राघव एक दवा बनाने वाली कंपनी में काम करता है. जब उस का रिश्ता तय हुआ तो उसे लगा कि उस ने गलती से ‘हां’ कर दी है. बारबार उसे यह बात कचोटने लगी कि लड़की की शक्ल ठीक नहीं है. राघव का जीजा उस का घनिष्ठ मित्र था और उस पर उसे पूरा भरोसा भी था. जब वह लड़की देखने गया तो किसी कारण से जीजा आ नहीं सका था. सब के कहने पर उस ने हां कर दी पर अब वह तय नहीं कर पा रहा था.

राघव को जब एक काउंसलर के पास लाया गया तो उस ने अपने दिल की बात उस से की कि लड़की सुंदर नहीं है और वह अगर उस से शादी करेगा तो सारी जिंदगी उसे खुश नहीं रख पाएगा. आखिरकार रिश्ता तोड़ दिया गया और विवाह से पहले सलाह लेने से 2 जिंदगियां बरबाद होने से बच गईं.

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पश्चिमी देशों की तरह भारत में भी तलाक का ग्राफ निरंतर बढ़ता जा रहा है. इस की मुख्य वजह है नई पीढ़ी की अपनी एक सोच होना, जो उन्हें अपने ढंग से जीने के लिए उकसाती है. अपनी इच्छाओं को दबाती नहीं है बल्कि अपने हक की लड़ाई लड़ती है. इसलिए उम्मीदें पूरी न होने पर बात तलाक तक पहुंच जाती है.

तलाक की सब से बड़ी वजह है पतिपत्नी के बीच शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक असंगति होना. इस के नतीजतन देखा गया कि 90 प्रतिशत युगल अवसाद का शिकार हो जाते हैं.

असल में प्यार करना, रिश्तों में बंधना आसान है पर उन्हें निभाना मुश्किल है. विवाह से पहले क्या कोई बताता है कि किस तरह से भावनात्मक रूप से सुदृढ़ और शारीरिक रूप से संतुष्ट रिश्ता कायम किया जाए. शायद नहीं, क्योंकि अभी भी हमारे देश में मातापिता या भाईबहन खुल कर विवाह से जुडे़ मसलों पर बात नहीं करते हैं.

प्रीमैरिज काउंसलिंग का उद्देश्य होता है युवा पीढ़ी को विवाह के बंधन की पूरी जानकारी देना ताकि युवकयुवती एकदूसरे के प्रति सम्मान रखते हुए एक स्नेहपूर्ण व मर्यादित रिश्ता जी सकें. स्वस्थ यौन संबंधों की जानकारी वैवाहिक जीवन को सुखद बनाने के लिए बहुत जरूरी है. अन्य विकासशील देशों की तरह भारत में यौन शिक्षा की जानकारी अभी भी स्कूलकालिज में नहीं दी जाती है इसलिए पतिपत्नी को एकदूसरे की जरूरतों को समझने और सही तरह से संबंध कायम करने के लिए प्रीमैरिज काउंसलिंग आवश्यक है.

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अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डा. संदीप वोहरा का कहना है, ‘‘प्रीमैरिज काउंसलिंग की यह अवधारणा पूरी तरह से पश्चिमी है. भारत में करीब 5 साल पहले इसे मान्यता मिली है और अभी भी यह अपनी प्रारंभिक अवस्था में है. आज की पीढ़ी कैरियर पर ज्यादा ध्यान देती है और चाहती है कि उन के प्रोफेशन के सामने कोई अवरोध न आए. वे मानसिक रूप से सशक्त नहीं हैं इसलिए चाहे वह व्यक्तिगत संबंध हो या प्रोफेशनल, उन्हें समझने के लिए उन के पास न तो समय है न ही कोई दिशा. वे सब से पहले अपने होने वाले जीवनसाथी की शक्ल देखते हैं, आकर्षण को महत्त्वपूर्ण मानते हैं. हम उन्हें समझाते हैं कि यह गौण चीज है और जरूरी है हर स्तर पर संगति होना.’’

