सोनिया 20 साल की हुई नहीं कि उस की मां को उस की शादी की चिंता सताने लगी. लेकिन सोनिया ने तो ठान लिया है कि वह पहले पढ़ाई पूरी करेगी, फिर नौकरी करेगी और तब महसूस हुआ तो शादी करेगी वरना नहीं. सोनिया की इस घोषणा की जानकारी मिलते ही परिवार में हलचल मच गई. सभी सोनिया से प्रश्न पर प्रश्न पूछने लगे तो वह फट पड़ी, ‘‘बताओ भला, शादी में रखा ही क्या है? एक तो अपना घर छोड़ो, दूसरे पराए घर जा कर सब की जीहुजूरी करो. अरे, शादी से पतियों को होता आराम, लेकिन हमारा तो होता है जीना हराम. पति तो बस बैठेबैठे पत्नियों पर हुक्म चलाते हैं. खटना तो बेचारी पत्नियों को पड़ता है. कुदरत ने भी पत्नियों के सिर मां बनने का बोझ डाल कर नाइंसाफी की है. उस के बाद बच्चे के जन्म से ले कर खानेपीने, पढ़ानेलिखाने की जिम्मेदारी भी पत्नी की ही होती है. पतियों का क्या? शाम को दफ्तर से लौट कर बच्चों को मन हुआ पुचकार लिया वरना डांटडपट कर दूसरे कमरे में भेज आराम फरमा लिया.’’

यह बात नहीं है कि ऐसा सिर्फ सोनिया का ही कहना है. पिछले दिनों अंजु, रचना, मधु, स्मृति से मिलना हुआ तो पता लगा अंजु इसलिए शादी नहीं करना चाहती, क्योंकि उस की बहन को उस के पति ने दहेज के लिए बेहद तंग कर के वापस घर भेज दिया. रचना को लगता है कि शादी एक सुनहरा पिंजरा है, जिस की रचना लड़कियों की आजादी को छीनने के लिए की गई है. स्मृति को शादीशुदा जीवन के नाम से ही डर लगता है. उस का कहना है कि यह क्या बात हुई. जिस इज्जत को ले कर मांबाप 20 साल तक बेहद चिंतित रहते हैं, उसे पराए लड़के के हाथों निस्संकोच सौंप देते हैं. उन की बातें सुन कर मन में यही खयाल आया कि क्या शादी करना जरूरी है. उत्तर मिला, हां, जरूरी है, क्योंकि पति और पत्नी एकदूसरे के पूरक होते हैं. दोनों को एकदूसरे के साथ की जरूरत होती है. शादी करने से घर और जिंदगी को संभालने वाला विश्वसनीय साथी मिल जाता है. व्यावहारिकता में शादी निजी जरूरत है, क्योंकि पति/पत्नी जैसा दोस्त मिल ही नहीं सकता.

सामाजिक सम्मान

पतिपत्नी का रिश्ता एक आवश्यकता है. दुनिया में हर आदमी अच्छे स्वस्थ संबंधों की कामना करता है. अच्छे संबंध पतिपत्नी को बेहतर इनसान बनाने में मदद करते हैं. इस बात से आप मुंह नहीं मोड़ सकते. लंबी आयु के लिए भी शादीशुदा होना जरूरी है. इस सुझाव में न तो खानपान पर रोक है न ही कोई बंदिश. यानी हींग लगे न फिटकरी रंग भी आए चोखा. लंदन स्कूल आफ इकोनोमिक्स के जानेमाने रिसर्चर प्रोफैसर माइक मर्फी के मुताबिक शादी खुद ही एक तरह का फायदा है. उन की रिसर्च के अनुसार अविवाहित लोगों के मुकाबले शादीशुदा लोग न केवल लंबी जिंदगी जीते हैं, बल्कि उन की सेहत भी ज्यादा ठीक रहती है.

