप इस फैक्ट से वाकिफ नहीं हैं शायद. बच्चे की शक्ल तय करने में मां के विचार, सोच का 90 प्रतिशत हाथ होता है और मैं जानता हूं कि विराज जब से शादी हो कर आई, सिर्फ आप के ही सान्निध्य में रही है, 24 घंटे आप ही तो रहीं उस के दिलोदिमाग में. इस लिहाज से बच्चे की शक्ल तो आप से मिलनी चाहिए थी. परिवार के अलावा किसी और पर या राजीव सर पर शक्लसूरत जाने का तो सवाल ही नहीं उठता. यह तो आप भी जानती हैं कि विराज ने आज तक किसी दूसरे की ओर देखा तक नहीं है. वह ठहरी एक सीधीसादी घरेलू औरत.’’

औरत…लगा तरुण ने मेरे पंख ही काट दिए और मैं धड़ाम से जमीन पर गिर गई हूं. मुझे बातबात पर परी का दरजा देने वाले ने मुझे अपनी औकात दिखा दी. मुझे अपने कंधों में पहली बार भयंकर दर्द महसूस होने लगा, जिन्हें तरुण ने सीढ़ी बनाया था, उन कंधों पर आज न तरुण की बांहें थीं और न ही पंख.

भेडि़या: मीना और सीमा की खूबसूरती पर किसकी नजर थी

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परी हूं मैं: भाग 2- आखिर क्या किया था तरुण ने

बस, एक चिनगारी से भक् से आग भड़क गई. सोच कर ही डर लगता है. भभक उठी आग. हम दोनों एकसाथ चीखे थे. तरुण ने मेरी साड़ी खींची. मुझ पर मोटे तौलिए लपेटे हालांकि इस प्रयास में उस के भी हाथ, चेहरा और बाल जल गए थे. मुझे अस्पताल में भरती करना पड़ा और तरुण के हाथों पर भी पट्टियां बंध चुकी थीं तो रिद्धि व सिद्धि को किस के आसरे छोड़ते. अम्माजी को बुलाना ही पड़ा. आते ही अम्माजी अस्पताल पहुंचीं. ‘देख, तेरी वजह से तरुण भी जल गया. कहते हैं न, आग किसी को नहीं छोड़ती. बचाने वाला भी जलता जरूर है.’ जाने क्यों अम्मा का आना व बड़बड़ाना मुझे अच्छा नहीं लगा. आंखें मूंद ली मैं ने. अस्पताल में तरुण नर्स के बजाय खुद मेरी देखभाल करता. मैं रोती तो छाती से चिपका लेता. वह मुझे होंठों से चुप करा देता. बिलकुल ताजा एहसास.

अस्पताल से डिस्चार्ज हो कर घर आई तो घर का कोनाकोना एकदम नया सा लगा. फूलपत्तियां सब निखर गईं जैसे. जख्म भी ठीक हो गए पर दाग छोड़ गए, दोनों के अंगों पर, जलने के निशान. तरुण और मैं, दोनों ही तो जले थे एक ही आग में. राजीव को भी दुर्घटना की खबर दी गई थी. उन्होंने तरुण को मेरी आग बुझाने के लिए धन्यवाद के साथ अम्मा को बुला लेने के लिए शाबाशी भी दी. तरुण को महीनों बीत चले थे भोपाल गए हुए. लेकिन वहां उस की शादी की बात पक्की की जा चुकी थी. सुनते ही मैं आंसू बहाने लगी, ‘‘मेरा क्या होगा?’’ ‘परी का जादू कभी खत्म नहीं होता.’ तरुण ने पूरी तरह मुझे अपने वश में कर लिया था, मगर पिता के फैसले का विरोध करने की न उस में हिम्मत थी न कूवत. स्कौलरशिप से क्या होना जाना था, हर माह उसे घर से पैसे मांगने ही पड़ते थे. तो इस शादी से इनकार कैसे करता? लड़की सरकारी स्कूल में टीचर है और साथ में एमफिल कर रही है तो शायद शादी भी जल्दी नहीं होगी और न ही ट्रांसफर. तरुण ने मुझे आश्वस्त कर दिया. मैं न सिर्फ आश्वस्त हो गई बल्कि तरुण के संग उस की सगाई में भी शामिल होने चली आई. सामान्य सी टीचरछाप सांवली सी लड़की, शक्ल व कदकाठी हूबहू मीनाकुमारी जैसी.

एक उम्र की बात छोड़ दी जाए तो वह मेरे सामने कहीं नहीं टिक रही थी. संभवतया इसलिए भी कि पूरे प्रोग्राम में मैं घर की बड़ी बहू की तरह हर काम दौड़दौड़ कर करती रही. बड़ों से परदा भी किया. छोटों को दुलराया भी. तरुण ने भी भाभीभाभी कर के पूरे वक्त साथ रखा लेकिन रिंग सेरेमनी के वक्त स्टेज पर लड़की के रिश्तेदारों से परिचय कराया तो भाभी के रिश्ते से नहीं बल्कि, ‘ये मेरे बौस, मेरे गाइड राजीव सर की वाइफ हैं.’ कांटे से चुभे उस के शब्द, ‘सर की वाइफ’, यानी उस की कोई नहीं, कोई रिश्ता नहीं. तरुण को वापस तो मेरे ही साथ मेरे ही घर आना था. ट्रेन छूटते ही शिकायतों की पोटली खोल ली मैं ने. मैं तैश में थी, हालांकि तरुण गाड़ी चलते ही मेरा पुराना तरुण हो गया था. मेरा मुझ पर ही जोर न चल पाया, न उस पर. मौसम बदल रहे थे. अपनी ही चाल में, शांत भाव से. मगर तीसरे वर्ष के मौसमों में कुछ ज्यादा ही सन्नाटा महसूस हो रहा था, भयावह चुप्पियां. आंखों में, दिलों में और घर में भी.

तूफान तो आएंगे ही, एक नहीं, कईकई तूफान. वक्त को पंख लग चुके थे और हमारी स्थिति पंखकटे प्राणियों की तरह होती लग रही थी. मुझे लग रहा था समय को किस विध बांध लूं? तरुण की शादी की तारीख आ गई. सुनते ही मैं तरुण को झंझोड़ने लगी, ‘‘मेरा क्या होगा?’’ ‘परी का जादू कभी खत्म नहीं होगा,’ इस बार तरुण ने मुझे भविष्य की तसल्ली दी. मैं पूरा दिन पगलाई सी घर में घूमती रही मगर अम्माजी के मुख पर राहत स्पष्ट नजर आ रही थी. बातों ही बातों में बोलीं भी, ‘अच्छा है, रमेश भाईसाहब ने सही पग उठाया. छुट्टा सांड इधरउधर मुंह मारे, फसाद ही खत्म…खूंटे से बांध दो.’ मुझे टोका भी, कि ‘कौन घर की शादी है जो तुम भी चलीं लदफंद के उस के संग. व्यवहार भेज दो, साड़ीगहना भेज दो और अपना घरद्वार देखो. बेटियों की छमाही परीक्षा है, उस पर बर्फ जमा देने वाली ठंड पड़ रही है.’ अम्माजी को कैसे समझाती कि अब तो तरुण ही मेरी दुलाईरजाई है, मेरा अलाव है. बेटियों को बहला आई, ‘चाची ले कर आऊंगी.’ बड़े भारी मन से भोपाल स्टेशन पर उतरी मैं. भोपाल के जिस तालाब को देख मैं पुलक उठती थी, आज मुंह फेर लिया, मानो मोतीताल के सारे मोती मेरी आंखों से बूंदें बन झरने लगे हों. तरुण ने बांहों में समेट मुझे पुचकारा. आटो के साइड वाले शीशे पर नजर पड़ी, ड्राइवर हमें घूर रहा था. मैं ने आंसू पोंछ बाहर देखना शुरू कर दिया. झीलों का शहर, हरियाली का शहर, टेकरीटीलों पर बने आलीशन बंगलों का शहर और मेरे तरुण का शहर.

आटो का इंतजार ही कर रहे थे सब. अभी तो शादी को हफ्ताभर है और इतने सारे मेहमान? तरुण ने बताया, मेहमान नहीं, रिश्तेदार एवं बहनें हैं. सब सपरिवार पधारे हैं, आखिर इकलौते भाई की शादी है. सुन कर मैं ने मुंह बनाया और बहनों ने मुझे देख कर मुंह बनाया. रात होते ही बिस्तरों की खींचतान. गरमी होती तो लंबीचौड़ी छत थी ही. सब अपनीअपनी जुगाड़ में थे. मुझे अपना कमरा, अपना पलंग याद आ रहा था. तरुण ने ही हल ढूंढ़ा, ‘भाभी जमीन पर नहीं सो पाएंगी. मेरे कमरे के पलंग पर भाभी की व्यवस्था कर दो, मेरा बिस्तरा दीवान पर लगा दो.’ मुझे समझते देर नहीं लगी कि तरुण की बहनों की कोई इज्जत नहीं है और मां ठहरी गऊ, तो घर की बागडोर मैं ने संभाल ली. घर के बड़ेबूढ़ों और दामादों को इतना ज्यादा मानसम्मान दिया, उन की हर जरूरतसुविधा का ऐसा ध्यान रखा कि सब मेरे गुण गाने लगे. मैं फिरकनी सी घूम रही थी. हर बात में दुलहन, बड़ी बहू या भाभीजी की राय ली जाती और वह मैं थी. सब को खाना खिलाने के बाद ही मैं खाना खाने बैठती. तरुण भी किसी न किसी बहाने से पुरुषों की पंगत से बच निकलता. स्त्रियां सभी भरपेट खा कर छत पर धूप सेंकनेलोटने पहुंच जातीं. तरुण की नानी, जो सीढि़यां नहीं चढ़ पाती थीं, भी नीम की सींक से दांत खोदते पिछवाड़े धूप में जा बैठतीं. तब मैं और तरुण चौके में अंगारभरे चूल्हे के पास अपने पाटले बिछाते और थाली परोसते. आदत जो पड़ गई है एक ही थाली में खाने की, नहीं छोड़ पाए. जितने अंगार चूल्हे में भरे पड़े थे उस से ज्यादा मेरे सीने में धधक रहे थे. आंसू से बुझें तो कैसे? तरुण मनाते हुए अपने हाथ से मुझे कौर खिला रहे थे कि उस की भांजी अचानक आ गई चौके में गुड़ लेने…लिए बगैर ही भागी ताली बजाते हुए, ‘तरुण मामा को तो देखो, बड़ी मामीजी को अपने हाथ से रोटी खिला रहे हैं. मामीजी जैसे बच्ची हों. बच्ची हैं क्या?’

परी हूं मैं: भाग 1- आखिर क्या किया था तरुण ने

जिस रोज वह पहली बार राजीव के साथ बंगले पर आया था, शाम को धुंधलका हो चुका था. मैं लौन में डले झूले पर अनमनी सी अकेली बैठी थी. राजीव ने परिचय कराया, ‘‘ये तरुण, मेरा नया स्टूडैंट. भोपाल में परी बाजार का जो अपना पुराना घर था न, उसी के पड़ोस में रमेश अंकल रहते थे, उन्हीं का बेटा है.’’ सहजता से देखा मैं ने उसे. अकसर ही तो आते रहते हैं इन के निर्देशन में शोध करने वाले छात्र. अगर आंखें नीलीकंजी होतीं तो यह हूबहू अभिनेता प्राण जैसा दिखता. वह मुझे घूर रहा था, मैं हड़बड़ा गई. ‘‘परी बाजार में काफी अरसे से नहीं हुआ है हम लोगों का जाना. भोपाल का वह इलाका पुराने भोपाल की याद दिलाता है,’’ मैं बोली.

‘‘हां, पुराने घर…पुराने मेहराब टूटेफूटे रह गए हैं, परियां तो सब उड़ चुकी हैं वहां से’’, कह कर तरुण ने ठहाका लगाया. तब तक राजीव अंदर जा चुके थे.

‘‘उन्हीं में से एक परी मेरे सामने खड़ी है,’’ लगभग फुसफुसाया वह…और मेरे होश उड़ गए. शाम गहराते ही आकाश में पूनम का गोल चांद टंग चुका था, मुझे लगा वह भी तरुण के ठहाके के साथ खिलखिला पड़ा है. पेड़पौधे लहलहा उठे. उस की बात सुन कर धड़क गया था मेरा दिल, बहुत तेजी से, शायद पहली बार. उस पूरी रात जागती रही मैं. पहली बार मिलते ही ऐसी बात कोई कैसे कह सकता है? पिद्दा सा लड़का और आशिकों वाले जुमले, हिम्मत तो देखो. मुझे गुस्सा ज्यादा आ रहा था या खुशी हो रही थी, क्या पता. मगर सुबह का उजाला होते मैं ने आंखों से देखा. उस की नजरों में मैं एक परी हूं. यह एक बात उस ने कई बार कही और एक ही बात अगर बारबार दोहराई जाए तो वह सच लगने लगती है. मुझे भी तरुण की बात सच लगने लगी.

