सास को अपनी कमाई कब दें कब नहीं

भले ही सासबहू के रिश्ते को 36 का आंकड़ा कहा जाता हो पर सच यह भी है कि एक खुशहाल परिवार का आधार सासबहू के बीच आपसी तालमेल और एकदूसरे को समझने की कला पर निर्भर करता है.

एक लड़की जब शादी कर के किसी घर की बहू बनती है तो उसे सब से पहले अपनी सास की हुकूमत का सामना करना पड़ता है. सास सालों से जिस घर को चला रही होती हैं उसे एकदम बहू के हवाले नहीं कर पातीं. वे चाहती हैं कि बहू उन्हें मान दे, उन के अनुसार चले.

ऐसे में बहू यदि कामकाजी हो तो उस के मन में यह सवाल उठ खड़ा होता है कि वह अपनी कमाई अपने पास रखे या सास के हाथों पर? बात केवल सास के मान की ही नहीं होती बहू का मान भी माने रखता है. इसलिए कोई भी फैसला लेने से पहले कुछ बातों का खयाल जरूर रखना चाहिए.

बहू अपनी कमाई सास के हाथ पर कब रखे

जब सास हों मजबूर:

यदि सास अकेली हैं और ससुर जीवित नहीं हों तो ऐसे में एक बहू यदि अपनी कमाई सास को सौंपती है तो सास उस से अपनापन महसूस करने लगती हैं. पति के न होने की वजह से सास को ऐसे बहुत से खर्च रोकने पड़ते हैं जो जरूरी होने पर भी पैसे की तंगी की वजह से नहीं कर पातीं. बेटा भले ही अपने रुपए खर्च के लिए देता हो पर कुछ खर्चे ऐसे हो सकते हैं जिन के लिए बहू की कमाई की भी जरूरत पड़ सकती. ऐसे में सास को कमाई दे कर बहू परिवार की शांति कायम रख सकती है.

सास या घर में किसी और के बीमार होने की स्थिति में:

यदि सास की तबीयत खराब रहती है और इलाज पर बहुत रुपए लगते हैं तो यह बहू का कर्तव्य है कि वह अपनी कमाई सास के हाथों पर रख कर उन्हें इलाज की सुविधाएं उपलब्ध कराने में मदद करे.

अपनी पहली कमाई:

जैसे एक लड़की अपनी पहली कमाई को मांबाप के हाथों पर रख कर खुश होती है वैसे ही यदि आप बहू हैं तो अपनी पहली कमाई सास के हाथों पर रख कर उन का आशीर्वाद लेने का मौका न चूकें.

यदि आप की सफलता की वजह सास हैं:

यदि सास के प्रोत्साहन से आप ने पढ़ाई की या कोई हुनर सीख कर नौकरी हासिल की है यानी आप की सफलता में आप की सास का प्रोत्साहन और प्रयास है तो फिर अपनी कमाई उन्हें दे कर कृतज्ञता जरूर प्रकट करें. सास की भीगी आंखों में छिपे प्यार का एहसास कर आप नए जोश से अपने काम में जुट सकेंगी.

यदि सास जबरन पैसे मांग रही हों:

पहले तो यह देखें कि ऐसी क्या बात है जो सास जबरन पैसे मांग रही हैं. अब तक घर का खर्च कैसे चलता था? इस मामले में अच्छा होगा कि पहले अपने पति से बात करें. इस के बाद पतिपत्नी मिल कर इस विषय पर घर के दूसरे सदस्यों से  विचारविमर्श करें. सास को समझएं. उन के आगे खुल कर कहें कि आप कितने रुपए दे सकती हैं. चाहें तो घर के कुछ खास खर्चे जैसे राशन, बिल, किराए आदि की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लें. इस से सास को भी संतुष्टि रहेगी और आप पर भी अधिक भार नहीं पड़ेगा.

यदि सास सारे खर्च एक जगह कर रही हों:

कई परिवारों में घर का खर्च एक जगह किया जाता है. यदि आप के घर में भी जेठ, जेठानी, देवर, ननद आदि साथ रह रहे हैं और पूरा खर्च एक ही जगह हो रहा है तो स्वाभाविक है कि घर के प्रत्येक कमाऊ सदस्य को अपनी हिस्सेदारी देनी होगी.

सवाल यह उठता है कि कितना दिया जाए? क्या पूरी कमाई दे दी जाए या एक हिस्सा दिया जाए? इस तरह की परिस्थिति में पूरी कमाई देना कतई उचित नहीं होगा. आप को अपने लिए भी कुछ रुपए बचा कर रखने चाहिए. वैसे भी घर के प्रत्येक सदस्य की आय अलगअलग होगी. कोई 70 हजार कमा रहा होगा तो कोई 20 हजार, किसी की नईनई नौकरी होगी तो किसी ने बिजनैस संभाला होगा. इसलिए हर सदस्य बराबर रकम नहीं दे सकता.

बेहतर होगा कि आप सब इनकम का एक निश्चित हिस्सा जैसे 50% सास के हाथों में रखें. इस से किसी भी सदस्य के मन में असंतुष्टि पैदा नहीं होगी और आप भी निश्चिंत रह सकेंगी.

यदि मकान सासससुर का है:

जिस घर में आप रह रही हैं यदि वह सासससुर का है और सास बेटेबहू से पैसे मांगती हैं तो आप को उन्हें पैसे देने चाहिए. और कुछ नहीं तो घर और बाकी सुखसुविधाओं के किराए के रूप में ही पैसे जरूर दें.

यदि शादी में सास ने किया है काफी खर्च:

अगर आप की शादी में सासससुर ने शानदार आयोजन रखा था और बहुत पैसे खर्च किए थे, लेनदेन, मेहमाननवाजी तथा उपहारों आदि में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, बहू और उस के घर वालों को काफी जेवर भी दिए थे तो ऐसे में बहू का भी फर्ज बनता है कि वह अपनी कमाई सास के हाथों में रख कर उन्हें अपनेपन का एहसास दिलाए.

ननद की शादी के लिए:

यदि घर में जवान ननद है और उस की शादी के लिए रुपए जमा किए जा रहे हैं तो बेटेबहू का दायित्व है कि वे अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा दे कर अपने मातापिता का सहयोग करें.

जब पति शराबी हो:

कई बार पति शराबी या निकम्मा होता है और पत्नी के रुपयों पर ऐय्याशी करने का मौका ढूंढ़ता है. वह पत्नी से रुपए छीन कर शराब या गलत संगत में खर्च कर सकता है. ऐसी स्थिति में अपने रुपयों की सुरक्षा के लिए जरूरी है कि आप ला कर उन्हें सास के हाथों पर रख दें.

कब अपनी कमाई सास के हांथों में न रखें

जब आप की इच्छा न हो. अपनी इच्छा के विरुद्ध बहू अपनी कमाई सास के हाथों में रखेगी तो घर में अशांति पैदा होगी. बहू का दिमाग भी बौखलाया रहेगा और उधर सास बहू के व्यवहार को नोटिस कर दुखी रहेंगी. ऐसी स्थिति में बेहतर है कि सास को रुपए न दिए जाएं.

जब ससुर जिंदा हो और घर में पैसों की कमी न हो:

यदि ससुर जिंदा हैं और कमा रहे हैं या फिर सास और ससुर को पैंशन मिल रही है तो भी आप को अपनी कमाई अपने पास रखने का पूरा हक है. परिवार में देवर, जेठ आदि हैं और वे कमा रहे हैं तो भी आप को कमाई देने की जरूरत नहीं है.

जब सास टैंशन करती हों:

यदि आप अपनी पूरी कमाई सास के हाथों में दे रही हैं इस के बावजूद सास आप को बुराभला कहने से नहीं चूकतीं और दफ्तर के साथसाथ घर के भी सारे काम कराती हैं, आप कुछ खरीदना चाहें तो रुपए देने से आनाकानी करती हैं तो ऐसी स्थिति में सास के आगे अपने हक के लिए लड़ना लाजिम है. ऐसी सास के हाथ में रुपए रख कर अपना सम्मान खोने की कोई जरूरत नहीं है बल्कि अपनी मरजी से खुद पर रुपए खर्च करने का आनंद लें और दिमाग को टैंशनफ्री रखें.

जब सास बहुत खर्चीली हों:

यदि आप की सास बहुत खर्चीली हैं और आप जब भी अपनी कमाई ला कर उन के हाथों में रखती हैं तो वे उन रुपयों को 2-4 दिनों के अंदर ही बेमतलब के खर्चों में उड़ा देती हैं या फिर सारे रुपए मेहमाननवाजी और अपनी बेटियों और बहनों पर खर्च कर देती हैं तो आप को संभल जाना चाहिए. सास की खुशी के लिए अपनी मेहनत की कमाई यों बरबाद होने देने के बजाय उन्हें अपने पास रखें और सही जगह निवेश करें.

जब सास माता की चौकी कराएं:

जब सासससुर घर में तरहतरह के धार्मिक अनुष्ठान जैसे माता की चौकी वगैरह कराएं और पुजारियों की जेबें गरम करते रहें या अंधविश्वास और पाखंडों के चक्कर में रुपए बरबाद करते रहें तो एक पढ़ीलिखी बहू उन की ऐसी गतिविधियों का हिस्सा बनने या आर्थिक सहयोग करने से इनकार कर सकती है. ऐसा कर के वह सास को सही सोच रखने को प्रेरित कर सकती है.

