चाची बरामदा पार करने लगीं तो आंगन में गेहूं साफ करती अवनी पर दृष्टि ठहर गई. कमाल है यह लड़की भी. धूप में, पानी में कहीं भी बैठा दो, चुपचाप बैठी काम पूरा करती रहेगी.

सुबह उस के हाथों से गिर कर चायदानी टूट गई थी. उसी के दंडस्वरूप चाची ने अवनी को धूप में गेहूं बीनने का आदेश दिया था.

सुबह की धूप अब धीरेधीरे पूरे आंगन को अपनी बांहों में घेरती जा रही थी. चाची ने देखा, अवनी का गोरा रंग धूप की हलकी तपिश में और भी चमक रहा था. मन ने कहा, ‘श्रावणी, तू इतनी निर्दयी क्यों बन गई?’ पर उत्तर उस के पास नहीं था.

जब वह ब्याह कर इस घर में आई थी, तब जेठानी मानसी के रूपरंग को देख धक रह गई थी. वह उन के आसपास भी कहीं नहीं ठहरती थी. मानसी जीजी ने प्यार से उसे बांहों में भर लिया था और एकांत होते ही बोली थीं, ‘‘हमारी कोई छोटी बहन नहीं है, बस 2 भाई हैं, तुम हमारी बहन बनोगी न?’’

वह मुसकरा कर आश्वस्त हो गई थी. जिसे अपने रूप का तनिक भी गर्व नहीं उस से भला कैसा डरना? पर सब कुछ वैसा ही नहीं होता है, जैसा व्यक्ति सोचता है. प्राय: किसी भी काम से पहले सास का स्वर उसे आहत कर देता, ‘‘श्रावणी बेटा, जरा मानसी से भी पूछ लेना कि भरवां टिंडे कैसे बनेंगे. पूरब को अभी तक अपनी भाभी के हाथों के स्वाद की आदत पड़ी है.’’

उस का तनमन सुलग उठता. कैसे प्यार भरी चाशनी में लपेट कर सास ने उसे जता दिया था कि अभी तुम रसोई में कच्ची हो.

श्रावणी धीमे कदमों से आंगन में पहुंची और उसे झंझोड़ कर बोली, ‘‘इतनी देर में बस आधा कनस्तर गेहूं बीना है, चल उठ, रसोई में जा कर नाश्ता कर ले.’’

अवनी चुपचाप उठ गई. श्रावणी जब मन ही मन दयावान होती, तब भी क्रोध से ही उसे परेशानी से नजात दिलाती. धूप की ताप से परेशान अवनी को देख कर मन में तो दया उपज रही थी, पर दिखाने से तो मन के तहखाने का सच सामने आ जाता, अत: नाश्ते के बहाने उसे वहां से उठा दिया था.

अवनी ने स्टील की छोटी प्लेट हटा कर देखा, 2 रोटियों पर आलू को कुछ टुकड़े रखे थे. वह चुपचाप खाने लगी. छुट्टी का दिन था, वह परीक्षा की तैयारी के लिए पढ़ना चाहती थी, पर अब रसोई के काम का समय हो गया था. उस की आंखें नम होने लगीं.

उसी समय पानी लेने विविधा वहां आ गई. उसे खाते देख कर बोली, ‘‘यह क्या अवनी दीदी, आप रोटी क्यों खा रही हैं? हम ने तो ब्रैडपैटीज खाई हैं.’’

अवनी के मन में हलचल मची पर संभालने की आदत पड़ चुकी थी उसे. बोली, ‘‘आज हीरा काम पर नहीं आया है तो बासी रोटी कौन खाता. इस महंगाई में अनाज फेंकना नहीं चाहिए.’’

विविधा ने 2-3 डोंगे खोल डाले और ब्रैडपैटीज उस की प्लेट में रखते हुए बोली, ‘‘पता है, आप बहुत अच्छी गृहस्थन हैं पर चख कर तो देखिए.’’

वह पानी ले कर मटकती हुई बाहर चली गई. अवनी की आंखें सदा ऐसे प्रसंगों पर नम हो जाती हैं. विविधा उस से 7 वर्ष छोटी है. जब पूरब चाचा का विवाह हुआ तब अवनी 5 वर्ष की थी. नई चाची को हुलस हुलस कर देखती. वे टौफी देतीं तो झट उन की गोद में बैठ जाती. ‘‘चाची आप बहुत अच्छी हैं,’’ वह कहती.

