कहीं दिखावे का स्वांग, कहीं डर से श्रद्धा, तो कहीं लकीर की फकीरी. कुल मिला कर यही हैं हम. हमारा समाज, जहां धर्मांधता के कारण पंडेपुजारियों, पुरोहितों द्वारा पर्व, उत्सवों को भी नाना प्रकार के कर्मकांडों से जोड़ कर सत्य तथ्यों को नकारते हुए उन का मूलभूत आनंदमय स्वरूप नष्ट कर दिया गया. शुभ की लालसा और अनिष्ट की आशंका से उन के पालन को विवश साधारण जनमानस का भयभीत मन अंधविश्वासों में घिरता चला गया, क्योंकि हमारे धार्मिक ग्रंथ भी इसी बात की पुरजोर वकालत करते हैं कि ईश्वर के बारे में, धार्मिक कार्यों में कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाना. बातें नहीं मानी तो नष्ट हो जाओगे.

भा. गीता श्लोक 18/58.

अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनंक्ष्यारी. यानी अब यदि तू अहंकार के  कारण नहीं सुनेगा तो पूर्णतया नष्ट हो जाएगा.

न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति. भा. गीता 18/67. यानी उसे यह (ज्ञान) तुझे कभी नहीं कहना चाहिए और न उसे, जो मेरी निंदा करता है.

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज.

अहं त्वा सर्व पापेश्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: भा. गीता 18/66. यानी जब धर्मकर्म (लोकधर्म अथवा लोकव्यवहार जो नाना संबंधों के माध्यम से निर्मित है) को त्याग कर तू सिर्फ मेरी शरण में आ जा. मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूंगा. दुखी मत हो.

यह सब क्या है

अगर भगवान है तो भगवान सर्वशक्तिमान है और उन्हें सब से बताने की क्या आवश्यकता थी? फिर उन्होंने अपना वचन सारी भाषाओं में क्यों नहीं लिखवा दिया? कंप्यूटर सौफ्टवेयर की तरह उन के पास तो सारा ज्ञानविज्ञान हमेशा से है. फिर पत्रों, पत्थरों पर क्यों लिखवाया? जो उन्हें नहीं मानते उन के आगे ये गीताके भगवान के वचन कहनेपढ़ने को क्यों मना किया? जबकि उन के वचन तो कानों में पड़ते ही उन्हें पवित्र बन जाना था. सीधी सी बात है, वे तर्क मांगते और इन के पास कोई जवाब न होता और ढोल की पोल खुल जाती, सत्य सामने आ जाता. सत्य तथ्यों को नकारना, बिना तर्क बिना कारण जाने कुछ भी मान लेना, मनवाना यहीं से शुरू हो गया. धर्मभीरु बना मन यहीं से दुर्बल या यों कहें वहमी बनता गया. इस डर में नएनए अंधविश्वास जन्म लेते गए और अंधविश्वासी बढ़ते गए.

एक ही बात मन की गहराई में बैठ गई कि यदि अकारण, बिना तर्क ऐसा करने से अच्छा और न करने से बुरा हो सकता है, तो हमारे व दूसरों के और क्रियाकलापों से भी बिना तर्क ऐसा करने से अच्छा और न करने से बुरा हो सकता है, तो हमारे व दूसरों के और क्रियाकलापों से भी बिना अच्छाबुरा घट सकता है. बस शुरू हो गया अंधविश्वास का सिलसिला. कभी क्रिकेट की जीत के लिए, तो कभी ओलिंपिक मैडल के लिए, तो कभी नेताओं की चुनाव में जीत के लिए हवन कराए जाने लगते हैं. यदि इन सब से कुछ हो सकता तो बलात्कार, हत्या या दुर्घटना रोकने के लिए भारत महान में कोई हवन क्यों नहीं होता, यह सोचने की बात है.

दिखाने का स्वांग

बिल्ली ने एक बार रास्ता काटा, बुरा हुआ तो वहम हो गया, दोबारा हुआ तो वहम और गहरा हो गया. कहीं तीसरी बार हो गया तो अंधविश्वासी ही बन गया. डर इतना मन में बैठ गया कि रास्ता ही बदल लिया या किसी और के गुजरने का इंतजार कर लेने में ही भलाई समझी. आगे आजमाने की हिम्मत ही नहीं दिखाई गई. डर इतना घर कर गया कि कभी ध्यान भी न गया कि अच्छा भी हुआ था कभी. अपना डर दूसरों में भी डालते चले गए. एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे, माउथ टू माउथ सब जगह बात फैल गई. जितनी धर्मभीरुओं की संख्या बढ़ती गई उस से अधिक अंधविश्वास और अंधविश्वासियों की संख्या में वृद्धि होती गई. इसलिए सर्वप्रथम धर्म, दूसरा व्यक्ति का दुर्बल भीरु मन मुख्य कारण हैं, जिन के फलस्वरूप अंधविश्वासी सत्य तथ्यों को सरलता से नकारने लगे.

तीसरा कारण है दिखावे का स्वांग. जैसे कुछ जन धार्मिक कर्मकांडों में लिप्त रह कर जताते हैं कि वे बहुत ही धार्मिक हैं, इसलिए अधिक अच्छे, सच्चे और विश्वास के योग्य जन एक पवित्र आत्मा हैं. फिर भले ही वे दानपुण्य की आड़ में गोरखधंधा या कालाधंधा खूब चलाते हों. दुनिया व कानून की नजरों में धूल झोंकते हुए बेशुमार धनदौलत, नामसम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेते हों.

