पिछला भाग पढ़ने के लिए- दूध के दांत: भाग-2

‘‘चलिए, अमितजी, आज हम लोग आप का बर्थ डे सैलिबे्रट करेंगे,’’ यह कह कर एक बड़ा सा गिफ्ट पैक उन्होंने पापा को थमा दिया. साथ में एक छोटा सा उपहार और भी दिया.

पापा ने अपना उपहार खोल कर देखा तो वह नोकिया का सुंदर फोन था जिसे खरीदने की बात वे कई दिन से सोच रहे थे. शायद बातोंबातों में कभी रीता आंटी से कह दिया होगा. तभी तो उन्हें उसे लाने का मौका मिल गया.

पापा ने रीता आंटी को जन्मदिन उपहार के लिए धन्यवाद दिया तो आंटी ने कहा, ‘‘चलिए, आज हमारी शाम अशोक होटल में बुक है.’’

‘‘नहीं, मुझे तो कहीं और जाना है,’’ कह कर पापा ने टालना चाहा लेकिन आखिर उन्हें आंटी की बात माननी पड़ी.

‘‘चलो बेटा, तैयार हो जाओ, घूमने चलना है. पहले तुम्हारी पसंद का जू देखने चल रहे हैं. फिर आज का खाना बाहर खाएंगे,’’ फिर चिल्ला कर बोलीं, ‘‘रामू, आज कुछ नहीं बनेगा.’’

रोहित ने पहले तो साफ मना करना चाहा फिर ध्यान आया कि साथ न जाने से तो बड़ी गलती होगी. वह मां को उन की सारी बातें कैसे बता पाएगा. वह फौरन तैयार हो गया.

गाड़ी में रास्ते भर उस के पापा व डा. रीता आंटी उस की मां की कमियों पर ही बातें करते रहे. पापा कहते रहे, ‘‘मेरी पत्नी शोभा पढ़ीलिखी तो है पर बस घर में बैठी रहती है. किसी बात का उसे कोई शौक ही नहीं है और अपनी तरह रोहित को भी बना रही है. कहता भी हूं कि कभी बाहर निकल कर दुनिया देखो तो कितनी बड़ी है पर बस, कूपमंडूक ही बनी रहती है. रोहित 9 साल का हो गया लेकिन उस के बिना अपना एक काम नहीं कर सकता. ज्यादा कुछ कहो तो मुंह बना कर बैठ जाती है.’’

अमित की ओर देख कर रीता आंटी ने कहा, ‘‘रियली, दिस इज ए ग्रेट प्रौब्लम फौर यू. आप का एक ही बेटा है, उसे भी यों ही अपने जैसा बुद्धू बना कर छोड़ना चाहती हैं. कैसे सहन कर पा रहे हैं शोभा को आप?’’ फिर पीछे पलट कर रोहित को प्यार से बोलीं, ‘‘ओ, माई डियर. कब टूटेंगे तुम्हारे दूध के दांत?’’ रोहित कुछ न बोल पाया.

‘‘अब आप चिंता न करें अमितजी, रोहित की जिम्मेदारी मैं लेती हूं. सारे एटीकेट व मैनर्स मैं सिखा दूंगी,’’ रीता ने कहा.

रोहित को खुश रखने का प्रयास दोनों मिल कर करते रहे. कभी आइसक्रीम खिलाते, कभी जू दिखाते और फिर निश्चिंत हो कर बातें करते रहते. लेकिन उसे तो अपनी मां की गैर मौजूदगी में उन के लिए कही गई बातें बिलकुल भी पसंद नहीं आ रही थीं. पर वह कर भी क्या सकता था?

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वे अशोक होटल पहुंच गए. डा. रीता ने अंदर का फैमिली केबिन बुक करवाया था. रोहित जा कर जैसे ही बैठा तो उसे बड़े जोरों की भूख का एहसास हुआ. पिछली बार मां के साथ भी वह इसी होटल में आया था तब जितना मजा आया था उसे आज तक वह कहां भूला है.

रीता आंटी ने बैठते ही पापा और अपनी पसंद का खाना मंगवा लिया.

रोहित को देख कर बैरे ने पूछा, ‘‘लिटल मास्टर, आप की पसंद का क्या ले कर आऊं? यहां तो आप की पसंद का बहुत कुछ मिलता है. आप ने तो अपनी पसंद बताई नहीं. अपने मम्मीपापा की पसंद का ही सब कुछ लेंगे क्या?’’

रोहित के अंदर का काफी देर से भरा गुस्सा फट पड़ा और वह चिल्ला कर बोला, ‘‘ये मेरी मम्मी नहीं हैं और मुझे कुछ भी पसंद नहीं है.’’

अमित व रीता यह सुन कर एकदम हड़बड़ा उठे. अच्छा हुआ कि वे अंदर केबिन में बैठे हैं नहीं तो आसपास के लोगों का ध्यान उधर जाता ही. बेटे का व्यवहार देख कर अमित अपने को रोक न सके और खिन्न हो कर एक जोरदार झापड लगा दिया.

