पिछला भाग पढ़ने के लिए- जहां से चले थे भाग-1

एक बार मैं कालिज टीम के साथ टेबलटेनिस का मैच खेलने सहारनपुर गई थी. रात को खाने के समय बातोंबातों में मुझे एक लड़के ने प्रपोज किया तो उस लड़के के कंधे पर हाथ रख कर मैं बोली, ‘एक बात तुम्हें साफसाफ बता दूं कि मैं ऐसीवैसी लड़की नहीं हूं और न ही मुझे आम लड़कियों की तरह हलके में लेना. दोबारा मेरे साथ नाम जोड़ने की कोशिश भी मत करना.’

वह लड़का तो चुपचाप वहां से चला गया पर मेरी अंतरंग सहेली वंदना ने मुझ से कहा, ‘इतना गुस्सा भी ठीक नहीं है संध्या. उस ने कौन सी तेरे साथ बदसलूकी की है, प्रपोज ही तो किया है. तू विनम्रता से इनकार कर देती, बातबात पर ऐसा रौद्र रूप दिखाना ठीक नहीं है.’ यह बात हमारे कालिज में दावानल की तरह फैल गई. मेरा कद 2 इंच और बढ़ गया. उस के बाद फिर किसी लड़के ने मेरी ओर आंख उठाने की भी हिम्मत नहीं की.

एम.बी.ए. करने के बाद मुझे एक से एक अच्छे आफर आने लगे. मैं भी दिखा देना चाहती थी कि मैं किसी से कम नहीं हूं. पापा का वरदहस्त तो सिर पर था ही. जहां मेरे साथ पढ़े लड़कों को 20 हजार के आफर मिले, मुझे 45 हजार का आफर मिला था.

पापा को अब मेरी शादी की चिंता सताने लगी, पर मैं अभी ठीक से सेटल नहीं हुई थी. वैसे भी मुझे अपने लिए एक ऐसा घरवर ढूंढ़ना था जो मेरी बराबरी और विचारों के अनुकूल हो. मैं पापा के अनुरोध को टालना भी नहीं चाहती थी और शादी कर के अपना आने वाला सुनहरा कल गंवाना भी नहीं चाहती थी. इसलिए पापा जब भी कोई रिश्ता ले कर आते मैं कोई न कोई कमी निकाल कर इनकार कर देती.

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