प्राची भारद्वाज

‘‘आप को ऐक्साइटमैंट नहीं हो रही है क्या, मम्मा? मुझे तो आजकल नींद नहीं आ रही है, आय एम सो सुपर ऐक्साइटेड,’’ आरुषि बेहद उत्साहित थी. करुणा के मन में भी हलचल थी. हां, हलचल ही सही शब्द है इस भावना हेतु, उत्साह नहीं. एक धुकुरपुकुर सी लगी थी उस के भीतर. एक साधारण मध्यवर्गीय गृहिणी, जिस ने सारी उम्र पति की एक आमदनी में अपनी गृहस्थी को सुचारु रूप से चलाने में गुजार दी हो, आज सपरिवार विदेशयात्रा पर जा रही थी.

पिछले 8 महीनों से बेटा आरव विदेश में पढ़ रहा था. जीमैट में अच्छे स्कोर लाने के फलस्वरूप उस का दाखिला स्विट्जरलैंड के ग्लायन इंस्टिट्यूट औफ हायर एजुकेशन में हो गया था. शुरू से ही आरव की इच्छा थी कि वह एक रैस्तरां खोले. स्वादिष्ठ और नएनए तरह के व्यंजन खाने का शौक सभी को होता है, आरव को तो खाना बनाने में भी आनंद आता था.

आरव जब पढ़ाई कर थक जाता और कुछ देर का ब्रेक लेता, तब रसोई में अपनी मां का हाथ बंटाने लगता, कहता, ‘खाना बनाना मेरे लिए स्ट्रैसबस्टर है, मम्मा.’ फिर आगे की योजना बनाने लगता, ‘आजकल स्टार्टअप का जमाना है. मैं अपना रैस्तरां खोलूंगा.’

ग्लायन एक ऐसा शिक्षा संस्थान है जो होटल मैनेजमैंट में एमबीए तथा एमएससी की दोहरी डिगरी देता है. साथ ही, दूसरे वर्ष में इंटर्नशिप या नौकरी दिलवा देता है. जीमैट के परिणाम आने के बाद पूरे परिवार को होटल मैनेजमैंट की अच्छी शिक्षा के लिए संस्थानों में ग्लायन ही सब से अच्छा लगा और आरव चला गया था दूर देश अपने भविष्यनिर्माण की नींव रखने.

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