सुबह हम औफिस जाने की तैयारी कर रहे थे कि अचानक ऐसा लगा मानो तबीयत खराब हो रही है. घबराहट होने लगी, सीने में दर्द भी होने लगा और लगा कि हम चक्कर खा कर गिर पड़ेंगे.
हम ने अपनी श्रीमतीजी को आवाज देनी चाही तो आवाज गले में दब कर रह गई. पसीना आने लगा. हम सोचने लगे कि क्या करें? वहीं धम्म से बैठ गए. श्रीमतीजी किचन में हमारे लिए लंच बना रही थीं. हमें उन के गाने की आवाज सुनाई दे रही थी. अंतिम आवाज श्रीमतीजी की हमारे कानों में यह आई थी, ‘‘औफिस जाओ, लेट हो रहे हो, मैं ने लंच बना दिया है. कब तक इस तरह फर्श पर लेटे रहोगे?’’
उस के बाद क्या हुआ, हमें नहीं मालूम. हमारी श्रीमतीजी ने जो कुछ बखान किया वह कुछ इस तरह है, ‘‘तुम्हें फर्श पर पड़ा देख कर मैं समझी तुम मुझे परेशान करने के लिए लोट रहे हो. मैं ने तुम्हें खूब खरीखरी सुनाई. लेकिन तुम्हारी कोई भी प्रतिक्रिया नहीं हुई तो मुझे हैरानी हुई. मैं ने जब तुम्हारे शरीर को देखा तो बर्फ की तरह ठंडा था. तुम पसीने से नहा चुके थे. मैं ने तुरंत पड़ोस के खड़से भैया और उन की बीवी खड़सी को बुलाया. वे तुरंत आ गए. उन्होंने बताया कि तुम्हें हार्ट अटैक आया है.
‘‘सुन कर मेरे हाथपांव फूल गए. फिर पूरे तीन दिनों तक आप को न जाने कितने इंजैक्शन, न जाने कितनी खून की बोतलें चढ़ाईं तब मेरा सुहाग बच पाया है,’’ कहतेकहते हमारी श्रीमतीजी की आंखों से गंगाजमना बहने लगी.
हम ने बिस्तर पर पड़ेपड़े ही कहा, ‘‘क्यों रोती हो? हमारे नहीं रहने पर तुम्हें अनुकंपा नौकरी मिल जाती, फंड का रुपया रिफंड हो जाता, बीमे के रुपए मिल जाते… अच्छा था तुम्हें चैन मिल जाता…’’
श्रीमतीजी ने साड़ी के पल्लू से अपनी तोते जैसी नाक को पोंछा और फिर कहने लगीं, ‘‘क्यों फालतू की बातें करते हो… अगर तुम ने ऐसी बातें की तो सच कहती हूं खटमल मार दवा पी कर मर जाऊंगी.’’
‘‘यानी मरतेमरते भी खर्च में डाल कर जाओगी,’’ हम ने नाराजगी भरे स्वर में कहा. फिर पूछा, ‘‘यह तो बताओ डाक्टर ने हमें बीमारी क्या बताई?’’
‘‘3 ट्यूब ब्लाकेज हैं, कोलैस्ट्रौल बढ़ गया है. हमेशा कहती थी कि घी, तेल वाली व चटपटी चीजें न खाया करो. लेकिन तुम सुनते कहां थे. हमेशा कहते थे कि उबली सब्जियां बनाती हो… कहो, मैं तुम्हारे अच्छे के लिए बनाती थी न? अब जो कुछ भी बनाऊंगी चुपचाप खा लेना.’’
‘‘ऐसे उबले खाने से तो मरना अच्छा है, हम नहीं खाएंगे,’’ हम ने गुस्से से कहा.
‘‘तुम्हें मैं क्या ठीक करूंगी… तुम्हें तो संसार में एक ही… ठीक कर सकती है…’’ न जाने किस का नाम लिया, हम सुन नहीं पाए और वे चली गईं.
एक शाम श्रीमतीजी ने हंसते हुए हमारे कमरे में प्रवेश किया और बताया, ‘‘शाम को मेरी मम्मी आ रही हैं.’’
‘‘आप की मम्मी आ रही हैं? मगर क्यों?’’
‘‘तुम्हें देखने.’’
‘‘हम ठीक तो हैं.’’
‘‘तो क्या मैं उन्हें आने से मना कर देती?’’
शाम को हमारी सासूमां आ धमकीं. आते ही हमारे पास आईं और फटाफट 1 दर्जन हिदायतें दीं.
