सुभाष की कंजूसी की आदत के चलते पत्नी मीनाक्षी ही नहीं, बल्कि रिश्तेदार भी नाराज रहते, लेकिन उन की आंख बंद होते ही मायकेससुराल के लोग उन के घर की परिक्रमा करने लगे. और तब मीनाक्षी, सुभाष को याद कर बिलख पड़ी थी.

सुभाषजी की आत्मा की शांति केलिए आयोजित श्रद्धांजलि समारोह में शास्त्रीजी का प्रवचन वहां बैठे सभी लोग ध्यान से सुन रहे थे. उन्होंने पौराणिक कथाओं को जोड़ कर अपने प्रवचन को काफी दिलचस्प बना दिया था.

मीनाक्षी चाह कर भी उस प्रवचन को ध्यान से नहीं सुन पा रही थी. अपने दिवंगत पति की माला पहनी तसवीर को देखतेदेखते उस का मन बारबार अतीत की यादों में खोता जा रहा था.

‘सुभाष की बहू चांद सी सुंदर और कितनी पढ़ीलिखी है. इस सिरफिरे की तो सचमुच लाटरी निकली है.’ लोगों के मुंह से निकली इस तरह की बातें मीनाक्षी के कानों में 32 साल पहले शादी के पंडाल में ही पड़ने लगी थीं.

लोग सुभाष को सिरफिरा क्यों बता रहे थे, इस का कारण मीनाक्षी की समझ में जल्दी ही आ गया था.

बढि़या पहनने और चटपटा खाने के अलावा उस के आरामपसंद पति को किसी अन्य बात में कोई दिलचस्पी नहीं थी. न तरक्की कर के आगे बढ़ने की चाह, न कोई सपना, न कोई महत्त्वा- कांक्षा. हां, अपने अच्छे नैननक्श व प्रभावशाली कदकाठी का घमंड होने के साथसाथ उस में पति होने की अकड़ जरूर बहुत ज्यादा थी.

वे अपनी नाक पर मक्खी नहीं बैठने देते थे. क्या मजाल जो घर में कोई काम उन की मरजी के खिलाफ हो जाए. क्लेश और झगड़ा कर के किसी की भी नाक में दम कर देना उन के बाएं हाथ का खेल था.

शादी के वक्त तो मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाली मीनाक्षी की तनख्वाह उन्हीं के बराबर थी. फिर सिर्फ वही तरक्की करती चली गई. हर 2-3 साल बाद उस का प्रमोशन हो जाता. दूसरी तरफ स्कूल मास्टर सुभाषजी को पगार में होने वाली सालाना बढ़ोतरी से ज्यादा कुछ और नहीं चाहिए था और न ही मिला.

‘मेरे सामने कभी ऊंचा बोलने की कोशिश मत करना. अगर कभी मेरे सिर के ऊपर से रास्ता बनाने की कोशिश की तो 1 मिनट में नौकरी छुड़वा कर घर बिठा दूंगा,’ इस तरह की धमकी अपने से ज्यादा कमाने वाली मीनाक्षी को वे आएदिन जरूर दे देते थे.

मीनाक्षी उन से ज्यादा कमा रही है, इस कारण सुभाषजी रिश्तेदारों व परिचितों के सामने पत्नी को कुछ ज्यादा ही दबा कर रखने की कोशिश करते. अगर खराब मूड में हों तो चार लोगों के बीच पत्नी को अपमानित करने का भी वे मौका नहीं चूकते थे. ऐसा करने से उन की हीनभावना ज्यादा उभर कर सामने आती है, यह उन की समझ में कभी नहीं आया.

