ये भी पढ़ें- दूध के दांत: भाग-3

‘‘रामू, मां के लिए रोटीसब्जी बनाओ, साथ में दही ले आना चीनी डाल कर,’’ रोब से रोहित ने कहा.

‘‘अच्छा, बाबाजी,’’ रामू ने जवाब दिया. शोभा से कुछ न बोला गया.

आज बहुत दिनों बाद रोहित अपनी मां के पास लेटा है. उसे कितनी सारी बातें करनी हैं, पूछनी हैं और बतानी भी हैं. वह जानता है कि जब तक मां को अपनी एकएक बात न बता देगा मन नहीं मानेगा. और आज तो उसे पापा ने रीता आंटी के सामने ही मारा है. यदि मारने वाली बात मां को बताएगा तो इस के लिए मम्मी उसे ही समझाएंगी. कभी सोचता, मां इतनी सीधी क्यों हैं? पापा से क्यों डरती हैं?

अपने ही सवालों में उलझा रोहित अचानक पूछ बैठा, ‘‘मां, तुम अंगरेजी में बात क्यों नहीं करतीं, जैसे डा. रीता आंटी करती रहती हैं? पापा को इसीलिए तो उन से बातें करना अच्छा लगता है.’’

‘‘तुम तो जानते हो बेटे, मैं अंगरेजी समझ तो लेती हूं पर धाराप्रवाह बोलने के लिए प्रैक्टिस चाहिए.’’

‘‘मां,’’ रोहित बोला, ‘‘अब हम आपस में अंगरेजी में बात कर के इसे बोलना सीखेंगे.’’

कुछ देर की खामोशी के बाद पहलू बदल कर रोहित फिर बोला, ‘‘मां, आंटी की तरह तुम भी पैसे क्यों नहीं कमातीं? कार क्यों नहीं चलातीं? बाहर घूमने क्यों नहीं चलतीं? बड़ी पार्टियां क्यों नहीं करतीं?’’

‘‘तुझे आज यह क्या हो गया है जो इस तरह की बहकीबहकी बातें कर रहा है? अब यह मत कह देना कि उन के जैसे कपड़े क्यों नहीं पहन लेतीं? बेटा, वे बड़े अस्पताल की डाक्टर हैं और मैं एक घरेलू महिला. मेरा जीवन तुम लोगों तक ही सीमित है.’’

‘‘पर तुम मेरी मां हो, अपने को थोड़ा चेंज करो न मां.’’

शोभा समझ नहीं पा रही थीं कि आज रोहित को हो क्या गया है. बेटे से वे इस बारे में कुछ पूछतीं कि तभी अमित बाहर से आ गए. उन को देखते ही डर कर चुप हो गईं और सोचने लगीं कि रोहित के पापाजी ने इतना भी नहीं पूछा कि उस के पिताजी की तबीयत कैसी है. दिल से न सही औपचारिकता तो निभा ही सकते हैं. इन को न जाने क्या होता जा रहा है, पहले तो ठीक ही व्यवहार करते थे. पर इधर ठीक ढंग से बातचीत तक नहीं करते.

मांबेटे को एकसाथ सोता देख कर अमित सोचने लगे, यही रोहित को बिगाड़ रही है अन्यथा वह इस तरह रीता को नहीं बोलता. पर अपने बेटे को इतनी जोर से उन्हें भी नहीं मारना चाहिए था. अपनी गलती का एहसास होते ही उन का मन ग्लानि से भर गया और वे अपनेआप को न रोक सके. धीरे से पूछा, ‘‘जाग रहे हो बेटा, ज्यादा जोर से तो नहीं लगी? आई ऐम सौरी.’’

‘‘क्या चोट लग गई? कहां लग गई, कैसे लगी इसे, इस ने तो कुछ नहीं बताया,’’ घबरा कर शोभा उठ कर बैठ गईं और बोलीं, ‘‘चलो, उठो और मुझे अपनी चोट दिखाओ.’’

‘‘अरे, मां जरा सा गिर गया और लग गई. पापा तो यों ही चिंता कर रहे हैं. अंदरूनी चोट है, तुम को नहीं दिखेगी.’’

