भारतीय समाज में कोई 4 दशक पहले की बात करें तो उन दिनों ‘दामाद’ को बड़ा आदरसम्मान प्राप्त होता था. दामादजी ससुराल आएं तो सास से ले कर सालियां तक उन की सेवा में जुट जाती थीं. ससुराल में दामादजी की आवभगत में कोई कमी न रह जाए, दामादजी के मुख से बात निकले नहीं कि पूरी हो जाए, किसी बात पर कहीं वे नाराज न हो जाएं, हर छोटीछोटी बात का ध्यान रखा जाता था. उन की आवभगत में हर छोटाबड़ा सदस्य अपने हाथ बांधे आगेपीछे लगा रहता था. उन के खानेपीने, रहनेघूमने की उच्चकोटि की व्यवस्था घर के मुखिया को करनी होती थी और जब ससुराल में सुखद दिन गुजार कर दामादजी अपने घर को प्रस्थान करते थे, तो भरभर चढ़ावे के साथ उन को विदा दी जाती थी. उन से यह आशा की जाती थी कि इस आदरसत्कार से दामादजी प्रसन्न हुए होंगे और उन के घर में हमारी कन्या को कभी कोई दुख नहीं मिलेगा.उत्तर भारत में दामाद की खातिरदारी की खातिर कुछ भी करगुजरने की परंपरा रही है. भले ही गैरकानूनी हो, पर दामाद को खुश करने का यह सिलसिला विवाह के समय दहेज से शुरू हो कर आगे तक चलता ही रहता है. फिर आंचलिक परंपरा तो किसी एक घर के दामाद को गांवभर का दामाद मान कर उस की खातिरदारी करने की भी रही है.

भारतीय समाज में दामाद से ज्यादा महत्त्वपूर्ण परिवार का कोई अन्य सदस्य नहीं होता. दामाद सिर्फ आदमी नहीं है. एक परंपरा है. एक उत्सव है. दामाद आता है तो पूरा घर मुसकराने लगता है. गरीब घर का बच्चा भी उछलनेकूदने लगता है. जिस घर में दालरोटी भी मुश्किल से जुटती है, और दालरोटी के साथ भाजी शायद ही कभी बनती है, उस घर में भी दामाद के आने पर पकवान बनते हैं. खीरपूरी बनती है. फलमिठाइयां आती हैं. इस सब के लिए साधन किधर से आता है, इस का खुलासा भी कभी दामाद के सामने नहीं होता. दामाद बेटे से भी बढ़ कर होता है. आप अपने बेटे के नाम के आगे कभी ‘जी’ लगा कर नहीं बुलाते, मगर झोंपड़ी में रहने वाला ससुर भी अपने दामाद को ‘कुंवरजी’ बोलता है. भीखू, ननकू, छोटेलाल का सीना गर्व से फूल कर56 इंची हो जाता है जब ससुरजी उन को ‘कुंवरजी’ के संबोधन से पुकारते हैं.

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