बेहतर है कि उपहार दें

इस संदर्भ में सोशल वर्कर अनुजा कपूर कहती हैं कि जरूरी नहीं आप पूरी कमाई सास को दें. आप उपहार ला कर सास पर रुपए खर्च कर सकती हैं. इस से उन का मन भी खुश हो जाएगा और आप के पास भी कुछ रुपए बच जाएंगे. सास का बर्थडे है तो उन्हें तोहफे ला कर दें, उन्हें बाहर ले जाएं, खाना खिलाएं, शौपिंग कराएं, वे जो भी खरीदना चाहें वे खरीद कर दें. त्योहारों के नाम पर घर की साजसजावट और सब के कपड़ों पर रुपए खर्च कर दें.

पैसों के लेनदेन से घरों में तनाव पैदा होता है पर तोहफों से प्यार बढ़ता है, रिश्ते संभलते हैं और सासबहू के बीच बौंडिंग मजबूत होती है. याद रखें रुपयों से सास में डौमिनैंस की भावना बढ़ सकती है जबकि बहू के मन में भी असंतुष्टि की भावना उत्पन्न होने लगती है. बहू को लगता है कि मैं कमा क्यों रही हूं जब सारे रुपए सास को ही देने हैं. इसलिए बेहतर है कि जरूरत के समय सास या परिवार पर रुपए जरूर खर्च करें पर हर महीने पूरी रकम सास के हाथों में रखने की मजबूरी न अपनाएं.

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इकलौते लड़के से शादी

जैसे ही किसी की बेटी की शादी इकलौते लड़के से तय होती है, त्योंही उसे सुखसमृद्धि की गारंटी मान लिया जाता है. एक दंपती ने जब अपनी बेटी की शादी के कार्ड बांटे तो हर किसी से अपनी बेटी के ससुराल में लड़के के इकलौते होने की चर्चा जरूर की. एक संबंधी ने कहा कि तब तो उन के यहां हमारे घर जैसी रौनक नहीं होगी. हमारे यहां तो मामूली अवसर पर भी इतने लोग इकट्ठा हो जाते हैं कि घर में उत्सव जैसा माहौल बन जाता है. फिर भी वे इकलौते लड़के के गुण गाते रहे तो उस रिश्तेदार ने आक्रोश में कहा कि अगर इतना ही इकलौतेपन का क्रेज है तो अपने बेटे को भी इकलौता रहने दिया होता. तब किसी और परिवार को भी आप के इस सुख जैसा सुख मिलता.

सब कुछ इस का है

अकसर शादी की बात चलते ही लड़की वाले इसी बात को अहमियत देते हैं और लड़के वाले भी पसंद की जगह बात बनाने के लिए इस बात का सहारा लेते हैं. भले ही यह बात सच है पर इस तरह की अपेक्षा पालना अकसर अनाधिकार चेष्टा को जन्म देता है. शैलेंद्र व सीता दंपती ने जब एक ट्रस्ट बनाया तो सब दंग थे. लेकिन उन्होंने बेटे को ट्रस्टी न बनाया तो उस ने रिश्तेदारों पर अपने मातापिता को समझाने का दबाव बनाया. तब मातापिता की बातों से स्पष्ट हुआ कि बेटाबहू तो सब कुछ उन का है यह मान कर बैठे हैं. इन की कमाई बहुत है फिर भी ये हारीबीमारी तक में नहीं पूछते. पता नहीं हमारे पालनपोषण में कहां कमी रह गई. हम अपना पूरा पैसा गरीबों की शिक्षा व संस्कार पर खर्चेंगे. खैर, समय रहते बेटाबहू सुधरे तो मांबाप ने अपनी वसीयत थोड़ी बदली. उन्होंने बेटाबहू के लिए गुंजाइश निकाली, लेकिन ट्रस्ट वाला मुद्दा नहीं बदला.

सब कुछ अपना मान लेने की मानसिकता फर्ज अदायगी में बाधक है. कुमार अच्छा कमाने के बावजूद जबतब मांबाप से मोटी रकम वसूलते रहते हैं. कुछ कहने पर कहते हैं कि आगे लूं या पीछे, इस से क्या फर्क पड़ता है. सब कुछ तो मेरा ही है. मांबाप को यह पसंद नहीं. उन्होंने अब दूसरी तरह सोचना शुरू कर दिया है.

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लड़की वाले हावी

ज्यादातर परिवारों में लड़के का छोटा परिवार होने के कारण लड़की के पीहर वाले हावी हो जाते हैं. इन के यहां है ही कौन हम ही तो हैं, यही सोचते हैं वे. ऐसी स्थितियां लड़की की ससुराल में उत्साह भंग करने वाली होती है. कुसुम को बारबार सुनना पड़ता है कि हमारे घर में उसी के घर वाले नजर आते हैं. कोई मौका हो तो पूरी फौज हाजिर हो जाती है. कुसुम ने पीहर वालों को जब ताकीद कराया कि बुलाने का मतलब यह नहीं कि उन के यहां अड्डा ही जमा लिया जाए तो कहीं बात बनी. बहुत से इकलौते लड़के के मांबाप बड़े परिवार में रिश्ता कर के खुश होते हैं. उन की इच्छा रहती है कि वकत पर वे लोग उन के पास आएंजाएं. क्योंकि छोटे परिवार की कमी वे  देख चुके होते हैं. फिर भी उन के यहां डेरा जमाना कुछ लड़की वालों को नहीं जंचता. उन्हें लगता है कि लड़के वालों की पहल तथा इच्छा से उन के यहां आनाजाना अच्छा व सम्मानजनक रहता है. साथ ही बेटी या बहन को ताने या चुहलबाजी का सामना नहीं करना पड़ता.

उस पर अगर इकलौता लड़का अपनी ससुराल से ज्यादा जुड़ जाता है तो उसे अपने करीबी लोगों के ताने सुनने पड़ते हैं. विजय के चचेरे भाईबहन उसे इसीलिए खरीखोटी सुनाते हैं, ‘यार अब हम हैं ही क्या? अब तो तुम्हें सिर्फ ससुराल वाले ही दिखते हैं.’ विजय को पत्नी पर गुस्सा आता है. पत्नी को पीहर वालों पर.

इकलौते नहीं रहे

एक दंपती ने इकलौते बेटे की सगाई करते ही उस से कह दिया कि अब उन्हें एक बेटी भी मिल गई है. अब वह अपनेआप को इकलौता न समझे. ये दंपती कहते हैं कि ऐसा उन्होंने बेटे की मानसिकता को ध्यान में रख कर किया. वह किसी और बच्चे को हमारी गोद में बैठा देख कर उसे मारता, रुलाता था. उस की चीजें तोड़फोड़ देता था. हम ने इस का इलाज भी कराया, फिर भी उस में वह भावना कुछ बची हुई है. एक दंपती कहते हैं कि हमारा बेटा ऐसी मनोवृत्ति का शिकार है कि उसे हमारा उसी के बेटाबेटी से प्यार करना अच्छा नहीं लगता. हम उसे कैसे ठीक करें, यह समझ में नहीं आ रहा. उसे समझाना आसान नहीं. हमारे घर में बातबात पर कलह आम बात है.

केयरिंग शेयरिंग की आदत नहीं

अकेले लड़के से शादी करना मखमली या फूल जैसी नहीं, बल्कि चुनौतीपूर्ण है. एक तो ऐसे लड़के वैसे ही नाजों से पाले जाते हैं, उस पर इकलौते लड़कों की तो बात ही क्या है. चूंकि उन्हीं की केयर ज्यादा की जाती है, इसलिए वे दूसरों की केयर करने में उतने उत्सुक या जागरूक नहीं होते. चूंकि उन्हें सब कुछ बहुतायत में मिलता है, इसलिए शेयर करने की आदत उन में नहीं आती. इसीलिए पत्नी के रूप में ही सही, उन की ही इच्छा से कोई उन के जीवन में प्रवेश करता है, तो भी वे उतने मन से उस का स्वागत नहीं कर पाते. ऐसे व्यक्ति के जीवन में स्पेस बनाना पत्नी के लिए चुनौती होता है. एक इकलौते व्यक्ति की पत्नी बताती है कि इन्हें तो रात के अलावा मेरा कमरे में रहना तक पसंद नहीं. बस इन का मन या गरज हो तभी. भावनाओं की कद्र करना तो आता ही नहीं इन्हें. ये तो लोगों को वस्तु समझते हैं.

ऐसी ही एक और इकलौती बहू कहती है कि मैं भरेपूरे परिवार से आई और यहां एकदम अकेली पड़ गई. इन्हें ही क्या, इन के मातापिता तक को मेरा किसी से शेयर करना अच्छा नहीं लगता. किसी से बोलनाबतियाना उन्हें मुंह लगाना लगता है, लेनादेना आफत मोल लेना तथा रिश्तों की कद्र करना लिफ्ट देना. मैं ने साफ कहा कि हम अपनेअपने अंदाज से जीएं. मैं भी इंसान हूं, मेरी भी कोई सोच है. इन्हें यह सब अच्छा तो नहीं लगता पर सहन करना सीख गए हैं.

