लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

नगमा आजाद खयाल की थी और वह मायके में सब को बहुत पसंद थी, मगर मुझे और मेरे परिवार वालों को इस तरह की आजाद परिंदों की तरह उड़ान भरने जैसी बातें कम ही रास आती थीं. नगमा ने अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रैजुएशन किया था और इतनी पढ़ाई उस के मायके से ले कर मेरे घर तक में किसी ने भी नहीं की थी.

आज नगमा को छोड़ कर कोई भी औरत हमारे घर में स्कूटी चलाना नहीं जानती है. बाजार स्कूटी से जाना और घरेलू सामान को खुद जांचपरख कर खरीदना उस को बेहद पसंद हैं. खरीदारी के लिए अकसर नगमा शहर के नामी मौल में जाना पसंद करती है पर सच कहूं तो मौल है बड़ी नामुराद जगह, वहां तो आदमी जरूरत के सामान से ज्यादा फालतू का सामान खरीद ले आता है. इस सामान के साथ यह औफर है तो उस सामान के साथ वह मुफ्त में मिल रहा है. अरे साहेब, जहां आज के दौर में पानी मुफ्त नहीं मिल रहा है तो कोई
कुछ और सामान मुफ्त मिलने की उम्म्मीद भी कैसे कर सकता है भला?

मौल के अंदर ऊपर वाले फ्लोर तक जाने के लिए नगमा हमेशा ही ऐस्कलैटर का प्रयोग करती है. अब भला यह भी कोई अच्छी तकनीक है, बस पैर जोड़ कर खड़े हो जाओ और ऊपर पहुंचने का इंतजार करो. कहीं पैर आगे बढ़ाने में जरा सा भी चूक गए तो मुंह के बल गिरने से कोई रोक नहीं सकता. अरे, कम से कम बगल में ही सुंदर सी सीढ़ियां भी तो बना रखी हैं, उन को काम में लाओ तो हाथपैरों में हरकत बनी रहे.

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