श्रावणी तब उसे बहुत प्यार करती थी. 2 वर्ष पूरे होतेहोते ही विविधा आ गई तो अवनी फूली नहीं समाई. स्कूल से आते ही उस के साथ खेलने लगती. कभीकभी चाची उसे टोकतीं, ‘‘देख संभल कर, गिरा मत देना,’’ मां सामने होतीं तो आगे बढ़ कर उस का हाथ विविधा की गरदन के नीचे लगा कर कहतीं, ‘‘देख बेटा, छोटे बच्चों को ऐसे संभाल कर गोद में उठाते हैं.’’

अवनी को जब भी अतीत याद आता वह उदास हो जाती. दादी जब बहुत बीमार थीं,

तब वह उन से कहती, ‘‘दादी, आप कब ठीक हो जाएंगी?’’

‘‘पता नहीं रानी, ठीक हो जाऊंगी या जाने का समय आ गया है,’’ दादी खांसते हुए कहतीं.

‘‘कहां जाना है दादी?’’ वह भोलेपन से पूछती तो दादी की आंखों के कोर भीग जाते.

‘‘तुम्हारे दादाजी के पास,’’ दादी दुख से शून्य में देखते हुए बोलतीं. तब तक वह इतनी बड़ी हो चुकी थी कि जन्म और मृत्यु का अर्थ समझ सकती थी. उसे पता था कि दादाजी अब इस संसार में नहीं हैं.

 

नाश्ता कर के उस ने प्लेट धो कर रख दी. तभी चाची आ गईं. बोलीं, ‘‘अवनी, जितना आटा है, गूंध कर रोटी बना लेना. दाल हम ने बना दी है. गोभीआलू भी बना लेना.’’

‘‘जी चाची, सब हो जाएगा,’’ उस ने सादगी से कहा.

चाची कमरे में पहुंचीं तो विविधा ने घेर लिया, ‘‘मम्मी, आप ऐसा क्यों करती हैं?’’ उस ने कहा.

‘‘क्या कैसा करती हूं?’’ श्रावणी ने पसीना पोंछते हुए पूछा.

‘‘दीदी को बासी रोटी क्यों दी?’’

श्रावणी के चेहरे पर हलकी सी घबराहट उभर आई. वह विविधा के समक्ष लज्जित होना नहीं चाहती थी. अपने आप को संभालती हुई बोली, ‘‘कल को उस का विवाह होगा और वहां बासी भी खाना पड़ा तो उसे दुख तो नहीं होगा.’’

‘‘यह तो कोई बात नहीं हुई. ऐसे घर में क्यों करोगी उन की शादी. उन के लिए खूब अच्छा घर खोजना,’’ विविधा ने कहा तो वह खीजते हुए बोली, ‘‘इतना दहेज कहां से लाएंगे.’’

विविधा जातेजाते ठिठक कर बोली, ‘‘इतनी सुंदर हैं दीदी, उन्हें तो कोई बिना दहेज के भी ब्याह लेगा.’’

श्रावणी के मन पर किसी ने जैसे पत्थर मार दिया. वह जब से ब्याह कर आई, यही तो सुनती रही, ‘बड़ी बहू बहुत सुंदर है. उस की बेटी भी मां पर ही गई है.’ कभी पड़ोसिनें कहतीं, कभी रिश्तेदार. वह डूबते मन से सुनती रहतीं.

पूरब अकसर कहता रहता, ‘‘भाभी बहुत स्वादिष्ठ खाना बनाती हैं. उन के हाथों में तो जादू है जैसे.’’

मांजी तो खाने की मेज पर बैठते ही पूछतीं, ‘‘मानसी बेटा, आज क्या बनाया?’’

हालांकि यह सब जान कर नहीं होता था पर ये अप्रत्यक्ष सी टिप्पणियां उस का सर्वांग आहत कर जातीं. वह अपमानित सा महसूस करती स्वयं को. साड़ी वाला साडि़यां ले कर प्राय: घर पर ही आया करता था. मांजी स्वयं ही साडि़यां चुनतीं और कहतीं, ‘‘ये कत्थई रंग तो अपनी मानसी पर खूब खिलेगा. श्रावणी बेटा, तुम पर यह हलका नीला रंग फबेगा.’’

वह उदास हो जाती. लगता यह सीधा प्रहार है उस के साधारण रूपरंग पर. मन के अंदर ईर्ष्या की ज्वाला सी धधकने लगती.

