सामने महेश खड़ा था. आंखों से झरझर आंसू बहाता हुआ, अपमानित सा, ठगा हुआ, पिटा हुआ सा, अपने प्रेम की यह हालत देखते हुए... स्वयं को लुटा हुआ महसूस कर, हिचकियों के साथ रो रहा था.

मैं उसे सामने देख कर अवाक् थी. मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मेरी वीरान जिंदगी में अब कोई आया है. ‘‘सपना...’’ रुंधे गले से महेश मुश्किल से बोल पाया.

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