लेखक- कृतिका केशरी

कविता ने ससुराल में कदम रखते ही अपनी सास के पैर छुए तो वह मुसकरा कर बोलीं, ‘‘बेटी, अपने जेठजी के भी पैर छुओ.’’

कविता राघव के पैरों पर झुक गई तो वह अपने स्थान से हटते हुए बोले, ‘‘अरे, बस…बस कविता, हो गया, तुम थक गई होगी. जाओ, आराम करो.’’

राघव को देख कर कविता को याद आ गया कि जब दोनों भाई उसे देखने पहली बार आए थे तो उस ने राघव को ही रंजन समझा था. वह तो उसे बाद में पता चला कि राघव रंजन का बड़ा भाई है और उस की शादी राघव से नहीं रंजन से तय हुई है. कविता की इस गलत- फहमी की एक वजह यह भी थी कि देखने में रंजन अपने बड़े भाई राघव से बड़ा दिखता है. उस के चेहरे पर बड़े भाई से अधिक प्रौढ़ता झलकती है.

ससुराल आने के कुछ दिनों बाद ही कविता को पता चला कि उस के जेठ राघव अब तक कुंआरे हैं और उन के शादी से मना करने पर ही रंजन की शादी की गई है.

एक दिन कविता ने पूछा था, ‘‘रंजन, जेठजी अकेले क्यों हैं? उन्होंने शादी क्यों नहीं की?’’

तब रंजन ने कविता को बताया कि मेरे पिताजी का जब देहांत हुआ तब राघव भैया कालिज की पढ़ाई पूरी कर चुके थे और मैं स्कूल में था. राघव भैया पर अचानक ही घर की सारी जिम्मेदारी आ गई थी. जैसेतैसे उन्हें नौकरी मिली, फिर भैया ने पत्राचार से एम.बी.ए. किया और तरक्की की सीढि़यां चढ़ते ही गए. उन्होंने ही मुझे पढ़ायालिखाया और अपने पैरों पर खड़े होने के काबिल बनाया. जब उन की शादी की उम्र थी तब वह इस परिवार की जरूरतों को पूरा करने में व्यस्त थे और जब उन्हें शादी का खयाल आया तो रिश्ते आने बंद हो चुके थे. बस, फिर उन्होंने शादी का इरादा ही छोड़ दिया. कविता राघव भैया के सम्मान को कभी ठेस न पहुंचाना.’’

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यह सब जानने के बाद तो कविता के मन में राघव के लिए आदर के भाव आ गए थे.

एक दिन कविता राघव को चाय देने गई तो देखा कि वह कोई पेंटिंग बना रहे हैं. कविता ने पूछा, ‘‘भैया, आप पेंटिंग भी करते हैं?’’

राघव ने हंस कर कहा, ‘‘हां, इनसान के पास ऐसा तो कुछ होना चाहिए जो वह सिर्फ अपनी संतुष्टि के लिए करता हो. बैठो, तुम्हारा पोटे्रट बना दूं, फिर बताना मैं कैसी पेंटिंग करता हूं.’’

कविता बैठ गई, फिर अपने बालों पर हाथ फिराते हुए बोली, ‘‘क्या आप किसी की भी पेंटिंग बना सकते हैं?’’

राघव ने एक पल को उसे देखा और कहा, ‘‘कविता, हिलो मत…’’

उन की बात सुन कर कविता बुत बन गई. उसे खामोश देख कर राघव ने पूछा, ‘‘कविता, तुम चुप क्यों हो गईं?’’

कविता ने ठुनकते हुए कहा, ‘‘आप ने ही तो मुझे चुपचाप बैठने को कहा है.’’

राघव ने जोरदार ठहाका लगाया तो कविता बोली, ‘‘जानते हैं, कभीकभी मेरा भी मन करता है कि मैं फिर से डांस करना और लिखना शुरू कर दूं.’’

राघव ने आश्चर्य से कहा, ‘‘अच्छा, तो तुम डांसर होने के साथसाथ कवि भी हो. अच्छा बताओ क्या लिखती हो?’’