रोहित की बात सुन कर अमित सोचने लगे कि लगता है आज की घटना के बारे में रोहित ने अपनी मां को कुछ नहीं बताया है. अमित को इधर कुछ दिनों से घर का माहौल एकदम अलग लगने लगा है. न किसी बात की चकचक होती न झंझट होता. पत्नी शोभा और बेटा रोहित जाने क्या करते रहते हैं. बेटे को देखो तो वह कमरे में बंद रहता है. मां को देखो तो सुबह से शाम तक अपने काम में ही लगी रहती है. अमित इस दिनचर्या से खुश हैं कि चलो रीता से मिलने में कोई रोकटोक नहीं है.

उस दिन अमित जैसे ही अपने घर पहुंचे कि पीछे से किसी ने आवाज दी. पलट कर देखा तो कोरियर वाला था. उन्होंने लिफाफा ले लिया और पढ़ कर देखा तो पत्र बेटे के नाम से था. कौन भेज सकता है और कहां से आया है? अमित के दिमाग में एकसाथ कई प्रश्न कौंध गए फिर भी उन्होंने रोहित को बुला कर उसे पत्र पकड़ा दिया. उस ने लिफाफा खोला और पढ़ा तो उछल पड़ा और मारे खुशी में उछलते हुए उस ने कहा, ‘‘पापा, आप भी इसे पढ़ो.’’

अमित ने पत्र पढ़ा, श्रीमती शोभा सिंह, इस बार की प्रादेशिक चित्रकला प्रतियोगिता में आप के बेहतरीन चित्र ने प्रथम स्थान प्राप्त किया है. हमारी शुभकामनाएं. आप को ललित कला अकादमी में खुद आ कर यह पुरस्कार व सम्मान राज्यपाल महोदय से लेना होगा.

अमित ने पत्नी से पूछा, ‘‘ये शौक कब से लग गया?’’

‘‘पेंटिंग का शौक तो मुझे बचपन से ही था लेकिन इस ओर ध्यान ही नहीं दिया,’’ उत्साहहीन भाव से शोभा ने कहा, ‘‘बेटे ने मेरे द्वारा बनाए गए साधारण से चित्र को कब इस प्रतियोगिता में भेज दिया मुझे नहीं पता और उस चित्र में ऐसा क्या है यह भी मैं नहीं जानती, क्योंकि मैं ने तो यों ही कूंची चला दी थी. पर इतना बड़ा पुरस्कार मिला. यह मेरे लिए आश्चर्य की बात है.’’

ये भी पढ़ें- Valentine’s Day Special: बसंत का नीलाभ आसमान

अमित कुछ बोले नहीं. बस, चुपचाप अपने कमरे में आ कर बैठ गए. सोचने लगे कि इतने दिनों तक पत्नी को वे कितना अपमानित करते रहे हैं. उस ने उफ तक न की. हां, उन के लिए उन के परिवार के लिए अपनी प्रतिभा को उस ने ताले में जरूर बंद कर दिया और वह अपने पाश्चात्यता के फैशन में पत्नी को इस तरह का कोई मौका ही नहीं दे पाए और न ही उस के मन को कभी समझना चाहा. पत्नी की असली कीमत तो उन्हें अब समझ में आ रही है. और बच्चों को भी कभी कम कर के नहीं आंकना चाहिए. वे कभी बड़ों से भी ज्यादा समझदार हो जाते हैं. इस तरह अमित को शादी के बाद पहली बार अपनी पत्नी पर गर्व हुआ.

मन की उधेड़बुन में फंसे अमित ने टैलीविजन खोला तो उन के कानों में ये शब्द सुनाई पड़े, ‘‘अब आप होनहार बाल कलाकार रोहित और उस की चित्रकार मां शोभा सिंह से मिलिए. आप को यह जान कर खुशी होगी कि एक बेहतरीन चित्रकार की प्रतिभा को आम लोगों के बीच लाने का श्रेय एक 9 साल के बच्चे को मिला है जो उन्हीं का बेटा है.’’

