‘‘बहू, बाथरूम में 2 दिन से तुम्हारे कपड़े पड़े हैं, उन्हें धो कर फैला तो दो,’’ सुनयना ने आंगन में झाड़ू लगाते हुए कहा.

‘‘अच्छा, फैला दूंगी, आप तो मेरे पीछे ही पड़ जाती हैं,’’ बहू ने अपने कमरे से तेज आवाज में उत्तर दिया.

‘‘इस में चिल्लाने की क्या बात है?’’

‘‘चिल्लाने की बात क्यों नहीं है. कपड़े मेरे हैं, फट जाएंगे तो मैं आप से मांगने नहीं आऊंगी. जिस ने मेरा हाथ पकड़ा है वह खरीद कर भी लाएगा. आप के सिर में क्यों दर्द होने लगा?’’

बहू अपने कमरे से बोलती हुई बाहर निकली और तेज कदमों से चलती हुई बाथरूम में घुस गई और अपना सारा गुस्सा उन बेजान कपड़ों पर उतारती हुई बोलती जा रही थी, ‘‘अब इस घर में रहना मुश्किल हो गया है. मेरा थोड़ी देर आराम करना भी किसी को नहीं सुहाता. इस घर के लोग चाहते हैं कि मैं नौकरानी बन कर सारे मकान की सफाई करूं, सब की सेवा करूं जैसे मेरा शरीर हाड़मांस का नहीं पत्थर का है.’’

अपने इकलौते बेटे अखिलेश के लिए सुनयना ने बहुत सी लड़कियों को देखने के बाद रितु का चुनाव किया था. दूध की तरह गोरी और बी.काम. तक पढ़ी सर्वांग सुंदरी रितु को देखते ही सुनयना उस पर मोहित सी हो गई थीं और घर आते ही घोषणा कर दी थी कि मेरी बहू बनेगी तो रितु ही अन्यथा अखिलेश भले ही कुंआरा रह जाए.

इस तरह सुनयना ने 2 साल पहले अपने बेटे का विवाह रितु से कर दिया था.

रितु अपने पूरे परिवार की लाड़ली थी, विशेषकर अपनी मां की. इसलिए वह थोड़ी जिद्दी, अहंकारी और स्वार्थी थी. उस के घर मेें उस की मां का ही शासन था.

बचपन से रितु को मां ने यही पाठ पढ़ाया था कि ससुराल जाने के बाद जितनी जल्दी हो सके अपना अलग घर बना लेना. संयुक्त परिवार में रहेगी तो सासससुर की सेवा करनी पड़ेगी.

वैसे तो सुनयना के परिवार में भी किसी चीज की कमी नहीं थी, पर रितु के परिवार के मुकाबले उन की स्थिति कुछ कमजोर थी. सुनयना के पति रामअवतार एक कंपनी में हैड अकाउंटेंट थे. वेतन कम था पर उसी कम वेतन में उन की पत्नी सुनयना अपने घर को बड़े ही सलीके से चला रही थीं, साथ ही अपने इकलौते बेटे अखिलेश को भी उन्होंने अच्छी शिक्षा दिलवाई थी. इस समय अखिलेश एक विदेशी कंपनी में प्रोजैक्ट मैनेजर के पद पर कार्य कर रहा था, जिस की शाखाएं देश भर के बड़ेबड़े शहरों में थीं. अखिलेश को अकसर अपनी कंपनी की अलगअलग जगह की शाखाओं का दौरा करना पड़ता था.

अखिलेश जानता था कि कितनी कठिनाई से उस के मम्मीपापा ने उसे अच्छी शिक्षा दिलवाई है, इसलिए उस का झुकाव हमेशा अपने मातापिता और अपने घर की ओर रहता था. वह अपने वेतन में से कुछ रितु को दे कर बाकी पैसा अपनी मम्मी के हाथों में रख देता था.

2-3 महीने तो रितु ने यह सब देख कर सहन किया. यहां की सारी स्थितियों की जानकारी वह अपनी मां को बताना कभी नहीं भूलती थी. हर रात दिनभर की घटनाओं की जानकारी वह अपनी मां को दे दिया करती और मां उसे अपना गुरुमंत्र देना कभी नहीं भूलती थीं.

