सानिया मिर्जा पर यह आरोप कि वह तो पाकिस्तानी बहू है, भारतीय दिमागी दिवालिएपन का एक नमूना मात्र है. हम भले ही अपने को बड़ा संस्कारी, जगत्गुरु, सभ्य, सुसंस्कृत, उदार कहते फिरें पर घरघर में संकीर्णता, संकुचता और असहनशीलता का प्रमाण देते फिरते हैं. घरों में सासबहू के विवादों का कारण यही है, जो के लक्ष्मण ने दर्शाया है. अपनी बात न बने तो लड़की के पुरखों या उस के रिश्तेदारों को कोसने लगो.

सानिया मिर्जा देशी है तो क्या, हमारी सोच में तो लड़की शादी कर के ससुराल में जा कर बसती, मरतीखपती है. उस ने पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक से शादी कर ली तो वह भारत की कहां रही? हिंदू घरों में तो पहले ही दिन कह दिया जाता है कि लड़की को अपने घर यानी ससुराल जाना है और वहां से केवल उस की लाश आएगी.

देश में विधवाओं के साथ अगर बुरा व्यवहार होता है तो इसीलिए कि शादी होने के बाद लड़की मां के घर की नहीं रहती और पति के मरने के बाद ससुराल की नहीं. तेलंगाना के भारतीय जनता पार्टी के नेता अपनी उसी सोच को दोहरा रहे थे, जो हर भारतीय में है, चाहे वह कम्युनिस्ट पार्टी का भी क्यों न हो.

सानिया मिर्जा के मामले में करेले की कड़वाहट पर भजभजी नीम भी चढ़ गई. सानिया मिर्जा को तेलंगाना का ब्रैंड ऐंबैसेडर बनाने का विरोध करते हुए भाजपाई नेता भूल गए कि वे अब सत्ता में हैं और अनर्गल बोलेंगे तो अनदेखा तो नहीं होगा. उन्हें ऐसा बोलने को कहा गया होगा, यह तो नहीं लगता क्योंकि इतना माइक्रो मैनेजमैंट बड़ी पार्टी के लिए संभव नहीं है पर भाजपा सत्ता में न होती तो यह कथन अन्यथा न लिया जाता.

सानिया मिर्जा अब चाहे जितनी सफाई दे, विवाह के बाद बेटी को पराया मानने वाला यह समाज कभी भी उसे भारतीय न मानेगा. वह है तो पाकिस्तान की बहू ही और यहां उन की कमी नहीं. जो उस जैसी को सदा के लिए विदा करना चाहेंगे चाहे वह कितनी प्रसिद्ध क्यों न हो. बेटियों को इस समाज में केवल राखी व भाईदूज पर घर में आने की इजाजत होती है और तब भी ननदों को भाभियां सहती हैं, उन का स्वागत नहीं करतीं.

इस समाज को जरूरत है मानसिक औपरेशन की. उस में सदियों का कूड़ा भरा है और शिक्षा, नैतिकता, सभ्यता, संवैधानिकता, लोकतंत्र, विचारों की स्वतंत्रता आदि की मशीनें इस कूड़े को उठा नहीं पाई हैं. उलटे उसी कूड़े पर फैशन, सैक्स, शराब वगैरह हावी है.

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