शादी की धूमधाम में शहनाई के मधुर स्वर हवा में तैर रहे थे. रंग, फूल, सुगंध, कहकहे, रंगबिरंगी रोशनी सब मिला कर एक स्वप्निल वातावरण बना हुआ था. इतने में शोर उठा, ‘बरात आ गई, बरात आ गई.’

सब एकसाथ स्वागत द्वार की ओर दौड़ पड़े. सजीसंवरी दुलहन को उस की कुछ सहेलियां द्वार की ओर ला रही थीं. वरमाला की रस्म अदा हुई, पहली बार वर ने वधू की ओर देखा और जैसे कोई उस के कलेजे पर वार कर गया. सारे रंगीन ख्वाब टूट कर बिखर गए.

दूल्हा सोचने लगा, जिंदगी ने यह कैसा मजाक उस के साथ किया है. सांवला, दुबलापतला शरीर, गड्ढे में धंसी आंखें, रूखे मोटे होंठ, दुलहन का शृंगार भी क्या उस की कुरूपता को ढक पाया था लेकिन अब क्या हो सकता था. यह गले पड़ा ढोल तो उसे बजाना ही था. इस से अब वह बच नहीं सकता था.

पिता के कठोर अनुशासन ने गौरव को अत्यंत लजीला और भीरु बना दिया था. उन के सामने वह मुंह तक नहीं खोल सकता था. जो कुछ वे कहते, वह सिर झुका कर मान लेता.

यह रिश्ता गौरव के लालची पिता ने लड़की वालों की अमीरी देख कर तय किया था. लड़की के पिता की लाखों की संपत्ति, उस पर इकलौती संतान, वे फौरन ही इस रिश्ते के लिए मान गए थे. पैसे से उन का मोह जगत प्रसिद्ध था.

गौरव ने सुधा के स्वभाव के बारे में तो पहले ही धारणा बना ली थी, बड़े बाप की इकलौती, पढ़ीलिखी लड़की घमंडी और बदमिजाज तो होगी ही. उस के पिता को ऐसी बहू मिलेगी जो उस की तरह उन से नहीं दबेगी, उलटा वे ही कुछ न कह सकेंगे, यह सोच कर उस की पिता से बदला लेने की भावना को कहीं संतुष्टि मिली.

लेकिन आशा के विपरीत सुधा बहुत ही मधुरभाषिणी, कम बोलने वाली और संकोची प्रवृत्ति की निकली. बड़ों का आदरसम्मान, बच्चों में प्यार से घुलमिल जाना, हर समय हर किसी को खुश करने के लिए काम में जुटे रहना, अपने इन्हीं गुणों से उस ने धीरेधीरे घर भर का मन मोह लिया था.

गौरव की बहन अरुणा दीदी, जो उम्र में उस से काफी बड़ी थीं, सुधा की तारीफ करते न थकतीं. दीदी, जीजाजी और उन के बच्चे शादी के बाद कुछ दिन उन के पास रुक गए थे. इसी दौरान सुधा उन से यों घुलमिल गई थी मानो बरसों से उन्हें पहचानती हो.

आश्चर्य की बात यह थी कि सिवा गौरव के घर भर में कोई भी सुधा के रूपरंग का जिक्र न करता, सब उस के स्वभाव का ही बखान करते. गौरव पत्नी की तारीफ सुन कर खीज उठता. वह अपने दोस्तों में हमेशा सुधा की कुरूपता की चर्चा करता और अपने से उस की तुलना कर अपने खूबसूरत होने पर गर्व महसूस करता.

सुधा पति को प्रसन्न करने का हर तरह से प्रयत्न करती, उस की छोटीछोटी सुविधाओं का पूरा ध्यान रखती लेकिन गौरव उस से बात तक न करता. जो कहना होता, मां से या नौकरों से कहता. सुधा धैर्यपूर्वक पलपल उस की बर्फीली बेरुखी सहती. उसे उम्मीद थी कि शायद कभी उस की जिंदगी का सूरज उदय होगा, जिस की आंच में यह बर्फ पिघल जाएगी और उस की कंपकंपाती जिंदगी को प्यार की नरम धूप का सेंक मिलेगा.

इस बीच गौरव का अपने दफ्तर की स्टेनो नंदिनी से मेलजोल बढ़ने लगा. नंदिनी उस पर काफी पहले से ही डोरे डाल रही थी. वह गौरव को फांस कर उस से शादी के सपने देखा करती. सुंदरसजीले गौरव पर बहुत सी लड़कियां मरती थीं, उस से दोस्ती करना चाहती थीं मगर गौरव शरमीले स्वभाव का होने के कारण लड़कियों से बहुत झेंपता, उन से बात करने में भी झिझकता और नजरें बचा कर निकल जाता.