करीब 3 महीने बाद रितु ने पहले तो अपने पति पर शासन करना शुरू किया और जब वहां बात नहीं बनी तो उस ने अपनी सास सुनयना से बातबात में झगड़ा करना शुरू कर दिया. एक बार जो उस का मुंह खुला तो उस ने सुनयना की हर ईंट का जवाब पत्थर से देना शुरू कर दिया. अब तो इस घर में हर दिन सासबहू में झगड़ा होने लगा. जिस घर में रितु के आने से पहले जो शांति थी, अब उस शांति का वहां नामोनिशान भी न रहा.

अब सुनयना की दोपहर घर से थोड़ी दूर एक कमरे में गरीब बच्चों को पढ़ाने में व्यतीत होने लगी. रामअवतार एक शांतिप्रिय व्यक्ति होने के नाते दोनों को कुछ भी कह नहीं पाते थे. पत्नी को अधिक प्यार करते थे इसलिए उसे अपने तरीके से समझा दिया और बहू के मुंह लगना उचित नहीं समझते थे इसलिए वे अपने आफिस से लेट आने लगे.

अखिलेश की भी यही स्थिति थी. जिस मां ने तमाम मुसीबतें झेल कर उसे पालापोसा, पढ़ालिखा कर इस लायक बनाया कि वह इज्जत की रोटी कमा सके उन से वह कठोर बातें बोल ही नहीं सकता था. लेकिन रितु के सामने उस की हिम्मत ही नहीं होती थी. उधर रितु रातदिन अखिलेश के कान भरने लगी कि अब वह इस घर में नहीं रहेगी. उसे या तो वह उस के मायके पहुंचा दे या दूसरा मकान किराए पर ले कर रहे.

शाम को जब अखिलेश आफिस से आया तो सीधे अपने कमरे में गया. कमरे में रितु बाल बिखेरे, अस्तव्यस्त कपड़ों में गुस्से में बैठी थी. अखिलेश ने उस से पूछा, ‘‘आज क्या हुआ. इस तरह क्यों बैठी हो? आज फिर मां से झगड़ा हुआ क्या?’’

‘‘और क्या? तुम्हारी मां मुझ से प्यार से बात करती हैं?’’ शेरनी की तरह गुर्राते हुए रितु ने कहा और उस की आंखों से आंसू बहने लगे. इसी के साथ दोपहर का सारा वृत्तांत रितु ने नमकमिर्च लगा कर बता दिया. पुरुष सब सह सकता है पर सुंदर स्त्री के आंसू वह सहन नहीं कर सकता. अखिलेश ने फौरन अपना निर्णय सुना दिया कि वह कल ही इस घर को छोड़ देगा. यह बात सुनते ही रितु के आंसू कपूर की भांति उड़ गए.

सोतेजागते रात गुजर गई. सुबह जल्दी उठ कर अखिलेश घर से निकल गया और करीब 2 घंटे बाद घर आ कर मां से बोला कि मैं ने अलग मकान देख लिया है और रितु के साथ दूसरे मकान में जा रहा हूं.

मां ने कहा, ‘‘अपने पापा को आ जाने दो, उन से बात कर के चले जाना.’’

‘‘नहीं, मां. अब मैं किसी का इंतजार नहीं कर सकता. हर दिन कलह से अच्छा है अलग रहना. कम से कम शांति तो रहेगी.’’

‘‘ठीक है. मैं तुम्हें रोकूंगी नहीं क्योंकि अब तुम बच्चे नहीं रहे, जैसा तुम्हें ठीक लगे करो. तुम्हें जिस सामान की जरूरत हो ले जा सकते हो और वैसे भी यह सबकुछ तुम्हारा ही है,’’ कांपती हुई आवाज में अखिलेश से कह कर सुनयना ड्राइंगरूम में जा कर बैठ गईं. उस समय उन की आंखों में आंसू थे, जिन्हें वे अपने आंचल से बारबार पोंछ रही थीं.

