‘‘चाजीजी, शाम को जन्माष्टमी की झांकी और उत्सव सजेगा. उस के लिए 100 रुपए चंदा दे दीजिए,’’ टोली के अगुवा गप्पू ने बड़ी धृष्टता से कहा. ‘‘100 रुपए. मैं तो 10 रुपए ही दे सकती हूं.’’ ‘‘नहीं, नहीं चाचीजी, जब सब लोग 100 रुपए दे रहे हैं तो आप 50 तो दे ही दीजिए. अरे, कन्हैयालला को दान नहीं करेंगी तो परलोक कैसे सुधरेगा?’’ गप्पू की तेज नजरों ने गुप्ताइन चाची के छोटे से बटुए में 50 का नोट ताड़ कर उन की कमजोर नस पर चोट की थी.

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