परंपराओं की दुहाई

जमीर को ताक पर रख दें तो जीवन में और क्या चाहिए? वे सब इसी मंतव्य को मानने वाले बन जाते हैं. भ्रष्ट बड़ेबड़े नेता, टैक्स की चोरी करने वाली बड़ीबड़ी फिल्मी हस्तियां बड़ी शान से अपने लावलश्कर और मीडिया की चकाचौंध के साथ मंदिरों में, ट्रीटमैंट के मध्य, देवीदेवताओं के दर्शन, भारी दान, चैरिटी कर अपनेआप को धार्मिक, पवित्र और नेक दिखाने का ढोंग करते हैं. क्या यह आंखें खोलने के लिए पर्याप्त नहीं? सच तो यह है कि हम सो नहीं रहे, सब जानतेबूझते आंखें बंद कर के पड़े हैं. सही तो है कि सोए हुए को जगाया जा सकता है पर जागे हुए को नहीं.

चौथा कारण है लकीर की फकीरी व परंपराओं की दुहाई. हमारे पूर्वज, बड़ेबूढ़े जो करते चले आ रहे हैं, आंखें मूंद कर लकीर के फकीर बने हम भी उन का अनुसरण करते जा रहे हैं. ऐसा करना हम अपना कर्त्तव्य मानते हैं. उन के प्रति प्यारआदर दिखाने का एक तरीका समझते हैं. उन से कोई तर्क नहीं करते. बस अनुसरण करते चले जाते हैं. कुछ संतुष्टि मिली, कुछ अच्छा लगने लगा, करतेकरते फिर विश्वास भी होने लगा, वैसे ही जैसे ताला बंद कर आराम से घूमने निकल जाते हैं कि अब घर सुरक्षित हैं. उन कर्मकांडों, अंधविश्वासों को मान कर, पालन कर हम अपनेआप को भविष्य के प्रति सुरक्षित सा अनुभव करने लगे. बस जैसा अपने बड़ों को करते देखा है वैसा बिना सोचेसमझे करते चले आ रहे हैं.

5वां कारण है अशिक्षा, अज्ञानता. यह भी एक बहुत बड़ा कारण है. आज शिक्षा का बहुत तेजी से प्रसार हो रहा है. कुछ मस्तिष्क में क्यों, कैसे प्रश्न भी अंकुरित होने लगे हैं. व्यक्ति हर बात का पहले कारण जानना, फिर मानना चाहता है. परंतु अभी भी हमारे देश की जनसंख्या सौ प्रतिशत शिक्षित नहीं हो पाई है. मोबाइल, गाड़ी का प्रयोग तो करते हैं पर बाबाओं से चमत्कार की आशा में उन के पास जाना नहीं छोड़ते. उन के चंगुल में फंसते जाते हैं. साईं बाबा, आसाराम बापू जैसे लोग कहां गए? उन की असलियत आज किसी से छिपी नहीं. दुर्गम पहाडि़यों के संकरे रास्तों से जान जोखिम में डालने हुए मंगल की अभिलाषा में देवीदेवताओं के दर्शन करने सुदूर मंदिरों में पहुंच जाते हैं. कभीकभी जान से भी हाथ धो बैठते हैं. फिर भी उन्हें विश्वास होता है कि अपने शरीर को कष्ट देने से, भूखे रहने से या चढ़ावा आदि देने से देवीदेवता प्रसन्न हो कर कल्याण करते हैं, मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं. परंतु कोई तर्क पूछे तो उत्तर नहीं रहता है उन के पास कि क्यों और कैसे संभव है?

बेसिरपैर की कहानी

किसी ने टोक दिया नजर लग गई और किसी काम के शुरू होते ही छींक दिया तो बुरा हो गया, कहीं काना व्यक्ति दिख जाए तो बहुत बुरा, आंख फड़कना, दीया बुझना, बिल्ली का रास्ता काटना, कुत्ते का रोना ऐसे न जाने अज्ञातवश कितने वहम पाल रखे हैं. शिक्षित हो कर अपना ज्ञान बढ़ा लें तो उन्हें कारणअकारण समझ आ जाए. दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं है, जिस का कारण न हो, तर्क न हो. नहीं जानते तो यह हमारी अज्ञानता ही कही जाएगी.

रातदिन कैसे होते हैं? नहीं मालूम तो कुछ भी मनगढंत अटकलें लगा लें. जैसे राक्षस रोज सूर्य को निगल जाता है या बेसिरपैर की कोई और कल्पना. आज भी जाने कितनी कला, कितना विज्ञान दुनियाजहान में छिपा पड़ा है. हमें उस ओर अपना मस्तिष्क दौड़ाना है. मनगढंत बातों से बचना है, जिस के लिए शिक्षा के साथसाथ ज्ञान का होना नितांत आवश्यक है.

हम समय का सदुपयोग न कर निरर्थक कार्यों, ढकोसलों में व्यस्त रह कर यह अनमोल जीवन व्यर्थ में गंवाते हैं. अंधविश्वासों से घिर कर पूर्णतया प्रसन्न भी नहीं रह पाते हैं. इसलिए शिक्षा के साथसाथ जनजन को अपनी बुद्धि के बंद दरवाजे खोल सब से पहले ज्ञान का प्रकाश अपने भीतर फैलाना चाहिए.

– डा. नीरजा श्रीवास्तव ‘नीरू’

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