थोड़ी देर बाद अखिलेश जा कर एक छोटा ट्रक ले आया, साथ में 2 मजदूर भी थे. मजदूरों ने सामान को ट्रक में चढ़ाना शुरू कर दिया. आधे घंटे बाद उसी ट्रक में दोनों पतिपत्नी भी बैठ कर चले गए.

सुनयना की हिम्मत नहीं हुई कि वे बाहर निकल कर उन दोनों को जाते हुए देखें.

शाम को जब रामअवतारजी आफिस से आए तब उन्हें अपनी पत्नी सुनयना से सारी जानकारी मिली. दुख तो बहुत हुआ पर हर दिन के झगड़े से अच्छा है, दोनों जगह शांति तो रहेगी. यह सोच कर वे चुप रहे. उस रात दोनों पतिपत्नी ने खाना नहीं खाया.

अखिलेश और रितु को गए हुए करीब 1 वर्ष हो गया था. ठीक दीवाली के 10 दिन बाद ही दोनों ने घर छोड़ा था.

दीवाली का त्योहार आया तो हर घर में धूमधाम से तैयारी शुरू हो गई, घरों में दीप जलाए जा रहे थे, पर सुनयना और रामअवतार दोनों उदास बैठे अतीत की यादों में खोए रहे. उन में त्योहार को ले कर न कोई उत्साह था न कोई उमंग. शाम को सुनयना केवल एक दीपक जला कर आंगन में रख आईं.

दीवाली के 2 दिन बाद रामअवतार को आफिस भेज कर सुनयना बच्चों को पढ़ाने चली गईं और जब वे शाम को लौट रही थीं तो रास्ते में उन की मुलाकात एक अनजान औरत से हो गई, जो उन्हें जानती थी पर सुनयना उसे नहीं जानती थीं.

पहले तो उस स्त्री ने सुनयना को नमस्ते की, फिर बताया कि रितु व अखिलेश उस के मकान के पास ही रहते हैं. आज रितु की तबीयत ज्यादा खराब थी और उसे उस के मकानमालिक आटोरिकशा से अस्तपाल ले गए हैं, क्योंकि अखिलेश यहां है नहीं और रितु की डिलीवरी होने वाली है.

सुनयना ने जब उस औरत से यह पूछा कि रितु के मकानमालिक उसे ले कर किस अस्पताल गए हैं, तो उस ने वर्मा नर्सिंग होम का नाम बता दिया.

सुनयना जल्दी से घर आईं और एक थैले में कुछ आवश्यक सामान रखा. अलमारी में जो पैसा रखा था उसे लिया और घर को ताला लगा कर आटो से वर्मा नर्सिंग होम चली गईं. वहां जा कर जब रितु के बारे में पता किया तो पता चला कि बच्चा नार्मल नहीं हो सकता इसलिए डाक्टर रितु को आपरेशन थिएटर में ले गए हैं. तभी एक नर्स ने आ कर आवाज लगाई कि रितु के साथ कौन है? डाक्टर एक फार्म पर साइन करने और आपरेशन फीस जमा कराने के लिए बुला रहे हैं.

सुनयना नर्स से जब रितु के बारे में पूछ रही थी तब वहीं पर रितु के मकान मालिक भी खड़े थे. वे समझ गए कि यह स्त्री शायद अखिलेश की मां हैं तभी इतनी बेचैनी से पूछ रही हैं. उन्होंने हाथ जोड़ कर सुनयना को नमस्ते किया और फिर सारी बातें उन्हें बता दीं. सुनयना ने भी उन्हें बता दिया कि रितु उन की बहू है.

सुनयना उस नर्स के साथ डाक्टर के कक्ष में चली गईं और डा. विमला भाटिया को नमस्ते कर उन्हें अपना परिचय दिया कि रितु उन की बहू है और वे आपरेशन की फीस जमा कराने आई हैं. पहले तो डाक्टर ने उन से एक फार्म पर हस्ताक्षर करवाए और फिर आपरेशन के लिए 25 हजार रुपए जमा कराने को कहा.