रोहित आज पापा का यह रूप देख कर एकदम चुप्पी लगा गया. बातबात में रोने वाले उस बच्चे की आंखों से आंसू तक नहीं गिरा, न ही उस ने कुछ कहा. बस, सिर नीचे कर के बैठ गया.

‘‘ओफ, आप भी अमितजी, छोटे बच्चों को कैसे टैकिल करते हैं, समझते ही नहीं. इतना अच्छा दिन बिता कर अब हमारे रोहित का सारा मूड बिगाड़ रहे हैं,’’ कह कर रीता आंटी उसे गोद में बैठाना चाह रही थीं.

रोहित उन के हाथ को हटाता हुआ अंगरेजी में बोला, ‘‘आंटी प्लीज, आई एम ओ.के., सौरी टू मेक यू डिस्टर्ब्ड विद माई बैड मैनर्स. ऐंड आई नो, माई डैड नैवर लाइक्स दिस.’’ एकदम गंभीरता से कह कर रोहित ने अपनी प्लेट में खाना लगा लिया. उस के पापा और डा. रीता उसे देखते रह गए. फिर उन्होंने भी चुपचाप अपना खाना निकाल लिया. उन के पास कहने को कुछ नहीं बचा. अमित भी समझ गए कि बेटे के मन में क्या है. उन को यह अंदाज भी हो गया कि केवल उन को बताने के लिए ही बेटे ने यह व्यवहार किया है.

वे लोग होटल से घर पहुंचे तो अमित ने देखा कि बाहर वाले कमरे की सारी खिड़कियां खुली हैं और सारे बल्ब जल रहे हैं. रोहित को लगा जैसे उस का पूरा घर खुशी से भर उठा है. ‘‘हुर्रे, मम्मी आ गई हैं. मुझे पता था कि पापा के बर्थ डे के दिन तक मम्मी आ ही जाएंगी,’’ और यह कहता हुआ वह तेजी से गाड़ी से नीचे उतर कर दरवाजे की ओर दौड़ पड़ा.

डा. रीता और अमित चुपचाप गाड़ी में ही बैठे रह गए. अमित ने अपने बच्चे के व्यवहार के लिए रीता से माफी मांगी तो वे बोलीं, ‘‘अरे, इस में माफी मांगने की क्या बात है. वह मेरा भी तो बेटे जैसा है.’’

‘‘तुम कब आईं मम्मी,’’ कह कर रोहित अपनी मां से लिपट गया.

‘‘मैं तो सुबह ही आ गई थी,’’ शोभा उसे प्यार करते हुए बोली, ‘‘बेटा, यों समझो कि तुम यहां से निकले हो और मैं आ गई.’’

‘‘मम्मी, आज आप साथ रहतीं तो कितना मजा आता. मैं तो पूरे समय आप को ही याद करता रहा. पिछले साल आज के दिन हम ने कितना ऐंजौय किया था न. उसी जगह हम आज भी गए थे. पर तुम चलतीं तो…’’ इतना कह कर रोहित चुप हो गया.

तभी रोहित को कुछ याद आया तो वह बोला, ‘‘मम्मी, जब आप बनारस गईं तो मैं ने इतनी ढेर सारी ड्राइंग बनाई है कि आप देखोगी तो देखती ही रह जाओगी,’’ और इसी के साथ अपने बनाए चित्रों को ला कर मां के सामने रख दिया.

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मां ने उस के बनाए सभी चित्रों को बहुत ध्यान से देखा और सब के नीचे पेंटिंग के अनुसार गीत बना कर 4-4 पंक्तियां लिख दीं तो रोहित को लगा, मम्मी ने उस के मन की ही बात लिख दी है.

‘‘ओह, वंडरफुल माई डियर मौम,’’ अपने पापा के अंदाज में रोहित ने कहा. फिर जैसे उसे कुछ याद आ गया हो, वह बोला, ‘‘मां, तुम ने खाना खा लिया. हम तो बाहर खा कर आए हैं, चलो, देखते हैं रामू ने क्या बनाया है.’’

‘‘बेटे, मुझे बिलकुल भूख नहीं है,’’ मां ने कहा, ‘‘तुम्हारे नानाजी की तबीयत अभी पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाई है. मैं तो कुछ दिन और रुकती पर मुझे तुम्हारी चिंता लगी थी इसलिए चली आई.’’

‘‘मम्मी अब आप मेरी चिंता करना छोड़ो. देखो, मैं कितना बड़ा हो गया हूं. अकेले रह सकता हूं, अपनी देखभाल कर सकता हूं. पापा का भी ध्यान रख सकता हूं,’’ कह कर वह खिलखिला कर जोरों से हंसा तो शोभा को लगा जैसे अमित हंस रहे हैं.

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