और वाकई, मैं खुद को परी समझने लगी थी. इस एक शब्द ने मेरी दुनिया बदल कर रख दी. इस एक शब्द के जादू ने मुझे अपने सौंदर्य का आभास करा दिया और इसी एक शब्द ने मुझे पति व प्रेमी का फर्क समझा दिया. 2 किशोरियों की मां हूं अब तो. शादी हो कर आई थी तब 23 की भी नहीं थी, तब भी इन्होंने इतनी शिद्दत से मेरे  रंगरूप की तारीफ नहीं की थी. परी की उपमा से नवाजना तो बहुत दूर की बात. इन्हें मेरा रूप ही नजर नहीं आया तो मेरे शृंगार, आभूषण या साडि़यों की प्रशंसा का तो प्रश्न ही नहीं था. तरुण से मैं 1-2 वर्ष नहीं, पूरे 13 वर्ष बड़ी हूं लेकिन उस की यानी तरुण की तो बात ही अलहदा है. एक रोज कहने लगा, ‘मुझे तो फूल क्या, कांटों में भी आप की सूरत नजर आती है. कांटों से भी तीखी हैं आप की आंखें, एक चुभन ही काफी है जान लेने के लिए. पता नहीं, सर, किस धातु के बने हैं जो दिनरात किताबों में आंखें गड़ाए रहते हैं.’

‘बोरिंग डायलौग मत मारो, तरुण,’ कह कर मैं ने उस के कमैंट को भूलना चाहा पर उस के बाद नहाते ही सब से पहले मैं आंखों में गहरा काजल लगाने लगी, अब तक सब से पहले सिंदूर भरती थी मांग में. तरुण के आने से जाने अनजाने ही शुरुआत हो गई थी मेरे तुलनात्मक अध्ययन की. इन की किसी भी बात पर कार्य, व्यवहार, पहनावे पर मैं स्वयं से ही प्रश्नोत्तर कर बैठती. तरुण होता तो ऐसे करता, तरुण यों कहता, पहनता, बोलता, हंसताहंसाता. बात शायद बोलनेबतियाने या हंसतेहंसाने तक ही सीमित रहती अगर राजीव को अपने शोधपत्रों के पठनपाठन हेतु अमेरिका न जाना पड़ता. इन का विदेश दौरा अचानक तय नहीं हुआ था. पिछले सालडेढ़साल से इस सैमिनार की चर्चा थी यूनिवर्सिटी में और तरुण को भी पीएचडी के लिए आए इतना ही वक्त हो चला है. हालांकि इन के निर्देशन में अब तक दसियों स्टूडैंट्स रिसर्च कंपलीट कर चुके हैं मगर वे सभी यूनिवर्सिटी से घर के ड्राइंगरूम और स्टडीहौल तक ही सीमित रहे किंतु तरुण के गाइड होने के साथसाथ ये उस के बड़े भाई समान भी थे क्योंकि तरुण इन के गृहनगर भोपाल का होने के संग ही रमेश अंकल का बेटा जो ठहरा. इस संयोग ने गुरुशिष्य को भाई के नाते की डोर से भी बांध दिया था.

औपचारिक तौर पर तरुण अब भी भाभीजी ही कहता है. शुरूशुरू में तो उस ने तीजत्योहार पर राजीव के और मेरे पैर भी छुए. देख कर राजीव की खुशी छलक पड़ती थी. अपने घरगांव का आदमी परदेस में मिल जाए, तो एक सहारा सा हो जाता है. मानो एकल परिवार भरापूरा परिवार हो जाता है. तरुण भी घर के एक सदस्य सा हो गया था, बड़ी जल्दी उस ने मेरी रसोई तक एंट्री पा ली थी. मेरी बेटियों का तो प्यारा चाचू बन गया था. नन्हीमुन्नी बेटियों के लिए उन के डैडी के पास वक्त ही कहां रहा कभी. यों तो तरुण कालेज कैंपस के ही होस्टल में टिका है पर वहां सिर्फ सामान ही पड़ा है. सारा दिन तो लेबोरेट्री, यूनिवर्सिटी या फिर हमारे घर पर बीतता है. रात को सोने जाता है तो मुंह देखने लायक होता है. 3 सप्ताहों का दौरा समाप्त कर तमाम प्रशंसापत्र, प्रशस्तिपत्र के साथ ही नियुक्ति अनुबंध के साथ राजीव लौटे थे. हमेशा की तरह यह निर्णय भी उन्होंने अकेले ही ले लिया था. मुझ से पूछने की जरूरत ही नहीं समझी कि ‘तुम 3 वर्ष अकेली रह लोगी?’

मैं ने ही उन की टाई की नौट संवारते पूछा था, ‘‘3 साल…? कैसे संभालूंगी सब? और रिद्धि व सिद्धि…ये रह लेंगी आप के बगैर?’’ ‘‘तरुण रहेगा न, वह सब मैनेज कर लेगा. उसे अपना कैरियर बनाना है. गाइड हूं उस का, जो कहूंगा वह जरूर करेगा. समझदार है वह. मेरे लौटते ही उसे डिगरी भी तो लेनी है.’’ मैं पल्लू थामे खड़ी रह गई. पक्के सौदागर की तरह राजीव मुसकराए और मेरा गाल थपथपाते यूनिवर्सिटी चले गए, मगर लगा ऐसा जैसे आज ही चले गए. घर एकदम सुनसान, बगीचा सुनसान, सड़कें तक सुनसान सी लगीं. वैसे तो ये घर में कोई शोर नहीं करते मगर घर के आदमी से ही तो घर में बस्ती होती है. इन के जाने की कार्यवाही में डेढ़ माह लग गए. किंतु तरुण से इन्होंने अपने सामने ही होस्टलरूम खाली करवा कर हमारा गैस्टरूम उस के हवाले कर दिया. अब तरुण गैर कहां रह गया था? तरुण के व्यवहार, सेवाभाव से निश्ंिचत हो कर राजीव रवाना हो गए.

वैसे वे चाहते थे घर से अम्माजी को भी बुला लिया जाए मगर सास से मेरी कभी बनी ही नहीं, इसलिए विकल्प के तौर पर तरुण को चुन लिया था. फिर घर में सौ औरतें हों मगर एक आदमी की उपस्थिति की बात ही अलग होती है. तरुण ने भी सद्गृहस्थ की तरह घर की सारी जिम्मेदारी उठा ली थी. हंसीमजाक हम दोनों के बीच जारी था लेकिन फिर भी हमारे मध्य एक लक्ष्मणरेखा तो खिंची ही रही. इतिहास गवाह है ऐसी लक्ष्मणरेखाएं कभी भी सामान्य दशा में जानबूझ कर नहीं लांघी गईं बल्कि परिस्थिति विशेष कुछ यों विवश कर देती हैं कि व्यक्ति का स्वविवेक व संयम शेष बचता ही नहीं है. परिस्थितियां ही कुछ बनती गईं कि उस आग ने मेरा, मुझ में कुछ छोड़ा ही नहीं. सब भस्म हो गया, आज तक मैं ढूंढ़ रही हूं अपनेआप को. आग…सचमुच की आग से ही जली थी. शिफौन की लहरिया साड़ी पहनने के बावजूद भी किचन में पसीने से तरबतर व्यस्त थी कि दहलीज पर तरुण आ खड़ा हुआ और जाने कब टेबलफैन का रुख मेरी ओर कर रैगुलेटर फुल पर कर दिया. हवा के झोंके से पल्ला उड़ा और गैस को टच कर गया.

जैसे को तैसा: भाग 3- भावना लड़को को अपने जाल में क्यों फंसाती थी

बातोंबातों में ही एक दिन भावना ने बताया कि उस के पापा प्राइवेट जौब में थे. कोरोना के कारण वह नहीं रहे तो घर चलाने के लिए उसे अपने सपने त्याग कर यह जौब करनी पड़ी. अमन के पूछने पर वह बोली कि उस का सपना तो पायलट बनने का था मगर आज एक छोटी सी नौकरी करने को मजबूर है. फिर वह बताने लगी कि उस के घर में मांपापा के अलावा एक छोटा भाई भी है और उन सब की जिम्मेदारी भावना पर ही है. उस की बातों से अमन काफी इंप्रैस हुआ और बोला था कि कौन कहता है कि लड़कियां बो   झ होती हैं अपने मांबाप पर बल्कि वे तो अपने मातापिता का अभिमान होती हैं और वक्त पड़ने पर उन का सहारा भी बनती हैं.

भावना के पूछने पर अमन ने बताया कि वह यहीं दिल्ली में ही एक बड़ी कंपनी में मैनेजर की पोस्ट पर कार्यरत है और उस के पापा पटना में एसबीआई में ब्रांच मैनेजर हैं. मां हाउसवाइफ हैं और एक छोटा भाई है जो बैंगलुरु में मैडिकल की पढ़ाई कर रहा है.

‘‘क्या बात, तुम्हारी तो पूरी फैमिली ही ऐजुकेटेड है,’’ अपने हाथ को हवा में लहराते हुए भावना बोली.

उस पर अमन बोला कि हां, उस के परिवार में, चाचा, मामा और उन के बच्चे भी ऊंचीऊंची पोस्ट पर हैं. कई तो अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा में रहते हैं. उस पर आश्चर्य से भावना की आंखें फैल गई थीं.

दोनों की दोस्ती अब काफी गहरी हो चुकी थी. छुट्टी में अकसर दोनों साथ समय गुजारते दिख जाते थे. पहले भावना कभी बस तो कभी औटो पकड़ कर औफिस जातीआती थी. मगर अब वह अमन के साथ उस की ही गाड़ी में औफिस जानेआने लगी थी.

एक रोज भावना ने बताया कि वह यहां एक पीजी में रहती है पर पीजी का भाड़ा बहुत ज्यादा है. खाना भी वहां का खाने लायक नहीं होता है. इसलिए रूम शेयरिंग में अगर एक कमरे का घर मिल जाता तो अच्छा होता. उस पर अमन बोला था कि वह भी एक लड़के के साथ, जोकि उस के ही औफिस में काम करता है, रूम शेयरिंग में रहता है. लेकिन अब उस की शादी हो रही है. इसलिए उसे अकेले रहना पड़ेगा. तो क्यों न भावना उस के साथ आ कर रहने लगे?

आइडिया अच्छा था. तय हुआ कि दोनों आधाआधा किराया देंगे और खानेपीने का खर्चा भी मिलबांट कर उठाएंगे. अब दोनों साथ रहने लगे थे. घरबाहर के कामों में भी वे एकदूसरे का पूरा सहयोग करते.

साथ रहने से जल्द ही दोनों के बीच की सारी औपचारिकताएं भी मिट गईं. लेकिन पहल हमेशा भावना की ही तरफ से होती थी और अंजाम तक पहुंचने में अमन उस का भरपूर सहयोग करता था. कोई चूक न हो जाए, इस बात की दोनों पूरी सावधानी बरतते थे. नहींनहीं, भविष्य में इन्हें कोई बंधनवंधन में नहीं बंधना था. यह तो बस जिंदगी के मजे ले रहे थे. अमन के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. वह घर से भी काफी संपन्न व्यक्ति था. लेकिन भावना पर अपने परिवार की पूरी जिम्मेदारी थी. इसलिए अमन जहां तक हो पाता उस से घर खर्च के पैसे नहीं लेता था. घर का भाड़ा भी अकसर वही भर दिया करता था. इस बात के लिए जब भावना उसे ‘थैंक्स’ कहती, तो अमन हंसते हुए कहता, ‘‘दोस्ती में ‘नो थैंक्यू नो सौरी,’’ और फिर दोनों ठहाके लगा कर हंस पड़ते थे.

छुट्टियों पर अमन अकसर भावना को लौंग ड्राइव पर ले जाता. मौल ले जा कर उसे शौपिंग करवाता, होटलों में खाना खिलाता और बदले में भावना उस पर अपना तनमन लुटाती. भावना के पिछले जन्मदिन पर अमन ने उसे ‘आई फोन’ गिफ्ट किया था और इस जन्मदिन पर लैपटौप. बदले में भावना ने भी उसे एक बढि़या सी व्हाइट शर्ट खरीद कर दी थीं. दोनों अपनीअपनी लाइफ खूब ऐंजौय कर रहे थे. कोई टैंशन नहीं, बस मौज ही मौज. साथ रहते हुए 3 साल कैसे हवा की तरह उड़ गए उन्हें पता ही नहीं चला.

अच्छे पैकेज पर अमन ने मुंबई की एक बड़ी कंपनी जौइन कर ली और उधर भावना ने दिल्ली में कोई दूसरी नौकरी पकड़ ली जो पहले से ज्यादा पैसा दे रहा था. लेकिन दोनों अब भी संपर्क में बने हुए थे. उन का जब भी मन करता एकदूसरे से मिलने आ जाते और अपनी भूख शांत कर तृप्त हो जाते. वैसे भी दिल्ली और मुंबई की दूरी है ही कितनी?

एक रोज जब अमन ने बताया कि उस की शादी तय हो गई, तो भावना खुश होते हुए उसे शादी की बधाई देते हुए बोली कि वह उसे अपनी शादी पर तो बुलाएगा न?

‘‘अरे, यह भी कोई पूछने वाली बात है,’’ हंसते हुए अमन ने कहा था.

इस क्रिसमस की छुट्टी पर अमन ने पटना जाने का प्रोग्राम बनाया था मगर भावना ने उसे दिल्ली बुला लिया यह कह कर कि दोनों खूब मजे करेंगे. अमन ने भी सोचा, अब तो उस की शादी होने ही वाली है, तो क्यों न 1-2 दिन भावना के साथ मजे कर लिए जाएं. 3-4 दिन दिल्ली रह कर वह वहीं से पटना चला गया.

रिटायरमैंट के बाद अमन के मांपापा हमेशा के लिए यहीं दिल्ली रहने आ गए और अमन ने भी मुंबई की कंपनी छोड़ फिर दिल्ली में ही जौब पकड़ ली.

अमन और भावना के बीच पहले की तरह ही नौर्मल बातें होतीं. लेकिन अमन जिस बात को इतना नौर्मल सम   झ रहा था, अब वह नौर्मल नहीं रही थी.

