पहला भाग पढ़ने के लिए- नजरिया – भाग-1

विनोद बिलकुल उस के विपरीत स्वभाव के थी. जहां सुरभि खुले विचारों वाली हंसमुख व विनोदी स्वभाव की लड़की थी, वहीं पेशे से वकील विनोद की सोच पारंपरिक व संकीर्ण थी. आकर्षक व्यक्तित्व वाले इंसान की सोच इतनी छोटी होगी सुरभि को शादी के बाद ही पता चला. किसी से भी ज्यादा बातें करना विनोद को पसंद नहीं था. सुरभि का परपुरुष से बातें करना उसे नागवार गुजरता था, कोई राह चलता पुरुष भी यदि सुरभि को देखता तब भी विनोद की शक्की निगाहें व तीखे बाण सुरभि पर ही चलते कि फलां तुम्हें क्यों देख रहा था? जरूर तुम ने ही पहले उसे देखा होगा… शादी के बाद सुरभि के पारिवारिक संबंधी व मित्रों की संख्या कम होने लगी. विनोद कब किस के बारे में क्या समझ ले कहना मुश्किल था.

सुरभि ने धीरेधीरे खुद को बदल कर विनोद के इर्दगिर्द समेट लिया था. कहते हैं इंसान प्यार में अंधा हो जाता है. सुरभि ने प्यार किया पर विनोद का प्यार जंजीर बन कर उसे जकड़ चुका था. बच्चे भी विनोद की मानसिकता के शिकार होने लगे. जब उस का मन करता सब से मेलजोल बढ़ाता पर जब पारिवारिक संबंध बनने लगते तो वहीं पर लगाम कसने लगता. गुस्सा आने पर मतभेद होने पर कई दिनों तक अकारण अबोलापन कायम रहना आम बात थी. घर में सीमित वार्त्तालाप अकेलेपन को जन्म दे चुका था.

घर का बोझिल वातावरण घुटनभरा होने लगा. जैसे हवा का दबाव सांस लेने के लिए अनुपयुक्त था. सासससुर, मामाभानजी, सालीसलहज जैसे रिश्ते भी विनोद के शक की आग में जल गए थे. डर का दानव अपना विकराल रूप लेने लगा. मन की कली रंगों से परहेज करने लगी थी.

सुरभि के पास ये सब सहने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं था. विनोद घर पर न हो तो सभी हंसतेबोलते थे, उस के सामने मजाक करना भी दुश्वार था. धीरेधीरे बच्चे भी अपनी जिंदगी में रम गए. अपना अकेलापन दूर करने के लिए सुरभि का समय सहेलियों के साथ ही व्यतीत होने लगा. पर मन आज भी प्यासा सा पानी की तलाश कर रहा है. विनोद ने कभी भूल से भी सुरभि से यह नहीं पूछा कि तुम्हें क्या पसंद है? रूठनामनाना तो बस फिल्मों में होता है. न कोई शौक न उत्साह. जब आधी उम्र गुजर जाने के बाद भी विनोद की सोच में परिवर्तन नहीं आया, तो मन उस से दूर भागने लगा. अब उस से दूर रहना ही मन को शांति देता था.

आज राहुल के अपनेपन ने कलेजे में ठंडक सी प्रदान की. दर्द बह कर निकल चुका था. सुरभि का मन हलका था. काश, विनोद उस का सच्चा हमसफर व एक दोस्त बन पाता जिस से वह खुल कर अपने सब रंग बांट सकती, जिंदगीके सारे चटक रंगों को अपने जीवन में भर सकती… सोचतेसोचते कब आंख लगी पता ही नहीं चला.

कोरों से निकले आंसू गालों पर रेखाचित्र बना कर अपने निशान छोड़ गए थे. मुख चूमती हुई भोर की किरणों ने उसे गुदगुदा कर उठा दिया. आईने में खुद को निहारते हुए होंठों पर तैर आई मुसकान ने आंखों में चमक पैदा कर दी थी. खुद को देख कर खुद के लिए जन्मा प्यार, मस्तीभरी जीवन के रंगों में भीगी शोख अदाएं जिस पर कालेज में सब मरमिटते थे, आज उसे अपने अंदर वही शोखी नजर आ रही थी. उस के अंदर नई ऊर्जा का संचार हो चुका था. 4 दिन पंख लगा कर उड़ गए. सुरभि खुद को बदलाबदला महसूस कर रही थी.

दिल्ली आने तक पुरानी सुरभि उस के अंदर वापस आ गई थी. राहुल की बातों ने उस की सोई हुई लालसा को जगा दिया था. आज उस के भीतर की सुरभि जाग गई थी. कालेज के दिनों के उस के शौक अब जीवन में नए रंग भरने के लिए तैयार थे. उस ने अपने जीवन को फिर से रंगों के इर्दगिर्द समेट लिया था. विनोद भी उस के इस परिवर्तन से हैरान था.

