ऋषभ के चेन्नई से आ जाने के बाद हमारी मुलाकात उतनी आसान न रही और न ही हमारे मिलने की कोई उपयुक्त जगह. 10-12 दिनों में ही हमारे बीच में जिस्मानी दूरी आने से हम बौखला उठे और फिर आपसी रजामंदी से भाग जाने का निर्णय ले लिया, किसी भी अंजाम की परवाह किए बगैर. मयंक का तो पहले ही अपने परिवार से कोई खास जुड़ाव नहीं था. इधर उस के शारीरिक आकर्षण में बंधी मैं भी घायल हिरनी सी उस के साथ चलने को तत्पर हो उठी.

एक दिन खुशी के स्कूल की छुट्टी थी. तब ऋषभ के औफिस जाने के बाद मैं ने खुशी को खिलापिला कर सुला दिया और चल पड़ी अपने नए सफर की ओर.

अब सोचती हूं तो बहुत धिक्कारती हूं खुद को परंतु उस वक्त वासना की आंधी के आगे मेरा सतीत्व और ममत्व दोनों हार गए थे. गोवा के एक रिजोर्ट में 2-3 दिन रहने के बाद जब हमारी खुमारी कुछ उतरी, तो समझ आया कि जीवन में शारीरिक जरूरतों के अलावा भी बहुत कुछ जरूरी होता है. उस का कारण यह था कि मयंक जो 10-15 हजार रुपए अपने घर से लाया था, वे खत्म होने को थे. मेरे पास जो भी कैश था, मैं ने मयंक के हाथ में रख दिया.

‘‘इस से क्या होगा?’’ उस के चेहरे पर नाराजगी के भाव थे. ‘‘तो मैं क्या करूं, जो मेरे पास था तुम्हें दे दिया. अब क्या करना है तुम जानो,’’ मैं गुस्से में बोली.

‘‘अच्छा तो क्या सारी जिम्मेदारी मेरी है. तुम भी तो कुछ ला सकती थीं?’’ उस ने झुंझला कर कहा.

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