उस रात अचानक भावना ने फोन कर अमन से यह कह कर 50 हजार रुपए की मांग कर दी कि उस के पापा की तबीयत बहुत खराब है और अभी उस के पास इतने पैसे नहीं हैं. वह जल्द ही उस के पैसे लौटा देगी. दूसरी बार उस ने अपने भाई की एडमिशन का कह कर पैसे मांगे कि अगर समय पर पैसे नहीं भरे तो एडमिशन की डेट निकल जाएगी. ऐसा करकर के वह जबतब अमन से पैसे    झटकने लगी और हर बार पैसे लेते समय वह इतना जरूर कहती कि वह उस के पैसे जल्द ही लौटा देगी और अमन चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाता. अभी तक वह धीरेधीरे कर अमन से करीब 2 लाख से ज्यादा ले चुकी थी.

मगर हर बात की एक हद होती है और अमन की अपनी भी जिंदगी थी, उस के भी खर्चे थे. इसलिए इस बार उस ने पैसे देने से साफ मना कर दिया और यह बात भावना को चुभ गई. अपना असली रंग दिखाते हुए बोली, ‘‘वैसे अमन हमारे नाजुक पल के मैं ने कुछ वीडियो बना रखे हैं, देखोगे? कुछ तसवीरें भी खींची थीं. अभी भेजती हूं. बताना पसंद आईं या नहीं,’’ बोल कर वह अजीब तरह से हंसी.

वीडियो और तसवीरें देख कर अमन के तो पैरों तले की जमीन ही खिसक गई.

‘‘ये ये सब क्या है भावना? प्लीज, इन्हें डिलीट करो अभी,’’ अमन घबराया सा बोला.

‘‘अरे, तुम तो घबरा गए और डिलीट क्यों करूं इन्हें? कितना तो अच्छी हैं, देखो न, नहीं लग रहा है कि तुम मेरे साथ जबरदस्ती कर रहे हो और मैं तुम से खुद को बचाने की कोशिश कर रही हूं… रो रही हूं… गिड़गिड़ा रही हूं… तुम्हारे सामने दया की भीख मांग रही हूं और तुम मु   झे दबोचे हुए हो… हांहां, जानती हूं यह सब    झूठ है बल्कि मैं ने ही तुम्हें ऐसा करने को कहा था. लेकिन यह बात मानेगा कौन क्योंकि यह वीडियो और फोटो तो यही बता रहे हैं कि तुम मेरा बलात्कार कर रहे हो,’’ बोल कर भावना ठहाका लगा कर हंसी.

मगर अमन को सम   झ नहीं आ रहा था कि भावना ने ये वीडियो कब और क्यों बनाया और तस्वीरें भी तो यही कह रही हैं कि उस ने उस के साथ जबरदस्ती की है. लेकिन उस ने तो कभी उस के साथ कोई जबरदस्ती नहीं की, बल्कि जब भी उन के बीच रिश्ता बना, दोनों की मरजी से बना.

हां, याद आया. उस क्रिसमस पर जब वह भावना से मिलने दिल्ली गया था तब मजाक में ही भावना बोली थी, ‘‘चलो, आज हम कुछ नए तरीके से सैक्स का मजा लेते हैं. ऐसा लगे कि तुम मेरा बलात्कार कर रहे हो और मैं खुद को तुम से बचाने की कोशिश कर रही हूं, गिड़गिड़ा रही हूं, तुम्हारे सामने, दया की भीख मांग रही हूं.’’

उस पर अमन ने हंसते हुए बोला भी था कि यह सब नाटक करने की क्या जरूरत है भावना? उस पर भावना बोली थी, ‘‘अरे, कर के देखो तो सही बहुत मजा आएगा.’’

मगर अमन को यह नहीं पता था कि भावना की यह सब सोचीसम   झी चाल है. उस ने जानबू   झ कर अमन से ऐसा करवाया था ताकि वीडियो बना कर बाद में उसे ब्लैकमेल कर सके.

‘‘सही सोच रहे हो तुम, मैं ने यह वीडियो जानबू   झ कर ही बनाया था ताकि मौका पड़ने पर इसे इस्तेमाल कर सकूं? लेकिन सोचो, अगर यह वीडियो और तसवीरें पुलिस के पास चली गईं तो क्या होगा?’’ अपने अधर को टेढ़ा कर भावना मुसकराते हुए बोली, ‘‘वैसे, मैं ऐसा होने नहीं दूंगी. लेकिन सोच रही हूं रागिनी को सैंड कर दूं. उसे बहुत पसंद आएगा. तुम क्या कहते हो?’’

‘‘तुम… तुम चाहती क्या हो?’’ अमन चीख पड़ा था.

‘‘पैसे और जब भी बुलाऊं आना पड़ेगा,’’ इठलाते हुए भावना बोली. पैसे देने से मना करने पर वह अमन को पुलिस का डर दिखाती. कहती कि पूरी दुनिया में उसे बदनाम कर देगी. फिर उसे मुंह छिपाने के लिए जगह नहीं मिलेगी और डर कर अमन उस की हर गलतसही मांग को मानता जा रहा था. भावना ने उस की हंसतीखेलती जिंदगी को मजाक बना कर रख दिया था. लेकिन अब वह इन सब से थकने लगा था. मन करता नींद की गोलियां खा कर सो जाए या किसी ट्रेन के नीचे आ जाए. लेकिन यह सब इतना आसान भी नहीं था. अपनी जिस शादी को ले कर अमन इतना खुश था, अब उसी से उसे डर लगने लगा था. सोचता, अगर रागिनी को यह सब पता चल गया तो क्या होगा, उलटेपुलटे विचार आते उस के मन में और वह सिहर उठता.

भावना के फोन का स्पीकर खराब हो गया था. इसलिए उस ने अमन को व्हाट्सऐप मैसेज कर 1 लाख रुपए ले कर आने को बोल दिया वह भी तुरंत. लेकिन अमन के पास सच में पैसे नहीं थे अभी. इसलिए उस ने उसे पैसे देने से मना कर दिया.

‘‘फिर अंजाम क्या होगा यह भी सम   झ लो तुम,’’ मैसेज कर के ही भावना बोली, ‘‘कल शाम 5 बजे पैसे तैयार रखना. सम   झ लो नहीं तो मैं यह वीडियो और तसवीरें पुलिस के पास पहुंचा दूंगी और तुम्हारी उस रागिनी को भी. फिर मत कहना कि बताया नहीं था.’’

अमन ने उस की बातों का फिर कोई जवाब नहीं दिया और उन्हीं कपड़ों में घर से बाहर निकल गया. रागिनी जब अमन से मिलने उस के घर पहुंची तो छाया ने बताया कि पता नहीं सुबह से ही वह कहां गया है? कुछ बता कर भी नहीं गया है. इसलिए वह खुद ही उसे फोन कर के पूछ ले. रागिनी ने जब अमन को फोन मिलाया तो पता चला वह अपना फोन घर पर ही भूल गया है. पता नहीं रागिनी का क्या मन हुआ कि वह उस का व्हाट्सऐप खोल कर देखने लगी. भावना और अमन का मैसेज पढ़ कर पहले तो वह हक्कीबक्की रह गई, लेकिन जब भावना का

डीपी खोल कर गौर से देखा, तो शौक्ड रह गई क्योंकि भावना वही लड़की थी जिस के कारण रागिनी के एक अजीज दोस्त, श्लोक ने अपनी जान दे दी थी. मगर कोई सुबूत न होने के

कारण पुलिस को किसी पर कोई शक नहीं हो पाया था और गुनहगार बच निकला था. लेकिन मरतेमरते श्लोक ने रागिनी को भावना की सारी सचाई बता दी थी. आज फिर वही सब अमन के साथ होते देख रागिनी का खून खौल उठा. उसे डर था कि कहीं श्लोक की तरह अमन भी कुछ कर न ले.

रागिनी को सब सम   झ में आने लगा कि अचानक अमन का व्यवहार इतना क्यों बदल गया? क्यों वह हर बात पर    झुं   झला उठता? क्यों शादी को ले कर कोई रुचि नहीं दिखाता? भावना ने और भी कई लड़कों को अपनी सुंदरता के जाल में फंसा कर प्राइवेट पल के वीडियो का भय दिखा कर उन्हें अपना निशाना बनाया था.

रागिनी ने फटाफट अमन के फोन से भावना के सारे मैसेज, फोटो, वीडियो अपने फोन में ट्रांसफर कर लिए और छाया से यह बोल कर घर से निकल गई कि अमन ने उसे गार्डन रैस्टोरैंट में मिलने बुलाया है तो वह जा रही है. लेकिन घर से वह यह सोच कर निकली कि अब वह भावना को नहीं छोड़ेगी. उसे उस की करनी की सजा दिलवा कर रहेगी.

अमन कहीं कुछ ऐसावैसा न कर ले इसलिए रागिनी ने पहले उसे ढूंढ़ने की कोशिश की. मिलने पर वह अमन को एक शांत पार्क में ले गई. अमन अभी भी चुप था. रागिनी ने अपनी हथेलियों के बीच उस के हाथ को प्यार से दबाते हुए फिर पूछा कि भावना से उस का क्या रिश्ता है, तो पहले तो वह    झूठ बोल गया कि वह किसी भावना को नहीं जानता है, लेकिन जब उस ने सारे मैसेज, जो भावना ने उसे भेजे थे, दिखाए तो वह टूट गया. अपने आंसू पोंछते हुए उस ने 1-1 कर सारी बातें रागिनी के सामने रख दी और कहने लगा कि अब वह जीना नहीं चाहता.

मगर रागिनी उसे धैर्य बंधाते हुए बोली, ‘‘मरने से क्या होगा? यही कि उस के मांपापा भी नहीं बचेंगे. उसे तो यह सोचना है कि भावना को कैसे सबक सिखाया जाए ताकि वह फिर किसी को अपना शिकार न बना सके और तुम ने मु   झे यह सब क्यों नहीं बताया? यह सोच कर कि मैं तुम्हें गलत सम   झूंगी? पागल हो? क्या मैं अपने अमन को नहीं जानती. चिंता मन करो सबकुछ ठीक हो जाएगा. चलो, अब उठो, घर चलते हैं. वहां आंटीअंकल तुम्हारे लिए परेशान हो रहे हैं,’’ अमन का हाथ पकड़ कर रागिनी बोली तो वह उस के पीछे चल पड़ा.

रागिनी की बातों ने अमन को एक राहत तो पहुंचाई पर डर अब भी उस के दिल में बैठा हुआ था कि जब छाया को यह सब पता चलेगा तो क्या होगा?

छाया जब अमन के लिए उस के कमरे में खाना ले कर पहुंची, तो उस का मन किया मां को पकड़ कर खूब रोए. बेटे की हालत देख कर छाया को उस की चिंता होने लगी. लेकिन अभी भी वह सम   झ नहीं पा रही थी कि उसे हुआ क्या है. इधर रागिनी कुछ जरूरी काम का बता कर वहां से निकल गई. अमन ने तो सोच लिया था अब उसे जीना ही नहीं है. लेकिन रागिनी ने कुछ और ही सोच रखा था.

पहले तो रागिनी ने भावना से दोस्ती गांठी. फिर एक अच्छी दोस्त बनने का दिखावा कर उस का विश्वास जीता यह कह कर कि वह अपनी कंपनी में उसे बढि़या जौब दिलवा देगी जहां उसे पहले से ज्यादा सैलरी मिलेगी. अकसर दोनों साथ में शौपिंग करते और मूवी भी देखने जाते थे.

उस संडे दोनों ने ‘कटहल’ मूवी देखने का प्रोग्राम बनाया. मूवी देखने के बाद दोनों एक रैस्टोरैंट में खाना खाने गए. जहां रागिनी ने यह बोल कर भावना से उस का फोन मांग लिया कि उसे एक जरूरी मैसेज करना है और उस का नैट बहुत स्लो चल रहा है. फिर उस ने भावना के फोन से सारे डिटेल्स अपने फोन में ट्रांसफर कर लिए जिसे भावना को भनक तक नहीं लगी.

रागिनी अमेरिका के कई हैकर्स को जानती थी जो उसी की कंपनी में काम करते थे. उस ने भावना के बारे में उन्हें बताया और उन से मदद मांगी. हैकर्स ने उस से भावना के फोन डिटेल्स मांगी जो रागिनी ने उन्हें दे दी और ये सारे डिटेल्स हैकर्स के लिए काफी थीं.

दूसरे दिन ही हैकर्स भावना का लड़कों को ब्लैकमेल करने का धंधा पकड़ लेते हैं. भावना कुछ सम   झ पाती, उस से पहले ही पुलिस उस के हाथों में हथकड़ी लगा दी. वह तो सोच भी नहीं सकती थी कि रागिनी ने सिर्फ इसलिए उस की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया था क्योंकि वह उसे जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाना चाहती थी और जिस में आज वो कामयाब हो चुकी थी.

खैर, जैसे को तैसा, तो होना ही था. आखिर कब तक वह अपनी सुंदरता की आड़ में अमन और राहुल जैसे लड़कों का फायदा उठाती. अमन की चेहरे की रौनक अगर वापस आई थी तो वह रागिनी की वजह से. आज दोनों अपनी शादीशुदा जिंदगी में खुश है और भावना जेल की सलाखों के पीछे है.

कुछ हैकर्स ऐसे भी होते हैं जो सही उद्देश्य के लिए काम करते हैं और उन्हें एथिकल हैकर्स या व्हाइट हैकर्स भी कहा जाता है.

