मां को अग्नि के सुपुर्द कर के मैं लौटी तो पहली बार मुझे ऐसा लगा जैसे मैं दुनिया में बिलकुल अकेली रह गई हूं. श्मशान पर लिखे शब्द अभी भी मेरे दिमाग पर अंकित थे, ‘यहां तक लाने का धन्यवाद, बाकी का सफर हम खुद तय कर लेंगे.’ मां तो परम शांति की ओर महाप्रस्थान कर गईं और मुझे छोड़ गईं इस अकेली जिंदगी से जूझने के लिए.

मां थीं तो मुझे अपने चारों ओर एक सुरक्षा कवच सा प्रतीत होता था. शाम को जब तक मैं आफिस से न लौटती, उन की सूनी आंखें मुझे खोजती रहतीं और मुझे देख कर अपना सारा प्यार उड़ेल देतीं. मैं भी मां को सारे दिन के कार्यक्रमों को बता कर अपना जी हलका कर लेती. आफिस में अपनी पदप्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए मुझे एक चेहरा ओढ़ना पड़ता था पर घर में तो मैं मां की बच्ची थी, हठ भी करती और प्यार भी. पर अब मैं बिलकुल अकेली पड़ गई थी.

कुछ दिन बाद आफिस के केबिन में बैठ कर मैं सामने दीवार पर देखने लगी तो मन में खयाल आया कि पापा के फोटो के साथ मां की भी फोटो लगा दूं, इतने में दरवाजा खोल कर मेरे निजी सचिव ने आ कर बताया कि कुछ जरूरी कागज साइन करने हैं, जो टेबल पर ही रखे हैं.

‘‘मिश्राजी, मेरी मानसिक हालत अभी ठीक नहीं है. मैं अभी कोई भी निर्णय नहीं ले सकती. अभी तो मां को गुजरे 4 दिन भी नहीं हुए हैं और…’’ इतना कह कर मैं भावुक हो गई.

‘‘सौरी, मैडम, मुझे इस समय ऐसा नहीं कहना चाहिए था,’’ कह कर वह वापस जाने लगे.

‘‘मिश्राजी, एक मिनट,’’ कह कर मैं ने उन्हें रोका और पूछा, ‘‘अच्छा, ब्रांच मैनेजर का इंटरव्यू कब है?’’

‘‘मैडम, चेयरमैन साहब खुद इस इंटरव्यू में बैठना चाहते हैं. आप कोई भी डेट…मेरा मतलब है जब भी आप कहेंगी मैं उन्हें बता दूंगा,’’ कह कर मिश्राजी चले गए.

हमारी मल्टीनेशनल कंपनी देश की 5 बड़ी ब्रांचों के लिए कुशल मैनेजर रखना चाहती थी. 6 महीने से चल रहे ये महत्त्वपूर्ण इंटरव्यू अब निर्णयात्मक दौर में थे. उन का वार्षिक पैकेज भी 10 लाख रुपए का था. यानी मुझ से आधा. चेयरमैन को तो इस इंटरव्यू में आना ही चाहिए.

मैं अनमने और भारी मन से एकएक पत्र देखने लगी. मन कहीं भी टिक नहीं रहा था. मां की भोली सूरत बारबार आंखों के सामने तैर जाती. मैं ने सारी फाइलें बंद कर दीं और अपने सचिव को बता कर घर चली आई.

रिश्तेदार, सगेसंबंधी सब एकएक कर के जा चुके थे. महरी अपना काम समेट कर टीवी देख रही थी. शायद उसे इस का एहसास नहीं था कि मैं घर जल्दी आ जाऊंगी. उसे टीवी के पास बैठी देख कर मैं एकदम झल्ला गई और अपना सारा गुस्सा उस पर ही उतार दिया, फिर निढाल हो कर पलंग पर पसर गई.

थोड़ी देर में महरी चाय बना कर ले आई. मुझे इस समय सचमुच चाय की ही जरूरत थी. वह चाय मेज पर रख कर बोली, ‘‘मेम साहब, आप ही बताइए, मैं सारा दिन यहां अकेली क्या करूं. मांजी और मैं इस समय टीवी ही देखा करते थे. आप को पसंद नहीं है तो अपना घर खुद ही संभालिए,’’ कह कर वह तेजी से चली गई.

मेरे क्रोध और धैर्य की सीमा न रही. इस की इतनी हिम्मत कि मुझे कुछ कह सके, मेरी बात काट सके. वह इस बात पर मेरा काम छोड़ भी देती तो मैं उसे रोकती नहीं, चाहे बाद में मुझे कितनी ही परेशानी होती. झुक कर बात करना तो मैं ने कभी सीखा ही नहीं था. बचपन से आज तक मैं ने वही किया जो मेरे मन को भाया. जिस से सहमति नहीं बन पाती, उस से मैं किनारा कर लेती.

चाय पीने के बाद भी मुझे चैन नहीं आया. मैं बदहवास एक कमरे से दूसरे कमरे में बिना मकसद घूमती रही. मुझे लग रहा था कि मां की आकृति कहीं आसपास ही तैर रही है. मैं ने मां की तसवीर पापा की तसवीर के साथ लगा दी. उन की फोटो पर लगे गेंदे के फूल मुरझा कर पापा की तसवीर पर लगे नकली फूलों की शक्ल ले रहे थे.

मैं मां की तसवीर के पास जा कर उन्हें देखती रही और फिर बीते दिनों के ऐसे तहखाने में जा पहुंची जहां बहुत अंधेरा था. पर अंधेरा भी मैं ने ही किया हुआ था, वरना ये दोनों तो मेरे जीवन में उजाला करना चाहते थे.

मुझे अपना खोया हुआ बचपन याद आने लगा और मैं अपने ही अतीत के पन्नों को एकएक कर पलटने लगी.

इकलौती संतान होने के कारण मां और पापा का सारा प्यार मेरे ही हिस्से में था. जब भी पापा को कोई मेरे लड़की होने का एहसास करवाता, पापा हंस कर कहते कि यही मेरा बेटा है और यही मेरी बेटी भी. उन्होंने मेरी परवरिश भी मुझे बहुत सी स्वतंत्रता दे कर अलग ढंग से की थी. मां जब भी मुझे किसी लड़के के साथ देखतीं या देर शाम को घर आते देखतीं तो अच्छाबुरा समझाने लगतीं और पापा एक सिरे से मां की बात को नकार देते.

स्कूल की पढ़ाई खत्म होते ही मैं ने प्रोफेशनल कोर्स ज्वाइन कर लिया, साथ ही दूसरे वह सभी काम सीख लिए जो पुरुषों के दायरे में आते थे. मैं किसी भी तरह खुद को लड़कों से कम नहीं समझती और न ही उन को अपने ऊपर हावी होने देती थी. मेरे इस दबंग और अक्खड़ स्वभाव के कारण कई लड़के तो मेरे पास आने से भी डरते थे.

अगले हफ्ते पढ़ें- मुझे एक लड़के ने प्रपोज किया तो…

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