शादी के बाद वही गौरव नारी के मांसल आकर्षण में अजीब खिंचाव और आनंद लेने लगा था. अब वह पहले सा लजीला, रूखा और नीरस युवक नहीं रह गया था. औरत के दैहिक सम्मोहन में आकंठ डूब चला था. सुधा की सूखी देह जब उस की बांहों में होती तो गौरव की कल्पना उसे नंदिनी की मांसल, आकर्षक देह बना देती. मगर वह क्षणिक दैहिक सुख गौरव को तृप्ति न दे पाता और वह प्यासा रह जाता, उस मिलन में उसे एक अधूरापन लगता.

नंदिनी गौरव के दिल की हालत समझ रही थी. उस ने सुन रखा था कि गौरव की पत्नी एक कुरूप नारी है. नंदिनी को अपनी सुंदरता और सुडौल शरीर पर बड़ा अभिमान था. वह रोज तरहतरह से अपने को सजासंवार कर दफ्तर आती और गौरव को रिझाने का प्रयास करती. आखिर गौरव भी कब तक धैर्य रखता. वह दिनोदिन उस की सुंदरता में डूबता जा रहा था.

आर्थिक रूप से गौरव सक्षम हो चुका था. दहेज में मिली लाखों की संपत्ति उस की थी. पिता बूढ़े हो रहे थे. गठिया के रोग से पीडि़त थे, चलफिर नहीं सकते थे, स्वत: ही उन का रोबदाब कम हो चला था. गौरव धीरेधीरे मनमानी पर उतर आया था.

सुधा को गौरव ने पत्नी का दर्जा कभी नहीं दिया था. बस, उस की झोली में एक प्यारा सा बेटा डाल कर उस के प्रति अपने कर्तव्य की इति समझ बैठा था. वह सारा दिन घर के कामकाज एवं सासससुर और बच्चे की देखभाल में जुटी रहती, इधर गौरव रातरात भर गायब रहता. उस के और नंदिनी के संबंध किसी से छिपे न रहे, लेकिन किसी की हिम्मत न थी जो उसे कुछ कह सके, पूरा घर उस से भयभीत रहने लगा था.

भीतर ही भीतर सुधा घुटती रहती मगर ऊपर से खामोश रहती. वह घर में किसी प्रकार की कलह नहीं करना चाहती थी. हीनभावना की गहराई में उस की अपनी अस्मिता कहीं डूब गई थी.

गौरव की ऐयाशी के किस्से जब एक दिन सुधा के मातापिता तक पहुंचे तो वे चुप न रहे. एक दिन जब गौरव नंदिनी के साथ कोई फिल्म देख कर लौटा तो अचानक अपने ससुर को वहां देख चौंक पड़ा.

‘‘कहां से आ रहे हो, गौरव?’’ ससुर कृष्णलाल ने व्यंग्यात्मक स्वर में पूछा.

एकाएक गौरव से कोई उत्तर न बन पड़ा. धीरे से बोला, ‘‘दोस्तों के साथ फिल्म देखने गया था.’’

सुनते ही उस के ससुर कठोर स्वर में बोले, ‘‘यह मत समझो कि हमें तुम्हारी कारगुजारियों का पता नहीं. सोच रहे थे कि शायद तुम अपनेआप संभल जाओ. सुधा बेचारी ने तो आज तक तुम्हारे खिलाफ एक शब्द नहीं लिखा. हर पत्र में तुम्हारी तारीफ ही लिखती रहती थी. वह तो भला हो तुम्हारे पिताजी का जिन्होंने तार दे कर मुझे बुलवा लिया, अपने बेटे की चरित्रहीनता दिखलाने, उस की ‘कीर्ति’ सुनवाने.’’

फिर कुछ रुक कर वे बोले, ‘‘लेकिन सुधा को मैं अब और अपमानित होने के लिए यहां नहीं रहने दूंगा. मैं उसे ले जा रहा हूं. हम सुबह की गाड़ी से ही आगरा चले जाएंगे. तुम ने अगर अपने रंगढंग नहीं बदले तो मजबूरन हमें सुधा को तुम से तलाक दिलवाना पड़ेगा,’’ इतना कह कर बिना एक पल रुके कृष्णकांत उठ खड़े हुए.

सुधा की बातों और धमकी से गौरव काफी परेशान हो गया. मन ही मन सोचने लगा कि इस समस्या का हल कैसे निकाला जाए. सुधा के जाने से तो पूरा घर अस्तव्यस्त हो जाएगा. बेटे चंदन की देखभाल कौन करेगा? उस की पढ़ाई का क्या होगा?

नंदिनी गौरव के लिए सिर्फ दिल बहलाव का जरिया थी वरना उस के छिछले स्वभाव को गौरव समझता था. वह इतना नासमझ नहीं था जो जानता न हो कि इस तरह की लड़कियां दुख की साथी नहीं होतीं, उन्हें तो अपनी मौजमस्ती चाहिए.