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हर इकलौता एक सा नहीं

गुड्डू भरेपूरे ससुराल को पा कर खुश है. वह मानता है कि उस के ससुराल वालों ने उस के जीवन की कमी को पूरा किया है. अपनी सालियों और पत्नी के चचेरेममेरे भाइयों तक को अपने परिवार का हिस्सा मानता है. उन से मिलने के लिए पार्टी के बहाने ढूंढ़ता है. सब उसे जीजूभाई, जीजूदादा, जीजूचाचा, जीजूमामा आदि कह कर खूब लाड़ करते हैं. उस की पत्नी इसे बावलापन समझती है. उस के सासससुर कहते हैं कि गुड्डू शुरू से ही मिलनसार है. इस ने कभी अकेला होना नहीं चाहा. बचपन में जब भी अस्पताल के सामने से निकलता, हम पर जोर देता कि जाओ, मेरे लिए खूब सारे भाईबहन ले कर आओ. हम से बारबार अकेलेपन का दुख कहता. हम ने अन्य संतानों की कोशिश की पर सफलता नहीं मिली. हमें तो पछतावा है. हम ने किसी अनाथ लड़की को गोद ले लिया होता. गुड्डू की जिंदगी में इकलौतापन मजबूरीवश आया. वह मन से इकलौता नहीं है.

इकलौतेपन को लौटरी न मान कर सहज भाव से लिया जाए. सब कुछ अपना मान कर चलना दुख बढ़ाता है. अधिकार के साथसाथ कर्तव्य भाव जिम्मेदार बनाता है. इकलौते लड़केलड़की की शादी देखने में भले अच्छी लगे पर कांटों भरे ताज जैसी होती है. क्योंकि उन्हें सहज रिश्तों में भी एकदूसरे तथा एकदूसरे के परिवारों की उपेक्षा का भाव अनुभव होता है. लड़की को इकलौते लड़के से शादी कर के केवल पत्नी बन कर ही नहीं रहना पड़ता, बल्कि उस की मां, बहन, रिश्तेदार, दोस्त व सहेली सब कुछ बन कर रहने का दायित्व भी वहन करना पड़ता है. इकलौते लड़के के नखरे भी उठाने पड़ सकते हैं. उस के मूड के अनुसार चलना पड़ सकता है. उस की इच्छाओं के आगे झुकना पड़ सकता है. पत्नी बन कर हम उस पर कब्जा नहीं जमा सकते. उस के स्वेच्छाचारी मन को जीतने के लिए कुछ खास जतन करने के लिए भी अपनेआप को तैयार करना पड़ सकता है. तभी इकलौते लड़के से शादी अच्छी तरह चल व निभ सकती है.

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40 पार की तैयारी करने के 5 टिप्स

40 की उम्र निकलते ही महिलाओं में अकेलेपन की समस्या घर करने लगती है कामकाजी की अपेक्षा होममेकर महिलाओं में यह समस्या अधिक देखी जाती है क्योंकि जब बच्चे छोटे होते हैं तो घर के कार्यों और बच्चों के पालन पोषण के कारण इन्हें सिर तक उठाने का अवसर नहीं मिलता परन्तु अब तक अधिकतर परिवारों में बच्चे पढने के लिए बाहर चले जाते हैं और यदि नहीं भी जाते हैं तो 18-20 की उम्र में उनकी अपनी ही दुनिया हो जाती है जिसमें वे व्यस्त रहते हैं. बच्चों की परवरिश में हरदम व्यस्त रहने वाली मां की उम्र भी अब तक 40 पार हो जाती है. पति अपने व्यवसाय या नौकरी में ही मसरूफ रहते हैं और बच्चे अपनी पढाई, दोस्तों और कैरियर में. वर्तमान समय में घरेलू कार्यों के लिए भी हर घर में मेड और मशीनें मौजूद हैं. जिससे घरेलू कार्यों में लगने वाला समय भी बहुत कम हो गया है. इन्हीं सब कारणों से जीवन के इस पड़ाव में महिलाओं के जीवन में रिक्तता आना प्रारंभ हो जाती है यदि समय रहते इस रिक्तता का इलाज नहीं किया जाता तो कई बार यह काफी गंभीर समस्या बन जाती है. घर में बच्चों के न होने से महिलाओं की व्यस्त दिनचर्या में अचानक विराम लग जाता है और कई बार तो वे स्वयं को घर का सबसे बेकार सदस्य समझने लगती हैं जिसकी किसी को भी आवश्यकता नहीं है. परंतु इस समस्या से निपटने का उपाय भी महिलाओं के स्वयं के हाथ में ही है. जैसे ही बच्चे कुछ बड़े होने लगें तो प्रत्येक महिला को यह कटु सत्य स्वीकार कर लेना चाहिए कि एक न एक दिन बच्चे अपनी दुनियां में व्यस्त हो जाएगें. जिस प्रकार कामकाजी महिलाओं को रिटायरमेंट के बाद सक्रिय रहने के लिए किसी गतिविधि में व्यस्त रहना आवश्यक है उसी प्रकार आज प्रत्येक महिला को चाहे वह कामकाजी हो या घरेलू, स्वयं को व्यस्त रखने के उपाय खोज लेने चाहिए ताकि बच्चों के बाद जीवन में आयी रिक्तता से स्वयं को दूर रखकर खुशहाल और स्वस्थ जीवन व्यतीत किया जा सके.

अक्सर महिलाओं को यह कहते सुना जाता है कि करना तो मैं भी कुछ चाहती हूं परंतु क्या करूं यह समझ नहीं आता. मेरी क्यूरी कहती हैं कि, ‘‘हमें यह विश्वास रखना चाहिए कि हमारे अंदर भी कोई न कोई हुनर छुपा है जिसे खोजना अनिवार्य है.’’यह सही है कि छोटे बच्चों के पालन पोषण की व्यस्तता में स्वयं के लिए थोड़ा सा भी वक्त निकालना काफी चुनौतीभरा कार्य होता है परंतु जहां चाह वहां राह वाले सिद्धांत पर अमल करें और जब भी वक्त मिले अपनी जिजीविषा को कायम रखें और जब आवश्यकता हो तो अपने इस हुनर को बाहर लाएं. वर्तमान में परिवार का स्वरूप एक या दो बच्चों तक ही सीमित हो गया है इसलिए अपने बच्चों के लिए माताएं बहुत अधिक पजेसिव हैं. उनका प्रत्येक छोटा बड़ा कार्य करके वे उन्हें पंगु तो बनाती ही हैं स्वयं भी पूरे समय व्यस्त रहती हैं इसकी अपेक्षा बच्चों को प्रारंभ से ही आत्मनिर्भरता का पाठ पढाएं, परिवार में कार्यों का विभाजन करें, आवश्यकतानुसार हेल्पर रखें ताकि आप अपने लिए भी चंद लम्हे निकाल सकें. यह आवश्यक नहीं है कि आप कोई भी कार्य धनार्जन के लिए ही करें बल्कि वह करें जिसमें आप खुशी महसूस कर सकें, अपने जीवन को जीवंत बना सकें, जिससे आप अपने जीवन के इस दूसरे दौर को पहले दौर से भी अधिक रोचक और आनंदकारी बना सकें.

1. रुचियों को जीवंत रखें

आमतौर पर विवाहोपरांत अपने घर प्ररिवार में महिलाएं इतनी अधिक व्यस्त हो जाती हैं कि वे अपनी रुचियां तो क्या अपने अस्तित्व तक को विस्मृत कर देती हैं. जीवन का भले ही कोई भी दौर क्यों न हो, सिलाई, कढ़ाई, रीडिंग, लेखन या कुकिंग जैसी अपनी रुचियों का परित्याग कदापि न करें क्योंकि वही तो आपका अस्तित्व और वजूद है जो आपको दूसरों से पृथक करता है. जब भी समय मिले कुछ न कुछ अंशों में अपनी हॉबी को कायम अवश्य रखें ताकि आवश्यकता पड़ने पर आप उसमें स्वयं को व्यस्त रख सकें यदि आप अपनी हॉबी पर काम नहीं करेंगी तो जीवन के एक पड़ाव पर खुद को अकेलेपन से घेर लेंगी.

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2. सीखना जारी रखें

एक से ढर्रे पर चलते चलते जीवन में बोरियत सी आने लगती है. सीखने की कोई उम्र नहीं होती लियोनार्डो द विंची कहते हैं कि ‘‘सीखने की प्रवृत्ति से मस्तिष्क कभी थकता नही है तथा जीवन उत्साह से परिपूर्ण रहता है.’’ अपनी रूटीन दिनचर्या से कुछ समय अपने लिए निकालकर अपनी रूचि के कार्य को अपडेट करने और जीवन में जीवन्तता बनाये रखने के लिए हमेशा कुछ नया सीखती अवश्य रहें ताकि जीवन में सदैव उत्साहजनक तरंगों का संचार होता रहे.