‘‘डाक्टर साहब, अभी तो आप 10 हजार रुपए जमा कर लें. बाकी पैसा मैं अपने पति से फोन कर के मंगवा लेती हूं, जब तक आप उस का आपरेशन करें. मुझे किसी भी हालत में जच्चा व बच्चा स्वस्थ चाहिए.’’

‘‘ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है. सब ठीक होगा. हां, आप यह पैसा काउंटर पर जा कर जमा करा दें और रसीद प्राप्त कर लें. वहीं से आप अपने पति को फोन भी कर दें.’’

डाक्टर के पास से आ कर सुनयना ने काउंटर पर जा कर पैसा जमा कर दिया और रसीद ले कर वहीं से रामअवतारजी को फोन कर के सारी बातें बता दीं. साथ ही यह भी कह दिया कि जल्दी से 15 हजार रुपए ले कर वर्मा नर्सिंग होम में आ जाएं.

करीब डेढ़ घंटे बाद रामअवतारजी वहां पर पैसा ले कर पहुंच गए लेकिन रितु के मम्मीपापा अभी तक नहीं आए थे. वे आपरेशन रूम के पास एक बैंच पर सुनयना के साथ बैठ कर इंतजार करने लगे. थोड़ी देर बाद एक नर्स सुनयना के पास आ कर पूछने लगी कि रितु के साथ कौन आया है.

सुनयना ने कहा, ‘‘मैं हूं.’’

‘‘बधाई हो, लड़की हुई है,’’ नर्स ने कहा, ‘‘बच्ची और उस की मां दोनों स्वस्थ हैं,’’ फिर थोड़ी देर बाद एक नर्स ने लड़की को ला कर सुनयना को दिखाया जिसे बड़े प्यार से उन्होंने पहले तो देखा फिर उस का माथा चूम अपने पति से कुछ इशारा किया. रामअवतारजी ने 500 रुपए का नोट निकाल कर नर्स को देते हुए कहा कि यह मेरी तरफ से आप सब लोगों को मिठाई खाने के लिए है.

थोड़ी देर बाद रितु को एक स्ट्रैचर पर लिटा कर वार्ड में लाया गया. उस समय वह बेहोश थी. वार्ड में एक बिस्तर पर लिटा कर उस के पास के पालने में बच्ची को भी लिटा दिया गया. सुनयना वहीं एक बैंच पर बैठ कर कभी बच्चे को तो कभी रितु को देखती रहीं और पति को घर भेज दिया.

करीब साढ़े 4 घंटे बाद रितु को होश आया. उस ने आंखें खोलीं तो देखा उस की सास सुनयना उस के पास बैठी हैं और उस की गोद में एक बच्चा है.

‘‘लक्ष्मी आई है, ठीक तुम्हारी तरह. तुम भी शायद जब पैदा हुई होगी तो ऐसी ही होगी,’’ सुनयना ने मुसकराते हुए कहा और रितु के माथे पर हाथ फेरने लगीं. रितु को बड़ा अच्छा लग रहा था. तभी उस के मकानमालिक भी वहां आ गए और बोले, ‘‘रितु, जब तुझे ले कर यहां आ रहा था तब मेरी पत्नी की तुम्हारी मम्मी से बातें हुई थीं और उन्होंने कहा था कि वे जल्द ही अस्पताल पहुंच रही हैं, पर अभी तक न खुद आईं और न तुम्हारे पापा आए हैं.’’

शाम हो गई थी, अभी तक सुनयना ने कुछ नहीं खाया था, बल्कि चाय तक भी नहीं पी थी. रात भर वह बैड के पास स्टूल पर बैठी कभी रितु का सिर दबातीं तो कभी बच्ची के रोने पर उसे उठा कर घुमातीं. इस तरह जिम्मेदारी को ढोते उन की रात आंखोंआंखों में कट गई.

सुबह रामअवतार थर्मस में चाय ले कर आए और दोनों को कपों में डाल कर चाय दी, फिर पत्नी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘तुम अब घर जाओ. मैं यहां बैठता हूं. कल से तुम ने खाना भी नहीं खाया है. तुम्हारा खाना किचन में कल से ज्यों का त्यों बना हुआ रखा है. घर जाओ और रितु के लिए खिचड़ी बना कर लेती आना. तब तक मैं यहां पर बैठता हूं. आज मैं ने आफिस से छुट्टी ले रखी है.’’