कमाया तो उन्होंने ज्यादा नहीं, पर घर में आते 1-1 रुपए का हिसाब वे ही रखते. कहीं भी जरूरत से ज्यादा खर्च करने की बात सुन कर उन के तेवर चढ़ जाते. उन के कंजूस स्वभाव के कारण दोनों के सामूहिक खाते में रकम तो तेजी से बढ़ती गई, पर घर के सदस्यों को कभी कोई ज्यादा खुशी नहीं मिल पाई. घर में सुखसुविधाओं की चीजें बढ़ती गईं पर हर चीज को खरीदने से पहले क्लेश होना लाजिमी था.

उन की शादी के 2 साल बाद बड़ा बेटा संजीव आ गया. मीनाक्षी के न चाहते हुए भी 2 साल बाद राजीव पैदा हो गया. सुभाष परिवार नियोजन के लिए किसी भी किस्म की जहमत उठाने को तैयार नहीं थे, इसलिए मीनाक्षी ने राजीव के होने के समय अपनी ही नसबंदी करा ली थी.

हर प्रमोशन के साथ आफिस में मीनाक्षी की जिम्मेदारियां बढ़ती चली गईं. उसे देर तक दफ्तर में रुकना पड़ जाता था. उस के लिए घर और आफिस की जिम्मेदारियां संभालना बहुत कठिन हो जाता अगर सुभाष ने घर संभालने में उस का पूरा हाथ  न बटाया होता. अपने पति के इस इकलौते गुण की तारीफ मीनाक्षी हर आएगए के सामने दिल से करती थी.

सुभाष ने घरगृहस्थी के काम निबटाने में अच्छी कुशलता हासिल कर ली थी. सुबह बच्चों को स्कूल भेजने के लिए तैयार करने से ले कर उन्हें पढ़ाने, खाना खिलाने, कपड़े बदलवाने जैसे सभी काम वही करते थे. वे खाने के शौकीन तो थे ही, इसलिए धीरेधीरे उन्होंने कई स्वादिष्ठ चीजें बनाने में महारत हासिल कर ली थी.

बड़े हो रहे बच्चों को अनुशासन में रखने के लिए वे गुस्से का इस्तेमाल खूब करते. इस का यह फायदा तो जरूर हुआ कि दोनों बेटे हर परीक्षा में अधिकतर प्रथम आते, पर अपने पिता को देखते ही उन का सहम सा जाना मीनाक्षी को दुखी कर जाता था.

वह कभी इस बाबत सुभाष से कुछ कहती तो वे बड़े रूखे से लहजे में जवाब देते, ‘हम दोनों के खूनपसीने की कमाई को आजकल चल रही फैशन की अंधी दौड़ में बरबाद करने के सपने मैं अपने दोनों बेटों को कभी नहीं देखने दूंगा. तुम भी इस मामले में उन्हें किसी भी तरह की शह देने की कोशिश मत करना.’

संजीव और राजीव को छोटी उम्र में ही कुछ इस तरह के लैक्चर सुनने को मिलने लगे थे, ‘अगर तुम्हें कोई भी कीमती या खास चीज चाहिए तो पहले परीक्षा में बहुत अच्छे नंबर लाओ और जो भी काम करने को दिया जाता है उसे जिम्मेदारी से निभाओ. इस घर में तुम्हें मुफ्त में कुछ नहीं मिलेगा और न लाड़प्यार से बिगाड़ा जाएगा, ये अच्छी तरह से समझ लो तुम दोनों.

‘ज्यादा दिखावा करना मूर्खतापूर्ण होने के साथसाथ बच्चों के अंदर गलत आदतें और संस्कार डालना है. हम ज्यादा दिखावा करेंगे तो दुनिया भर के मंगते हमारे घर में जमा होना शुरू हो जाएंगे. अपनी गांठ में पैसा बचा कर रखना समझदारी है. तुम अपने आफिस को संभालो और घर व बच्चों की चिंता मुझे करने दो. दुनियादारी की समझ है नहीं और चली हैं मुझे समझाने.’ ऐसे मौकों पर सुभाष गुस्सा हो कर मीनाक्षी की बोलती बंद कर देते थे.