जब एक दिन कार दुर्घटना में जेठ जेठानी की अचानक मृत्यु हो गई तो पूरे घर पर जैसे बिजली सी गिर पड़ी. कुछ वर्ष पहले ही मांजी की मृत्यु भी हो चुकी थी. लाख ईर्ष्या थी पर उस हादसे ने उसे किंकर्तव्यविमूढ़ कर दिया था. वह बिलखबिलख कर रो पड़ी थी.

उसे जेठानी का चेहरा अकसर याद आता रहता. सोचती, इतने थोड़े समय का साथ था पर मैं नासमझ उन से चिढ़ने में ही लगी रही. धीरेधीरे मन को शांत कर सकी थी. जब सुध आई तो सामने पहाड़ की तरह एक उत्तरदायित्व उसे परेशान करने लगा. क्या होगा अवनी का? जैसे ही उसे सीने से लगाती तो अतीत के कई स्वर उसे आंदोलित करते और वह पुन: विक्षिप्त सी हो उठती. विवाह की पहली रात ही पूरब ने कहा था, ‘‘श्रावणी, हम चाहते हैं कि तुम्हारा मीठा स्वभाव उसी तरह मां के मन पर राज करे, जैसे भाभी का करता है.’’

प्रथम मिलन के समय अपने पति से मीठी प्यारी बातों के स्थान पर ऐसी बात उसे आश्चर्यचकित कर गई. वह कह रहा था, ‘‘भैया भाभी ने इस घर के लिए बहुत से त्याग किए हैं पर कभी भी उलाहना नहीं दिया.’’

पूरब ने उसे बताया कि कैसे बाबूजी के कम वेतन में इस घर में दरिद्रता का राज था. भैया ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के साथ कुछ ट्यूशन ले रखी थीं ताकि घर की स्थिति में भी सुधार आए और वह पढ़ाई भी पूरी कर लें. भैया की लगन और परिश्रम से उन्हें एक अच्छी नौकरी भी मिल गई. घर में सुख के छोटे छोटे पौधे लहराने लगे. जब भाभी ब्याह कर आईं तो उन्होंने भी हर प्रकार से घर के हितों का ही ध्यान रखा. उन्हीं की जिद से मैं एम.बी.ए. कर सका और आज एक बड़ी कंपनी में नौकरी कर रहा हूं.

श्रावणी को याद है कि कैसे अपनी उबासियों को रोक कर उस ने सारी बातें सुनी थीं. उस रात की मर्यादा बनाए रखने के लिए उस ने मन का उफनता हुआ लावा सदा मन में दबाए रखा. जब जेठ जेठानी चले गए तो वह लावा समय असमय अवनी पर फूटने लगा.

 

अवनी के विवाह के नाम पर जेठ जेठानी ने बहुत पहले ही एक पौलिसी ली थी जिसे अब निश्चित समय पर आगे बढ़ाना पूरब के जिम्मे था. जब तक अवनी 20 वर्ष की होगी, उस के विवाह के लिए अच्छी रकम जमा हो चुकी होगी. फिर भी वह समयसमय पर अवनी के विवाह की चिंता दिखाने बैठ जाती. ‘इस महंगाई में अपनी बेटी का विवाह करना ही कठिन है, ऊपर से जेठजी की बेटी का भी सब कुछ हमें ही संभालना है.’

उस की बातों से आसपड़ोस की महिलाएं बहुत प्रभावित हो जातीं लेकिन पूरब खीज उठता, जो श्रावणी को सहन नहीं होता था.

पूरब कहता, ‘‘भैया सिर्फ अवनी के लिए ही नहीं अपनी विधू के लिए भी छोड़ गए हैं. दोनों उस में ब्याह जाएंगी.’’

श्रावणी खीज कर कहती, ‘‘मेरे पास बहुत काम है, तुम्हारी भैयाभाभी स्तुति सुनने का समय नहीं है.’’

अवनी पढ़ाई में बहुत तेज थी. घर के सारे काम निबटा कर अपनी पढ़ाई पूरी करती. कभी विविधा कुछ पूछती तो उसे भी पढ़ाने में समय देती.

एक दिन श्रावणी की दूर की मौसी का फोन आया कि वे अपने पुत्र के लिए लड़की देखने आ रही हैं. उन का एक ही पुत्र था.

2 बेटियों का विवाह कर चुकी थीं, अब पुत्र का शीघ्र विवाह करना चाहती थीं ताकि कनाडा जाने से पूर्व उस के पैरों में बेडि़यां डाल दें. श्रावणी ने अवनी से कहा, ‘‘मेरी दूर की मौसी आ रही हैं, पहली बार आएंगी, खूब खातिर करना.’’