3. पति की सहभागी बनें

पति की सहयोगी बनना आपके लिए व्यस्त रहने का सर्वोत्तम उपाय है. कई बार जब पति अपने व्यवसाय या नौकरी के बारे में पत्नी को बताना चाहते हैं तो पत्नियां ‘‘तुम्हारी तुम जानो’’ कहकर पति की आफिसियल या व्यवसायिक बातों से पल्ला झाड़ लेतीं हैं इसकी अपेक्षा आप प्रारंभ से ही उनके काम में हाथ बटाएं, उन्हें रुचिपूर्वक सुनें आवश्यकता पड़ने पर  अपनी राय भी दें इससे आप स्वयं तो अपडेट रहेंगी ही पति भी आपके महत्व से अवगत रहेंगे. साथ ही आगे चलकर जब आपके बच्चे बड़े हो जाएँ तो आप उनके कार्य में भी अपना भरपूर योगदान दे सकेंगीं.

4. सक्रिय और सकारात्मक रहें

एक निश्चित समय के बाद रहना अकेले ही है इस कटु सत्य को स्वीकार कर अपने को व्यस्त रखने के उपाय खोजने में ही बुद्धिमानी है. नकारात्मकता जहां आपके जीवन को निष्क्रिय कर देती है, जीवन को तनाव और अवसाद जैसी बीमारियों से ग्रस्त कर देती है वहीं सकारात्मकता जीवन में सक्रियता का संचार कर जीवन को उत्साह से सराबोर कर देती है इसलिए सदैव पाजिटिव और सक्रिय रहें.

5. स्वयं पर ध्यान दें

इस उम्र में अपने जीवन मे योगा, व्यायाम और टहलने को प्राथमिकता दें ताकि आप शरीर और मन से स्वस्थ रह सकें. जीवन की समस्यायों और अकेलेपन का रोना रोते रहने की अपेक्षा कुछ अपने मन का करें अपने व्यक्तित्व को निखारने का भी प्रयास करें. योग, व्यायाम और वाकिंग से स्वयं को फिट रखने के साथ साथ ब्यूटी पार्लर जाकर अपने सौन्दर्य में भी चार चांद लगाएं अब तक जो भी करने की इच्छा आपके मन में रह गयी है उस सबको पूरा करने का वक्त है यह, अतः अपनी समस्त इच्छाओं की पूर्ति करें.

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मेरी पत्नी ने झूठे दहेज के इल्जाम में फंसा दिया, मैं क्या करुं?

सवाल

मैं विवाहित पुरुष हूं. मेरा विवाह हुए 4 वर्ष हो गए हैं. शादी के बाद से ही पत्नी का मेरे प्रति व्यवहार क्रूरतापूर्ण था. वह बात बात पर मुझे परेशान करती थी. हर समय कोई न कोई डिमांड करती और कहती, मांग पूरी करो वरना तुम्हें व तुम्हारे परिवार को दहेज विरोधी कानून में फंसवा दूंगी. बातबात पर पुलिस स्टेशन में झूठी शिकायत कर के परेशान करना उस की दिनचर्या बनने लगी. परेशान हो कर मैं ने तलाक का केस फाइल कर दिया तो उस ने सचमुच में हमें झूठे दहेज कानून में फंसा दिया. मुझे समझ नहीं आ रहा, क्या करें, इस मुसीबत से कैसे निकलूं? सलाह दें.

जवाब

दरअसल, 498ए दहेज प्रताड़ना कानून महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया था लेकिन आज यह कानून, कवच बनने के बजाय हथियार बन गया है जो कानूनी आातंक का रूप ले रहा है. आप की पत्नी की तरह अनेक पत्नियां इस कानून का दुरुपयोग पतिपत्नी के बीच के अहं, पारिवारिक विवाद, अलग रहने की इच्छा, संपत्ति में हक की चाहत आदि के लिए करती हैं. झूठे मुकदमे दर्ज करवाने के मामले अब बहुत सुनने में आ रहे हैं जो न केवल निराधार होते हैं बल्कि उन के पीछे गलत इरादे होते हैं. ऐसे मुकदमे दर्ज कराने का मकसद पैसा कमाना भी होता है. लेकिन अगर आप सही हैं तो डरे नहीं और पत्नी के खिलाफ सुबूत इकट्ठा करें. वैसे भी,

2 जुलाई, 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने दहेज से जुड़े श्वेता किरन के मामले में निर्णय सुनाते हुए कहा है कि 498ए कानून के अंतर्गत की गई शिकायत में कोई भी गिरफ्तारी तब तक नहीं हो सकती जब तक कोई 2 सुबूत या गवाह उपलब्ध न हों. ऐसा निर्णय इसलिए दिया गया ताकि असंतुष्ट व लालची पत्नियां इस कानून का दुरुपयोग न कर सकें और न ही पति को ब्लैकमेल कर सकें.

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अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

मेरा बेटे को शराब और सिगरेट की लत लग गई है, मैं क्या करूं?

सवाल

मेरे बेटे की उम्र 21 वर्ष है. वह गलत दोस्तों की संगति में आने की वजह से शराब और सिगरेट की लत का शिकार हो गया है. अब तो स्थिति यह हो गई है कि वह अपनी एडिक्शन की तलब पूरा करने के लिए चोरी भी करने लगा है. घर में किसी के भी पैसे बिना बताए उठा लेता है. मैं उस की इस स्थिति को देखते हुए खुद तनाव में आ गई हूं. कुछ समझ नहीं आता कि क्या करूं. कैसे उस को एडिक्शन से मुक्ति दिलाई जाए?

जवाब

जब हम एडिक्शन यानी लत की बात करते हैं तो इस का सीधा संबंध दिमाग से होता है. लत किसी भी चीज की हो सकती है. आप को यह समझना होगा कि एडिक्शन एक लत या आदत नहीं बल्कि बीमारी होती है. रही बात आप के बेटे की तो पूरी केस हिस्ट्री देखने के बाद उस की शारीरिक और मानसिक स्थिति का आकलन किया जा सकता है. उस से पता चलेगा कि शराब के कारण उस के शरीर पर कितना बुरा असर हुआ है. दूसरा यह पता लगाना भी जरूरी है कि शराब की वजह से डिप्रैशन या अन्य तरह की समस्या तो नहीं है. पहले उस की काउंसलिंग होगी फिर इलाज शुरू किया जाएगा.

आप घबराएं नहीं. एडिक्शन से आजाद होना मुश्किल तो है लेकिन नामुमकिन नहीं. अगर सही उपचार द्वारा कोशिश की जाए तो नशे की लत को छुड़ाया जा सकता है. टीएमएस थेरैपी के द्वारा नशे की लत को छुड़ाने में 100% रिजल्ट मिले हैं.

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पीयूष ने दोनों बैग्स प्लेन में चैकइन कर स्वयं अपनी नवविवाहित पत्नी कोकिला का हाथ थामे उसे सीट पर बैठाया. हनीमून पर सब कुछ कितना प्रेम से सराबोर होता है. कहो तो पति हाथ में पत्नी का पर्स भी उठा कर चल पड़े, पत्नी थक जाए तो गोदी में उठा ले और कुछ उदास दिखे तो उसे खुश करने हेतु चुटकुलों का पिटारा खोल दे.

भले अरेंज्ड मैरिज थी, किंतु थी तो नईनई शादी. सो दोनों मंदमंद मुसकराहट भरे अधर लिए, शरारत और झिझक भरे नयन लिए, एकदूसरे के गलबहियां डाले चल दिए थे अपनी शादीशुदा जिंदगी की शुरुआत करने. हनीमून को भरपूर जिया दोनों ने. न केवल एकदूसरे से प्यार निभाया, अपितु एकदूसरे की आदतों, इच्छाओं, अभिलाषाओं को भी पहचाना, एकदूसरे के परिवारजनों के बारे में भी जाना और एक सुदृढ़ पारिवारिक जीवन जीने के वादे भी किए.

हनीमून को इस समझदारी से निभाने का श्रेय पीयूष को जाता है कि किस तरह उस ने कोकिला को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया. एक सुखीसशक्त परिवार बनाने हेतु और क्या चाहिए भला? पीयूष अपने काम पर पूरा ध्यान देने लगा. रातदिन एक कर के उस ने अपना कारोबार जमाया था. अपने आरंभ किए स्टार्टअप के लिए वैंचर कैपिटलिस्ट्स खोजे थे.  न समयबंधन देखा न थकावट. सिर्फ मेहनत करता गया.

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उधर कोकिला भी घरगृहस्थी को सही पथ पर ले चली.

‘‘आज फिर देर से आई लीला. क्या हो गया आज?’’ कामवाली के देर से आने पर कोकिला ने उसे टोका.

इस पर कामवाली ने अपना मुंह दिखाते हुए कहा, ‘‘क्या बताऊं भाभीजी, कल रात मेरे मर्द ने फिर से पी कर दंगा किया मेरे साथ. कलमुंहा न खुद कमाता है और न मेरा पैसा जुड़ने देता है. रोजरोज मेरा पैसा छीन कर दारू पी आता है और फिर मुझे ही पीटता है.’’