मनोवैज्ञानिक और काउंसलर हेमा गुप्ता का कहना है, ‘‘हमारे जीवन के 2 मुख्य पहलू काम और परिवार वाटर टाइट कंपार्टमेंट नहीं हैं, वे एकदूसरे से संबंधित हैं. विवाह से पहले इन दोनों विषयों पर स्पष्ट रूप से बात करना जरूरी है क्योंकि लड़के के लिए आज उस का काम जितना आवश्यक है उतना ही लड़की के लिए भी है. अगर इस स्तर पर वे सामंजस्य नहीं बिठा पाते हैं तो मतभेद होना स्वाभाविक ही है.

‘‘आज से 20-25 साल पहले तक मातापिता बच्चों से पूछते तक नहीं थे कि वे क्या चाहते हैं क्योंकि माना जाता था कि विवाह एक समझौते का नाम है पर अब विवाह का अर्थ है दोनों का समान रूप से विकास. विवाह 100 प्रतिशत सामंजस्य का नाम है पर उस का अर्थ है एकदूसरे को जैसे वे हैं उसी रूप में स्वीकारना. अकसर जब काउंसलिंग के लिए लड़कालड़की आते हैं तो एक ही सवाल उन्हें परेशान करता है कि उन्हें कैसे पता चले कि सामने वाला उन के लिए कैसा है? वे साथी के बारे में भी विस्तार से जानने को इच्छुक होते हैं.’’

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आज जब लड़कालड़की दोनों ही अपनी स्वतंत्र सोच रखते हैं और आत्मनिर्भर रहते हुए आत्मसम्मान के साथ जीवन बिताना चाहते हैं, ऐसे में प्रीमैरिज काउंसलिंग बहुत ही प्रभावी जरिया है.

प्रीमैरिज काउंसलिंग के दौरान घरपरिवार, नौकरी, उत्तरदायित्व और समझौतों पर तो बात होती ही है, सेक्स संबंधी समस्याओं को ले कर भी लड़कालड़की में अनेक सवाल होते हैं. अपोलो अस्पताल की वरिष्ठ स्त्रीरोग विशेषज्ञ डा. गीता चड्ढा का कहना है, ‘‘अगर लड़की वर्जिन होती है तो उसे हम सेक्स की जानकारी देते हैं कि किस तरह पतिपत्नी को शारीरिक रिश्ता कायम करना चाहिए. विवाह के बाद भी ऐसे युगल आते हैं जो कहते हैं कि वे महीनों बीत जाने पर भी शारीरिक संबंध स्थापित नहीं कर पाए हैं.

जिन लड़कियों का हाइमन किसी वजह से फट गया है, उस मामले में हम लड़के को समझाते हैं कि ऐसा खेलकूद के दौरान हो जाता है और आवश्यक नहीं कि प्रथम सहवास के दौरान लड़की को रक्तस्राव हो. जो युगल विवाह होते ही संतान नहीं चाहते हैं उन्हें हम विभिन्न गर्भनिरोधकों की जानकारी देते हैं. विवाह से पहले ही लड़की को गर्भनिरोधक पिल्स देना शुरू कर देते हैं ताकि विवाह के बाद वह तनावग्रस्त न रहे.

‘‘कई लड़कियां जो 30 वर्ष से अधिक की होती हैं, वे चाहती हैं कि संतान जल्दी हो जाए तो हम जांच करते हैं कि वे स्वस्थ हैं कि नहीं और विवाह के तुरंत बाद गर्भवती होना ठीक रहेगा या नहीं.

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विवाह से पूर्व यौनसंबंधों के बारे में स्वस्थ जानकारी होना नितांत आवश्यक है क्योंकि यह ऐसा संवेदनशील विषय है जिसे ले कर लड़कालड़की दोनों के मन में एक घबराहट रहती है.’’

वास्तविकता तो यह है कि बेशक प्रीमैरिज काउंसलिंग की अवधारणा पाश्चात्य सभ्यता की देन है पर हर समाज में इस की जरूरत है. खासकर भारत जैसे देश में जहां अभी भी विवाह को ले कर मांबाप और लड़केलड़कियों के मन में पूर्वाग्रह हैं. इस के द्वारा वह विवाह से पहले ही साथी की कमियों, खूबियों और उम्मीदों को समझ विवाह के बाद रिश्ते को बेहतर बना सकते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि वह जान जाते हैं कि उन्हें विवाह के बाद किस स्तर पर और कितना सामंजस्य करना होगा.

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