अमित टैलीविजन को देखने लगे. स्क्रीन पर रोहित का हंसता चेहरा नजर आया जो कह रहा था, ‘‘पिछले दिनों पापा की एक पत्रिका में मैं ने छिपी प्रतिभाओं को ढूंढ़ निकालने की इस प्रतियोगिता के बारे में पढ़ा तो मां की बनाई हुई अपनी पसंद की एक पेंटिंग भेज दी. मुझे पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था कि मम्मी का बनाया यह चित्र अवश्य ही पसंद किया जाएगा. लेकिन प्रथम पुरस्कार प्राप्त होगा यह मुझे नहीं लगा था.

मां की कलाकृतियों की विशेषता है किसी भी चित्र को देख कर उस के नीचे स्वरचित कुछ विशेष पंक्तियां लिखना जो उस चित्र को उत्कृष्टता और भव्यता देती हैं. मेरी मां की लगन व पापा का सहयोग ही हमें आगे कार्य करने को निरंतर उत्साहित करेगा.’’

अमित इस साक्षात्कार को देखने में इतने तल्लीन थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि रोहित कब आ कर उन की बगल में बैठ गया. साक्षात्कार समाप्त होने के बाद बगल में रोहित को बैठा देख कर अमित बोले, ‘‘हां, तो मास्टर रोहित, यह साक्षात्कार कब हो गया और तुम ने मुझे बताया भी नहीं.’’

‘‘पापा, वे कल घर आए थे. मां से भी कहते रहे पर उन को कुछ कहने में झिझक हो रही थी. पर मैं ने अच्छा कहा न?’’

इसी के बाद अमित के पास अपने लोगों की बधाइयां आने लगीं जिस में इस शहर के कुछ जानेमाने लोगों के भी बधाई संदेश शामिल थे. अब अमित की समझ में आया कि घर में तो हीरा छिपा है और वे पत्नी को सदा हीनता का ही बोध कराते रहे. कितनी गलती करते रहे थे वे. जो काम उन को करना चाहिए वह उन के बेटे ने कर दिखाया है. उन्हें लग रहा था कि उन का बेटा अब उन से भी बड़ा हो गया है. कितनी शालीनता से उस ने उन को सही मार्ग दिखला कर घरौंदे को बिखरने से बचा लिया है. पीछे पलट कर देखते हैं तो उन को बधाई देने वालों में डाक्टर रीता भी शामिल हैं.

वे भीगी आंखों से सब की बधाइयां स्वीकार करते रहे और पत्नी कितनी निर्विकार हो कर मुसकरा रही थी. उन के अपने घर में इतनी बड़ी कलाकार बैठी है और वे घर के बाहर भटकते रहे हैं. मन ने जैसे एक निश्चय किया. नहीं, अब वे अपने पथ से विचलित नहीं होंगे.

पहली बार अमित अपनी पत्नी की ओर हाथ बढ़ा कर बोले, ‘‘चलो शोभा, आज बाहर कहीं इस खुशी को सैलिब्रेट करने चलें.’’

शोभा अदा से बोलीं, ‘‘थैंक्यू, अमितजी, कौंगे्रचुलेट टू अवर सन फौर दिस गे्रट अचीवमैंट.’’

अपनी पत्नी के मुंह से अंगरेजी में कही बातों पर अवाक हो कर अमित पहले पत्नी और फिर बेटे को देखते रह गए.

रोहित नन्हा बालक बन कर बोला, ‘‘पापा, हम पहले आइसक्रीम खाएंगे, फिर चिडि़याघर देखेंगे, पिज्जा खाएंगे तब घर आएंगे.’’

‘‘श्योर,’’ अमित बोले, ‘‘आज जो चाहोगे वही मिलेगा. फिर घर आ कर मां के हाथ की बनी खीर का मजा लेंगे.’’

शोभा का मन खुशी से खिल उठा. हाथ में बंधी घड़ी पर नजर जाते ही बोलीं, ‘‘अब चलें, कितने काम पैंडिंग पड़े हैं, जल्दी पूरे करने हैं.’’

एकदूसरे की खुशी में सराबोर, हाथों में हाथ डाले वे लौट आए हैं. घर का दरवाजा खोलते हुए अमित सोचने लगे कि कौन कहता है कि मेरे बेटे रोहित के दूध के दांत अभी नहीं टूटे हैं.

ये भी पढ़ें- पति वल्लभा: भाग-2

Tags:
COMMENT