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जब कहना हो न

20 सितंबर, 2021 की सुबह. करीब 9 बजे का समय. सड़क पर लोगों की आवाजाही आम दिनों की तरह थी. दिल्ली के लेबर चौक के पास से 2 युवतियां गुजर रही थीं. सहसा वहां एक बाइक आ कर रुकती है. बाइक सवार बाइक को ठोकर मार कर एक युवती की तरफ लपक कर उस पर एक के बाद एक कैंची से वार करने लगता है. खून से लथपथ लड़की जमीन पर गिर जाती है. मगर युवक  रुकता नहीं. लड़की पर करीब 25-26 दफा वार कर डालता है.

युवक युवती की गरदन को बुरी तरह गोद देता है. पीठ पर भी वार करता है. लात भी जमाता है. यहां तक कि कई नसें भी काट देता है. हैवानियत का यह घिनौना खेल करीब 10 मिनट तक चलता है. इस बीच लोग मूकदर्शक बने खड़े रहते हैं. कोई बचाव के लिए आगे नहीं आता है.

दिलोदिमाग को झकझोर देने वाली इस घटना को देख कर कोई भी समझ सकता है कि वह शख्स उस लड़की से बेतहाशा नफरत करता होगा.

सुरेंद्र नाम का यह शख्स 3 वर्षों से करुणा नाम की उस युवती से प्यार करने का दंभ भरता था. एकतरफा प्यार में पागल यह युवक एक कंप्यूटर ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट चलाता था और शादीशुदा था. उस के 2 बच्चे भी हैं. पत्नी के साथ तलाक का केस चल रहा था. करीब 3 साल पहले करुणा ने उस के सैंटर में दाखिला लिया था. तभी से सुरेंद्र उस का पीछा करने लगा था और प्यार करने का दावा करता था. करुणा ने उस का प्रेमप्रस्ताव ठुकरा दिया था. पुलिस में भी शिकायत की थी. पर सुरेंद्र के प्यार का भूत नहीं उतरा. उसे शक था कि करुणा किसी और से जुड़ी हुई है. करुणा के रिजैक्शन ने सुरेंद्र के अहं पर ऐसी चोट की कि उस ने अपने तथाकथित प्यार के जनून में करुणा का कत्ल ही कर डाला.

ऐसी ही एक घटना 19 सितंबर, 2016 को दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके में घटी. जब एक दिलजले आशिक ने अपनी प्रेमिका को तीसरी मंजिल की बालकनी से फेंक दिया. वजह वही थी, एकतरफा प्यार में रिजैक्शन का दर्द.

करीब डेढ़ साल पहले आरोपी अमित ने ब्यूटीपार्लर में काम करने वाली उस युवती से फेसबुक पर दोस्ती की थी. दोनों के बीच जानपहचान बढ़ती गई. व्हाट्सऐप पर खूब चैटिंग भी होने लगी पर अमित द्वारा विवाह का प्रस्ताव रखने पर लड़की ने इनकार कर दिया और इस इनकार की कीमत उसे अपनी जान दे कर चुकानी पड़ी.

दरअसल, 19 सितंबर की रात अमित अपनी बहन के साथ लड़की के घर पहुंचा और बातचीत के दौरान फिर से विवाह का प्रस्ताव रखा पर युवती द्वारा फिर इनकार किए जाने पर वह आगबबूला हो गया और युवती को बालकनी से नीचे फेंक दिया.

इसी तरह गत 23 सितंबर को ईस्ट दिल्ली क्रौस रिवर मौल की तीसरी मंजिल से एक 17 वर्षीय लड़की ने छलांग लगा कर खुदकुशी कर ली. इस घटना की तह में भी एक असफल हिंसक प्रेमी का बदला ही था. दरअसल, यह युवक 1 माह से लड़की को परेशान कर रहा था. लड़की के परिवार वालों ने इंदिरापुरम थाने में आरोपी के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई थी. मगर वह लड़की का पीछा नहीं छोड़ रहा था.

उस ने लड़की का अपने साथ लिया गया फोटो व्हाट्सऐप पर डाल दिया. इस घटना से लड़की को इतनी शर्मिंदगी उठानी पड़ी कि उस ने आहत हो कर अपनी जान दे दी.

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ऐसी घटनाएं समाचारों की सुर्खियां बनती रहती हैं. हाई प्रोफाइल केसेज (1996 का प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड/नैना साहनी तंदूर कांड) हों या मध्य अथवा निम्नवर्गीय केसेज जनून और अहं के आवेश में पागल पुरुष (भले ही वह पति हो या प्रेमी) स्त्री के प्रति हिंसक हो उठता है. तब उसे अपने ही प्रेम को बेदर्दी से मौत के घाट उतारते जरा भी संकोच नहीं होता है.

अब सवाल उठता है कि प्रेम जैसे खूबसूरत और दिल के रिश्ते में बदला और नफरत जैसे नकारात्मक भावों की जगह कहां है? प्रेम तो ऐसा एहसास है. जो दिल की गहराइयों को छूता है. सच्चा प्यार करने वाला इनसान कभी अपने प्रेमी को दुखतकलीफ में नहीं देख सकता. वह तो प्रेमी के चेहरे पर मुसकान सजाने के लिए अपने प्राणों तक की बाजी लगा सकता है. फिर जान लेना तो कल्पनातीत बात है. दरअसल, इन घटनाओं के मूल में है रिजैक्शन.

प्यार में रिजैक्शन

जिंदगी में अकसर हम चीजें रिजैक्ट करते हैं. कभी कोई चीज, जो हमें पसंद न हो उसे, तो कभी नौकरी, जो रास न आ रही हो या फिर कभी कोई आइडिया जो हमारी अपेक्षाओं के अनुकूल न हो. जैसे अप्रूवल, वैसे ही रिजैक्शन. दोनों ही हमारी जिंदगी के हिस्से हैं. इस से हैल्दी कंपीटिशन और बेहतर क्वालिटी निश्चित होती है. मगर मुश्किल तब पैदा होती है जब मनुष्य एकदूसरे को रिजैक्ट करते हैं खासकर जब लड़की/ स्त्री किसी लड़के/पुरुष को रिजैक्ट करती है.

मर्दवादी मानसिकता पर चोट

ऐसा होने पर उन के अहं पर चोट लगती है. लड़के कभी यह सहने को तैयार नहीं होते कि कोई लड़की उन के प्रेम को अस्वीकार कर किसी और को गले लगा ले. वे प्रेम पर एकाधिकार चाहते हैं. दरअसल, बचपन से ही हमारे यहां घरों में लड़कों की हर इच्छा पूरी की जाती है. मनपसंद चीज न मिलने पर यदि वे तोड़फोड़ भी करते हैं, तो भी घर वाले कुछ नहीं कहते.

घर के पुरुष महिलाओं पर रोब झाड़ते हैं. भाइयों के आगे बहनों में चुप रह कर सब सह जाने की आदत डाली जाती है. नतीजतन बड़े हो कर भी बहुत से लड़के स्वयं को इस मर्दवादी मानसिकता से मुक्त नहीं कर पाते.

नफरत में बदलती चाहत

इस तरह की मर्दवादी मानसिकता वाले शख्स जब एकतरफा प्यार में किसी को जनून की हद तक चाहने लगते हैं और लड़की यदि उन की इस चाहत को गंभीरता से नहीं लेती या अस्वीकार कर देती है, तो उन के प्यार को नफरत में बदलते देर नहीं लगती.

इस संदर्भ में क्रिमिनल साइकोलौजिस्ट अनुजा कपूर कहती हैं, ‘‘एक अध्ययन में पाया गया है कि किसी के प्रति एकतरफा चाहत जब जनून का रूप ले लेती है, तो वह इनसान को बड़े से बड़ा अपराध तक करने को मजबूर कर देती है. नाकाम चाहत में कुछ व्यक्ति डिप्रैशन में आ जाते हैं, तो कुछ घटिया करतूतों पर उतर आते हैं जैसे धमकी भरे मैसेज भेजना, पीछा करना, परेशान करना आदि. नफरत के ज्वार में बह कर कुछ लड़के कई दफा लड़की के साथसाथ अपनी जिंदगी भी बरबाद कर लेते हैं.’’

स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब प्रेमी/पति साइकोपैथ हो. इन का कोई भरोसा नहीं होता. अपने जनून में ये बर्बरता की हद तक जा सकते हैं.

साइकोपैथ प्रेमियों के लक्षण

साइकोलौजिस्ट डा. गौरव गुप्ता का कहना है, ‘‘साइकोपैथ जोड़तोड़ या झांसा देने में माहिर होते हैं. किसी लड़की/लड़के की शुरुआती मुलाकातों में इस बात का पता नहीं चल पाता कि  वह साइकोपैथ के साथ है. इस तरह के व्यक्ति के किसी के साथ जुड़ने पर उस के जीवन में काफी बदलाव नजर आने लगते हैं. वह अपने पहनावे को ले कर सतर्क होने लगता है. ऐसा व्यक्ति अपने पार्टनर को बोलने नहीं देता. सामने वाले की बातों को नजरअंदाज करता है. दूसरे की योजनाओं को चुटकियों में पलट कर अपनी योजना थोप देता है. अगर आप ब्रेकअप करने का प्रयास करेंगे तो वह परेशान हो उठेगा, माफी मांगेगा, लेकिन यह सब प्लानिंग के तहत होता है. उसे कभी अपने किए का पछतावा नहीं होता. वह आंखों में आंखें डाल कर झूठ बोलने में माहिर होता है. वह धीरेधीरे आप को दोस्तों से अलग करता जाएगा और केवल वही आप की जिंदगी में रहेगा ताकि वह आप पर और अधिकार जमा सके. उस का व्यवहार पलपल बदलता है. हर बार वह अपने बुरे बरताव के लिए माफी मांगेगा, लेकिन उस में सुधार नहीं होता.’’