विविधा ने तुरंत टोका, ‘‘फिर दीदी कालेज कब जाएंगी?’’

‘‘हम सब कर लेंगे चाची, आप चिंता न करिए…’’

श्रावणी ने विविधा को क्रोध से देख कर कहा, ‘‘तुम्हारी तरह आलसी नहीं है अवनी. सब कुछ मैनेज करना जानती है.’’

कहने को तो वह कह गई पर तुरंत उसे अपनी गलती का एहसास हो गया. अवनी से काम करवाने के चक्कर में अपनी बेटी पर कटाक्ष कर बैठी. वह मन ही मन में अपनी नासमझी पर विकल हो उठी.

न चाहते हुए भी बहुत कुछ हो जाता है और उस सब की जिम्मेदारी उसी पर है. अपना हाथ एकसाथ दोनों पर रख कर बोली, ‘‘हमारा मतलब है कि आज तुम भी अपनी दीदी का हाथ बटाओ और सीख लो कि कैसे वह सब बनाती है,’’ अपनी गलती सुधारती श्रावणी तीव्रता से बाहर चली गई.

 

मौसी आईं तो उन का पुत्र अनिकेत भी साथ आया. उस ने बहुत जल्दी हर एक का मन जीत लिया. भोजन करने बैठे सब तो मौसी ने खूब प्रशंसा आरंभ कर दी.

श्रावणी बोली, ‘‘दोनों बहनों ने मिल कर बनाया है.’’

‘‘नहीं आंटी,’’ विविधा तुरंत बोली, ‘‘यह सारा खाना दीदी ने बनाया है.’’

‘‘अरे वाह, तुम तो बहुत अच्छी गृहस्थन हो बेटा,’’ मौसी ने प्यार से अवनी को देखा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘जी, अवनी.’’

‘‘पढ़ती हो?’’ मौसी ने अगला प्रश्न उछाल दिया.

‘‘बी.ए. फाइनल में,’’ अवनी ने धीरे से कहा.

‘‘काश! वह लड़की भी तुम्हारी ही तरह गुणी हो, जिसे हम लोग अनिकेत के लिए देखने जा रहे हैं.’’

मौसी और अनिकेत के जाने के बाद अवनी कालेज चली गई. उस के 2 पीरियड छूट चुके थे.

शाम को जब घर पहुंची तो घर में बहुत सन्नाटा था. मौसी और चाची धीरेधीरे कुछ बोल कर चुप्पी साध लेती थीं. अनिकेत समाचारपत्र पकड़ कर लगातार कुछ सोच रहा था.

अवनी ने पुस्तकें रखीं और चाची के पास जा कर बोली, ‘‘चाय बनाऊं?’’

मौसी ने चौंक कर उसे देखा. उन की आंखों में जाने क्या था. श्रावणी ने कहा, ‘‘हां, साथ में कुछ गरमगरम पकौड़े भी बना लो.’’

अवनी लौटी तो उस ने सुना मौसी कह रही थीं, ‘‘कितनी प्यारी और शांत स्वभाव की है तुम्हारी अवनी.’’

रात तक अवनी को उन लोगों की चुप्पी का कारण पता चल गया था. इन लोगों को तो लड़की पसंद थी पर उस लड़की ने एकांत में अनिकेत से कहा कि वह किसी से प्यार करती है, मांबाप जबरन उस की शादी करवा रहे हैं. विविधा ने ये सारी बातें करते मौसी और मां को सुना था और अवनी को बताने चली आई थी.

अवनी के काम में हाथ बटाते हुए वह निरंतर कुछ न कुछ बोलती जा रही थी. अवनी मन ही मन में सोच रही थी कि वह लड़की कितनी बहादुर है, जिस ने सच को इस तरह सामने रख दिया.

खाने की मेज पर सब बैठे तो मौसी ने कहा, ‘‘अवनी बेटा, तुम भी हमारे साथ बैठो.’’

‘‘आप खाइए, हम गरम गरम फुलके सेंक रहे हैं.’’

मौसी ने उसे बहुत हसरत से देखा और अचानक बोलीं, ‘‘श्रावी, अपनी अवनी हमें दे दो,’’ फिर उन्होंने अनिकेत से कहा, ‘‘क्यों अनि, अवनी हमें बहुत पसंद है, तुम्हारे लिए मांग लें.’’

रसोई में कदम रखतेरखते अवनी ने सुना तो हठात ठहर गई. पूरा शरीर सिहर उठा. चाची से पहले चाचा ने कहा, ‘‘आप की ही बेटी है मौसी, जब चाहें अपना बना लें.’’