सुनयना दोनों को बहुत सी हिदायतें दे कर चली गईं. रामअवतार वहीं बैंच पर बैठ गए. करीब 1 घंटे बाद कुछ सोच कर रितु से उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, मैं जरा बाहर बैठता हूं, कोई चीज चाहिए तो नर्स से कहलवा देना,’’ और वार्ड से बाहर निकल गए.

रितु के बगल वाले बैड पर भी एक स्त्री को आपरेशन से बच्चा हुआ था. उस की देखभाल के लिए उस की मां वहीं पर बैठी हुई थीं. जब रामअवतार वार्ड से बाहर चले गए तब वह औरत अपनी जगह से उठ कर रितु के बैड के पास आ गई और पूछने लगी, ‘‘तुम्हारे मम्मीपापा अच्छे स्वभाव के मालूम पड़ते हैं. खासकर तुम्हारी मम्मी तो बहुत ही अच्छी हैं. बेचारी रातभर तुम्हारी सेवा करती रही हैं.’’

‘‘ये दोनों मेरे मम्मीपापा नहीं, सासससुर हैं.’’

‘‘क्या?’’ वह औरत आश्चर्य से रितु का मुंह देखने लगी. फिर उस ने कहा, ‘‘क्या दुनिया में ऐसी भी सास होती है, जो कल से बिना खाएपिए अपनी बहू की सेवा कर रही है. बेटी, तुम बहुत खुशनसीब हो जो तुम्हें ऐसे सासससुर मिले हैं. पूरा वार्ड अब तक यही समझ रहा था कि ये तुम्हारे मम्मीपापा हैं. कोई सास अपनी बहू के लिए इतना कर सकती है यह मैं ने पहली बार देखा है. अगर हर सास तुम्हारी सास जैसी हो जाए तो कोई बहू जल कर नहीं मरेगी, कोई बहू गले में फंदा लगा कर नहीं मरेगी. कोई बहू जहर खा कर या गाड़ी के नीचे आ कर अपनी जान नहीं देगी.

‘‘मैं तो तुम्हें यही कहूंगी कि कभी अपनी सास को तकलीफ मत देना, कभी उन से कठोर बातें मत बोलना और बेटी, सच्चे मन से उन की बुढ़ापे में सेवा करोगी तो इस बुढि़या की आत्मा तुम्हें आशीर्वाद ही देगी.’’

इतने में एक नर्स रितु को इंजैक्शन लगाने आ गई. उस औरत की बेटी ने शायद पानी मांगा और उसे वह पानी पिलाने चली गई. रितु सोचने लगी कि उस की मम्मी भी एक औरत हैं और उस की सास भी, पर दोनों में कितना फर्क है. एक केवल शासन करना चाहती है, दूसरी नम्रतापूर्वक अनुसरण. एक किसी के घर को तोड़ना चाहती है, तो एक घर को बचाने के लिए स्वयं तकलीफ उठाती है. एक में दिखावा है, अभिमान है तो दूसरी में गंभीरता एवं सहजता है. पहली नारी है इसलिए सम्माननीय है, दूसरी सम्मान के साथसाथ श्रद्धा व प्रेम की पात्र भी है. एक केवल जननी है तो दूसरी मां. रितु की आंखें छलक रही थीं.

‘‘बेटा, चाय पी लो,’’ रामअवतार की आवाज से रितु का ध्यान भंग हो गया. रितु ने बड़े ध्यान से अपने ससुर की ओर देखा और सोचने लगी इस व्यक्ति ने आज तक मुझे बेटा के सिवा और किसी नाम से बात नहीं की और न ही कठोर शब्द बोले. इन लोगों के साथ गलत व्यवहार कर के मैं ने बहुत बड़ा अपराध किया है. फिर रितु का ध्यान भंग हुआ क्योंकि रामअवतारजी बगल वाली स्त्री से कह रहे थे :

‘‘बहनजी, आप को एक कष्ट दे रहा हूं. आप मेरी बहू को हाथ लगा कर उठा दें, ताकि वह चाय पी ले.’’