भेडि़या: भाग 3- मीना और सीमा की खूबसूरती पर किसकी नजर थी

हफ्ता निकल गया. डर थोड़ा कम तो हुआ पर गया नहीं. झुग्गी के ठीक सामने खूब घना जामुन का पेड़ है. गरमियों के मौसम में कई बस्ती वाले रात को इसी पेड़ के नीचे सोते हैं और सर्दियों में सभी बुजुर्ग यहां धूप सेंकते हैं. कुछ बच्चे कंच्चे और क्रिकेट भी खेलते हैं.

अकसर मीना दरवाजे पर खड़ी हो कर बच्चों के खेल का आनंद लेती है. 2 दिन से 18-19 साल के एक लड़के को पेड़ के नीचे डेरा डाले देख रही है. मैलेकुचैले कपड़ों में यह लड़का चुपचाप    झुग्गी को ताकता रहता है. शुरू में मीना को अजीब सा लगा. फिर जल्द ही सम   झ आ गया, मुसीबत का मारा है बेचारा. भोले से चेहरे वाले इस लड़के के करीब बैठने का जी करता.

आजकल दोनों बहनों के बीच वार्त्ता का विषय, मुच्छड़ नहीं पेड़ के नीचे बैठा वह लड़का है.

मीना को बड़ा तरस आता है इस बेचारे पर. जी करता है पूछे कि वह ऐसा क्यों है?

नहीं, दोनों बहनें अपनी परिधि से घिरी हैं. किसी ने उन्हें लड़के से बात करते देख लिया तो बात उछालने का कोई मौका नहीं छोड़ेगा. पूरी बस्ती है ही ऐसी. इस से अच्छा है इसे इसी के हाल पर छोड़ देते हैं. पर बच्चे अकसर पागल कह कर जब पत्थर मारते तो बहनों का जी तड़प जाता. संवेदना तो बस्ती वालों की पहले ही मर चुकी है. किसी के दुख को ये क्या सम   झेंगे?

एक रोज मीना मौका देख लड़के के पास जा पहुंची. बोली, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’

‘‘कमल,’’ लड़के ने   झिझकते हुए बताया.

‘‘कहां के रहने वाले हो?’’

‘‘मंतर गांव है. मेरा घर में कोई नहीं है. गांव में बाढ़ आई सब तबाह हो गया. तुम इन्हीं    झुग्गियों में रहती हो? मेरे गांव में तुम्हारे जैसी एक लड़की थी. उस का नाम मीना था. तुम्हारा क्या नाम है?’’

वह हंस पड़ी, ‘‘मेरा नाम भी मीना है.’’

अगले पल दोनों समवेत स्वरों में हंसे. मीना आज कई दिनों बाद हंसी थी वो भी खुल कर.

अगले पल चुप हो लड़के ने मीना पर आंखें टिका दीं और बोला, ‘‘कितने अजीब हैं यहां के लोग. सब देखता हूं पर चुप रहता हूं. यहां मु   झे अपना कहने वाला कोई नहीं है. थोड़े दिन में पानी उतर जाएगा तो मैं चला जाऊंगा.’’

मीना का मन लड़के की बात के समर्थन में बहुत कुछ कहना चाहता था पर विवश है. फिर भी बोल, ‘‘वह क्या नाम बताया?’’

‘‘नाम? तुम ने पूछा तो था? कमल है

मेरा नाम,’’ मुसकराहट की पतली सी रेखा खिंच गई थी.

गजब का आकर्षण था कमल के चेहरे पर.

‘‘तुम ने देखा होगा वह मुच्छड़ दारू पी कर सारी बस्ती में घूमता रहता है. लड़कियों को देख गंदेगंदे इशारे करता है. जी करता है गोली मार दूं और वह मोटा लाला. फिर वह तिरपाली बनिया कितनी बकवास करता है? देखा है न? मन करता है इन सब को इकट्ठा कर के आग लगा दूं.’’

‘‘किसकिस को गोली मारोगी? सब गंदगी में पले हैं. मु   झे भी पागल कह कर मेरी खिल्ली उड़ाते रहते हैं.’’

‘‘तुम ठीक कहते हो. सब यहां ठेकेदार के पाले हुए गुंडे हैं. तभी तो कोई कुछ नहीं कहता. अच्छा, मैं चलती हूं.’’

सामने से मोटा लाला खींसें निपोरता हुआ आ कर खड़ा हो गया. बोला, ‘‘नईनई दोस्ती हुई है. कभी हमें भी अपना यार बना लो, कसम से पूरी दुकान तुम्हारे नाम कर दूंगा…’’’ और मीना के बाजू को रगड़ता हुआ निकल गया. मीना का शरीर कांप गया. कमल की आंखों में भी गुस्सा था.

अपमान का घूंट पी कर    झुग्गी पर आ गई. चुप, डरी हुई. अच्छा हुआ घर पर अम्मां नहीं है. बापू भी गायब था. बहन सोई पड़ी है. मीना का मन हलका था. न जाने कितने दिनों के बाद उसे लगा था, वह अकेली ही नहीं बल्कि कोई और भी इस गंदे माहौल से आजिज है. कमल ने मन का कमल खिला दिया था.

शाम के 7 बजे हैं. अम्मां देर रात तक लौटेगी. कह रही थी कोठी में पार्टी है. दरवाजा बंद कर के लेट गई.

कोठी नंबर 26 में पार्टी जूम पर है. ड्रिंक्स का दौर थम ही नहीं रहा. पी कर गिलास फेंकने की भी यह नई रीत है. रात के 10 बज चुके हैं. आधी  बोतलें खाली हो गई हैं. ठंड में सौ गिलासों को धोना आसान नहीं है.

चंपा के हाथ थक गए हैं. बारबार टूटे गिलासों को    झाड़ू से समेट कर डस्टबिन में डालतेडालते कांच के टुकड़ों से उगलियां घायल हो चुकी हैं.

अचानक लगा बसेसर गार्ड के पास गेट पर बैठा है. धुली कमीज और पाजामे में बसेसर ही तो था.

यहां कैसे? घर में लड़कियां अकेली हैं, यह यहां? भला पूछूं यहां क्या कर रहा है?

हाथ में लोहे की मूठ वाला डंडा लिए गार्ड से हंसहंस कर बतिया रहा था. चमेली का गुस्सा  7वें आसमान पर था. जी करा, लाठी से मारमार कर अधमरा कर दे. लगता है मुफ्त की दारू इसे यहां खींच लाई है. उस ने सपने में कभी न सोचा था कि ऐसी कुत्ती चीज के लिए लार टपकाता कोठी तक पहुंच जाएगा. पता होता, बेटियों को छोड़ यहां आ टपकेगा तो कभी न आती. भाड़ में जाएं हजार रुपए. यहां पता नहीं कितनी देर और लगेगी. चल कर पहले बसेसर की खबर लेती हूं. लेकिन यह क्या अचानक भेडि़या… भेडि़या  का शोर सुनाई दिया.

अफरातफरी मच गई. डर के मारे लोग एकदूसरे पर गिरने लगे. उस ने भी देखा कुत्ते जैसा था भयानक आंखें जैसे जलते हुए अंगारे हों. डर कर पलंग के नीचे जा छिपी. सूखे पत्ते सा कांप गया था मन और तन.

चंपा ने देखा. बसेसर कूद कर उस के सामने आ गया. लोहे की मूठ वाली लाठी उस के हाथ में थी, छलांग लगा कर खिड़की से कूद कर भागने की कोशिश में था भेडि़या. अचानक ग्रिल में जा फंसा.

आधा तन अंदर तो सिर का हिस्सा बाहर था. बसेसर ने मूठ वाली लाठी से सिर पर कम से कम 20-25 वार किए होंगे.

हल्ला मच गया, ‘‘बसेसर ने भेडि़ए को मार डाला.’’

लोगों ने बसेसर की पीठ ठोंकी, ‘‘आज यह न होता तो भेडि़ए ने 2-4 का खात्मा तो कर ही देना था.’’

चमेली पति की तारीफ सुन कर खुश हो रही थी. उसे अपने लंगड़े बहादुर पति पर पहली बार जबरदस्त प्यार उमड़ा.

पार्टी खत्म हो चुकी थी. लोग घर के लिए निकल कर कार पार्किंग की तरफ बढ़ लिए.

बसेसर अभी तक गार्ड के पास था. दारू जो नहीं मिली थी. गार्ड को आंख मार कर बोला, ‘‘इतनी दिलेरी दिखाई है, ईनाम तो मिलना ही चाहिए. जा भाई, अंदर से एक बोतल तो ला दे.’’

बोतल स्वैटर में छिपा कर निकल भागा और सांस झुग्गी पर पहुंच कर ही ली थी.

पीछेपीछे चमेली भी जा पहुंची. न जाने कहां से चमेली की चाल में दम भर गया. वह ठंड से कांप रही थी, परंतु दौड़ लगाने से पसीना आ गया.

हाय यह क्या? दरवाजे खुले थे. घर में अंधेरा कैसे? लड़कियां कहां गईं?

‘‘मीना?’’ कोई जवाब न था. मन सनाका खा गया. क्या हुआ? कहीं उन्हें भेडि़या तो नहीं खा गया? सड़क पर लगे लैंप पोस्ट की मरी हुई लाइट घर के अंदर पहुंच रही थी.

चंपा ने देखा, दोनों लड़कियां खून से लथपथ फर्श पर बेसुध पड़ी हैं.

‘‘मीना…’’ मुंह से चीख निकल गई. चीख काफी दूर तक लोगों ने सुनी. दौड़ कर पड़ोसी भी आ गए. किसी पड़ोसी ने अंदाज से बिजली का बटन दबाया. लाइट में सभी ने देखा. कमरे के फर्श पर लड़कियां निर्वस्त्र पड़ी थीं. टांगों के बीच से निकली खून की धार घर की चौखट को पार कर बाहर तक पहुंच गई थी. हाय यह क्या? यह किस ने किया है? जरूर किसी कसाई गुंडे का काम है. तन को कपड़े से ढक कर चंपा ने बेटियों के मुंह पर पानी के छींटे मारे… कुछ देर बाद दोनों को होश आ गया. दोनों ने आंखें खोल कर भय से इधरउधर देखा और फिर बेहोश हो गईं.

लोग कानाफूसी कर रहे थे. जितने मुंह, उतनी बातें. पूछनाकहना क्या था, सब को सम   झ में आ रहा था. लड़कियां के साथ दरिंदगी हुई है, लेकिन कौन है वह? सभी ने होंठ सी लिए थे. एक ही आवाज गूंज रही थी, पुलिस को बुलाओ, हौस्पिटल ले चलो.

थोड़ी देर में पुलिस आ गई. लड़कियां हौस्पिटल पहुंच गईं. बदहवास चंपा, हौस्पिटल के बरामदे में बेचैनी से चक्कर लगा रही थी और बसेसर का रात का हैंगओवर अभी उतरा नहीं था. दोनों पतिपत्नी पता नहीं किसकिस को गालियां देते जा रहे थे.

बड़ी सुबह दोनों को होश आया. फटी नजरों से आसपास देख रही थीं. पुलिस बयान लेगी. किसी ने आ कर बताया. यह भी बताया कि पुलिस को शक है कि यह कमल का ही काम है सो पकड़ कर ले गई है. कमल को पुलिस ने पीटा भी है. वह लौकअप में है.

‘‘कितने लोग थे?’’ पुलिस वाले ने मीना से पूछा.

इधरउधर देख कर बोली, ‘‘भेडि़या.’’

बारबार दोनों से यही प्रश्न किया. दोनों ने घबराते हुए, ‘‘भेडि़या,’’ यही उत्तर दिया.

पुलिस वाले ने कहा, ‘‘ये अभी कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं हैं. मैं फिर आऊंगा.

चंपा ने कोठी का काम छोड़ दिया. अफसोस मनाती है हजार के लालच में अस्मत गवां दी. उस रात न जाती तो यह सबकुछ भी न होता. मीना, सीमा इतनी सहम गई हैं कि घर से बाहर नहीं जातीं. जानती है परीक्षा होने वाली है नहीं देंगी तो साल बरबाद हो जाएगा. कितनी मजबूर हैं वे. जब से निर्दोष मासूम कमल के बारे में पता लगा है बस यही रटती हैं कि वह तो बेचारा भेड़ है, भेडि़या तो कोई और ही है. देखना, निर्दोष को फंसा कर, भेडि़या भी नहीं बचेगा. देखना अम्मां, एक दिन यही होगा.

बसेसर ने भी दारू का अड्डा छोड़ दिया. इस हादसे ने पूरे परिवार को हिला कर रख दिया. इसीलिए छत के लिए, चद्दरें भी खरीद लाया है. बस बल्लियों पर रख कर लोहे के कड़े से कस दूंगा.

लोहे के दरवाजे भी खरीद लिए हैं. 2-3 दिन में बस चढ़ा देगा. सोच रहा है कल ही यह काम कर लेता हूं.

बाप को उदास देख लड़कियों को भी अच्छा नहीं लगता. आजकल दोनों अम्मां से चिपट कर सोती हैं.

बसेसर इतनी ठंड में भी    झुग्गी से बाहर सोता है. रात गहरी हो रही है. सन्नाटा ऐसा कि सन्नाटा भी डर जाए. बसेसर ने कसम खाई है अब कभी नहीं पीएगा. वैसे वह जानता है असली भेडि़या कौन है? बसती में जब भी मुच्छड़ को देखता है, लगता है उस से कहा जा रहा है, बसेसर, अंगारों पर चलना आसान है पर उस से पंगा मत लेना.

यह बात कहीं उस के अंदर के बसेसर को विपरीत दिशा में सोचने को मजबूर करती है. कहीं बेहद मजबूत पाता है अपने को… किसी से डरता नहीं है. कुछ दिन पहले उस ने कोठी में खिड़की की ग्रिल में फंसा कर जंगल से कूद कर आए भेडि़ए का काम तमाम किया था. सब जानते हैं. सोचतेसोचते कब सो गया पता ही लगा.