सुभाष की तीखी जबान और कंजूसी की आदत के चलते घर के लोग ही नहीं, बल्कि हर रिश्तेदार भी उन से नाराज रहता था. तगड़े बैंक बैलेंस ने उन के अंदर किसी से कोई भी उलट या अपमानजनक बात कह देने का दुस्साहस पैदा कर दिया था.

एक बार मीनाक्षी के बड़े भैया ने 50 हजार रुपए अपने जीजाजी से मांगे थे. मीनाक्षी अपने भाई की सहायता करना चाहती थी पर सुभाष ने साफ इनकार कर दिया.

अपने भाई के दबाव में आ कर मीनाक्षी ने जब इस विषय पर कहनासुनना जारी रखा, तो एक दिन सुभाष ने अपने साले को ससुराल में ही जा कर भलाबुरा कह दिया था.

‘साले साहब, अपनी बहन को मेरी पीठ पीछे अगर किसी तरह की उलटी पट्टी पढ़ा कर मेरा माल खींचने की कोशिश की तो ठीक नहीं होगा. मेरा इतना कहना आप के लिए काफी होना चाहिए कि दूसरों से अपनी इज्जत कराना इनसान के अपने हाथ में होता है,’ सुभाष की इस धमकी का यह असर हुआ कि उन के साले ने करीब 5 साल तक उन के घर की दहलीज नहीं लांघी थी.

सुभाष के अपने छोटे भाई का बिजनेस हमेशा घाटे में चलता था. उसे अपने बड़े भाई से कोई आर्थिक सहायता मिली भी तो कर्जे के रूप में मिली और उसे 1-1 पाई लौटानी पड़ी थी. हर महीने अगर वह तय राशि लौटाने नहीं आता था तो सुभाषजी उस के घर पहुंच कर उसे डांटने और झगड़ा करने से नहीं चूकते थे.

सुभाषजी की कंजूसी का यह फायदा हुआ कि उन्होंने बड़ी जल्दी 200 गज के प्लाट पर एकमंजिला मकान बनवा लिया था. मकान बनवाने के 2 साल बाद कार भी ले ली थी. अपने दोनों बेटों को इंजीनियर बनाने में किसी आर्थिक कठिनाई का सामना उन्हें नहीं करना पड़ा था.

मीनाक्षी मन मार कर उन के साथ जी रही थी. उस का घूमनेफिरने और लोगों से मिलनेजुलने का शौक अपने पति के आलसी व तीखे स्वभाव के कारण कभी पूरा नहीं हो सका था. उसे हमेशा लगता था कि वह अपने पति के अजीबोगरीब व्यक्तित्व के कारण अपनी सहेलियों व सहयोगियों के सामने शर्मिंदा होती है.

शास्त्रीजी ने जब पगड़ी की रस्म शुरू करने की घोषणा की तो मीनाक्षी झटके से अतीत की यादों से निकल आई थी.

कार्यक्रम समाप्त हो जाने के बाद कई औरतें विदा लेते हुए मीनाक्षी के गले लग कर रोईं, पर मीनाक्षी को एक बार भी दिल से रोना नहीं आया. जीवनसाथी हमेशा के लिए साथ छोड़ कर चला गया है, यह तथ्य उसे बहुत ज्यादा पीड़ा नहीं पहुंचा रहा था. उसे लग रहा था कि किसी के भी दिल में अपनी जगह न बना पाने वाला इनसान अपनी पत्नी के दिल से भी खुद को दूर रखने में सफल रहा था.

सब मेहमानों के चले जाने के बाद घर के करीबी लोग रह गए थे. रात 10 बजे के करीब वह अपने कमरे में आराम करने को लेटी ही थी कि उस के बड़े भैया मिलने आ पहुंचे.