उम्र ढलने पर उन्हें ज्यादा देखभाल भी हासिल होती है. जहां 34 साल से कम उम्र के अविवाहित पुरुषों में मृत्युदर इस उम्र के शादीशुदा पुरुषों के मुकाबले ढाई गुना ज्यादा पाई गई, वहीं अविवाहित बुजुर्ग महिलाओं में भी उन की शादीशुदा साथियों के मुकाबले मृत्युदर कहीं ज्यादा पाई गई. विवाह तो इनसानी सभ्यता की न जाने कितनी पुरानी रस्म है. हजारों सालों से विवाह होते आ रहे हैं. यदि शादी नाम की संस्था न होती तो क्या होता? जंगलराज. कोई भी किसी के साथ जब तक मन होता रहता, फिर छोड़ कर अपना अलग रास्ता नापता, जबकि स्त्रीपुरुष शादी के बंधन में बंध कर सम्मान का रास्ता बनाते हैं. यह सच है कि इस संस्था में दहेज जैसी कुरीति का प्रवेश हो गया है, जिस से लड़कियों की खुशियों का मोल लगाया जाता है और उस से उन्हें लगता है कि जैसे उन का कोई वजूद ही नहीं है. पर यह कुरीति तो जानेअनजाने हम सभी ने अपनाई है और इसे बढ़ावा दिया है. आज जरूरत है तो दहेज जैसी कुरीति को समाप्त करने की न कि विवाह संस्था को समाप्त करने की.

सामंजस्य जरूरी

वे दिन लद गए जब पत्नियों से पति और ससुराल वालों के हर जुल्म को सहने की उम्मीद की जाती थी. अब तो बराबरी का जमाना है. गलत बात पर आवाज उठाना और अपने हक के लिए लड़ना पत्नियों का अधिकार है. फिर आज की युवा लड़कियों को विवाहित जिंदगी में पांव रखने में हिचकिचाहट क्यों? दरअसल, घरपरिवार बनाना और विवाहित जीवन सफल बनाना पति और पत्नी दोनों के ही हाथ में होता है, जो बातें कुदरत ने अलगअलग दी हैं, वे तो हमेशा ही रहेंगी. जरूरत है आपसी सामंजस्य, सूझबूझ और प्रेम की. इस धरती पर कोई भी 2 लोग एकजैसे नहीं होते. खून के रिश्तों में यहां तक कि जुड़वा जन्मे बच्चों में भी कोई भिन्नता अवश्य होती है. फिर पतिपत्नी जो एकदूसरे से विपरीत पारिवारिक माहौल में रहने वाले व अलगअलग संस्कार वाले होते हैं, उन में परस्पर वैचारिक और स्वभावगत भिन्नता हो तो अचरज कैसा. इसलिए विवाह संस्था पर उंगली उठाने से पूर्व निम्न पूर्वाग्रहों से मुक्त हो जाएं :

कोई भी पूर्ण नहीं होता. अत: दूसरे को उस की कमियों के साथ ही स्वीकारें.

सिर्फ लड़के/लड़कियों की कमियों का ही विश्लेषण न करें, बल्कि अपनी कमियों पर भी गौर करें और उन्हें दूर करने का प्रयास करें.

किसी को सुधारने के चक्कर में उस के अहं को ठेस न पहुंचाएं.

परस्पर सम्मान और भावनात्मक लगाव बनाएं.

समानता का अर्थ टक्कर लेना नहीं बल्कि एकदूसरे के लिए समान रूप से उपयोगी साबित होने से है, इस सचाई को समझें और खुले दिल से स्वीकारें.        

शादी न करने पर होने वाले अभाव

व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं हो पाता.

स्वभावगत भिन्नता से मिलने वाला आत्मविकास नहीं हो पाता.

विवाहित लोगों की जिंदगी लंबी होती है अविवाहितों की कम.

शादीशुदा रिश्ता जिंदगी की अहम जरूरतों को पूरा करता है, जो गैरशादीशुदा होने पर पूरी नहीं हो पातीं.

कठिन वक्त पर सब से विश्वसनीय साथी की कमी बेहद खलती है.

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