अचानक झुग्गी के अंदर से ‘धम्म’ की आवाज से नींद खुली. लपक कर लाठी उठाई. अंदर की ओर भागा सामने मुच्छड़ था जिसे चंपा ने गरदन से पकड़ रखा था मीना और सीमा पास में पड़ी लोहे की रौड से सिर पर वार पर वार कर रही थीं. 2-3 रौड पड़ने के बाद वह बेहोश हो गया.

चारों ने मिल कर, घसीट कर    झुग्गी से बाहर ला पटका. रात के 2 बजे थे. कड़ाके की ठंड. सड़क सुनसान थी. डाल दिया भेडि़ए को बीच सड़क पर…

आज लड़कियों के लिए तो कैदमुक्ति थी. तभी चारों ने चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘‘भेडि़या… भेडि़या… भेडि़या…’’

देखते ही देखते हाथों में लाठी, डंडे, बल्लम, बरछे के साथ भीड़ उमड़ पड़ी. रास्ते में अंधेरे में कौन किस के पैरों तले रौंदा जा रहा है, किसी को कुछ पता न था.

चंपा, बसेसर मीना और सीमा सड़क के सुरक्षित कोने पर खड़े चुपचाप देखते रहे.

अगले दिन अखबार में खबर छपी, मालाड गांव से सटे जंगल से आए एक भेडि़ए ने पास की कालोनी से लगी    झुग्गी के एक निवासी पर हमला कर के घायल कर दिया. अस्पताल ले जाते हुए रास्ते में घायल की मौत हो गई.

दूसरे दिन चंपा ने देखा मुसकराती मीना और सीमा अपनाअपना बस्ता ले कर स्कूल के लिए निकल पड़ी थीं.

छलिया कौन: क्या हुआ था सुमेधा के साथ

सब कहते हैं और हम ने भी सुना है कि जिंदगी एक अबूझ पहेली है. वैसे तो जिंदगी के कई रंग हैं, मगर सब से गहरा रंग है प्यार का… और यह रंग गहरा होने के बाद भी अलगअलग तरह से चढ़ता है और कईकई बार चढ़ता है. अब प्यार है ही ऐसी बला कि कोई बच नहीं पाता. ‘प्यार किया नहीं जाता हो जाता है…’ और हर बार कोई छली जाती है… यह भी सुनते आए थे.

आज भी ‘छलिया कौन’ यह एक बड़ा प्रश्नचिन्ह बन कर मुंहबाए खड़ा है. प्यार को छल मानने को दिल तैयार नहीं और प्यार में सबकुछ जायज है, तो प्यार करने वाले को भी कैसे छलिया कह दें? प्यार करने वाले सिर्फ प्रेमीप्रेमिका नहीं होते, प्यार तो जिंदगी का दूसरा नाम है और जिंदगी में बहुतेरे रिश्ते होते हैं. मसलन, मातापिता, भाईबहन, मित्र और इन से जुड़े अनेक रिश्ते…

ममत्व, स्नेह, लाड़दुलार और फटकार ये सभी प्यार के ही तो स्वरूप हैं. इन सब के साथ जहां स्वार्थ हो वहां चुपके से छल भी आ जाता है.

वैसे, जयवंत और वनीला की कहानी भी कुछ इसी तरह की है. कथानायक तो जयवंत ही है, मगर नायिका अकेली वनीला नहीं है. वनीला तो जयवंत और उस की पत्नी सुमेधा की जिंदगी में आई वह दूसरी औरत है जिस की वजह से सुमेधा अपनी बेटी मीनू के साथ अकेली रहने के लिए विवश है. सुमेधा सरकारी स्कूल में शिक्षिका है और जयवंत सरकारी कालेज में स्पोर्ट्स टीचर है. दोनों की शादी परिवारजनों ने तय की थी.

सुमेधा सुंदर और सुशील है और जयवंत के परिजनों को दिल से अपना मान कर सब के साथ सामंजस्य बैठा कर कुशलतापूर्वक घर चला रही है. शादी के 10 सालों बाद सरकारी काम से जयवंत को दूसरे शहर में ठौर तलाशना पड़ा. काफी प्रयासों के बाद भी सुमेधा का ट्रांसफर नहीं हुआ. जयवंत हर शनिवार शाम को आता और पत्नी व बेटी के साथ 2 दिन बिता कर सोमवार को लौट जाता. मीनू भी प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ रही थी तो सुमेधा ने परिस्थितियों से समझौता कर लिया. सुमेधा सप्ताहभर घर की जिम्मेदारी अकेली उठाती रहती और सप्ताहांत में घर आए पति के लिए भी समय निकालती.

जयवंत के कालेज में एक प्राध्यापिका थी वनीला, जो अधिक उम्र की होने के बाद भी अविवाहित थी. वह सुंदर, सुशील और संपन्न थी. मनोनुकूल वैवाहिक रिश्ता न मिलने से सब को नकारती रही. उम्र के इस सोपान पर तो समझौता करना ही था, जो उस के स्वभाव में नहीं था, इसलिए आजीवन अविवाहित रहने का मन बना चुकी थी. अक्ल और शक्ल दोनों कुदरत ने जी खोल कर दी थी तो अकड़ भी स्वाभाविक. कालेज में सब को अपने से कमतर ही समझती थी.

जयवंत और वनीला ने जब पहली दफा एकदूसरे को देखा तो दोनों का दिल कुछ जोर से धड़का. जयवंत तो था ही स्पोर्ट्समैन तो उस का गठीला शरीर था. उसे देख कर वनीला को अपना संकल्प कमजोर पड़ता जान पड़ा. उसे लगा कि कुदरत ने उस के लिए योग्य जीवनसाथी बनाया तो सही, मगर मिला देर से. दोनों देर तक स्टाफरूम में बैठे रहते, जबरदस्ती का कुछ काम ले कर.

दोनों को पहली बार पता चला कि वे कितने कर्मठ हैं. एकदूसरे की उपस्थिति मात्र से वे उत्साह से लबरेज हो तेजी से काम निबटा देते. अधिकांश कार्यकारिणी समितियों में दोनों का नाम साथ में लिखा जाने लगा, क्योंकि इस से समिति के अन्य सदस्य निश्चिंत हो जाते थे. दोनों को किसी अन्य की उपस्थिति पसंद भी नहीं थी.

स्पोर्ट्स समिति की कर्मठ सदस्य और अधिकांश गतिविधियों की संयोजक अब वनीला मैडम होती थीं. यह अलग बात है कि उन की बातचीत अभी भी शासकीय कार्यों तक ही सीमित थी. व्यक्तिगत रूप से दोनों एकदूसरे से अनजान ही थे.

बास्केटबौल के टूर्नामैंट्स होने थे, जिस की टीम में वनीला दल की अभिभावक के तौर पर जबकि जयवंत कोच के रूप में छात्राओं के दल के साथ गए थे. वहां अप्रत्याशित अनहोनी हुई कि एक छात्रा की तबियत काफी खराब हो गई. उसे हौस्पिटल में भरती करना पड़ा. शहर के दूसरे कालेज के दल के साथ ही अपनी टीम को रवाना कर वे दोनों छात्रा के पेरैंट्स के आने तक वहीं रुके.

हौस्पिटल में गुजरी वह एक रात उन की जिंदगी में बहुत बड़ा परिवर्तन ले आई. रातभर बेंचनुमा कुरसियों पर बैठेबैठे ही काटनी पड़ी और चूंकि काम तो कुछ था नहीं, सो उस दिन खूब व्यक्तिगत बातें हुईं.

जयवंत ने वनीला से अभी तक शादी न करने की वजह पूछी तो उस के मुंह से अनायास निकल पड़ा, “तुम्हारे जैसा कोई मिला ही नहीं…”

उस की बात का इशारा समझ कर जयवंत भी बोल उठा, “जब मैं ही मिल सकता हूं तो मेरे जैसे की जरूरत ही क्या है?”

वनीला की आंखें आश्चर्यमिश्रित खुशी से फैल गईं,”क्या आप ने भी अभी तक शादी नहीं की?”

अब जयवंत मगरमच्छी आंसुओं के साथ बोला,”मेरी दादी मरते वक्त मुझे उन के एक दूर के रिश्तेदार की बेटी का हाथ जबरन थमा गईं… वह दिमाग से पैदल है, तभी तो यहां ले कर नहीं आया… अब मैं उसे तलाक दे दूंगा… यदि तुम चाहोगी तो हम शादी कर लेंगे, वीनू.”

“ओह जय, कितना गलत हुआ तुम्हारे साथ… हम पहले क्यों नहीं मिले? अब तुम्हारी पत्नी है तो हम कैसे शादी कर सकते हैं?”

“क्यों नहीं कर सकते वीनू… आई लव यू…और मुझे पता है कि तुम भी मुझे प्यार करती हो… बोलो, सच है न यह? हमारी जिंदगी है… हम एकदूसरे के साथ बिताना चाहें तो इस में गलत क्या है?” कहते हुए उस ने भावातिरेक में वनीला का हाथ कस कर पकड़ लिया.

उम्र की परतों में वनीला ने जो भावनाओं की बर्फ छिपा रखी थी वह जयवंत के सहारे की गरमी से पिघलने लगी… जवाब में उस ने भी बोल ही दिया, “आई लव यू टू जय… आई वांट टू स्पैंड माई लाइफ विद यू.”

इधर इजहार ए इश्क हुआ और उधर छात्रा की तबियत थोड़ी सुधरने लगी. वीनू सोच रही थी कि जय की पत्नी के साथ मैं छल कर रही हूं तो गलत नहीं है, क्योंकि उस के परिवार वालों ने भी तो जय के साथ छल किया है. जय सोच रहा था कि घर की जिम्मेदारी भी उठाऊंगा, पत्नी और बेटी तो वैसे ही अकेले रहने की आदी हो गई हैं… यहां पर मैं वीनू को उस के हिस्से का प्यार दे कर उस पर उपकार कर रहा हूं… कोई छल नहीं कर रहा, वह भी तो मुझे पाना चाहती है. बेटी को पढालिखा कर शादी कर दूंगा… कितने ही पुरुषों ने 2 शादियां की हैं… यह कहीं से भी गलत नहीं है और सुमेधा तो इस सब से अनजान ही थी.

जय और वीनू अब कालेज के बाद भी साथ में समय गुजारने लगे थे. उम्र का तकाजा था तो शाम के बाद कभी कोई रात भी साथ में गुजर जाती. जय अपने रूम पर कम और वीनू के घर पर अधिक समय गुजारने लगा. दोनों ने चोरीछिपे शादी भी कर ली, मगर उसे गुप्त रखा.

जय का रविवार अभी भी सुमेधा और मीनू के साथ गुजरता था. यह बात भी सोलह आने सच है कि पत्नियों की आंखें उन्हें अपने पतियों की नजरों में परिवर्तन का एहसास करा ही देती हैं. सुम्मी भी जय में आए परिवर्तन को महसूस कर रही थी. रहीसही कसर स्टाफ मैंबर्स ने पूरी कर दी.

एक गुमनाम पत्र पहुंचा था सुम्मी के पास जिस में जयवंत और वनीला के संबंधों का जिक्र करते हुए उसे सावधान किया गया था.

अगले रविवार जब जयवंत घर पहुंचा तो वहां अपने मातापिता और सासससुर को आया देख कर हैरान रह गया. हंगामा होना था… हुआ भी… जयवंत लौट आया इस समझौते के साथ कि तलाक के बाद भी मीनू की पढ़ाई और शादी की सारी जिम्मेदारी वही वहन करेगा. अब वीनू से शादी की बात राज नहीं रह गई थी.

काफी लंबे अरसे बाद किसी वजह से हमारा सुमेधा के शहर में जाना हुआ. जयवंत ने सुम्मी और मीनू से मिल कर आने को कहा. हमें भला क्यों आपत्ति होती… जयवंत और वनीला निस्संतान थे, इसलिए इस की तड़प तो थी ही.

इतने सालों बाद बेटी से मिलने की तड़प तो पिता को होनी स्वाभाविक भी थी. प्यार का खुमार हमेशा एकजैसा नहीं रहता है और जयवंत की पोस्टिंग भी दूसरे शहर में हो चुकी थी. अब उसे अकेले में अपराधबोध सालता होगा. जयवंत के मातापिता ने वीनू को कोसने में कोई कसर नहीं रखी. उन के अनुसार उस बांझ स्त्री ने उन के बेटेबहू का घर तोड़ कर उन का जीवन नारकीय बना दिया है. उस ने पत्नी का सुख तो दिया मगर पिता का सुख नहीं दे पाई. उसी की वजह से जय और मीनू इतने सालों तक एकदूसरे से दूर रहे.

अब मीनू पीजी की पढ़ाई पिता के साथ रह कर उन के कालेज से करना चाहती थी. जयवंत और वनीला की पोस्टिंग अलगअलग शहर में होने से शायद उन्हें फिर उम्मीद की किरण दिख रही थी. सुमेधा का कहना था कि मुझे कोई अपेक्षा नहीं है मगर मीनू को उस का अधिकार मिलना चाहिए.

वनीला के विरोध के बावजूद भी मीनू अपने पिता के घर रहने आ गई थी. वीनू अब वीकैंड में आती थी. जब कभी कुछ विवाद होता तो उन का फोन आने पर हमें ही जाना पड़ता था, क्योंकि न चाहते हुए भी इस कलह की अप्रत्यक्ष वजह तो हम बन ही चुके थे. न हम सुम्मी से मिलने जाते और न ही यह टूटा तार फिर से जुड़ता.

