Cultural pressure in Indian marriages : एक कहावत है,'मियांबीवी राजी तो क्या करेगा काजी', लेकिन सच तो यह है कि शादी वाले दिन काजी या पंडित जो कहते हैं, मियांबीवी को वही करना पड़ता है. सिर्फ यही नहीं बल्कि शादी किस से करना सही रहेगा और किस से नहीं, यह सब भी पंडित ही बताते हैं. उन की पूरी कोशिश रहती है कि इस में आप की पसंद न चले.

दरअसल, जो शादी विधिवत होती है उस के लिए कम से कम 20 बार पंडित आते हैं. बहुत से घरों में आज भी रिश्ता भी वही बताते हैं.  इस के बाद जो रिश्ते आ रहे उन के लिए कुंडली मिलाने का काम भी पंडित ही करते हैं. कम से कम एक शादी के लिए 10 लड़के देखें जाएंगे तो उस के लिए 10 बार पंडित कुंडली मिलाने आएंगे और दक्षिणा लेंगे.

फिर सगाई पर आते हैं. हलदी, मेहंदी में भी आते हैं. शादी में भी मोटी रकम लेते हैं. और आप प्रेमविवाह कर के उन के सारे धंधे को चौपट करना चाहते हो? अगर आप ने प्रेमविवाह किया या फिर ऊंचीनीची जाति में कर लिया तो फिर बाद तक के लिए धर्म खत्म, उस परिवार में और पंडित का एक क्लाइंट कम हो जाएगा.

शादियां परिवारों और पुरोहितों के नियंत्रण में रही हैं

परिवार में शादी करवाने का काम शुरू से पंडितों के नियंत्रण में रहा है. वे ही घर में रिश्ता ले कर जाते थे और दोनों ही पार्टियों से रिश्ता बताने की ऐवज में मोटी फीस वसूलते थे. लेकिन अब धीरेधीरे उन के हाथों से यह नियंत्रण निकलता जा रहा है. शादियां अब धीरेधीरे परिवारों और पुरोहितों के पूर्ण नियंत्रण से निकल कर व्यक्तिगत पसंद, संवाद और सहमति की ओर बढ़ रही हैं. यह बदलाव सामाजिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों का संकेत है, भले ही इस की गति हर जगह समान न हो.

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