दूसरे दिन लाख मिन्नतें करने के बावजूद गौरव के ससुर बेटी को अपने साथ ले गए. चंदन को उस के दादाजी के कहने पर मजबूरन उन्हें वहीं छोड़ना पड़ा वरना गौरव के कहने से तो वे कदाचित न मानते.

सुधा के जाते ही घर का पूरा नक्शा ही बिगड़ गया. गौरव को दफ्तर से छुट्टी लेनी पड़ी. उस ने नंदिनी से सहायता मांगी तो उस ने साफ शब्दों में कह दिया, ‘‘गौरव, और कुछ करने को कहो लेकिन घर की देखभाल, न बाबा न, वो मेरा विभाग नहीं.’’

2-3 दिन की लगातार भागदौड़ के बाद उसे अपने एक दोस्त के जरिए एक नौकरानी मिल गई. करीब एक हफ्ते तो उस ने ठीक तरह से काम किया. 8वें दिन पता चला कि सुधा की अलमारी से सब साडि़यां और कुछ गहने ले कर वह चंपत हो गई है. बहुत कोशिश की, लेकिन उस का कुछ पता न चल सका.

चंदन हर वक्त मां को याद करता रहता, ‘‘पिताजी, मां कब आएंगी…कहां गई हैं? मुझे साथ क्यों नहीं ले गईं,’’ वह बारबार पूछता. मां के बगैर उसे खानापीना भी अच्छा न लगता. वह बहुत उदास और गुमसुम रहने लगा था. गौरव से अपने बेटे की यह हालत देखी न जाती. गौरव चाहता था कि सुधा लौट आए. उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा था.

ऐसे में ही एक दिन गौरव को अरुणा दीदी की याद आई. ‘हां, दीदी ही सुधा को वापस ला सकती हैं.’ यह विचार मन में आते ही तुरंत ही वह बेटे चंदन को ले कर मेरठ चल दिया.

दीदी उसे अचानक आया देख हैरान रह गईं. आश्चर्यचकित हर्ष से पूछने लगीं, ‘‘अरे, गौरव, अचानक कैसे आना हुआ. सुधा कहां है?’’ भाई को देख कर उन का चेहरा स्नेह से भीग उठा था. अभी तक उन्हें गौरव की हरकतों का पता न लग पाया था.

गौरव फीकी हंसी से सुधा के न आने की बात टाल गया. दीदी समझ गई थीं कि जरूर कुछ गड़बड़ है वरना गौरव यों चंदन को ले कर अकेला क्यों आता. दीदी ने उस समय ज्यादा कुछ न पूछा.

रात को खाने पर जीजाजी के बारबार पूछने पर आखिर गौरव फूट पड़ा, ‘‘जीजाजी, सुधा अब कभी नहीं आएगी. अपनी ही गलती से मैं ने उसे खो दिया है. मैं ने उस की कद्र नहीं की…क्या मुंह ले कर अब मैं उस के पास जाऊं,’’ गौरव ने उन से कुछ न छिपाया, सारी बातें सचसच कह दीं.

गौरव पश्चात्ताप की आग में जल रहा है, यह देख कर दीदी ने उसे समझाया, ‘‘गौरव, यह तुम तीनों की जिंदगी का सवाल है. जाने को तो मैं जा कर सुधा को ला सकती हूं लेकिन इस तरह तुम्हारा प्रायश्चित्त अधूरा रह जाएगा. सोच लो, सुधा को जो खुशी तुम्हारे जाने से होगी वह मेरे जाने से नहीं, फिर इस बात का क्या भरोसा कि उस के मातापिता सुधा को मेरे साथ भेज ही देंगे.’’

गौरव के ससुराल आने पर सुधा के मातापिता को जरा भी हैरानी न हुई, उन्हें अपनी संकोची स्वभाव की गुणवान बेटी पर बहुत मान था. उन्हें पूरा यकीन था कि उस जैसी आदर्श पत्नी की कद्र गौरव एक दिन जरूर करेगा. इसी भरोसे पर तो वे अपनी बेटी को लिवा लाए थे कि दूर रह कर ही गौरव उस के गुणों को आंक पाएगा और हुआ भी वही.

अपने कमरे में सुधा उत्सुकता से गौरव के आने का इंतजार कर रही थी. गौरव एक क्षण दरवाजे पर ठिठका. फिर उस ने आगे बढ़ कर सुधा को बांहों में भर कर उदास स्वर में पूछा, ‘‘मुझे माफ करोगी, सुधा?’’

सुधा खामोश थी लेकिन उस की आंखों से बहते आंसुओं ने गौरव के सारे अपराध क्षमा कर दिए थे.

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