आज भी अचानक फोन आया और वीनू ने कहा, “आपलोग तुरंत आइए, अब इस घर में या तो मैं रहूंगी या मीनू.”

कुछ देर तक तो हम समझ ही नहीं पाए… सौतन का आपसी झगड़ा तो सुना था, मगर सौतेली मां और बेटी का इस तरह से झगड़ना…?

आश्चर्य की एक वजह और थी कि वनीला और मीनू दोनों ही काफी समझदार थीं. अलगअलग दोनों से बात करने पर हम इतना समझ पाए थे कि दोनों अपनी सीमाएं जानती थीं और एकदूसरे के क्षेत्राधिकार में दखल भी नहीं देती थीं. कभीकभी जय संतुलन नहीं कर पाते, तभी विवाद होता था.

जय का कहना था कि मीनू ही मेरी इकलौती संतान है तो वीनू को भी इसे स्वीकार लेना चाहिए. आखिर वह उस की भी बेटी है. सुमेधा ने तो वनीला को अपनी जगह दे दी तो क्या यह उस की बेटी को हमारी जिंदगी में थोड़ी भी जगह नहीं दे सकती? उस का अधिकार तो यह नहीं छीन रही है. 2-3 साल बाद तो ससुराल चली जाएगी, तब तक भी इसे आंख की किरकिरी नहीं मान कर सूरमे की तरह सजा ले… हमारी जिंदगी में रोशनी ही तो कर रही है…

हम भी जय की बातों से सहमत थे. जिंदगी का यही दस्तूर है… दूसरी औरत ही हमेशा गलत ठहराई जाती है. मैं भी एक औरत हूं तो सुम्मी का दर्द महसूस कर रही थी और मीनू से सहानुभूति होते हुए भी वीनू को गलत नहीं मान पा रही थी. मेरे पति वीनू को गलत ठहरा रहे थे और मैं जय को… एक पल को लगा कि उन का झगड़ा सुलझाने में हम न झगड़ पड़ें.

वीनू ने चुप्पी तोड़ी,”हम इतने सालों से अकेले रहे, मीनू कोई छोटी बच्ची नहीं है, उसे समझना चाहिए कि मैं वीकैंड पर आती हूं, उस के आने के बाद जय तो आते नहीं उसे अकेला छोड़ कर, यदि कुछ गलत दिखे तो मुझे मीनू को डांटने का अधिकार है या नहीं? यदि कुछ ऊंचनीच हो गई तो दोष तो मुझे देंगे सब… पड़ोस में रहने वाले लड़के से इस का नैनमटक्का चल रहा है, मैं ने खुद देखा… पूछा तो साफ मुकर गई और जय मुझे ही गलत कह रहे हैं. यह उतनी भी सीधी नहीं है, जितनी दिखती है…” उस का प्रलाप चलता ही रहता यदि हमें मीनू की सिसकियां न सुनाई देतीं.

“मेरी कोई गलती नहीं हैं… आंटी मुझे क्यों ऐसा बोल रही हैं, वे खुद जैसी हैं, वैसा ही मुझे समझ रही हैं… मैं उन की सगी बेटी नहीं हूं तो मेरी तकलीफ क्यों समझेंगी?” सुबकते हुए भी मीनू इतनी बड़ी बात बोल गई. एक पल को सन्नाटा छा गया.

“मुझे भी आज मीनू को देख कर अपना अजन्मा बच्चा याद आता है…” सन्नाटे को चीरते हुए वनीला ने रहस्योद्घाटन किया. अब चौंकने की बारी हमारी थी.

“वीनू, चुप रहो प्लीज… मीनू बेटी के सामने इस तरह बात मत करो…” जयवंत गिड़गिड़ाते हुए बोले. मीनू भी सहम सी गई.

वीनू के सब्र का बांध जो टूटा तो आंसुओं की बाढ़ सी आ गई, “बताओ मेरी क्या गलती है… जब जय आखिरी बार सुम्मी के घर से लौटे थे, तब मैं ने इन्हें खुशखबरी दी थी… जीवन बगिया में नया फूल खिलने वाला था… मगर…”

जय ने बीच में ही बात काट दी, “वीनू प्लीज… मेरी गलती है, मुझे माफ कर दो. मगर प्लीज अब चुप हो जाओ…”

लेकिन वीनू ने भी आज ठान ही लिया था. वह बोलती रही और परत दर परत जयवंत के छल की कलई खोलती गई.

“उस समय इन्होंने मुझे कहा कि अभी कोर्ट में केस चल रहा है. इस समय सुम्मी के वकील को हमारी शादी का सुबूत मिल गया तो हम मुश्किल में पड़ जाएंगे… सरकारी नौकरी भी जा सकती है… तुम अभी बच्चे को एबोर्ट करवा दो.… एक बार कोर्ट की कार्यवाही निबट जाएं फिर हम नए सिरे से जिंदगी शुरू करेंगे और बच्चा तो भविष्य में फिर हो ही जाएगा…”

“तो मैं ने गलत नहीं कहा था… उस समय यही उचित था…”

“उचितअनुचित मैं नहीं जानती. मुझ पर तो बांझ होने का कलंक लग गया, क्योंकि मीनू तुम्हारी बेटी है, यह सब जानते हैं.”

हम पसोपेश में बैठे थे. स्थिति इतनी बिगड़ने की उम्मीद नहीं थी. मैं सोच रही थी कि प्यार क्याक्या बदलाव ला देता है, सही और गलत की विवेचना के परे… सुम्मी ने मातृत्व को जिया मगर परित्यक्त हो कर अधूरी रही.… वीनू ने प्रेयसी बन प्यार पाया मगर मातृत्व की चाह में अधूरी रही… जयवंत ने सुम्मी और वीनू के साथ अधूरी जिंदगी जी, बेटी होने के बाद भी मीनू को दुलार न सका… क्या यही प्यार है या मात्र छलावा है?

“आप ने मेरे पापा को छीना, अपने अजन्मे बच्चे की हत्या की थी, इसलिए आप मां नहीं बन सकीं… कुदरत ने आप को सजा दी,” मीनू भी आज उम्र से बड़ी बातें कर वीनू को कटघरे में खींच रही थी.

“देखो, जो हुआ उसे हम बदल नहीं सकते. मीनू सही कह रही है, हमारी गलती का प्रायश्चित करने के लिए ही कुदरत ने मीनू को हमारे पास भेज दिया है, वही हमारी बेटी है, तुम बांझ नहीं हो… प्लीज अब बात को यहीं खत्म करो…”

“बात तो अब शुरू हुई है. कुदरत ने सजा नहीं दी, यह तो… ” बोलते हुए वीनू उठी और पर्स में से एक कागज निकाल कर मेरे सामने रख दिया, “यह देखो… सजा मुझे मिली है, यह सही है, मैं ने प्यार किया मगर जय ने मेरे साथ कितना बड़ा छल किया… यह अचानक मिला है मुझे, देखो…”

“क्या नाटक है यह? कौन सा कागज है?” जय अब गुस्से से चिल्लाया.

मैं ने देखा… वह मैडिकल सर्टिफिकेट था, जय की नसबंदी का…”आप ने वीनू को बताए बिना ही औपेरशन…”

मैं ने बात अधूरी छोड़ दी. अब जरूरी भी नहीं था कुछ बोलना. अब परछाई पानी में नहीं थी. आईने में सब स्पष्ट दिख रहा था और हम सोच रहे थे कि प्यार में छल हम किस से करते हैं, अपने रिश्तों से या खुद से, खुद की जिंदगी से?

प्रश्न अभी तक अनुत्तरित ही है…

जैसे को तैसा: भाग 2- भावना लड़को को अपने जाल में क्यों फंसाती थी

छाया अपने कमरे में यह सोचसोच कर करवटें बदल रही थी कि आखिर अमन को हो क्या गया है? क्यों वह इस तरह से सब से व्यवहार करने लगा है? रागिनी भी पूछना चाहती थी उस से कि कोई समस्या है तो बताएं, साथ मिल कर सुल   झा लेंगे. लेकिन अमन कैसे बताए किसी को कि वह एक बहुत बड़ी मुसीबत में फंस चुका है जिस से वह चाह कर भी बाहर नहीं निकल पा रहा है.

‘काश, काश मैं समय को पलट पाता. काश, मैं उस भावना का असली रूप देख पाता, तो आज मेरी जिंदगी कुछ और ही होती.’

अमन अपने मन में सोच ही रहा था कि उस का फोन घनघना उठा. भावना का ही फोन था. ‘नहीं, मैं इस का फोन नहीं उठाऊंगा’ फोन को घूरते हुए अमन बड़बड़ाया. लेकिन अंजाम के डर से उस ने फोन उठा लिया.

‘‘इतनी देर लगती है तुम्हें फोन उठाने में?’’ भावना गुर्राई.

‘‘नहीं, वह मैं सो गया था इसलिए… फोन की आवाज सुन नहीं पाया, सौरी. बोलो न क्या बात है?’’

‘‘बातवात कुछ नहीं, वह कल मु   झे 2 लाख रुपयों की सख्त जरूरत है, तो तुम मेरे घर आ कर दे जाओगे या मैं ही आ जाऊं पैसे लेने?’’ भावना के लफ्ज काफी सख्त थे.

‘‘द… द… दो लाख… पर इतनी जल्दी 2 लाख रुपए कहां से आएंगे?’’

‘‘वह तुम जानो… मु   झे तो बस 2 लाख रुपए चाहिए, वह भी कल के कल,’’ कह कर भावना ने फोन रख दिया और अमन अपना सिर पकड़ कर बैठ गया. मन तो किया उस का अपनी मां की गोद में सिर रख कर खूब रोए और कहे कि अब उसे नहीं जीना है.मर जाना चाहता है वह. मगर छाया हाई बीपी की मरीज है. इसलिए वह अपने आंसुओं को खुद ही पीता रहा घंटों तक. रागिनी से भी वह कुछ नहीं बता सकता था क्योंकि हो सकता है यह सब जानने के बाद वह उस से शादी करने से मना कर दे और वह रागिनी को किसी भी हाल में खोना नहीं चाहता था. अपने ही गम में डूबे कब अमन की आंखें लग गईं और कब सुबह हुई उसे पाता ही नहीं चला. घड़ी में देखा तो सुबह के 7 बज रहे थे.

रात में ठीक से नींद न आने के कारण उस का सिर दर्द से फटा जा रहा था. इसलिए अपनी आंखें बंद कर वह सोने की कोशिश करने ही लगा कि उस का फोन घनघना उठा.उसे लगा भावना का ही फोन है. इसलिए    झल्ला कर बोला, ‘‘आखिर तुम चाहती क्या हो? बोलो न? क्यों तुम मु   झे चैन से जीने देना नहीं चाहती? एक काम करो, बंदूक लाओ और मार दो मु   झे. एक बार में सारा किस्सा ही खत्म हो जाएगा.’’

रागिनी चौंकी क्योंकि फोन पर वही थी. लेकिन उस ने सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘अमन, मैं रागिनी बोल रही हूं. ’’

‘‘र… रागिनी… तुम, मु   झे लगा कि मेरे बौस का फोन है. बताओ, इतनी सुबहसुबह क्यों फोन किया? तुम ठीक हो?’’

‘‘हां, मैं तो ठीक हूं. वह मैं ने इसलिए फोन किया कि भैयाभाभी चाहते हैं अगर हमारी शादी अगले महीने के फर्स्ट वीक में हो जाती तो सही होता क्योंकि फिर इतनी दूर अमेरिका से तुरंत आना उन के लिए पौसिबल नहीं हो पाएगा न.’’

‘‘हां, वह कल हमारी बात नहीं हो पाई इस बारे में. सोच रहा हूं औफिस से सीधे तुम्हारे घर ही आ जाऊंगा. भैया तो रहेंगे न?’’

‘‘हांहां, भैया घर पर ही रहेंगे. तुम आ जाओ,’’ रागिनी पूछना चाहती थी कि कोई परेशानी तो नहीं है उसे लेकिन पूछ नहीं पाई.

‘‘ओके, फिर हम शाम को मिलते हैं,’’ अमन फोन रख लेटा ही था कि देखा छाया चाय की ट्रे लिए खड़ी है. वह हड़बड़ा कर उठ खड़ा हुआ और हाथ से चाय की ट्रे लेने की कोशिश करने ही लगा. मगर छाया खुद ही चाय की ट्रे टेबल पर रख पानी का खाली जग ले कर वहां से चलती बनी. छाया के चेहरे से ही लगा रहा था कि कल की बात को ले कर अभी भी वह उस से नाराज है. नाश्ते की टेबल पर भी उस ने अमन से कोई बात नहीं की और न ही अमन ने क्योंकि उन के सवालों के क्या जवाब देता वह इसलिए खापी कर सीधे औफिस के लिए निकल गया.

आज शाम औफिस से लौटते हुए अमन को रागिनी के घर जाना था, उस के भैयाभाभी से मिलने. लेकिन वह तो खुद ही रात के 12 बजे घर लौटा, फिर क्या जाता उन से मिलने. रास्ते में जब उस ने अपना फोन चैक किया तो रागिनी और छाया की कई मिस्डकौल्स थीं. वापस जब उस ने उन्हें कौल किया तो किसी ने उस का फोन नहीं उठाया. घर आने पर छाया ने उस से कोई बात भी नहीं की और न ही कुछ पूछाताछ की. खाना डाइनिंग टेबल पर रख सोने चली गई. अमन को भूख तो लगी थी, पर कुछ खाया नहीं. केवल एक गिलास पानी पी कर वह भी सोने चला गया.