कानून की ढीली पकड़

इस तरह की घटनाओं की एक और मुख्य वजह कानून की ढीली पकड़ भी है. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत में महिलाओं के हित में अनेक कानून बने हैं. फिर भी उन के खिलाफ अपराधों में कमी नहीं आ रही. वजह है कानून की ढीली पकड़ और अपराधी को सजा मिलने में होने वाला विलंब.

बड़े से बड़ा अपराध कर के भी अपराधी बच निकलता है. सजा मिलती भी है तो वर्षों बाद. ऐसे में लोगों के बीच कानून का खौफ घटा है. लड़कियों के साथ खुलेआम छेड़छाड़, कहीं भी शराबसिगरेट पीना, बीच सड़क पर थूकना, गंदगी फैलाना, गालियां देना, ट्रैफिक नियमों की अवहेलना जैसे काम करने के बावजूद व्यक्ति को सजा मिलनी तो दूर उसे टोकने वाला भी कोई नहीं होता है. वह स्वयं को सिस्टम के ऊपर समझने लगता है और फिर जो मन करता है वही करने लगता है.

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न कहें मगर संभल कर

लाइफ कोच, अनामिका यदुवंशी कहती हैं, ‘‘जिस शख्स के लिए आप का दिल गवाही न दे रहा हो उसे अपने साथी के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता. अत: न कहते समय कुछ बातों का खयाल रखें ताकि सामने वाला आप से बदला लेने को उतारू न हो.’’

न कहना हो तो न करें इंतजार: किसी को भी ज्यादा समय तक मौका दे कर आप उस के मन में यह संशय पनपने का समय दे रही हैं कि कहीं न कहीं उस के पास अब भी मौका है. जितनी देर आप लटकी रहेंगी, उतनी ही उस की उम्मीदें बढ़ती रहेंगी. ऐसे में किसी को ज्यादा दिनों तक लटका कर न कहने से आप उसे न केवल ज्यादा दुख देंगी, बल्कि इस से उस का ईगो भी ज्यादा हर्ट होगा और वह अपना गुस्सा संभालने की स्थिति में नहीं रहेगा.

अत: आप की किसी लड़के में रुचि नहीं है तो शुरूआत से ही सारी चीजें साफ रखनी चाहिए.

सब से बेहतरीन तरीका है ईमानदारी से सीधे तौर पर न कहना: मैसेज से कहें न. सामने न कहने से किसी के भी अहं को चोट लग सकती है, क्योंकि हो सकता है वह उस समय भावनाओं से अभिभूत हो या फिर जब आप न कहें वह उस समय नशे में हो और आप पर गुस्सा करे, चिल्लाए. अत: इन स्थितियों से बचने के लिए अपनी अस्वीकृति मैसेज द्वारा भेज सकती हैं.

अनदेखा करें: कोई आप की प्रतिक्रिया पाने के लिए लगातार आप को मैसेज करेगा. आप के सामने गिड़गिड़ाएगा कि आप उसे क्यों छोड़ रही हैं. हो सकता है, आप को सब के सामने बेइज्जत भी करे या आप का मजाक उड़ाए. ऐसे में आप को खुद को सही ठहराने के लिए कोई सफाई देने की जरूरत नहीं है. बस हर स्थिति को अनदेखा करें और धैर्य रखें.

न कह कर मत करें हां: भले ही कोई आप को कितने भी मैसेज करे या दबाव बनाए, लेकिन अपना मन या निर्णय न बदलें. उसे यह मौका कतई न दें कि वह आप की नजरों में आप को ही दोषी बना दे और इस कारण आप उस से बातचीत जारी रखें. यदि आप नहीं चाहती हैं तो दोस्ती रखने की भी जरूरत नहीं है. उसे दुख न हो, इस के लिए दूसरी कहानी बनाने की जरूरत नहीं है और न ही भविष्य के लिए उसे फिर से उम्मीद बंधाने की जरूरत है.

यदि उसे अनदेखा करना मुश्किल है, तो ब्लौक कर दें. एक बार जब कोई न कर देता है और किसी भी तरह का कोई संबंध नहीं रखता तो अधिकांश लोग आगे बढ़ जाते हैं.

आप को न कहने का हक है. बस इस के बारे में खुद को स्पष्टवादी रखे, लेकिन स्थिति साफ रखें. अस्पष्टता लिए कोई गुंजाइश न छोड़ें बिना दुख पहुंचाए न कहने का सब से बेहतर तरीका यही है.

अनामिका यदुवंशी कहती हैं कि पुरुषों को नफरत से नहीं, सकारात्मक सोच से डील करना चाहिए. यदि न आप का साथी कह रहा है या दुनिया में आप को सब से ज्यादा समझने वाला अथवा वह जो आप को खुद भी बहुत प्यार करता है, पर उस की कोई मजबूरी है तब उस की न को दिल पर न ले कर उस की भावनाओं को समझें वरना उस की न को अहं पर ले कर आप खुद को नुकसान पहुंचाएंगे और भविष्य के लिए बड़ी समस्याएं खड़ी करेंगे.

न का सीधा असर दिमाग पर: दरअसल, जब हम न सुनते हैं तो हमारे दिमाग का कुछ हिस्सा तेजी से कार्य करता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब आप शारीरिक रूप से दर्द या दुख महसूस करते हैं तो उस का सीधा असर दिमाग पर होता है. इसी कारण न सुनना ज्यादा दुख पहुंचाता है.

मनोवैज्ञानिक घावों को भी भरा जा सकता है: भावनात्मक दर्द, किसी की अस्वीकृति और मानसिक पीड़ा से उत्पन्न घावों को भरा जा सकता है. इस के लिए हमें सकारात्मक सोच रखनी होगी. सकारात्मक सोच के साथ जीवन के दोनों पहलुओं हां और न को साथ ले कर चलें. निश्चय ही किसी की न आप को कभी परेशान नहीं करेगी.

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मेरे देवर को क्राइम शो देखने की लत लग गई है, मैं क्या करुं?

सवाल-

मैं 32 वर्षीया विवाहिता हूं. सासससुर नहीं रहे इसलिए 17 साल का देवर साथ ही रहता है. मैं उसे अपने बच्चे जैसा प्यार करती हूं. पर इधर कुछ दिनों से देख रही हूं कि वह टीवी पर अकसर क्राइम शो देखता है और उसी पर बातें भी करता है. कुछ दिनों पहले उस का 2-4 लड़कों से झगड़ा भी हो गया था. मैं ने डांटा तो पलट कर जवाब तो नहीं दिया पर उस ने उस दिन से मुझ से बात कम करता है. क्राइम शो देखने की लत कई बार मना करने पर भी उस ने नहीं छोड़ी है. उस की यह लत उसे गलत दिशा में तो नहीं ले जाएगी? कृपया उचित सलाह दें?

जवाब-

टीवी पर दिखने वाले अधिकतर क्राइम शो काल्पनिक होते हैं, जो समाज में जागरूकता तो नहीं फैलाते अलबत्ता लोगों को गुमराह जरूर करते हैं.

अकसर रिश्ते में धोखाधड़ी, एक दोस्त द्वारा दूसरे दोस्त का कत्ल, पैसे के लिए हत्या, शादी में धोखा, अवैध संबंध, पतिपत्नी में रिश्तों में विश्वास का अभाव दिखाना कहीं न कहीं लोगों के मन में अपनों के प्रति अविश्वास का भाव ही पैदा करता है. यकीनन, टीवी पर दिखाए जाने वाले अधिकतर क्राइम शो न सिर्फ रिश्तों को प्रभावित करते हैं, अपराधियों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका भी निभाते हैं.

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हाल ही में एक खबर सुर्खियों में आई थी जिस में एक आदमी ने अपनी ही पत्नी की निर्मम हत्या कर दी थी. जब वह पकड़ा गया तो उस ने पुलिस को बताया कि यह हत्या उस ने टीवी पर प्रसारित एक क्राइम शो देखने के बाद की थी. यह कोई एक मामला नहीं. आएदिन ऐसी घटनाएं घट रही हैं.

अधिकतर क्राइम शो में दिखाया जाता है कि अपराधी किस तरह अपराध करते वक्त एहतियात बरतता है, ताकि वह कानून के चंगुल में फंस न सके. इस से कहीं न कहीं आपराधिक मानसिकता के लोगों का गलत मार्गदर्शन ही होता है.