‘‘कविता.’’

राघव ने मुसकरा कर कहा, ‘‘मैं ने तुम्हारा नाम नहीं पूछा.’’

‘‘मैं ने भी अपना नाम नहीं बताया है, बल्कि आप को यह बता रही हूं कि मैं कविता लिखती हूं.’’

राघव ने कहा, ‘‘कुछ मुझे भी सुनाओ, क्या लिखा है तुम ने.’’

कविता ने सकुचाते हुए अपनी एक कविता राघव को सुनाई और प्रतिक्रिया जानने के लिए उन की ओर देखने लगी, तो वह बोले, ‘‘कविता, तुम्हारी यह कविता तो बहुत ही अच्छी है.’’

कविता ने खुश होते हुए कहा, ‘‘आप को सच में अच्छी लगी?’’ फिर अचानक ही उदास हो कर वह बोली, ‘‘पर रंजन को तो यह बिलकुल पसंद नहीं आई थी. वह तो इसे बकवास कह रहे थे.’’

राघव कविता के सिर पर स्नेह से हाथ फिराते हुए बोले, ‘‘वह तो पागल है, तुम उस की बात पर ध्यान मत दिया करो और मैं तो कहूंगा कि तुम लिखो.’’

रात को कविता ने रंजन से कहा, ‘‘तुम मेरी कविताओं का मजाक बनाते थे न, पर जेठजी को तो बहुत पसंद आईं, देखो, उन्होंने मेरा कितना सुंदर स्केच बनाया है.’’

रंजन ने बिना स्केच की ओर देखे, फाइलें पलटते हुए कहा, ‘‘अच्छा है.’’

कविता नाराज होते हुए बोली, ‘‘तुम्हें तो कला की कोई कद्र ही नहीं है.’’

रंजन हंस कर बोला, ‘‘तुम और भैया ही खेलो यह कला और साहित्य का खेल, मुझे मत घसीटो इस सब में.’’

रंजन की बातों से कविता की आंखों में आंसू आ गए तो वह चुपचाप जा कर लेट गई. थोड़ी देर बाद कविता के गाल और होंठ चूमते हुए रंजन बोला, ‘‘तुम्हारी कविता…और वह स्केच…दोनों ही सुंदर हैं,’’ इतना कहतेकहते उस ने कविता को अपने आगोश में ले लिया.

अगले दिन रंजन आफिस से जाते समय कविता से बोला, ‘‘सुनो, बहुत दिनों से हम कहीं घूमने नहीं गए, आज शाम को तुम तैयार रहना, फिल्म देखने चलेंगे.’’

पति की यह बात सुन कर कविता खुश हो गई और वह पूरे दिन उत्साहित रही, फिर शाम 5 बजे से ही तैयार हो कर वह रंजन का इंतजार करने लगी.

राघव ने उसे गौर से देखा, धानी रंग की साड़ी में कविता सचमुच बहुत सुंदर लग रही थी. वह पूछ बैठे, ‘‘क्या बात है कविता, आज कहीं जाना है क्या?’’

कविता मुसकरा कर बोली, ‘‘आज रंजन फिल्म दिखाने ले जाने वाले हैं.’’

धीरेधीरे घड़ी ने 6 फिर 7 और फिर 8 बजा दिए, पर रंजन नहीं आया. कविता इंतजार करकर के थक चुकी थी. राघव ने देखा कि कविता अनमनी सी खड़ी है, तो पल भर में उन की समझ में सारा माजरा आ गया. उन्हें रंजन पर बहुत गुस्सा आया. फिर भी वह हंस कर बोले, ‘‘कोई बात नहीं कविता, चलो, आज हम दोनों आइसक्रीम खाने चलते हैं.’’

कविता ने भी बेहिचक बच्चों की तरह मुसकरा कर हामी भर दी.

राघव ने चलतेचलते कविता से कहा, ‘‘तुम रंजन की बातों का बुरा मत माना करो, वह जो कुछ कर रहा है, सब तुम्हारे लिए ही तो कर रहा है.’’