‘‘मीनू, तुम्हें जो भी इकट्ठा मिला है या मिलेगा, उसे संभाल कर रखना जरूरी है. मैं अपने अकाउंटेंट को कल ही यहां भेज देता हूं. वह बैंक और बीमे आदि के सारे कागज देख लेगा,’’ बड़े भैया ने फौरन काम की बात करनी शुरू कर दी थी.

‘‘अभी मेरा दिमाग बिलकुल काम नहीं कर रहा है, भैया. उसे कुछ दिन बाद भेज देना,’’ थकी हुई मीनाक्षी को न जाने क्यों उन का इस वक्त रुपएपैसों की बात करना अच्छा नहीं लगा था.

‘‘वह रविवार को आ जाएगा. बड़े भाई के होते हुए तुम्हें किसी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है,’’ बड़े भैया ने उस के सिर पर हाथ रख कर हौसला बंधाया और फिर कमरे से बाहर चले गए थे.

उन के जाते ही मीनाक्षी का देवर सचिन उस की इजाजत ले कर कमरे के अंदर आ गया.

सामने पड़ी कुरसी पर बैठने के बाद सचिन ने संजीदा लहजे में बोलना शुरू किया, ‘‘भाभी, अब इस घर में अकेले रहने में बहुत समस्याएं आएंगी. अगर रातबिरात किसी तरह की जरूरत पड़ी तो आप किसे पुकारोगी?’’

‘‘हमारे पड़ोसी अच्छे हैं और…’’

‘‘भाभी, पड़ोसी पड़ोसी होते हैं,’’ सचिन ने आवेश भरे लहजे में उसे टोक दिया, ‘‘वे अपनों की जगह कभी नहीं ले सकते हैं. आप मेरी एक सलाह मानोगी?’’

‘‘कैसी सलाह?’’

‘‘सीमा और मैं यहां आप के पास आ कर रहना शुरू कर देते हैं. संजीव और राजीव बाहर नौकरी कर रहे हैं और मुझे नहीं लगता कि वे कभी सैटल होने के लिए यहां लौटेंगे. मैं छत पर 2 कमरों का सैट अपने खर्चे से बनवा देता हूं. हमारे यहां आ कर साथ रहने से आप को सहारा हो जाएगा. हमारे बच्चों के स्कूल यहां से बहुत पास में हैं, सो यहां शिफ्ट करने में हमारा फायदा भी है.’’

‘‘मैं संजीव और राजीव से सलाह कर के तुम्हें जवाब देती हूं,’’ सिर में तेज दर्द शुरू हो जाने के कारण मीनाक्षी को बोलने में कठिनाई हो रही थी.

‘‘आप अपनों का सहारा मिलने की बात पर जोर दोगी, तो वे कमरे बनवाने की बात जरूर मान जाएंगे,’’ उन्हें ऐसी सलाह दे कर सचिन बाहर चला गया था.

सचिन चाचा के जाते ही उस के दोनों बेटे संजीव और राजीव एकसाथ कमरे में आ गए थे. दोनों ही टैंशन और हिचकिचाहट का शिकार बने नजर आ रहे थे.

‘‘तुम दोनों मुझ से कोई खास बात करने आए हो न?’’ मीनाक्षी ने यह सवाल पूछ कर उन्हें अपने मन की बात फौरन कह देने की सुविधा उपलब्ध करा दी थी.

‘‘मम्मी, अब आप के यहां अकेले रहने की कोई तुक नहीं है. हम दोनों को लगता है कि अब इस मकान को बेच कर आप को हमारे साथ रहना शुरू कर देना चाहिए,’’ कहते हुए राजीव भावुक हो उठा.

‘‘अब आफिस में और ज्यादा खटने की जरूरत भी नहीं है. आप जल्दी रिटायरमैंट लेने की अरजी दे डालो,’’ यह सलाह संजीव ने दी.