‘‘अब गुस्से वाली बात तो है ही न. वहां रागिनी और उस के भैयाभाभी इस का इंतजार कर रहे थे और इन जनाब को कुछ याद ही नहीं रहा.’’

सुबह नाश्ते के टेबल पर छाया ने तल्खी से कहा और फिर जूठे प्लेट्स उठा कर वहां से चलती बनी. अमन के जवाब का इंतजार भी नहीं किया. लेकिन वह जवाब भी क्या देता? यही कि उसे सब याद था, पर जा नहीं पाया रागिनी के भैयाभाभी से मिलने क्योंकि वह उस भावना के साथ था. हां, उसी भावना के साथ जिस का वह मुंह भी नहीं देखना चाहता. लेकिन मजबूर है कि उस की उंगलियों पर नाचने को विवश है.

दूसरे दिन शाम को अमन जब औफिस से घर आया तो काफी थका हुआ महसूस कर रहा था. छाया घर पर नहीं थी इसलिए उस ने खुद ही अपने लिए चाय बनाई. रात के खाने की टेबल पर भी वह चुप ही रहा. बिस्तर पर जब सोने गया, तो फिर उसी बेचैनी ने उसे आ घेरा क्योंकि उसे तो हर पल इसी बात का डर लगा रहता था कि पता नहीं कब भावना का फोन आ जाए और पता नहीं क्या कह दे. इंसान की आंखें नींद से कितनी भी बो ि  झल क्यों न हों, लेकिन अगर सिर पर चिंता मंडरा रही हो तो नींद हवा हो जाती है. अमन के साथ भी यही हो रहा था. भावना नाम के चक्रव्यूह में वह ऐसे फंस चुका था कि उस की रातों की नींद और दिन का चैन गायब हो चुका था. औफिस में भी उस से ठीक से काम नहीं हो पा रहा था.

मन करता अमन का कि चीखचीख कर दुनिया को भावना की सारी सचाई बता दे. लेकिन क्या इस आग में वह नहीं    झुलसेगा क्योंकि सारी तसवीरें और वीडियो तो यही कह रहे हैं कि अमन ने भावना का बलात्कार किया है. फिर क्या रागिनी के भैया कभी अपनी बहन की शादी अमन से होने देंगे और छाया विश्वास करेगी कि अमन सही बोल रहा है और उस ने भावना के साथ कुछ गलत नहीं किया है? नहींनहीं, उस का चुप रहना ही बेहतर है.

रात के सन्नाटे में घड़ी की टिकटिक उस के सिर पर हथौड़े की चोट की तरह बरस रही थी. मन तो कर रहा था उस का कि घड़ी की बैटरी निकाल कर फेंक दे ताकि वह बजना बंद हो जाए. सोचता, काश समय पीछे जा पाता, तो वह सबकुछ ठीक कर देता. लेकिन यह कहां संभव था. समय कभी पीछे गया है किसी का? हां, उस समय में किए गए अच्छेबुरे कर्म जरूर इंसान के साथसाथ चलते हैं. आज भी उस मनहूस दिन को याद कर अमन तड़प उठता है. सोचता है, काश वह न हुआ होता, तो आज उस की जिंदगी कुछ और ही होती.

आज से 4 साल पहले भावना से उस की पहली मुलाकात अपने एक दोस्त की बर्थडे पार्टी में हुई थी. शौर्ट ड्रैस में इतनी खूबसूरत लड़की को देख कर मनचला अमन का मन मचल उठा था. लेकिन जब अचानक से वह पार्टी के बीच से ही गायब हो गई, तो उस का मन उदास हो गया. पूछने पर अमन के दोस्त ने बताया कि वह लड़की यानी भावना उस के ही औफिस में काम करती है. अभी पिछले महीने ही इंदौर से ट्रांसफर हो कर वह दिल्ली आई है.

उस के बारे में अमन और भी बहुत कुछ जानना चाहता था, मगर दोस्त से पूछते नहीं बना. घर आ कर भी वह उस के ही खयालों में खो गया. सुबह जब नींद खुली तो भावना का ही मुसकराता चेहरा नजर आया उसे. लेकिन न तो उस के पास भावना का कोई फोन नंबर था और न ही उस के घर का अतापता ही कि वह उस से कौंटैक्ट कर पाता.

उस दिन संडे की छुट्टी से ऊब कर जब वह मौल पहुंचा तो भावना को वहां देख कर

उस की आंखें चमक उठीं. बिना कुछ सोचेसम   झे लपक कर वह उस के करीब आ गया और बोला,  ‘‘हाय, आप वही हैं न… आई मीन… मेरे दोस्त संतोष के बर्थडे पार्टी में मिले थे हम. याद आया?’’

‘‘हां… याद आया. आप अ… मन…’’ भावना रुकरुक कर बोल रही थी क्योंकि ठीक से उसे उस का नाम याद नहीं आ रहा था.

‘‘हां, मैं अमन. अमन सिंह राठौर,’’ बड़ी गरमजोशी के साथ अमन ने अपना हाथ आगे बढ़ाया.

उस की बात पर भावना मुसकरा कर बोल पड़ी, ‘‘नाम ही काफी है. सरनेम बताने की जरूरत नहीं है.’’

उस की बात पर अमन बुरी तरह से    झेंप गया. बोला, ‘‘आई थिंक… यू आर राइट. और सरनेम में रखा ही क्या है. रखा तो नाम में है.’’

उस की बात पर भावना खिलखिला कर हंस पड़ी तो अमन भी हंसने लगा. उस दिन के बाद से दोनों अच्छे दोस्त बन गए. उन की रोज फोन पर बातें और मुलाकातें होने लगीं.

भेडि़या: भाग 2- मीना और सीमा की खूबसूरती पर किसकी नजर थी

अगले दिन चमेली जसोदा को 25 नंबर के आगे मिली. दोनों ने साथ में काम किया था.

बरामदे में शीला और सान्याल बैठी बियर पी रही थीं. चमेली दोनों के बीच होने वाली वार्त्तालाप को बड़े ध्यान से सुन रही थी.

शीला, ‘‘समाज के इस घिनौना नंगे सच को लोगों के सामने तो लाना ही होगा.’’

‘‘सो तो है. वह दिल्ली में हुए निर्भया कांड के बारे में पढ़ा?’’ सान्याल बोली.

‘‘हां, मैं ने तो टीवी पर सारा डिटेल में देखा है. सरेआम लोग दरिंदगी कर रहे हैं. सरकार कोई ऐक्शन क्यों नहीं लेती?’’

‘‘बेचारी लड़कियां… थैंकगौड… मेरी बेटियां तो आउट औफ इंडिया हैं,’’ शीला ने बियर का लंबा सिप खींचा.

सान्याल ने सिर घुमा कर शीला को ऐसे देखा जैसे बाकी दुनिया की लड़कियां तो कूड़ाकरकट हैं.

‘‘यू आर राइट शीला,’’ सान्याल को लगा कि अभी यह औरत 1 ग्लास और गटक सकती है. मुंह जुठारने को पूछ ही लिया, ‘‘वन मोर?’’

‘‘नो… नो, इनफ…’’

आखिरी घूंट हलक में उडे़ला और उठ गई, ‘‘ओके सान्याल, मैं चलूं? मिलती हूं सैटरडे को. पैसों का हिसाबकिताब पार्टी के बाद कर लेंगे.’’

शीला जा चुकी थी. सान्याल ने उसे सीढि़यां उतरते देख लिया था.

‘‘स्साली, इडियट. मुफ्ती की मिल जाती है न इसीलिए चिपक जाती है. पूरी बोतल खाली कर के ही हिलती है… यहां से,’’ सान्याल खुद से बातें कर रही थी. इस बीच 2-4 मोटीमोटी  अंगरेजी में गालियां और जड़ दीं शीला को.

चमेली का मन किया कह दे यहां तो सभी ऐसे हैं, मुंह पर कुछ पीछे कुछ. सोचा नहीं, कल को इन दोनों के घर में नौकरी करनी है. चुप रहना ही ठीक होगा.

काम खत्म कर के सड़क पर आई तो

कुछ लोगों को    झुंड में खड़ा देखा. सब काम वालियां थीं.

‘‘अरे क्या हुआ?’’

कुसुम कह रही थी, ‘‘कल रात को नेपाली गार्ड ने 26 नंबर कोठी के पीछे की लेन में भेडि़या देखा.’’

26 नंबर वाली बोली, ‘‘अरे, अरे यानी इसी सामने वाली कोठी के पीछे?’’

‘‘हां, बिलकुल,’’ सीमा ने ऐसे पक्का किया जैसे उस ने अपनी आंखों से देखा.

सब के चेहरे पर भय था जैसे भेडि़या सामने खड़ा हो. सभी के होंठों पर ताले लगे थे.

शायद कोई भी इस विषय पर बात करना नहीं चाहता था. कारण, यह पहली बार नहीं हुआ है. पहले भी जंगली सूअर, लकड़बग्घा और नील गाय जैसे जानवरों को कोठी वालों ने पिछली लेन में घूमते देखा है.

चमेली ने फोन निकाल कर समय देखा दोपहर के 2 बजे थे. जल्दीजल्दी कदम बढ़ाए. बेटियां स्कूल से आ चुकी होंगी. चलने लगी तो जसोदा ने रोका, ‘‘चमेली, आज मैडम के यहां पार्टी है. मेरी जगह तू काम कर ले.’’

‘‘पार्टी तो रात को होगी?’’

‘‘हां.’’

‘‘चल साथ में. रास्ते में सोच कर बताती हूं.’’

चमेली का गणित फिर से चालू हो गया… पार्टी… मतलब पूरे हजार रुपए यानी तिरपाल की जगह  ऐस्बैसटस शीट की छत पड़ सकती है. यह ठीक रहेगा.

झट से कह दिया, ‘‘हांहां ठीक है. तू फिक्र मत कर. ठीक 8 बजे शीला मैडम के यहां पहुंच जाऊंगी… सब संभाल लूंगी.’’

बेटियों की फिक्र ने उस के पैरों को गति दे दी थी. यों तो घर पर बसेसर है पर वह भी कई दफा दारू के अड्डे पर जा बैठता है. दारू की लत से चमेली बहुत आजिज है.

लड़कियां अभी तक लौटी न थीं. रास्ता अकेला है. चमेली को पता नहीं है कि 3 दिन पहले क्या हुआ था और आज भी.

मीना और सीमा तेजी से चलती हुई घर की ओर आ रही थीं. तभी सामने से एक हट्टोकट्टे  बदसूरत मुच्छड़ ने बिलकुल नजदीक से साइकिल से रास्ता काटा, दोनों पीछे हट गईं. सहम कर तेजी से घर को बढ़ गईं. दोबारा फिर दोनों को घूर कर गंदा सा फिकरा कसा और उन को छूता हुआ सामने जा खड़ा हुआ. वहीं से दोबारा कमैंट मारा, ‘‘हाय मैं सदके जावां.’’

दोनों बड़ी तेजी से आगे बढ़ने लगीं. डर से चेहरे सफेद थे. कुछ देर बाद देखा मुच्छड़ एक पेड़ के पीछे छिपा खड़ा था. इरादा नेक न था.

एक बार फिर साइकिल करीब ला कर वहशियाना हंसी के साथ बोला, ‘‘आ जाओ… दोनों को खुश कर दूंगा. साथ में पैसे भी दूंगा.’’

मीना और सीमा, सूखे पत्ते सी कांप गईं.

तभी पीछे से धीरू चाचा की आवाज सुनाई दी, ‘‘क्या हुआ बेटियो?’’

‘‘कुछ नहीं चाचा.’’

मीना ने कह तो दिया, किंतु उन्हें भी माजरा सम   झते देर न लगी, ‘‘डरो नहीं मैं साथ हूं. चलो मेरे साथ चलो, मैं भी घर ही जा रहा हूं.’’

बिना कुछ कहे, धीरू के साथ चल दीं. पेड़ के पास खड़े मुच्छड़ के लिए गंदी गाली निकली थी धीरू ने.

‘‘आज लेट हो गईं?’’ चमेली दोनों के चेहरों को देख हैरान थी. लपक कर करीब आई, ‘‘क्या हुआ?’’

दोनों बस्ते फेंक मां से जा चिपकीं. रुलाई रुक नहीं रही थी. बड़ी मुश्किल से कहा, ‘‘वह, वह…’’

‘‘अरे क्या वह… वह… तुम ने भी भेडि़या देख लिया?

‘‘हां… हां,’’ सच बोलने की हिम्मत न थी.

जो भी हो मुच्छड़ भेडि़ए से कम तो नहीं है. दोनों ने चेहरे घुमा कर रजामंदी में सिर हिलाया.

‘‘बस्ती वाले भी आज यही बता रहे थे,

तुम सहेलियों के साथ आया करो. चलो खाना

खा लों.’’

‘‘नहीं, हमें भूख नहीं है.’’

‘‘अरे, थोड़ा सा तो खा लो,’’ मां ने बड़े प्यार से कहा.

नहीं खाया. दोनों चुपचाप खाट पर लेट कर सोने का बहाना करने लगीं.

‘‘देखो मैं पड़ोस वाली कमलो के घर जा रही हूं. दरवाजा बंद कर लो. बापू भी आता ही होगा. आए तो खाना दे देना.’’

मां के जाते ही दोनों उठ कर बैठ गईं.

‘‘सुन मीना कल हम स्कूल नहीं जाएंगे.’’

‘‘मैं भी यही सोच रही हूं. यह रावण फिर पीछे आएगा.’’

‘‘तू ठीक कहती है.’’

‘‘लेकिन कब तक छुट्टी करेंगे? हम किसी को बता भी नहीं सकते. जिसे भी बताएंगे. हमें ही गलत सम   झेगा.’’

