बिंदास आजादी कभीकभी ऐसे गर्त में गिरा देती है कि वहां से निकलना भी दूभर हो जाता है. एहसास तब होता है जब नतीजा सामने आता है. ऐसा ही कुछ श्रेया के साथ भी हुआ. फिर कैसे उबरी वह इस गर्त से?
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