‘‘अभी तो मेरी सर्विस के 2 साल बचे हैं. शायद 1 और प्रमोशन भी मिल…’’

‘‘मम्मी, अब प्रमोशन के बदले आप को अपनी सेहत का ज्यादा ध्यान रखना चाहिए. पूना में मेरे घर के पीछे खाली जमीन पड़ी है. उस की देखभाल कर आप अपना बागबानी का शौक पूरा करो और अपना ब्लड प्रैशर भी ठीक रखो.’’

‘‘आप को यह जगह छोड़ कर अब हमारे पास रहना शुरू करना ही पड़ेगा,’’ संजीव ने जब दबाव बनाने को अपने मुंह से निकले हरेक शब्द पर बहुत जोर डाला तो मीनाक्षी मन ही मन खीज उठी थी.

कुछ पल सोचविचार में खोए रहने के बाद वह झटके से उठ खड़ी हुई और बोली, ‘‘चलो, ड्राइंगरूम में एकसाथ बैठ कर कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर फैसला कर लेते हैं.’’

वे दोनों बड़ी अनिच्छा से उस के पीछे ड्राइंगरूम की तरफ चल पड़े थे. मीनाक्षी ने ड्राइंगरूम की तरफ जाते हुए अपने भाई, देवर और देवरानी को भी साथ ले लिया था.

जब सब लोग बैठ गए तो मीनाक्षी ने खड़ेखड़े ही बोलना शुरू किया, ‘‘इस में कोई शक नहीं कि आप सब लोग मेरे करीबी भी हैं और शुभचिंतक भी, पर फिर भी मैं एक बात आप सभी से कहना चाहती हूं. यह अच्छी बात है कि आप सब को मेरे सुखदुख की चिंता है, पर यह भी समझ लें कि उन के जाने के बाद मैं कमजोर और असहाय नहीं हो गई हूं. जहां तक मेरा मार्गदर्शन करने की बात है तो जब मैं आंख बंद करती हूं तो वे मुझे हर उलझन को सुलझाने की सलाह देते नजर आने लगते हैं.

‘‘मेरे हित को ध्यान में रख कर आप सभी के द्वारा दी गई सारी सलाह और सुझावों के बारे में मैं एक ही बात कहना चाहूंगी. मुझ से कुछ कराने की सलाह देने से पहले आप सब यह जरूर सोचें कि अगर वे जिंदा होते तो आप की सलाह को ले कर उन की क्या प्रतिक्रिया होती.

‘‘मैं आप सब से साफसाफ कह देना चाहती हूं कि जो काम वे अपने सामने नहीं होने देते, उसे मेरे ऊपर दबाव डाल कर कराने की कोशिश न करें. वे किसी हालत में अपना पैसा किसी और को संभालने के लिए नहीं देते…न इस मकान के ऊपर 2 कमरों का सैट किसी को बनाने देते और न ही इस मकान को बेच कर अपने बेटों के पास रहने जाते.

‘‘अगर अब भी आप लोगों के पास मेरे हित का कोई ऐसा सुझाव बचता है जो उन्हें भी मान्य होता, तो कल सुबह उसे आप मुझे अवश्य बताएं. इस वक्त मैं बहुत थक गई हूं और सोना चाहती हूं. आप सब भी आराम करें. गुड नाइट.’’

एक नजर उन सभी करीबी लोगों के नाराज चेहरों पर डाल कर मीनाक्षी अपने कमरे की तरफ चल पड़ी थी. अपने दिवंगत पति के बारे में इस वक्त वह नए ढंग से सोच रही थी. उसे वे बहुत ज्यादा याद आ रहे थे.

मीनाक्षी के जेहन में एक चित्र जो बारबार उभर रहा था, वह खेतों में लगाए गए स्केअर क्रो का था. उस डरावनी सी शक्ल और बिना शरीर वाले पुतले को हवा से हिलताडुलता देख कर पक्षी खेत की फसल को नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं.

कमरे में पहुंचने के बाद अपने ‘स्केअर क्रो’ को याद कर वह पहली बार बिलखबिलख कर रो पड़ी थी.

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