चाय पीते हुए विनोद अचानक बोले, ‘‘क्या बात है सुरभि, बहुत बदलीबदली नजर आ रही हो, इतने दिनों में किसकिस से मिली… क्याक्या नए जलवे बिखेरे?’’

‘‘कुछ नहीं, बस बचपन जी कर आ रही हूं. तुम ने मुझे कभी उस तरह देखा ही कहां है… कितना जानते हो मेरे शौक को?’’ सुरभि की आवाज में जाने क्या था कि आज विनोद चुप

हो गया.

एक समय के बाद नदी का प्रवाह भी पत्थर से टकरा कर अपनी दिशा बदल लेता है. आज वे कोमल संवेदनाएं पत्थर से टकरा कर चूरचूर हो गई थीं.

फिर से जीवन ने करवट बदल ली. अपने नाम को सार्थक करती हुई सुरभि फिर से महकने लगी. उस के रंगों ने अपना एक आसमान तैयार कर लिया था. विनोद ने कुछ कहा नहीं बस चुपचाप उसे बदलते हुए देखता रहा.

काम करते समय जब भी फोन की घंटी बजती सुरभि की आंखें फोन में कुछ तलाशने लगतीं. कानों को राहुल की आवाज का इंतजार था. उस ने 1-2 बार संदेश भी भेजा पर कोई जवाब नहीं आया.

राहुल अपनी सीमा जानता था. इंतजार सप्ताह से बढ़ कर महीना और फिर साल में परिवर्तित हो गया पर राहुल का फोन नहीं आया. उस के साथ बिताए 6-7 घंटों ने ऐसी चिनगारी भड़काई कि सुरभि दोबारा जी उठी थी. मगर उस के उपेक्षित व्यवहार से सुरभि का पुरुषों के प्रति नजरिया बदल गया था. राहुल ने कहा था खून से बढ़ कर नमक का रिश्ता नहीं होता. हर बात की एक मर्यादा होती है.

सब पुरुष एकजैसे ही होते हैं. स्त्री के प्रति उन का नजरिया नहीं बदलता. पुरुष उस

पर एकछत्र राज्य ही करना चाहता है. अपने घर के बाहर मर्यादा की रेखा खींच कर दोहरा व्यक्तित्व जीता है. स्त्रीपुरुष की मित्रता वह सामान्य तरीके से लेना कब सीखेगा? नारी के लिए लकीर खींचने का हक पुरुष को किस ने दिया? दोनों अलगअलग व्यक्तित्व हैं, फिर हर फैसला लेने का अधिकार एक को कैसे हो सकता है? मन के भाव शब्दों व रंगों के माध्यम से अपनी बात बेखौफ कहने लगे. तूफान गुजरने के बाद घर का नजारा कुछ बिखरा सा था.

आज मन शांत हो गया. विनोद को समझना उस के लिए अब आसान हो गया था. शायद सभी पुरुषों की सोच ऐसी ही होती है. कूची जीवन को सफेद कागजों पर जीवंत करने लगी. सुप्त मन के भाव आकार लेने लगे. उस का मन चंचल हिरणी के समान हो गया था जो अपने ही जंगल में विचरण का पूर्ण आनंद लेती है. अपने रंगों व अनुभूतियों में डूबी सुरभि आज अपने पिंजरे में भी खुश थी. मेज पर रखा खाली गिलास भी उसे खाली नहीं लग रहा था. उस  में हवा थी जो चुपचाप पानी की बूंदों को आत्मसात कर के गिलास को सुखाने का प्रयत्न कर रही थी.

उस के जीवन में अब खालीपन का स्थान नहीं था. उस के चाय के कप से निकलती भाप हवा में अपने अस्तित्व का संकेत दे कर विलय हो रही थी. इलायची की खुशबू वातावरण को महका रही थी. चाय पीने की तलब ने हाथों को कप की तरफ बढ़ा कर होंठों से लगा लिया.

चाय की चुसकियां व बंजर से जीवन में वसंत ने अपने रंग भर दिए थे. रेडियो पर बज रहा गाना गुनगुनाने को मजबूर कर रहा था, ‘मेरे दिल में आज क्या है तू कहे तो मैं बता दूं…’ दिल आज भी उस आवाज को सुन कर धन्यवाद देना चाहता है, जिस ने अनजाने ही सूखे गुलाब में इत्र की कुछ बूंदें छिड़क दी थीं.

‘‘स्नेह की एक बूंद को तरसता उस का प्यासा मन रेगिस्तान के समान तपने लगा. विनोद का व्यवहार उसे अंदर तक सालता था…’’

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