‘‘तो फिर भैया को कहूं?’’

‘‘न… न… यह गजब न करना. फिर तो खुलेआम दुश्मनी हो जाएगी. क्या, भैया उसे छोड़ेगा? मुच्छड़ की हड्डीपसली का चूरा बना कर नदी में बहा देगा. बड़ी बदनामी होगी.’’

‘‘फिर हम क्या करें?’’

‘‘छोड़, देखा जाएगा.’’

अगले दिन दोनों घर से बाहर न निकलीं. दरवाजे की मोटी संध से बाहर    झांक लेतीं. हादसे की दहशत बरकरार थी.

अगले दिन मां के जाने के बाद दोनों ने मन की भड़ास निकाली, ‘‘अरे वह तिरपाली बनिया भी ऐसा ही दिखता है. जाने कैसी भूखी नजरों से घूरता है जैसे खा जाएगा. छि: कैसी घिनौनी हंसी है और वह दूध वाला मोटा लाला? कोई उस की बेटी को ऐसे देखे तो लाला सामने वाले का पेट चीर कर अंतडि़यों का सालन बना कर खा जाएगा. एकदम कसाई दिखता है.’’

सारा दिन दोनों बहनें यही सब बातें करती रहीं. मुंह में अन्न का एक दाना तक न गया. मन ही नहीं करता था. कौर तोड़तीं तो कभी मुच्छड़, कभी तिरपाली तो कभी लाला का डरावना चेहरा उन्हें विचलित करता.

जैसे को तैसा: भाग 1- भावना लड़को को अपने जाल में क्यों फंसाती थी

‘‘अमन,कहां हो तुम? बाय द वे जहां भी हो, मुझे आ कर मिलो अभी, इसी वक्त,’’ फोन पर और्डर देते हुए भावना बोली.

मगर अमन ने यह कहते हुए आने से मना कर दिया कि उस के घर पर कुछ मेहमान आने वाले हैं, तो वह अभी उस से मिलने नहीं आ सकता है.

‘‘ओके… फिर मैं ही आ जाती हूं तुम्हारे घर.’’

‘‘नहीं… तुम यहां मत आना, प्लीज,’’

अमन ने रिक्वैस्ट की, ‘‘ठीक है मैं ही आता हूं.’’

‘‘यह हुई न बात,’’ अपना मुंह गोल कर भावना ने फोन पर ही अमन को बड़ा सा चुम्मा दिया और यह कह कर फोन रख दिया कि उसे इंतजार करना जरा भी नहीं पसंद, इसलिए वह जल्दी आ जाए.

अब अमन को सम   झ नहीं आ रहा था कि वह घर से निकले तो कैसे क्योंकि अगर उस की मां छाया पूछेंगी कि वह कहां जा रहा है तो क्या बहाना बनाएगा? लेकिन जाना तो पड़ेगा वरना उस भावना का कोई भरोसा नहीं कि यहां पहुंच जाए. अपने मन में सोच अमन उठ खड़ा हुआ.

‘‘मां, एक जरूरी काम है, बस थोड़ी देर में आता हूं,’’ बोल कर अमित घर से निकलने ही लगा कि छाया ने उसे रोका, ‘‘पर जा कहां रहा है? अरे, घर पर मेहमान आने वाले हैं और तुम…’’

‘‘हां मां, पता है मु   झे. लेकिन मैं बस थोड़ी देर में आता हूं,’’    झल्लाता सा अमन घर से निकल गया. छाया कुछ और पूछतीं उस से पहले वह गाड़ी स्टार्ट कर पलभर में ओ   झल हो गया.

दरअसल, आज शाम रागिनी अमन की मंगेतर के भैयाभाभी अमन से मिलने उस के घर आने वाले हैं. वे लोग चाहते हैं कि अगर हफ्ता 10 दिनों में ही अमन और रागिनी की शादी हो जाए, तो बहुत अच्छा रहेगा. रागिनी का भाई राकेश गूगल कंपनी में सीओओ है और वे अपने परिवार सहित यहां इंडिया आए हुए हैं. राकेश की सास की हार्ट सर्जरी हुई है इसलिए वे लोग उन्हें देखने आए थे. चूंकि राकेश की पत्नी अपने मातापिता की एकलौती संतान है, इसलिए अपने मातापिता की सारी जिम्मेदारी उन की ही है. इंडिया आने के लिए राकेश को बड़ी मुश्किल से महीनेभर की छुट्टी मिल पाई थी, इसलिए अब वह सोच रहा है कि अगर रागिनी और अमन की शादी इधर ही हो जाए, तो फिर उन्हें तुरंत छुट्टी ले कर यहां नहीं आना पड़ेगा और उन का समय और पैसा दोनों बच जाएंगे.

वैसे सोच तो वे ठीक ही रहे थे क्योंकि उतनी दूर 7 समंदर पार से जल्दीजल्दी छुट्टी ले कर आना कोई बच्चों का खेल थोड़े ही है. आनेजाने में पैसे भी बहुत खर्च हो जाते हैं और बच्चों की पढ़ाई भी रुकती है. लेकिन राकेश का आना व्यर्थ ही गया क्योंकि अमन से उस की भेंट ही नहीं हो पाई. छाया ने कई बार उसे फोन भी लगाया यह पूछने के लिए कि वह कब आ रहा है. लेकिन अमन का फोन नहीं लग रहा था, इसलिए हार कर वे लोग वापस चले गए. रागिनी छाया की सब से प्रिय सहेली की बेटी है. 2 साल पहले ही वह अमेरिका से कंप्यूटर साइंस में मास्टर्स कर के लौटी है. अभी वह दिल्ली की एक बड़ी कंपनी में बहुत ही अच्छे पैकेज पर जौब कर रही है.

पिछले साल ही एक शादी समारोह में रागिनी और अमन की मुलाकात हुई थी जो धीरेधीरे प्यार में बदल गई. लड़की जानीपहचानी, पढ़ीलिखी और सुंदर है और सब से बड़ी बात कि दोनों एकदूसरे को पसंद करते हैं, यह सोच कर दोनों परिवारों ने भी इस रिश्ते को मंजूरी दे दी और कुछ मेहमानों की मौजूदगी में दोनों की सगाई कर दी गई. लेकिन शादी की डेट 6 महीने बाद का पड़ा क्योंकि अमन ऐसा चाहता था. इसलिए राकेश अमन से बात करना चाह रहा था. मगर बात ही नहीं हो पाई.

मेहमानों के जाने के बाद भी छाया ने अमन को कई बार फोन लगाया. लेकिन हर बार उस का फोन ‘आउट औफ कवरेज’ ही बता रहा था. छाया को परेशान देख कर ब्रजकिशोर अमन के पापा ने कहा भी कि हो सकता उस का फोन डिस्चार्ज हो गया होगा, इसलिए नहीं लग रहा होगा. लेकिन छाया इस बात से परेशान थी कि थोड़ी देर का बोल कर गया यह लड़का घंटों से कहां गायब है? कहीं वह किसी मुसीबत में तो नहीं फंस गया.

छाया को काफी परेशान देख कर ब्रजकिशोर ने फिर सम   झाया कि बेकार में चिंता करने से क्या होगा? होगा कोई जरूरी काम. आ जाएगा न.  लेकिन छाया कैसे कहे अपने पति से कि ऐसा अकसर ही हो रहा है. रात देखता है न दिन… किसी का फोन आते ही दौड़ पड़ता है एकदम से. और फोन आने पर वह इतना घबरा क्यों जाता है? एक मां अपने बच्चे की हर सांस को पहचानती है, तो क्या अमन की आंखों का डर उसे नहीं सम   झ में आएगा? लेकिन पूछने पर वह कुछ बताता भी तो नहीं है न. या हो सकता है

उस के औफिस में कोई टैंशन हो और उस के बौस का फोन आया हो? नहींनहीं, ऐसा कैसे हो सकता है क्योंकि अभी परसों ही तो उस के बौस से छाया की मुलाकात हुई थी. वे तो अमन की कितनी बढ़ाई करने लगे कि अमन बहुत ही मेहनती लड़का है. फिर किस बात की टैंशन है उसे? खुद से ही सवालजवाब करती हुई छाया ने अभी अपनी आंखें    झपकाई ही कि कौल बज उठी. अमन ही था.

रात के करीब साढ़े 11 बजे अमन को घर आया देख कर छाया का पारा 7वें आसमान पर चढ़ गया. अब गुस्सा तो आएगा ही न, मेहमान आ कर चले गए और यह लड़का अब आ रहा है. क्या सोच रहे होंगे वे लोग कि कितना लापरवाह लड़का है. छाया ने तो किसी तरह कोई बहाना बना कर उन्हें सम   झा दिया कि अचानक से अमन के औफिस से फोन आ गया इसलिए जाना पड़ा, आता ही होगा बस. मगर इस लड़के ने तो हद ही कर दी. बस आता हूं, कह कर घंटों बाद लौटा है. आखिर गया कहां था? कुछ बताता भी तो नहीं है.

‘‘आखिर चल क्या रहा है तुम्हारे दिमाग में?’’ गुस्से से नाक फुलाती जब छाया ने सवाल किया तो अमन यह बोल कर अपने कमरे में

चला गया कि वह बहुत थक गया है, सुबह बात करेगा. यह भी नहीं पूछा उस ने कि रागिनी के भाईभाभी आए थे तो क्या बातें हुईं या उस के बारे में क्या कुछ पूछ रहे थे वे लोग? बस आया और सीधे अपने कमरे में चला गया. खाना भी तो नहीं खाया उस ने.

‘‘देख, अगर तेरे दिल में कोई बात है तो अभी बता दे. मेरे कहने का मतलब है अगर

तुम्हें कोई और लड़की पसंद आ गई हो तो बोल दे, मैं मना कर दूंगी उन्हें,’’ छाया ने स्पष्ट शब्दों में बोला.

‘‘आप बेकार में क्यों मेरा दिमाग खा रही हो मां,’’ अमन    झल्लाया सा बोला, ‘‘क्या चाहती हैं आप बोलिए न? अरे, कोई जरूरी काम आ पड़ा था इसलिए चला गया न तो इस में कौन सी बड़ी आफत आ गई जो आप इतना सुना रही हैं?’’

अमन के तेवर देख छाया हैरान रह गई क्योंकि पहले कभी उस ने अपनी मां से इस तरह से बात नहीं की थी.

‘‘प्लीज, आप जाइए यहां से, मु   झे सोने दीजिए,’’ कह कर अमन ने लाइट औफ कर दी. छाया कुछ पल वहीं खड़ी रही, फिर कमरे से बाहर निकल कर सोचने लगी कि कहीं ऐसा तो नहीं कि अमन को कोई दूसरी लड़की पसंद आ गई हो और अब वह रागिनी से शादी नहीं करना चाहता है? नहींनहीं, अगर ऐसा होता, तो वह सगाई ही क्यों करता रागिनी के साथ. मैं भी न बेकार में उलटासीधा सोचने लगती हूं. हो सकता है इसे औफिस की ही कोई टैंशन हो. अपने खुले बालों को मुट्ठी में लपेट कर जूड़ा बनाते हुए छाया ने पलट कर देखा, तो अमन दीवार की तरफ मुंह किए सो रहा था. इसलिए वह धीरे से दरवाजा बंद कर वहां से चली आई.

अपनी मां से इस तरह बात करना अमन को जरा भी अच्छा नहीं लगा. लेकिन वह भी क्या करे क्योंकि वह अपनी मां से    झूठ नहीं बोल सकता था और छाया सच सुन नहीं पाती. इसलिए उसे अपनी मां से ऐसे रूखे स्वर में बात करनी पड़ी ताकि वह बारबार उस से सवाल न करे. रागिनी को भी उस ने फोन पर ऐसे ही दोटूक शब्दों में जवाब दे कर चुप करा दिया था कि अभी उन की शादी नहीं हुई है, जो वह उस पर इतना हक जता रही है. रागिनी को अमन की बात का बुरा तो लगा था पर उस ने जताया नहीं. लेकिन अमन को यह भी नहीं हुआ कि वापस फोन कर उसे एक बार सौरी बोल दें. उलटे रागिनी ने ही उसे फोन कर हालचाल पूछा था.

रागिनी भले ही अमेरिका से पढ़लिख कर लौटी है और इतनी बड़ी कंपनी में जौब कर रही है, लेकिन उस में घमंड नाममात्र का भी नहीं है. ‘डाउन टू अर्थ’ है वह. उस की इसी अदा पर तो अमन फिदा हो गया था. रागिनी अमीरीगरीबी, जातिधर्म में कोई भेद नहीं करती है. वह तो सड़क पर भीख मांग रहे बच्चे को भी गोद में उठा कर दुलार करने लगती है. जब भी समय मिलता है वह अपनी मेड के बच्चों को बैठा कर पढ़ाती है. हर संडे वह ब्लाइंड्स बच्चों को भी पढ़ाने जाती है. जब उस की मेड का पति शराब पी कर उसे मारतापीटता था, तब रागिनी ने उसे ऐसी डांट लगाई थी कि उस ने अपनी पत्नी के साथ बदसलूकी करना छोड़ दिया.

रागिनी जबतब अपनी मेड की पैसों से

भी मदद करती रहती है. हालांकि उस की यह मदद सामान्य बात है. पर उसे यह सामाजिक सरोकार की भावना अपनी मां और दादी से विरासत में मिली है. वैसे बेतरतीब इंसान तो अमन भी नहीं है. वह भी लोगों की मदद करने में विश्वास रखता है और उस के इसी विश्वास का नतीजा है कि आज वह इतनी बड़ी मुसीबत में फंस चुका है.

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