‘‘लेकिन अवनी से भी तो पूछिए,’’ अचानक उसे अनिकेत का यह स्वर सुनाई दिया.

इस असंभव सी बात पर वह आश्चर्यचकित भी थी और प्रसन्न भी. मन उत्तेजना से धड़क रहा था. क्या यह कोई सपना है? मौसी ने अगली बार उस के आते ही अपनी बगल में बैठा लिया.

‘‘बैठो बेटा, रोटी श्रावी बना लेगी,’’ उन की बात पर श्रावणी घबरा कर उठ गई और अवनी को बैठना पड़ा. मौसी ने प्यार से उस की पीठ पर हाथ फेरा और कहा, ‘‘बेटा,एक बात सचसच बताना, हमारा अनिकेत कैसा है?’’

अवनी ने धीरे से पलकें उठाईं. अनिकेत मुसकरा रहा था. उसे घबराहट सी होने लगी. अचानक आए ये अनोखे पल उसे अवाक कर रहे थे, पर स्थिति का सामना तो करना था. उस ने अपने चाचा की ओर देखा, फिर धीरे से बोली, ‘‘अच्छे हैं.’’

‘‘इस से शादी करोगी?’’ मौसी ने फिर पूछा. घबरा कर उस ने फिर चाचा की ओर देखा. उन्होंने ‘हां’ का संकेत दिया तो गरदन झुकाते हुए लजा कर उस ने ‘हां’ में हिला दी.

‘‘थैंक्यू अवनी,’’ अचानक अनिकेत का स्वर उस के कानों में गूंजा, ‘‘मुझे तो पहली ही नजर में आप पसंद आ गई थीं.’’

मौसी ने आश्चर्य से उसे देखा फिर बोलीं, ‘‘अरे, तो पहले ही क्यों नहीं कहा. हम वहां जाते ही नहीं.’’

अनिकेत ने संकोच से उधर देखा, ‘‘मां, मैं आप का वचन तोड़ कर कभी कुछ नहीं करना चाहता हूं. आप ने अपने वहां जाने की सूचना उन्हें दे रखी थी.’’

‘‘वाह बेटा वाह,’’ पूरब ने झट से कहा, ‘‘आजकल ऐसी अच्छी सोच कहां देखने को मिलती है.’’

श्रावणी मन ही मन में सोच रही थी कि जेठ जेठानी अकेली छोड़ गए बेटी को पर देखो तो, घर बैठे विदेश में बसा लड़का मिल गया. पता नहीं हमारी बेटी का क्या होगा.

पूरब को उस की खामोशी अच्छी नहीं लग रही थी पर वह कुछ कह कर उस के मन को दुखी नहीं करना चाहता था. सारी स्थिति को स्वयं ही संभालते हुए उस ने कहा, ‘‘मौसी, आप का बेटा हमें भी बहुत पसंद है. अब आप आज्ञा दें तो शगुन दे कर इसे अपना बना लें.’’

मौसी ने तुरंत कहा, ‘‘यह तुम्हारा ही है पूरब.’’

प्रसन्नचित्त पूरब रसोई में जा कर श्रावणी से बोली, ‘‘श्रावी, चलो अपनी बेटी के शगुन की रस्म पूरी करो. तुम्हें ही मां और चाची का फर्ज निभाना है.’’

 

श्रावणी कुछ कहने जा रही थी पर उसी समय विविधा आ गई तो उस ने मन की बात बाहर नहीं निकाली. विविधा आते ही श्रावणी से लिपट गई. बोली, ‘‘हाय मम्मी, अवनी दी अब हमें छोड़ कर चली जाएंगी…’’

श्रावणी के मन में अचानक कुछ घनघना उठा. इतने वर्षों से इस घर का हर काम अवनी ने ही संभाला हुआ था. अब क्या होगा, कैसे होगा? श्रावणी ने विविधा और पूरब को देखा. वह बोला, ‘‘विवू ठीक कह रही है. बहुत थोड़ा समय है जिस में हमें अवि को जी भर कर लाड़ देना है.’’

पूरब जैसे ही घूमा देखा द्वार पर अवनी खड़ी थी और उस के आंसू झरने लगे थे.

‘‘बाहर क्यों खड़ी है, चल अंदर आ जा,’’ अचानक श्रावणी ने कहा. वह सुबकती हुई आई तो श्रावणी ने आंचल से उस के आंसू पोंछ डाले.