कविता व्यंग्य से बोली, ‘‘वह जो कर रहे हैं मेरे लिए कर रहे हैं? पर मेरे लिए तो न उन के पास समय है न मेरी परवा ही करते हैं. अगर मैं ही न रही तो उन का यह किया किस काम आएगा?’’

कविता के इस सवाल का राघव ने कोई जवाब नहीं दिया. शायद वह जानते थे कि कविता सही ही कह रही है.

वे दोनों आइसक्रीम खा रहे थे कि एक भिखारी उन के पास आ कर बोला, ‘‘2 दिन से भूखा हूं, कुछ दे दो बाबा.’’

राघव ने जेब से 10 रुपए निकाल कर उसे दे दिए.

वह आशीर्वाद देता हुआ बोला, ‘‘आप दोनों की जोड़ी सलामत रहे.’’

कविता ने एक पल को राघव की ओर देखा और अपनी नजरें झुका लीं.

दोनों घर पहुंचे तो देखा कि रंजन आ चुका था. कविता को देखते ही रंजन भड़क कर बोला, ‘‘कहां चली गई थीं तुम? कितनी देर से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं, अब जल्दी चलो.’’

कविता ने भी बिफर कर कहा, ‘‘मुझे पूरी फिल्म देखनी थी, उस का अंत नहीं. मैं बहुत थक गई हूं, अब मुझे कहीं नहीं जाना है.’’

रंजन की आंखें क्रोध से दहक उठीं, ‘‘क्या मतलब है इस का? नहीं जाना था तो पहले बतातीं, मैं अपना सारा काम छोड़ कर तो नहीं आता…’’

कविता की आंखों में आंसू छलक आए, ‘‘काम, काम और बस काम…मेरे लिए कभी समय होगा तुम्हारे पास या नहीं? मैं 5 बजे से इंतजार कर रही हूं तुम्हारा, वह कुछ नहीं…तुम्हें 5 मिनट मेरा इंतजार करना पड़ा तो भड़क उठे?’’

गुस्से से पैर पटकते हुए रंजन बोला, ‘‘तुम्हारी तरह मेरे पास फुरसत नहीं है और फिर यह सब मैं तुम्हारे लिए नहीं तो किस के लिए करता हूं?’’

कविता ने शांत स्वर में कहा, ‘‘मैं तुम से बस, तुम्हारा थोड़ा सा समय मांगती हूं, वही दे दो तो बहुत है, और कुछ नहीं चाहिए मुझे,’’ इतना कह कर कविता अपने कपड़े बदल कर लेट गई.

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राघव ने उन दोनों की बातें सुन ली थीं, उन्हें लगा कि दोनों को अकेले में एकदूसरे के साथ समय बिताना बहुत जरूरी है,  अगले दिन शाम को जब राघव आफिस से आए तो बोले, ‘‘मां, मैं आफिस के काम से 15 दिन के लिए बनारस जा रहा हूं, तुम भी चलो मेरे साथ, रास्ते में तुम्हें मौसी के पास इलाहाबाद छोड़ दूंगा और लौटते हुए साथ ही वापस आ जाएंगे.’’

राघव की बात पर मां तैयार हो गईं. कविता ने जब यह सुना तो एक पल को वह उदास हो गई. वह मां से बोली, ‘‘मैं  अकेली पड़ जाऊंगी मां, आप मत जाओ.’’

मां ने कविता को समझाते हुए कहा, ‘‘रंजन तो है न तेरा खयाल रखने के लिए, अब कुछ दिन तुम दोनों एकदूसरे के साथ बिताओ.’’

अगले दिन राघव और मां चले गए. रंजन आफिस जाने लगा तो कविता अपने होंठों पर मुसकान ला कर बोली, ‘‘आप आज आफिस मत जाओ न, कितने दिन हो गए, हम ने साथ बैठ कर समय नहीं बिताया है.’’

रंजन बोला, ‘‘नहीं, कविता, आज आफिस जाना बहुत जरूरी है, पर मैं शाम को जल्दी आ जाऊंगा, फिर हम कहीं बाहर खाना खाने चलेंगे.’’

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