बच्चों को तो इन धारावाहिकों से दूर ही रखने में भलाई है. और फिर आप के देवर की उम्र तो अभी काफी कम है. उस का मन अभी पढ़ाई की ओर लगना चाहिए. आप उसे प्यार से समझाने की कोशिश करें. उसे अच्छी पत्रिकाएं या अच्छा साहित्य पढ़ने को दें या प्रेरित करें. आप चाहें तो अपने पति से भी बात करें ताकि समय रहते उसे सही दिशा की ओर मोड़ा जा सके.

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ननद के रिलेशनशिप के बारे में फैमिली को बताऊं या नही?

सवाल-

मेरी ननद किसी लड़के से 8 सालों से रिलेशनशिप में है. हालांकि वह कहती है कि उन्होंने कभी मर्यादा की सीमारेखा नहीं लांघी है, फिर भी मुझ डर लगता है कि वह कभी कोई गलत फैसला न ले ले. उस ने यह बात घर में सभी से छिपा रखी है. मुझे भी इस बात की जानकारी अनजाने में ही हो गई है. अब मुझे लगता है कि यह बात मुझे अपने पति व सास को बता देनी चाहिए. पर कहीं ननद मुझ से हमेशा के लिए खफा न हो जाए. क्या यह ठीक रहेगा?

जवाब-

आप अपनी ननद की नाराजगी की चिंता किए बगैर इस बात से घर वालों को अवगत कराएं, क्योंकि यदि जानेअनजाने कल को उस के जीवन में कुछ गलत होता है तो आप को सारी उम्र इस बात का मलाल रहेगा.

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मायके में परिवार की चहेती और अपने तरीके से जीवन जीने वाली लड़की विवाहोपरांत जब ससुराल आती है तो नए घरपरिवार की जिम्मेदारी तो उस के कंधों पर आती ही है, साथ ही उस के नएनवेले गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते हैं सासससुर, ननददेवर जैसे अनेक नए रिश्ते. इन सभी रिश्तों को निभाना और इन की गरिमा बनाए रखना नवविवाहिता के लिए बहुत बड़ी चुनौती होती है.

ननद चाहे वह उम्र में बड़ी हो या छोटी सब की चहेती तो होती ही है, साथ ही परिवार में अपना अलग और महत्त्वपूर्ण स्थान भी रखती है. जिस भाई पर अभी तक केवल बहन का ही अधिकार था, भाभी के आ जाने से वह अधिकार उसे अपने हाथों से फिसलता नजर आने लगता है, क्योंकि अब भाई की जिंदगी में भाभी का स्थान अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है.

परिवार में एक नवीन सदस्य के रूप में प्रवेश करने वाली भाभी ननद की आंखों में खटकने लगती है. कई बार ननद भाभी को अपना प्रतिद्वंद्वी समझने लगती है और फिर अपने कटु व्यवहार से भाईभाभी की जिंदगी को नर्क  बना देती है.

अनावश्यक हस्तक्षेप

एक स्कूल में प्रिंसिपल रह चुकीं लीला गुप्ता कहती हैं, ‘‘मेरी इकलौती ननद परिवार की बड़ी लाडली थीं. विवाह हो जाने के बाद भी अपनी ससुराल से ही मायके को संचालित करती थीं. जब भी मायके आती थीं तो मेरे सासससुर उन्हीं की भाषा बोलने लगते थे. मैं भले कितने ही मन से कोई वस्तु या कपड़ा अपने या घर के लिए लाई हूं अगर वह ननद ने पसंद कर लिया तो वह उन्हीं का हो जाता था. यहां तक कि मेरे जन्मदिन पर मेरे लिए पति द्वारा लाया गया उपहार भी यदि उन्हें पसंद है तो उन का हो जाता था.

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मैं जेठानी और सास के सास बहू के सीरियल से परेशान हूं, मैं क्या करुं?

सवाल-

मैं 29 वर्षीय शादीशुदा महिला हूं. हम संयुक्त परिवार में रहते हैं. सासससुर के अलावा घर में जेठजेठानी, उन के 2 बच्चे व मेरे पति सहित कुल 8 सदस्य रहते हैं. ससुर सेवानिवृत्त हो चुके हैं. मुख्य समस्या घर में सासूमां और जेठानी के धारावाहिक प्रेम को ले कर है. वे सासबहू टाइप धारावाहिकों, जिन में अतार्किक, अंधविश्वास भरी बातें होती हैं, को घंटों देखती रहती हैं और वास्तविक दुनिया में भी हम से यही उम्मीद रखती हैं. इस से घर में कभीकभी अनावश्यक तनाव का माहौल पैदा हो जाता है.

इन की बातचीत और बहस में भी वही सासबहू टाइप धारावाहिकों के पात्रों का जिक्र होता है, जिसे सुनसुन कर मैं बोर होती रहती हूं. कई बार मन करता है कि पति से कह कर अलग फ्लैट ले लूं पर पति की इच्छा और अपने मातापिता के प्रति उन का आदर और प्रेम देख कर चुप रह जाती हूं. सम  झ नहीं आता, क्या करूं?

जवाब-

सासबहू पर आधारित धारावाहिक टीवी चैनलों पर खूब दिखाए जाते हैं. बेसिरपैर की काल्पनिक कहानियों और सासबहू के रिश्तों को इन धारावाहिकों में अव्यावहारिक तरीके से दिखाया जाता है.

पिछले कई शोधों व सर्वेक्षणों में यह प्रमाणित हो चुका है कि परिवारों में तनाव का कारण सासबहू के बीच का रिश्ता भी होता है और इस में आग में घी डालने का काम इस टाइप के धारावाहिक कर रहे हैं. ये धारावाहिक न सिर्फ परिवार में तनाव को बढ़ा रहे हैं, बल्कि भूतप्रेत, ओ  झातांत्रिक, डायन जैसे अंधविश्वास को भी बढ़ावा दे रहे हैं.

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काल्पनिक दुनिया व अंधविश्वास में यकीन रखने वाले लोगों में एक तरह का मनोविकार भी देखा गया है, जो इन चीजों को देखसुन कर ही इन्हें सही मानने लगते हैं. ऐसे लोगों की मानसिकता बदलना टेढ़ी खीर होता है. अलबत्ता, इस के लिए आप को धीरेधीरे प्रयास जरूर करना चाहिए.

दिल्ली प्रैस की पत्रिकाएं समाज में व्याप्त ढकोसलों, पाखंडों व अंधविश्वासों के खिलाफ शुरू से मुहिम चलाती आई हैं और अब महिलाएं समाज में व्याप्त ढकोसलों, पाखंडों का विरोध करने लगी हैं.

फिलहाल आप खाली समय में उपयुक्त वक्त देख कर सास और जेठानी को इस के गलत प्रभावों के बारे में बता सकती हैं. आप को उन के मन में यह बात बैठानी होगी कि इस से घर में तनाव का माहौल रहता है और इस का सब से ज्यादा गलत प्रभाव बच्चों और उन के भविष्य पर पड़ता है और वे वैज्ञानिक सोच से भटक कर तथ्यहीन और बेकार की चीजों को सही मान कर भटक सकते हैं. आप अपने ससुर से भी इस में दखल करने को कह सकती हैं.

बेहतर होगा कि खाली समय को ऊर्जावान कार्यों की तरफ लगाएं और उन्हें भी इस के लिए प्रेरित करें. उन्हें पत्रपत्रिकाएं व अच्छा साहित्य पढ़ने को दें. कुप्रथाओं, परंपराओं, अंधविश्वास के गलत प्रभावों को तार्किक ढंग से बताएं ताकि उन की आंखों की पट्टी खुल जाए और वे इस टाइप के धारावाहिकों को देखना बंद कर दें.

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महिलाओं के इन 10 नखरों के बारे में जान कर आप मुस्कुराए बिना नहीं रहेंगे

महिलाएं किसी माने में पुरुषों से कम नहीं हैं. कई क्षेत्रों में तो वे पुरुषों को भी पछाड़ चुकी हैं. बात बचत की हो या फिर परिवार को बांधे रखने की, महिलाएं अपनी सारी भूमिकाएं बखूबी निभाती हैं. उन में खूबियों के साथसाथ कुछ ऐसी हरकतें भी होती हैं, जिन का जवाब मिल पाना मुश्किल है. आइए, जानते हैं वे हरकतें कौन सी हैं :

पीछे बुराई सामने बखान:

आप ने अकसर अपनी श्रीमती को अपनी सहेली से कहते सुना होगा कि अरे वह नीलिमा न जाने खुद को क्या समझती है. थोड़े अच्छे कपड़े क्या पहनती है, उसे लगता है उस से सुंदर कोई और है ही नहीं. लेकिन जैसे ही श्रीमती की मुलाकात नीलिमा से किसी पार्टी या फंक्शन में होती है तो उन की राय तुरंत बदल जाती है. तब वे कहती हैं कि हाय नीलिमा, आप की साड़ी बहुत सुंदर है. साडि़यों का कलैक्शन आप के पास कमाल का है. कोई कुछ भी कहे, मुझे आप की ड्रैसिंग सैंस बेहद पसंद है. भई, जब आप को तारीफ करनी ही थी तो पीठ पीछे बुराई क्यों की और अगर सच में मन में नफरत थी तो फिर यह तारीफ क्यों? अब आप ही बताएं कि है न यह सोचने वाली बात?