वह औरत उठी और रितु को उठा कर चाय पिलाने लगी तो रामअवतारजी वार्ड से बाहर चले गए. करीब 10 बजे सुनयना खिचड़ी और कुछ साफसुथरे कपड़े ले कर आ गईं और रितु को धीरे से बैठा कर चम्मच से अपने हाथ से खिलाने लगीं. आज उसे यह खिचड़ी मोहनभोग के समान लग रही थी.

शाम को करीब 4 बजे रितु के पापा गिरधारी प्रसाद और उस की मम्मी रजनी ने एकसाथ वार्ड में प्रवेश किया. उस समय सास सुनयना रितु के बालों में कंघी कर रही थीं. बैड की दूसरी तरफ एक खाली बैंच पर वे दोनों बैठ गए. दोनों का यहां आना ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी पार्टी में आए हों. गिरधारी प्रसाद बारबार अपनी टाई को ठीक कर रहे थे और रजनी का तो कहना ही क्या था. दोनों के कपड़ों से महंगे परफ्यूम की खुशबू आ रही थी. पूरा जच्चाबच्चा वार्ड उस खुशबू से महक रहा था. दोनों ने औपचारिकता- वश हाथ जोड़ कर सुनयना को नमस्कार किया पर फिर उन  से कोई बात नहीं की.

एक थैले में कुछ सामान रख कर सुनयना ने उठते हुए कहा, ‘‘रितु, जितना मुझ से बन सका मैं ने कर दिया. अब तुम्हारे मम्मीपापा आ गए हैं, अब मैं अपने घर जा रही हूं. तुम भी एक सप्ताह बाद अपना टांका कटवा कर अपने घर चली जाओगी और हां, आज तक की दवाइयों का और अस्पताल के बिल का भुगतान मैं ने कर दिया है, जिस की सारी रसीदें तुम्हारे तकिए के नीचे रखी हैं. अखिलेश आएगा तो उसे मेरा आशीर्वाद कह देना.’’

इतना कह कर चलने के लिए जैसे ही उन्होंने कदम बढ़ाया, अचानक लगा कि उन का आंचल कहीं फंस गया है. उन्होंने पीछे मुड़ कर देखा तो रितु उन का आंचल पकड़े हुए है और डबडबाई आंखों से उन्हें ही देखे जा रही है. सुनयना ने आंचल छुड़ाने का प्रयास किया तो रितु धीरे से बोली, ‘‘मम्मी, क्या अपनी इस मूर्ख बेटी को माफ नहीं करोगी?’’

सुनयना ने झट से रितु का सिर अपनी छाती से लगा लिया और उस समय उन की भी आंखें छलछला उठीं. उन्होंने उस के माथे को सहलाते हुए कहा, ‘‘पगली, कहीं मां भी अपनी बेटी से नाराज होती है, स्वयं को मूर्ख क्योें कहती है. अरे, सैकड़ों लड़कियों में से चुन कर तुझे मैं अपने घर लाई थी तो तू मूर्ख कैसे हो गई. तू मेरी बहू नहीं बेटी है और बेटी ही तुझे समझा है.’’

सुनयना रोती जा रही थीं और कहती जा रही थीं, ‘‘ज्यादा नहीं रोते बेटा. अभी तुम्हारा शरीर कमजोर है, टांके कच्चे हैं, रोने से उन पर जोर पड़ता है और टूटने का भय रहता है,’’ यह कहते हुए वे अपने आंचल से उस के आंसुओं को पोंछने लगीं.

अचानक सुनयना का ध्यान दूसरी तरफ बैठे गिरधारी प्रसाद और उन की पत्नी रजनी की ओर गया तो वे लोग कब के चले गए थे. शायद रजनी ने सोचा होगा कि यहां अब उन का कोई काम नहीं, क्योंकि उन की कोई भी विद्या अब रितु पर असर नहीं करने वाली.