‘‘आज तो खुशी का दिन है, फिर रो क्यों रही है?’’

अवनी उन के गले से लग गई तो धीरेधीरे श्रावणी ने भी उसे बांहों में भर लिया.

‘‘चुप हो जा और विवू इसे अच्छी सी साड़ी पहना कर तैयार कर. हम अनिकेत के टीके की थाली बना रहे हैं.’’

पूरब जा चुका था. विविधा अवि को ले कर चली तो अचानक श्रावणी ने कहा, ‘‘बेटा अवि, मेरी किसी बात का दुख न मनाना. मैं तो हूं ही पगली. कभी यह भी नहीं सोचा, यह तो पराया धन है, इसे जी भर कर प्यार कर लूं.’’

‘‘नहीं चाची, आप तो हमें घरगृहस्थी के योग्य बनाना चाहती थीं. यह तो मातापिता ही सिखाते हैं.’’

श्रावणी ने भरी आंखों से उसे देखा. एकदम अपनी मां जैसी सादगी से भरी हुई. अवनी चली गई तो श्रावणी जल्दीजल्दी थाली सजाने लगी. उस के हाथ तीव्रता से चल रहे थे और उसी रफ्तार से वह सोच में डूब गई थी. आखिर वह इतने दिनों से किस से चिढ़ रही थी. उस जेठानी से, जिस ने सदा उसे छोटी बहन माना. यह क्रोध क्या उसे इसलिए सताता रहा कि सास क्यों जेठानी को अधिक प्यार करती थीं या इसलिए कि वह क्यों नहीं उन की तरह समर्थ थी? तो फिर क्यों अवनी को भी उसी क्रोध का शिकार बना डाला?

 

मन के बवंडर को संभालते हुए वह टीके की थाली ले कर बाहर आ गई. विविधा भी तब तक अवनी को ले कर आ गई थी. सुनहरे बौर्डर वाली लाल जरीदार साड़ी में अवनी एकदम राजकुमारी लग रही थी. मौसी ने उसे अपनी बगल में बैठा लिया और लाड़ से उसे देखते हुए शनील का डब्बा खोल कर सुंदर सा हार उस के गले में पहना दिया.

माथे पर रोली का टीका लगा कर बोलीं, ‘‘श्रावणी, तुम्हारी बेटी अब हमारी हुई.’’

श्रावणी का मन धक से रह गया. एक बार फिर वह किसी अपने को खोने जा रही थी तो क्यों नहीं उसे कभी जी भर कर प्यार कर पाई?

श्रावणी देर से जिस बवंडर से जूझ रही थी. वह आखिर बांध तोड़ कर बह निकला, ‘‘बहुत भोली है हमारी बेटी, इसे…’’

‘‘इसे हम बहू नहीं बेटी बना कर रखेंगे श्रावणी,’’ मौसी ने बीच में ही टोक दिया.

अवनी ने पलकें उठा कर रोती हुई चाची को देखा तो उस का मन भी भर आया. श्रावणी अनिकेत को टीका करने लगी तो उस ने कहा, ‘‘आप से वादा करता हूं, इन्हें कभी मायके की कमी महसूस नहीं होने देंगे.’’

अवनी को लग रहा था, जैसे वह कोई स्वप्न देख रही हो. आखिर इतना प्यार चाची ने कहां छुपा रखा था और क्यों छुपा रखा था?

जाने कितने द्वंद्व श्रावणी के अंतरमन में छुपे हुए थे, जो बूंदबूंद बन कर रिसने लगे थे. अवनी ने देखा और उन के गले से लग गई. एक कांपता सा रुदन उस के कंठ से भी फूट निकला था, ‘‘छोटी मां…’’

श्रावणी के स्वर गायब से हो चुके थे, फिर भी लरजती ध्वनि से कह गई, ‘‘क्षमा कर देना मेरी बच्ची.’’

अवनी के आंसुओं से उस का कंधा भीग गया था और अवनी अस्फुट स्वरों में फुसफुसा रही थी, ‘‘मां कभी क्षमा नहीं मांगती है, बस आशीर्वाद देती है.’’

अवनी के ये अस्फुट शब्द श्रावणी के अंतरमन को हुलसाते चले गए थे. यह कैसा मधुर सा एहसास था, किसी को अपना पूरी तरह बना लेने का. काश, मन के दरवाजे बहुत पहले ही खोल दिए होते. उस ने प्रफुल्लित मन से अवनी का माथा चूम लिया था.        

– माया प्रधान               

COMMENT