सलाह लेंगी पर मन की करेंगी:

‘‘अच्छा मांजी मैं व्यायाम क्लास के लिए कहां जाऊं सरकार नगर या बगल वाली बिल्डिंग में?’’

मान लें कि मांजी ने कहा सरकार नगर, लेकिन तब भी वे पति से पूछेंगी, ‘‘आप को क्या लगता है मुझे व्यायाम क्लास के लिए कहां जाना चाहिए?’’

माना पति ने भी कहा सरकार नगर. पर 2 लोगों से एक सा जवाब पाने के बाद भी उन के दिल को तसल्ली नहीं मिलती. अपनी 2-4 सहेलियां से भी यही सवाल पूछेंगी और आखिर में कहेंगी, ‘‘मैं सोच रही हूं बगल वाली बिल्डिंग ठीक रहेगी. सरकार नगर वाली क्लास में बाकी सुविधाएं तो ठीक हैं, लेकिन वह घर से थोड़ा दूर है.’’

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श्रीमतीजी, जब आप को अपने मन की करनी ही थी तो लोगों की सलाह क्यों ली?

खाएंगी भी मोटापे से भी डरेंगी:

‘‘बस…बस थोड़ा ही देना’’  ‘‘अरे यह ज्यादा है थोड़ा कम करो’’, ‘‘चलो आप कह रही हैं तो चख ही लेती हूं’’, ‘‘इतना काफी है ज्यादा खाऊंगी. तो मोटी हो जाऊंगी.’’ जब भी खानेखिलाने की बात होती है महिलाएं अकसर इन जुमलों का इस्तेमाल करती हैं. लेकिन खाती जरूर हैं. इतना ही नहीं, खाने की सामग्री थोड़ाथोड़ा कहतेकहते अधिक भी हो जाती है और किसी को पता भी नहीं चलता. उन्हें भी नहीं.

अगर वाकई में उन्हें नहीं खाना है तो इतनी सारी बातें कहने के बजाय एक साधारण सा न भी कह सकती हैं.

5 मिनट कहेंगी सजने में घंटों लगा देंगी:

‘‘बस 5 मिनट में रैडी हो कर आई’’, ‘‘हां…हां… मैं तैयार हूं बस 3 मिनट’’, ‘‘बस आ ही रही हूं.’’ महिलाओं के मुंह से ये वाक्य तब सुनने को मिलते हैं जब वे तैयार हो कर कहीं जाने के मूड में होती हैं. पूछने पर हर बार कहती हैं कि बस ‘‘5 मिनट’’ और उन के ये 5 मिनट 5 से 10, 10 से 15, 15 से 20 बढ़ते जाते हैं. हैरान करने वाली बात तो यह है कि तैयार होने में 30 मिनट से भी अधिक समय लगाने के बावजूद कुछ न कुछ बाकी ही रहता है. इस का खुलासा तब होता है जब कोइ उन्हें कहता है कि मिसेज शर्मा, आप बहुत खूबसूरत नजर आ रही है और वे जवाब में कहती हैं, ‘‘क्या खूबसूरत. मैं तो अच्छी तरह से तैयार भी नहीं हो पाई, शर्माजी को आने की जल्दी जो पड़ी थी.’’ क्यों यह भी सच है न?

साथी को बदलेंगी फिर बदलाव से चिढ़ेंगी:

हमसफर भले कितना भी अच्छा क्यों न हो, महिलाओं के लिए वह कभी परफैक्ट नहीं होता है. बारबार टोक कर वे उसे हमेशा सुधारने में लगी रहती हैं. ‘‘भई, पार्टी में कभी आगे बढ़ कर आप भी लोगों से बात कर लिया करो,’’ ‘‘आप कभी खुद शौपिंग पर जा कर हमारे लिए कुछ नहीं लाते हो.’’

बेचारे पति कई बार ये ताने सुनने के बाद खुद को बदल लेते हैं. तब वही पत्नियां उन से कहती हैं, ‘‘पार्टी में तुम्हें लोगो से मिलने की बड़ी जल्दी होती है’’, ‘‘यह अपने मन से क्या उठा लाए? जब शौपिंग करनी नहीं आती है तो करते क्यों हो?’’ अब आप ही बताएं कुसूरवार कौन है?

शौपिंग के लिए हर वक्त रहेंगी रैडी:

‘‘मैं औनलाइन शौंपिंग में यकीन नहीं रखती,’’  कहने वाली महिलाएं को अगर इंटरनैट पर कोई काम करते वक्त साड़ी, सूट या ज्वैलरी का विज्ञापन दिख जाए, तो क्लिक कर के एक बार उसे देखती जरूर हैं. भई, अगर खरीदना नहीं है तो देखना क्यों? कुछ कहती हैं, ‘‘मैं तो बस फलां मौल से शौपिंग करती हूं.’’ लेकिन अगर पता चल जाए कि पास में ज्वैलरी की नई शौप खुली है तो देखने जरूर पहुंच जाती हैं. खरीदें या न खरीदें यह बाद की बात है.

‘‘मैं तो बस संडे को शौपिंग करती हूं.’’ ऐसा कहने वाली महिलाओं की भी कोई कमी नहीं है, लेकिन यह भी बस कहने की बात है. कुछ दिनों बाद वे खुद कहती हैं, ‘‘सोच रही हूं मंडे को शौपिंग पर चली जाऊं, घर में अकेली बैठ कर क्या करूंगी?’’

कहने का मतलब बस यही है कि महिलाएं किसी भी स्थिति में और कहीं भी शौपिंग के लिए तैयार रहती हैं.

हर बात को ले कर रहती हैं कन्फ्यूज्ड:

‘‘जानू शादी में क्या पहनूं, लहंगासाड़ी या फिर घाघराचोली’’, ‘‘मांजी नास्ते में क्या बनाऊं डोसा या ढोकला’’, ‘‘क्या करूं यार समझ नहीं पा रही पार्टी में जाऊं या नहीं.’’ बात छोटी हो या बड़ी, फैसले को ले कर महिलाएं हमेशा कन्फ्यूज्ड रहती हैं. ‘करूं या न करूं, जाऊं या नहीं. क्या पहनूं, क्या नहीं खाऊं या न खाऊं’ जैसी तमाम बातें महिलाओं से जुड़ी होती हैं, लेकिन फैसले को ले कर वे हमेशा हां, न में ही उलझी रहती हैं. मजेदार बात यह है कि महिलाएं जिन बातों को ले कर उलझन में रहती हैं, उन को छोड़ कर कुछ तीसरा ही करती हैं.

लड़ेंगी भी रोएंगी भी:

यह कहना गलत नहीं होगा कि पत्नियां पतियों के सामने अपने आंसुओं का इस्तेमाल तलवार की तरह करती हैं, जिन्हें देख कर बेचारे पति खुद घुटने टेक देते हैं. मजेदार बात तो तब होती है जब गलती खुद पत्नी की होती है, लेकिन वे पति पर बरस पड़ती हैं और आखिर में आंसू बहा कर पति को यों एहसास दिलाती हैं जैसे गलती उन की है. बेचारे पति भी कुछ समझ नहीं पाते. पत्नी की आंखों में आंसू देख कर सौरी बोल कर मामले को रफादफा कर देते हैं और पत्नियां मन ही मन मुसकराती हैं. न जानें वे ऐसी क्यों हैं?

हर हाल में कहेंगी मैं ठीक हूं:

‘‘आप को मेरी कोई फ्रिक नहीं है’’, ‘‘कल से मेरी तबीयत खराब है. पर आप को क्या’’, ‘‘मेरा सिर दर्द से फटा जा रहा है, लेकिन आप को क्या.’’  जैसी न जानें कितनी बातें हैं, जो पत्नियां अपने पति से अकसर गुस्से में कहती हैं खासकर तब जब पति उन का हालचाल उन से न पूछे. लेकिन पत्नियों के तानों के बाद जब कभी पति पत्नी से पूछता है कि अब दर्द कैसा है या तबीयत कैसी है  तो पत्नी कहती है कि मैं ठीक हूं, फिर चाहे दर्द ज्यों का त्यों क्यों न हो. अब आप ही बताएं जब ठीक ही थी तो पति को इतनी बातें सुनाने की क्या जरूरत थी.

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नाराज भी रहेंगी फिक्र भी करेंगी:

चाहे पति आसमान से चांद ही क्यों न ले आएं, लेकिन पत्नियां हमेशा उन से नाराज ही रहती हैं. लेकिन यह भी सच है कि  उन की नाराजगी में फ्रिक भी छिपी होती है. नाराजगी के चलते वे भले फोन लगा कर आप से प्यार भरी बातें न करें, लेकिन नाराजगी के अंदाज में आप की खैरियत का जायजा ले ही लेती हैं. इतना ही नहीं, अपनी नाराजगी को वे हमेशा एक ओर रखती हैं और पति की चायपानी, टिफिन जैसी जरूरतों को एक तरफ, कभी वे अपनी नाराजगी में पति का नुकसान नहीं करती हैं. अब आप ही बताएं क्या वे ऐसी नहीं हैं?

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