एक सप्ताह बाद रितु के टांके कट चुके थे और उसे अस्पताल से छुट्टी की अनुमति मिल गई थी. अखिलेश भी टूर से वापस आ गया. जब वह अपने कमरे पर गया तो उसे वहां सारी बातों की जानकारी मिल गई. वह अपना सामान कमरे में रख कर सीधे ही अस्पताल चला गया. मां को रितु के पास देख कर पहले तो ग्लानि से अखिलेश के पांव ही आगे नहीं बढ़ पा रहे थे, लेकिन जब उस ने रितु और अपनी मम्मी को मुसकराते हुए देखा तो मम्मी के पास जा कर उन के चरण छू कर प्रणाम किया.

अस्पताल से जिस दिन रितु को छुट्टी मिली उस ने स्पष्ट कह दिया कि वह अब किराए के मकान में न जा कर मम्मी के साथ सीधे अपने घर जाएगी. इसलिए उसे ले कर सुनयना घर आ गई थीं. अब उस घर में खुशियां ही खुशियां थीं. सभी के चेहरे मुसकराते रहते थे. नन्ही सी जान सब के लिए खिलौना बनी हुई थी.

रितु पर अभी बहुत प्रतिबंध था इसलिए वह केवल अपने कमरे में लेटी रहती थी. घर का सारा काम सुनयना ही करती थीं.

सुनयना ने रितु के पास आ कर कहा, ‘‘बेटी, मैं जरा बाजार जा रही हूं और बाहर से ताला लगा देती हूं ताकि तुझे बारबार उठना न पड़े,’’ और वे बाहर से ताला लगा कर चली गईं. रितु अपने कमरे में आ कर बेटी को दूध पिलाते हुए सो गई. अचानक उस की आंख खुली तो देखा कि कमरे में ट्यूबलाइट जल रही है. वह धीरे से अपने कमरे से बाहर निकली तो देखा कि आंगन में चावल के घोल का अल्पना बना हुआ था और वहां पर बहुत से दीपक रखे हुए हैं जिन्हें मम्मीजी बैठ कर जला रही हैं.

दीवाली बीतने के बाद मम्मीजी दीपक जला रही हैं. यह रहस्य उस की समझ में नहीं आ रहा था. वह धीरे से अपनी सास के पास गई. रितु की पायल की आवाज से सुनयना का ध्यान दरवाजे की ओर गया तो उन्होंने देखा कि दरवाजे पर रितु खड़ी है.

रितु ने आश्चर्यचकित स्वर में पूछा, ‘‘मम्मी, दीवाली तो कब की बीत गई… फिर ये सब आज क्यों?’’

सुनयना मुसकराते हुए रितु की ठोड़ी को ऊपर उठाते हुए बोलीं, ‘‘मेरे घर वर्षों बाद मेरे बच्चे आए हैं तो दीवाली तो अभी ही मनाऊंगी. मेरी बेटी दीवाली के बाद गई थी और दीवाली के बाद अपने साथ मेरी पोती भी ले कर आई है. इस खुशी में मैं ने आज दीवाली मनाई है. जाओ, तुम भी अच्छी सी साड़ी पहन लो और नूपुर को नए कपड़े पहना दो. मैं ने तुम दोनों के लिए नए कपड़े अलमारी में रख दिए हैं, फिर हमसब साथ मिल कर दीपक जलाएंगे.’’

रितु का हृदय गद्गद हो गया. वह अलमारी से कपड़े ले कर बाथरूम में बदलने चली गई. रितु ने झुक कर पहले सुनयना के पैर छू कर प्रणाम किया, फिर उस ने कहा कि मम्मी, नूपुर को आज यही आशीर्वाद दें कि इस में आप के जैसे गुण आ जाएं और वह जिस घर में जाए उस घर को स्वर्ग बना दे.

आंगन में रखी परात में जो 11 दीपक जल रहे थे, आज उन की लौ रितु को बड़ी ही सुंदर लग रही थी. वह अपलक केवल जलते दीपकों को ही देखे जा रही थी और वे जलते हुए दीपक उसे यों लग रहे थे मानो उन दीपकों की लौ से उस का जीवन ही जगमगा गया.

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