अगले दिन सुबह से दूध के गिलास में मलाई बिलकुल नहीं थी. परांठे खाने को बैठे तो 2 फुलके बिना घी के आ गए. हम ने यह देखा तो माथा पीट लिया. यह सब परोसने के लिए हमारी सासूमां मौजूद थीं. खाने से घी गायब था, अंडे नहीं थे और जो फल यानी पपीते, सेब, अनार, आम आदि थे उन में से मात्र 25% हम तक आ रहे थे शेष 75% के छिलके हम ने अपनी सासूमां के बैडरूम में रखी डस्टबिन में देखे.
एक दिन पड़ोसी मिस्टर कैथवास और मिसेज कैथवासनी ने चिकन तंदूर चुपके से भेजने का वचन दिया. हम भी प्रतीक्षा कर रहे थे. श्रीमतीजी को हम ने कसम दे कर अपनी ओर मिला लिया था. रात को हम मुंह में पानी लिए खाने की प्रतीक्षा कर रहे थे कि तभी हमारी थाली में मुरगा नहीं, बल्कि दलिया लिए हमारी सासूमां प्रकट हुईं और आंखें तरेर कर कहने लगीं, ‘‘मैं ने आज आप के दोस्त कैथवास की खूब आरती उतारी है, मुरगा लाया था नालायक आप के लिए…’’
‘‘अरे,’’ हम ने आश्चर्य प्रकट किया, ‘‘मुरगा है कहां?’’ हम ने पूछा.
‘‘हमें आप के मित्र की इज्जत का ध्यान था इसलिए मुरगा रख लिया, आप दलिया जल्दी से खा लो ताकि मैं जा कर मुरगे को निबटाऊं.’’
हम ने आंखें बंद कर के दलिया खाया, पानी पीया और अपनी किस्मत पर बिसूरते हुए सो गए. हमारी सासूमां ने पूरा मुरगा और बटर को निबटाया. यह सिलसिला महीने भर तक चलता रहा.
डाक्टर ने चैकअप किया, रक्त परीक्षण किया और श्रीमतीजी को बधाई दी, ‘‘कोलैस्ट्रौल एकदम 1 महीने में सामान्य हो गया… ऐसा परहेज 3-4 माह और चलने दें, ब्लाकेज भी अपनेआप ठीक हो जाएंगे.’’
श्रीमतीजी प्रसन्न हो गईं, मगर इतना लंबा परहेज सुन कर हम परेशान हो गए. वजन की मशीन पर हमारी सासूमां ने वजन लिया जो पूरा 60 किलोग्राम था.
1 माह में 30 किलोग्राम की बढ़ोतरी हो चुकी थी. सच में हमारी सासूमां के गालों पर लाली आ गई थी, माशा अल्लाह हैल्थ भी अच्छी हो गई थी.
श्रीमतीजी ने कहा, ‘‘जब तक आप पूरी तरह ठीक नहीं हो जाएंगे मम्मी यहीं रहेंगी.’’
हम ने कभी विरोध नहीं किया था इसलिए चुप हो गए. पूरे 3 महीने तक हमें 25% भोजन दिया गया.
एक रोज सुबह श्रीमतीजी रोते हुए बोलीं, ‘‘मम्मीजी के सीने में दर्द है, पसीना आ रहा है, जी घबरा रहा है, बेहोशी आ रही है…’’
हम तेजी से उठे और उन्हें देखा. सच में वे ठीक हमारी तरह ही हो रही थीं. हम उन्हें तुरंत अस्पताल ले गए. डाक्टर ने उन्हें हार्ट अटैक बताया. खानेपीने के परहेज में घी, मक्खन, पनीर, मुरगा, अंडे सब खाने के लिए मना कर दिया. हम इलाज करा कर उन्हें घर ले आए. घर में उन के लिए बिस्तर लगा दिया.
हम उन्हें देखने जब उन के कमरे में गए तो उन्होंने हंसतेमुसकराते हुए हमें देखा और कहा, ‘‘दामादजी, आप की तबीयत ठीक रहे इसलिए नहीं चाहते हुए भी हम ने वह सब खाया, क्योंकि हमें आप की चिंता थी. यदि सामान घर में रहता तो आप भला किसी की सुनते?’’
‘‘हमारे स्वास्थ्य की आप को कितनी चिंता है सासूमां,’’ हम ने बड़े प्यार से कहा.
‘‘क्यों न हो? दामाद बेटे समान होता है.’’
हम प्रेमश्रद्धा से भर उठे और उन के चरण स्पर्श कर लिए. श्रीमतीजी परदे की ओट से सास और दामाद का स्नेह, श्रद्धा से भरा मिलन देख रही थीं. सच में, हमें पहली बार अपनी सास पर गर्व हुआ कि ऐसी महान सास सब को मिले.
